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Categories: बीच बहस

महंगा पड़ गया मायावती के लिए बीजेपी के समर्थन का बयान

बसपा सुप्रीमो मायावती भाजपा को खुला समर्थन देने की घोषणा एक हफ्ते तक भी नहीं बरकरार रह सकीं और मुसलमानों के आक्रोश से घबराकर उनको कहना पड़ा कि पार्टी कभी भी भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेगी। राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की कथित साजिश’ पर गुस्साई मायावती ने कहा कि वह सपा को हराने के लिए भाजपा को भी सपोर्ट करने से नहीं हिचकेंगी। तब सियासी गलियारों में यह चर्चा होने लगी कि कहीं मायावती आगामी चुनावों में भाजपा के साथ गठबंधन का तो मन नहीं बना रही हैं। बहरहाल मायावती इस बयान से हो चुकी क्षति से कैसे उबरती हैं यह शोध का विषय बन गया है।

मायावती की इस घोषणा से बिहार के चुनाव में उनके ओवैसी और उपेन्द्र कुशवाहा से गठबंधन की मुसलमानों में पूरी तरह हवा निकल गयी है और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में बसपा प्रत्याशियों को भाजपा के डमी प्रत्याशी का तमगा मिल गया है।

यूपी में विधानसभा की सात सीटों पर मंगलवार को होने वाले मतदान से एक दिन पहले मायावती ने भाजपा के साथ मिले होने के आरोपों पर सफाई दी। माया ने कहा कि उनकी पार्टी भाजपा की विचारधारा के विपरीत है और भविष्‍य में विधानसभा या लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ कभी गठबंधन नहीं करेगी। मायावती ने कहा कि उपचुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस हमारी पार्टी के खिलाफ साजिश में लगी है और गलत ढंग से प्रचार कर रही है ताकि मुस्लिम समाज के लोग बसपा से अलग हो जाएं। बसपा सांप्रदायिक पार्टी के साथ समझौता नहीं कर सकती है। हमारी विचारधारा सर्वजन धर्म की है और भाजपा की विपरीत विचारधारा है। वह राजनीति से संन्यास ले सकती हैं, लेकिन सांप्रदायिक, जातिवादी और पूंजीवादी विचारधारा रखने वाली ऐसी पार्टियों के साथ नहीं जाएंगी।

उन्‍होंने विस्तार में जाए बिना कहा कि 1995 में जब भाजपा के समर्थन से मेरी सरकार बनी तो मथुरा में भाजपा और आरएसएस के लोग नई परंपरा शुरू करना चाहते थे, लेकिन मैंने उसे शुरू नहीं होने दिया और मेरी सरकार चली गई। साल 2003 में मेरी सरकार में जब भाजपा ने लोकसभा चुनाव में गठबंधन के लिए दबाव बनाया तब भी मैंने स्‍वीकार नहीं किया। भाजपा ने सीबीआई और ईडी का भी दुरुपयोग किया, लेकिन मैंने कुर्सी की चिंता नहीं की।

मायावती को यह सफाई इसलिए भी देनी पड़ रही है क्योंकि 1995 साल 2002 में मायावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं थीं और जब से केंद्र में भाजपा सरकार है तब से मायावती का रुख प्रो सरकार है। आम जन में पहले से ही यह चर्चा है कि बहिन जी का गला सीबीआई और ईडी के चंगुल में है इसलिए रस्म अदायगी के अलावा मायावती केंद्र सरकार का विरोध कर ही नहीं सकतीं।

सपा अध्‍यक्ष और पूर्व मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने पिछले दिनों मायावती पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगाते हुए कहा था कि राज्‍यसभा चुनाव में भाजपा और बसपा के गठबंधन को उजागर करने के लिए ही समाजवादी पार्टी ने निर्दलीय उम्‍मीदवार का समर्थन किया था। सपा ने निर्दलीय प्रकाश बजाज को समर्थन दिया था, जिनका नामांकन बाद में निरस्‍त हो गया ।

उप्र में दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा मायावती का है लेकिन भाजपा को उनके समर्थन की घोषणा खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। मायावती की यह समझौता-परस्त राजनीति तो शुरू से सामने आती रही है पर जब मोदी सरकार की कारपोरेट-परस्त राजनीति, दलित, आदिवासी, मजदूर, किसान और अति पिछड़े वर्गों व अल्पसंख्यक विरोधी नीतियों पर मायावती की चुप्पी रही है। निजीकरण के कारण दलितों का सरकारी नौकरियों में आरक्षण लगभग खत्म हो गया है। नए कृषि कानूनों से किसान परेशान हैं तो श्रम कानूनों के शिथिलीकरण से मजदूरों को मिलने वाले सारे संरक्षण लगभग समाप्त हो गए हैं। दलितों और आदिवासियों का शोषण बढ़ा है।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हिटलरी प्रहार हो रहे हैं।

ऐसे समय में मायावती की चुप्पी व समझौता वादी राजनीति पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि दलितों और आदिवासियों के मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले तथा उनकी पैरवी करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों तक को माओवादी व राष्ट्र विरोधी करार देकर तरह-तरह के आरोपों में जेल में डाला जा रहा है, सामंती व पूंजीवादी ताकतें हमलावर हैं पर मायावती की पता नहीं किस मजबूरी में आवाज बंद है।

मायावती पर यह आरोप सालों से लग रहे हैं कि वह भाजपा के प्रति नरम हैं या अंदरखाने भाजपा से उनकी साठगांठ है।

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा के चुनाव में जब भाजपा ने संख्या बल के बावजूद बसपा के लिए एक सीट छोड़ी, तो यह मिलीभगत सतह पर आ गयी और बसपा के कई विधायकों ने विद्रोह कर दिया जिसमें प्रयागराज के प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र के बसपा विधायक मुज्तबा सिद्दीकी भी शामिल थे जो उस समय नहीं टूटे थे जब बड़ी संख्या में बसपा विधायकों ने बगावत की थी और मुलायम सरकार में मंत्री बन गये थे।

एक के बाद एक चुनाव में बसपा की हार हो रही है और मायावती से एक विशेष जाति के अलावा अन्य दलित वर्गों का पूरी तरह मोहभंग हो चुका है। चन्द्रशेखर रावण की भीम आर्मी के उभरने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मायावती का कोर वोट बैंक पूरी तरह उनके हाथ से निकलता जा रहा है। वर्ष 2007 में यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ़ उसके बाद लगातार गिरता ही गया।

साल 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्हें जहां 206 सीटें मिली थीं, वहीं साल 2012 में महज़ 80 सीटें मिलीं। साल 2017 में यह आंकड़ा 19 पर आ गया।साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें राज्य में एक भी सीट हासिल नहीं हुई। इस दौरान बसपा का न सिर्फ़ राजनीतिक ग्राफ़ गिरता गया, बल्कि उसके कई ऐसे नेता तक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए जो न सिर्फ़ क़द्दावर माने जाते थे बल्कि पार्टी की स्थापना के समय से ही उससे जुड़े थे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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This post was last modified on November 3, 2020 7:55 pm

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