मध्य प्रदेश में सामने आ गया हिंदू और हिंदुत्व के बीच का टकराव

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अभी चंद रोज़ पहले ही राहुल गांधी ने हिंदू और हिंदुत्व की मीमांसा करते हुए कहा था गांधी हिंदू थे और उनको मारने वाले गोडसे हिंदुत्ववादी थे। बेहद सरल शब्दों में एक ज़रूरी और महत्वपूर्ण संदेश उन्होंने लोगों को दिया था तब कुछ लोगों ने उनसे धर्म के मुद्दे पर न उलझने की सलाह दी थी। लेकिन गत दिनों मध्यप्रदेश में एक‌ कबीर पंथी हिंदू को मार डाला हिंदुत्व वादियों ने। यह राहुल गांधी की बात को समझने के लिए काफ़ी है। अब हिंदू भी एक बार फिर गोडसेवादियों निशाने पर है।

घटना एमपी के मन्दसौर जिले के भैंसोदा मंडी की है जहां बजरंगदल और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने संत रामपाल के अनुयायियों को जो दलितों के दहेज रहित विवाह कार्यक्रम करवा रहे थे। कार्यक्रम में घुसकर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी जिसमें देवीलाल नामक एक व्यक्ति की मौत हो गई और तीन घायल हो गए। घटना के बाद हिन्दू समाज के लोग इन हिंदुत्ववादियों की खोज कर रहे हैं। वजह क्या थी कारण अब तक स्पष्ट नहीं हुआ है। किंतु पत्रिका अख़बार के मुताबिक़ संत रामपाल के अनुयायी जो इस वैवाहिक आयोजन में शामिल थे, ने पुलिस को जानकारी दी कि उपद्रवी यह आरोप लगा रहे थे कि यह विवाह धर्म विरुद्ध है। पुलिस इसे एक सामान्य घटना के तौर पर देख रही है लेकिन इसकी वजहें काफ़ी गहरी हैं तथा उनके पीछे सामाजिक और राजनैतिक ताकतें नज़र आ रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक संत रामपाल क्रांतिकारी कवि कबीर के अनुयायी हैं और उनके शिष्य धर्म के नाम पर पाखंड का विरोध करते हैं। यहां यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि शायद ऐसे ही किसी मामले पर ये प्रगतिशील सोच आड़े आ गई होगी। कबीर तो कबीर थे उनके निशाने पर केवल पाखंडी हिंदू ही नहीं बल्कि तत्कालीन समय के मुसलमान भी थे। भक्तिकालीन संतों ने सनातन धर्म की विकृतियों का भी खुलकर विरोध किया था। इसलिए समाज के कथित निचले तबके के लोग जो वर्ण व्यवस्था से पीड़ित थे इनकी ओर आकर्षित हुए। कबीर के नाम को लेकर अनेक डेरे और संस्थाएं बन गई हैं। ऐसे ही एक डेरे का यह कथित संत रामपाल भी है। जिनकी वजह से हिंदुत्ववादी लोगों का क्रोध जागृत हो गया और एक व्यक्ति को अपनी जान खोनी पड़ी।

जैसा कि समाचार पत्र पत्रिका के अनुसार हमलावर आयोजन को धर्म विरुद्ध बता रहे हैं वहीं पीड़ित पक्ष इसे रीति रिवाज के अनुसार विवाह होना बता रहा है। अब सवाल यह है कि क्या दोनों हिंदूवादी संगठन दहेज के न लेन-देन को धर्म विरोधी बता रहे थे अथवा धार्मिक संस्कारों को? उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए था। वैसे वैवाहिक, धार्मिक परंपराएं अलग-अलग सामाजिक, जातीय समूहों में भिन्न-भिन्न रही हैं। कौन सा समाज किस रीति से विवाह आयोजित करता है, यह उनका निजी मामला है। इससे न तो किसी को एतराज़ होना चाहिए, न ही विवाद करना चाहिए।

सनातन हिंदू धार्मिक परंपरा में वर्ण व्यवस्था आज भी प्रभावशाली है। उसमें कबीर का समायोजन संभव नहीं रहा है। मध्ययुगीन सामंतकालीन भारत में तो कबीर को यह कहने की आजादी थी कि “पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोए… “लेकिन वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी सहिष्णुता संभव नहीं रही है। संत रामपाल पर हिंदू देवी- देवताओं के अपमान का आरोप लगता रहा है। जिसके कारण वे हिंदुत्ववादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं। आरोप है कि संत रामपाल द्वारा प्रकाशित साहित्य में गीता और रामायण पर जो टिप्पणियां की गई हैं, हिंदुत्ववादी उसे अपमानजनक मानते हैं। उन पर दूसरा आरोप है कि वे स्वयं को भगवान कहलाना प्रचारित करते हैं। वे संत कबीर को भी भगवान कहते हैं। सनातनी ईश्वर के अवतरण की परंपरा में यह संभव नहीं है। उनके समर्थकों के अनुसार संत रामपाल समाज सुधारक हैं उन्होंने दहेज प्रथा और नशे से अपने अनुयायियों को मुक्त करवाया है।

वर्ष 2006 में संत रामपाल ने महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित “सत्यार्थ प्रकाश” के कुछ भागों पर आपत्ति व्यक्ति की थी। गुस्साए आर्य समाजियों ने 12 जुलाई 2006 को हरियाणा स्थित उनके सतलोक आश्रम को घेर लिया वहां हुई हिंसा में एक आर्य समाजी की मृत्यु हो गई। संत पर हत्या का आरोप लगा। वर्ष 2008 में वे जमानत पर रिहा हुए।

अदालत के आदेश पर 19 नवंबर 2014 को पुनः जब पुलिस संत को गिरफ्तार करने पहुंची तो उसकी समर्थकों से झड़प हो गई जिसमें 5 महिलाओं और एक बालक की मृत्यु हो गई थी जिसका मुकदमा संत रामपाल पर ही बनाया गया। रामपाल के अनुयाई इसे षड्यंत्र और अन्याय बताते हुए संपूर्ण घटना क्रम की सीबीआई से जांच करवाने की मांग करते रहे हैं। ऐसी घटना हरियाणा के बरवाल स्थित आश्रम में भी हुई। वहां भी घटना का दोषी संत को मानते हुए 11 अक्टूबर 2018 को हिसार की अदालत ने संत रामपाल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

संपूर्ण घटना क्रम की पृष्ठभूमि में जयपुर में राहुल गांधी ने हिंदू और हिंदुत्ववादियों का जो फर्क बताया था, बजरंग दल और विहिप ने उसे सही साबित कर दिया। वरिष्ठ पत्रकार विष्णु बैरागी ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि “यह है हिंदू धर्म और हिंदुत्व के अंतर का प्रभावी उदाहरण। इस घटना में मरने वाला भी हिंदू है और मारने वाला भी हिंदू है। यदि बात हिंदू धर्म की होती तो यह हमला और हत्या होनी ही नहीं चाहिए थी। किंतु मरने वालों का हिंदू धर्म मारने वाले हिंदुत्ववादियों को मंजूर नहीं था, इसलिए जो हिंदुत्ववादी नहीं, वह हिंदू नहीं। जो हिन्दू है वह इसलिए मारा जाएगा कि वह हिंदुत्ववादी नहीं है।”

लगता है संघ और बजरंग दल के हिंदुत्ववाद का पहला असर मध्यप्रदेश में दिखने लगा है। बजरंगियों द्वारा हिंसा का नग्न तांडव करने के बाद वहां हिन्दू वर्सेज बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद हो गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दू और हिंदुत्व की बीमारी का प्रवेश मध्यप्रदेश में भी शुरु हो गया है। समय रहते इस बीमारी को फैलने से रोकना होगा। ख़ास तौर से दलित संगठनों में धर्म के पाखंड से मुक्ति हेतु विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। इस तरफ ध्यान देने की ज़रूरत है, साथ ही इस घटना के तमाम दोषियों को शीघ्र पकड़ने और दंडित करने की जरूरत है। इसे राजनीति का हिस्सा न बनाएं वरना शांति का टापू मध्यप्रदेश भी सुलग सकता है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और टिप्पणीकार हैं। और आजकल जबलपुर में रहती हैं।)

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