विशेष आलेख: अनिश्चितता के बीहड़ में खुलता आत्महत्या का प्रवेशद्वार

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प्रतीकात्मक फोटो।

जीवन के मोह से मनुष्य का बुनियादी लगाव रहा है, पर लगता है, जैसे जीवन से ऊब भी एक ऐतिहासिक तथ्य से कम नहीं। प्राचीन काल में जिंदगी से मुंह मोड़ लेने वाले मनुष्यों का इतिहास कहीं पढ़ने-देखने को नहीं मिलता। अलबत्ता प्राचीन मिस्र के दस्तावेज़ों में पैपिरस की टहनियों से बने कागज़ पर लिखी एक छोटी सी कविता जरूर मिलती है जिसका शीर्षक है- ‘आदमी, जो ज़िंदगी से ऊब गया।’ यह ‘आदि कविता’ एक आदमी की आत्महत्या करने से पूर्व अपने-आपसे बातचीत है। कविता है: 

आज—मौत मेरे सामने प्रत्यक्ष है

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ऐसे—जैसे कोई चिर-रोगी, रोगहीन होने को हो।

जैसे—कोई कारागार से छूटकर

बाहर निकल जाता है….. ।

आज—मौत मेरे सामने प्रत्यक्ष है

जैसे—कमल के फूलों से एक गंध उठती है, 

और जैसे—मदमाती धरती के किनारे

कोई बैठा हो। 

आज—मौत मेरे सामने प्रत्यक्ष है

आदमी, जैसे—अपने घर के लिए तरसा हुआ—

जिसने—अनेकानेक वर्ष

किसी क़ैद में बिताए हैं।

जीवन को एक क़ैद की तरह महसूस करने के अनुभवों से हेरोडोटस भी गुजरे होंगे। यूनान के प्रथम इतिहासकार माने जाने वाले हेरोडोटस ने ईसा से करीब 450 ईसवी पूर्व कहा था, ‘जब जीवन बोझ की तरह हो जाता है, तो मृत्यु ही मनुष्य के लिए एक सहज आश्रय बन जाता है।’ लगभग इन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हुए 2 जुलाई 1962 को ‘फॉर हूम द बेल टोल्स’ जैसे कालजयी उपन्यास के सर्जक अर्नेस्ट हैमिंग्वे ने नोबल पुरस्कार को खूंटी पर टांग कर खुद को गोली मार ली थी। युयुत्सावाद के प्रवर्तक कवि शलभ श्री राम सिंह ने भी अपने स्यूइसाइड नोट में हैमिंग्वे की ‘अपनी शर्तों पर यह संसार छोड़ कर चले जाने’ की बात दोहराई और चले गए। 

प्रतीकात्मक फोटो।

बहुत पुरानी बात है। एक बार मैं रात करीब दो बजे अपने पश्चिम विहार दिल्ली वाले फ्लैट पर पहुंचा था तभी फोन की घंटी बजी। फोन उठाया तो पता चला मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन से एसएचओ नागर का फोन था। उसने बताया कि एक गाड़ी पकड़ी गयी है उसका ड्राईवर तो भाग गया लेकिन गाड़ी में एक सज्जन पाँच किलो आरडीएक्स और डेटोनेटर के साथ पकड़े गए हैं अपना नाम शलभ श्री राम सिंह बता रहे हैं और आपसे बात करवाने को कह रहे हैं। छूटते ही मैंने उससे कहा कि आरडीएक्स और डेटोनेटर कहाँ से आया यह तो सुबह पता कर लेना लेकिन यह जो चलता-फिरता आरडीएक्स तुमने थाने में बैठा रखा है इससे पहले की चल जाये इसे इसके गंतव्य तक छोड़ के आओ। फिर मैंने उसे यह भी बताया कि हमारे बाबा नागार्जुन इन्हें ‘बगावत का कवि’ क्यों कहते हैं। हमेशा जीवन और युद्ध की बातें करने वाले शलभ के बारे में क्या कोई कभी सोच सकता था कि वह आत्महत्या कर सकते हैं।  

यहाँ जो कुछ दिखाई देता है या जो कुछ दिखाई नहीं भी देता है मगर है इस ब्रह्मांड के अंदर तो वह राजनीति की जद से बाहर नहीं है। आत्महत्या भी नहीं। वर्तमान राजनीति ने हमें उस मोड़ पे लाकर खड़ा कर दिया है जहां बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि हम उस देश के वासी हैं जहां हर चार मिनट पर एक नागरिक आत्महत्या कर लेता है और हरेक सात में से एक नागरिक मनःसंताप, मनोविक्षिप्तता या अवसाद का शिकार है। फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत भी इन्हीं में से एक था। जिसकी आत्महत्या की ख़बर ने जो देश भर में एक ख़लल पैदा किया है उसने मीडिया का भी ध्यान आत्महत्या से जुड़ी खबरों की ओर गया है और इन दिनों लॉकडाउन में फंसे लोगों का कोई दिन खाली नहीं जाता जब किसान, मज़दूर, खिलाड़ी, छात्र, व्यवसायी आदि किसी एक नागरिक की आत्महत्या की ख़बर पढ़ने को न मिलती हो। 

आत्महत्या की हरेक ख़बर हमारे सामने अबूझ पहेली सा एक सवाल छोड़ जाती है कि वह क्या है जो किसी अच्छे-खासे हंसते-गाते जीते-जागते इंसान को मृत्यु के प्रवेश द्वार पर ले जाकर खड़ा कर देता है? लोग आत्महत्या क्यों करते हैं? आत्महत्या की प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है? क्या आत्महत्या की प्रवृत्ति एक मनोरोग नहीं है, जिसका उपचार होना चाहिए? 

अगर हम हाल के दिनों में हो रही आप्रवासी मजदूरों की आत्महत्या की ही बात करें तो इसमें बड़ी तेजी से इजाफ़ा हुआ है। देश भर में घरों को लौटे आप्रवासी मजदूरों में आत्महत्या की घटनाओं में आई बढ़ोतरी का अंदाजा इसी ख़बर से लगाया जा सकता है उत्तर प्रदेश के अकेले बांदा जिले से तकरीबन बीस मज़दूरों की इस लॉकडाउन के दौरान आत्महत्या की ख़बर आ चुकी है। इन बीस मज़दूरों की आत्महत्या का विश्लेषण फ़िल्म-अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या से थोड़ा अलग से रख कर करना होगा क्योंकि 5 लाख 60 हज़ार रुपये में इन बीस मज़दूरों के परिवार बड़े ठाठ से साल भर जीवित रह सकते थे जबकि इतनी रकम सुशांत एक महीने के अपने घर के किराए के तौर पर चुकाता था। इस आर्थिक असमानता के बावजूद एक बात जो दोनों में सांझी थी वह थी बेगानगी का एहसास। 

घरों को लौटते प्रवासी मजदूर।
प्रवासी मजदूर।

मार्क्स सर्जनात्मक सक्रियता की क्षमता को मनुष्य की ऐसी प्रवृत्ति मानते हैं जो उसे पशु-जगत से अलग करती है। मार्क्स के अनुसार अगर व्यक्ति को अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त करने का मौका नहीं मिलता तो वह पशुओं या मशीनों के समान हो जाता है। बेगानगी के कारणों की शिनाख़्त करते हुए मार्क्स उसकी व्यापक प्रक्रिया में जाकर तर्क देते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था में कामगार का अपने कार्य पर नियंत्रण ख़त्म हो जाता है और वह समूची व्यवस्था से बेगानगी महसूस करने लगता है। मार्क्स के अनुसार कामगार सबसे पहले अपने श्रम के उत्पादों से बेगानगी महसूस करता है, क्योंकि उसका निर्मित वस्तु या उसके उपयोग पर कोई नियंत्रण नहीं होता। उसका काम महज धन जुटा कर जीवन की भौतिक ज़रूरतें पूरी करने का साधन बन जाता है।

दूसरे, कामगार कार्य की प्रक्रिया से भी कटा हुआ अनुभव करते हैं क्योंकि उनके काम करने की गति, ढर्रे, उपकरणों और तकनीक पर दूसरों का आधिपत्य होता है। तीसरे, अपने काम से जुड़ाव महसूस न करने के कारण कामगार अंतत: अपने आत्म से भी बेगानगी महसूस करने लगते हैं। इसके उलट अगर कामगार को अपने मन और रुचि से काम करने की स्वतंत्रता हो तो वह उत्साह से काम करता है और अपने काम से गहरा लगाव महसूस करता है। चौथे, बेगानगी पर आधारित श्रम एक एकांतिक प्रयास होता है क्योंकि वह समूह की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सामूहिक स्तर पर नियोजित उपक्रम का हिस्सा नहीं होता।

इस सबका समेकित परिणाम यह होता है कि कामगार न केवल दूसरों से बल्कि अपने आप से भी कट जाता है। मार्क्स का मानना था कि बेगानगी के ये आयाम औद्योगिक पूँजीवाद के दौर में सबसे गम्भीर रूप धारण करते हैं। अंतत: काम के साथ यह बेगानगी और उसके प्रति अरुचि कामगार को व्यवस्था में बदलाव करने के लिए प्रेरित करती है। इस तरह मार्क्स के दृष्टिकोण में बेगानगी की सामाजिक क्रांति में एक निर्णायक भूमिका होती है। 

यहां जब मार्क्स मज़दूर की बात करते हैं तो निश्चित तौर पर महाराष्ट्र, पंजाब या गुजरात में काम की तलाश में गए आप्रवासी, अस्थाई, दिहाड़ी मज़दूर की बात नहीं कर रहे हैं जो बहुत ही अस्थिरता और असुरक्षा के आतंक से घिरा रहने वाला मज़दूर होता है। सामाजिक दर्शन के तौर पर पढ़ने-सुनने में यह बहुत अच्छा लग सकता है कि ‘बेगानगी के सिद्धान्त समाज के बेहतर विकल्पों की कल्पना को जीवंत बनाने में मदद करते हैं’ लेकिन सच्चाई जो पिछली आधी सदी में हमने अब तक देखी है या देख रहे हैं यह बेगानगी एक मज़दूर को सामाजिक विमुखता के एक ऐसे कगार पर लाकर खड़ा कर देती है जहां हाशिये के अंदर एक और हाशिया पैदा हो जाता है। उस अंतिम हाशिये की एक नुक्कड़ पर खड़ा वह मज़दूर आत्महत्या कर लेता है।  

अब हम अगर फ़िल्म-अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की बात करें तो जो बातें खुलकर सामने आ रही हैं उनसे पता चलता है कि वह बहुत ही प्यारा और शर्मीला सा प्रतिभा सम्पन्न बच्चा इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में टॉपर रहा था। वह अपने मित्रों के साथ ‘क्वान्टम थियरी’ की बातें करता था। उसके पास एक अच्छी-ख़ासी दूरबीन थी जिस पर सवार होकर वह अंतरिक्ष में नित-नई आकाश-गंगा में डुबकी लगाने निकल जाता था और अपने अनुभव मित्रों से बड़े उत्साह के साथ साझा करता था। वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक अरुणा ब्रूटा मानती हैं कि उनकी मानसिक शक्ति बहुत मज़बूत थी लेकिन आत्मशक्ति बहुत कमजोर थी और इन दोनों में वह आपसी संतुलन नहीं बना पाये। 

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत।

अगर मसला मानसिक शक्ति और आत्मशक्ति के संतुलन का है तो क्या कमी रही होगी इस संतुलन की रूस के भविष्यवादी कवि व्लादिमिर मायकोवस्की में जिसने 1910 में क्रांतिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ते हुए और ‘जनरुचि के मुँह पर तमाचा’ (A slap in the face of the public taste) जड़ते हुए लिखा था ‘हमेशा चमकना/ और हर जगह चमकना/ और अंत तक चमकना/ यह सूर्य का उद्देश्य है/– और मेरा भी।’ वही मायकोवस्की 1930 आते-आते लिखते हैं कि ‘हर रोज ज़िंदगी की चट्टान से टक्कर खा-खाकर प्रेम की नाव चूर-चूर हो गयी’ और खुद को गोली मार लेते हैं!

जनता के मुक्ति-आंदोलनों में ताउम्र शिरकत करते रहे जनकवि गोरख पाण्डेय को ही ले लें। हिन्दी के वे पहले कवि थे जिन्होंने आत्महत्या की लेकिन जिनके मृत्यु ग्रस्त सपनों में वह जो एक बूढ़ा माली उम्मीद के फूल रख जाता था, उस माली की हत्या किसने की? जिनकी कविताओं को दुनिया ने अपनी आँखों से हजारों युवाओं को एक साथ गाते हुए देखा ‘गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले’। क्या हुआ जो उन्हें जीवन से ही आज़ादी ज्यादा भा गयी। ‘हमरे सुगना के ले गइल बुखार सजना’ जैसे मर्मस्पर्शी गीत के रचयिता गोरख पाण्डेय की मृत्यु पर भी किसी ने इस घटना को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने-समझने की जरूरत नहीं समझी कि यह भी मलेरिया-टाइफ़ायड जैसा कोई रोग हो सकता है। 

‘जन संस्कृति मंच’ के स्थापना दिवस पर महान नाटककार गुरशरण सिंह के साथ जब मैं सुबह सवेरे पहुंचा तो गोरख पाण्डेय और कॉमरेड नागभूषण पटनायक बाहर ही मिल गए थे। मैं इन तीनों की एक तस्वीर लेना चाहता था। भाई गोरख पाण्डेय से अपने दिल की बात कहने को आगे बढ़ा तो वह सहम कर पीछे हट गए। उसी समय इस बात का आभास हो गया था कि बेइलाज स्रीज़ोफ़्रेनिया ने उनकी देह में जगह बना ली थी। कोई कुछ नहीं कर पाया।  

गोरख पांडे की मृत्यु के बाद हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने जो कहा वह काबिले-गौर है कि ‘इस घटना से हम स्तब्ध हैं। इस बात को कोई नहीं जान सका या जान सकता कि उन्होंने आत्महत्या क्यों की। आत्महत्या एक ऐसा रहस्य है, जो अपनी रहस्यात्मकता में काफी भयावह है। इस बात से मुझे यह लगता है वे बेहद बहादुर इंसान थे। हमारी तरह कायर नहीं। जो लोग हत्या करते हैं यानि दूसरों के प्राण लेते हैं, वे कायर होते हैं। लेकिन उन्होंने अपने प्राण लिए यह एक असाधारण बात है।’ आत्महत्या का यह महिमा मंडन वैसा ही था जैसा हैमिंग्वे के जीवनी-लेखक ने लिखा था ‘उनका विचार ठीक था—मनुष्य पराजित होने के लिए नहीं बना। मनुष्य मर सकता है, पर हार नहीं सकता।’ सच तो यह है कि आत्महत्या के बारे में अपनी नासमझी को हमने हमेशा अपने लच्छेदार जुमलों और भ्रांत दार्शनिकता के वर्क से ढकने का ही प्रयास किया है या फिर चुनौतियों का सरलीकरण किया है।

गोरख पांडेय।

आज मनोचिकित्सा विज्ञान में यह माना जाता है कि दिमाग में रासायनिक असंतुलन की वजह से मन में आत्महत्या के विचार आने लगते हैं और इस रासायनिक असंतुलन को मनुष्य की आनुवंशिकता, पारिवारिक परवरिश, सामाजिक परिवेश, सामुदायिक सुरक्षा, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य, जीवन-शैली, आहार तथा व्यसन और भावनात्मक परिपक्वता या अपरिपक्वता इत्यादि से भी जोड़ कर देखा जाता है। कोशिकाओं में होने वाली इस जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं को गहराई से समझने के लिए हमें पहले मार्टिन हाइडेगर की प्रसिद्ध किताब ‘बीइंग एंड टाइम’और सार्त्र की रचना ‘बीइंग एंड नथिंगनेस’ के अस्तित्ववाद को एक ओर रखकर और शून्यवाद के नशीले धीमे-ज़हर वाले तंग गलियारों से बाहर निकलकर मेडिकल जेनेटिक्स के संसार में दाखिल होकर ही बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।  

मेडिकल जेनेटिक्स को सरलता से समझने के लिए हम मान लेते हैं कि मनुष्य का शरीर कोशिका रूपी शहरों वाला एक देश है। शरीर में लगभग हर कोशिका में ‘माइटोकॉंड्रिया’ ऊर्जा उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं। ‘माइटोकॉंड्रिया’ बिजली संयन्त्रों की तरह होते हैं, जो हमारी कोशिकाओं को कार्य करने के लिए आवश्यक ऊर्जा आपूर्ति करते हैं। कोशिकाएँ हमारे शरीर में ऊतकों और अंगों का निर्माण करती हैं। यदि हमारी कोशिकाओं में पर्याप्त ऊर्जा नहीं है तो ऊतक या अंग ठीक से काम नहीं करते हैं। उसी तरह, अगर बिजली संयंत्र पर्याप्त ऊर्जा का उत्पादन नहीं करते हैं तो ब्लैकआउट क्षेत्र होंगे और देह रूपी देश के कुछ क्षेत्र काम नहीं करेंगे।

यह बात भी अब किसी से छुपी हुई नहीं है कि जब किसी व्यक्ति को माइटोकॉंड्रियल बीमारी होती है तो कोशिकाओं में माइटोकॉंड्रिया पर्याप्त ऊर्जा पैदा नहीं करते हैं, कभी-कभी वह कुशल नहीं होते या बिल्कुल भी काम नहीं करते हैं। शरीर में सामान्य रूप से प्रभावित हिस्से वे होते हैं जिनकी सबसे बड़ी ऊर्जा की मांग होती है, जैसे कि मस्तिष्क, मांसपेशियां, हृदय, गुर्दे आदि। माइटोकॉंड्रियल बीमारियों से निजात पाने के लिए इस दिशा में होने वाले शोधों की ओर और ज़्यादा तेजी से आगे बढ़ने की जरूरत तो है पर यह तभी संभव है जब देश में शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट हथियारों के बजट से ज्यादा बड़ा होगा। 

समाजविज्ञानियों की सरलीकृत भाषा में कहें तो आत्महत्या किसी भी व्यक्ति में सामाजिक सम्बन्धों की घनिष्ठता की भावना की कमी और सामाजिक बंधनों के क्षय को दर्शाती है। पिछले दिनों स्वास्थ्य जर्नल ‘लांसेट’ में इंडियन स्टेट लेवल डिज़ीज़ बर्डन इनिशिएटिव के हवाले से छपी एक रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए तो आंकड़े यह तो नहीं बताते कि नव उदारवादी ‘एक के साथ एक फ्री’ वाले खुले बाज़ार के दौर में भारतीय नागरिक कितने सुखी-सम्पन्न हुए हैं। अलबत्ता यह जरूर बताते हैं कि आत्महत्या करने वाले मानसिक विकार से पीड़ित रोगियों की संख्या 1990 की तुलना में बढ़कर दोगुनी हो गई है। क्योंकि हमारी राज्यसत्ता ने जन-स्वास्थ्य की जगह बोफोर्स और राफेल को तरजीह दी है। 

बरसों से सुनते तो यही आए हैं कि मनोविज्ञान की दुनिया में आत्महत्या के बारे में अध्ययन और अनुसंधान ज़ोरों पर है जिसके तहत लक्षणों को पहचान कर यह जानने की कोशिश की जा रही है कि कौन व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है उसकी पहचान पहले से की जा सके लेकिन निराशा तब हाथ लगती है जब विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट हमें बताती है कि 2025-30 तक डिप्रेशन (आत्महत्या की आशंका को बढ़ाने वाला) की बीमारी इंसान की डिसेबिलिटी की पहली सबसे बड़ी वजह बन जाएगी। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि अनिश्चितता के बीहड़ में खड़े आत्महत्या के प्रवेशद्वार को बंद करने के लिए परिपक्व चिंतन के आधार पर नैदानिक-व्यावहारिक उपाय तलाश किए जाएँ। यह काम पेशेवर अपराधियों और पूँजीपतियों के गठजोड़ माफ़िया को सत्ता से ख़ारिज किए बिना संभव नहीं है।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और तकरीबन दो दशक तक जनसत्ता के साथ जुड़े रहे हैं।) 

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