Sunday, May 22, 2022

चुनाव के पहले फ्री उपहार बांटने पर पार्टी की मान्यता रद्द हो, याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

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उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को उस याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया, जिसमें चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि राजनीतिक दलों को चुनाव से पहले सार्वजनिक निधि से तर्कहीन फ्रीबी (मुफ्त उपहार) का वादा करने या वितरित करने की अनुमति न दें और जो राजनीतिक पार्टियां ऐसा करती हैं तो उनके पंजीकरण रद्द करें या पार्टियों के चुनाव चिन्ह जब्त करें। चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस  एएस बोपन्ना और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि यह निस्संदेह एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन आश्चर्य है कि अदालत समस्या को हल करने के लिए क्या कर सकती है। बहस के दौरान चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि जब सभी पार्ट़ियां ऐसा कर रही हैं तो आपने अपनी अर्जी में सिर्फ दो का जिक्र क्यों किया है, तब याची के वकील विकास सिंह ने कहा कि वह पार्टियों का नाम नहीं लेना चाहते हैं।

उच्चतम न्यायालय में दाखिल याचिका में कहा गया है कि उन राजनीतिक पार्टियों की मान्यता रद्द हो और सिंबल सीज होना चाहिए जो चुनाव से वोटरों को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार बांटने का वादा करते हैं या फिर बांटते हैं। याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना की अगुवाई वाली बेंच ने मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इसमें संदेह नहीं है कि ऐसे तमाम मामले हैं लेकिन परेशानी की बात है कि कोर्ट कैसे इन तमाम समस्याओं को ठीक करे।

पीठ ने कहा कि हम जानना चाहते हैं कि कैसे ये सब कंट्रोल होगा। निसंदेह कई मामले ऐसे दिख रहे हैं। मुफ्त उपहारों वाला बजट सामान्य बजट से बाहर है। कुछ पार्टियों के लिए यह सब एक समान फील्ड मुहैया नहीं कराता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले के जजमेंट को रेफर किया। सुब्रमण्यम बालाजी बनाम स्टेट ऑफ तामिलनाडु में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनावी घोषणा पत्र का वादा करप्ट प्रैक्टिस नहीं हो सकता है। चुनाव आयोग से कहा गया था कि वह चुनावी घोषणा पत्र के कंटेट के मामले में गाइडलाइंस बनाए।

याचिकाकर्ता के वकील विकास सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार इस मामले में गाइडलाइंस के साथ एफिडेविट दाखिल करे। यह देखा जाए कि आखिर किसका पैसा वादे के तहत दिया जा रहा है? ये लोगों का पैसा है। अभी भी मुफ्त उपहार बांटा जा रहा है और देने का वादा किया जा रहा है। कोर्ट ने गाइडलाइंस बनाने को कहा था लेकिन उसका कोई दांत (ताकत) नहीं है और इस कारण सभी पार्टियां ऐसा अभी भी कर रही हैं। याचिका में राजनीतिक दलों के ऐसे फैसलों को संविधान के अनुच्छेद-14, 162, 266 (3) और 282 का उल्लंघन बताया गया है।

याचिका में चुनाव से पहले वोटरों को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार बांटने या मुफ्त उपहार देने का वादा करने वाले राजनीतिक पार्टियों की मान्यता रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा सरकारी फंड से चुनाव से पहले वोटरों को उपहार देने का वादा करने या उपहार देने का मामला स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव को प्रभावित करता है।

याचिका में केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को प्रतिवादी बनाया गया है और अर्जी दाखिल कर कहा गया है कि पब्लिक फंड से चुनाव से पहले वोटरों को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार देने का वादा करने या मुफ्त उपहार बांटना स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के खिलाफ है और यह वोटरों को प्रभावित करने और लुभाने का प्रयास है। इससे चुनाव प्रक्रिया प्रदूषित होती है। याचिकाकर्ता ने कहा कि इससे चुनाव मैदान में एक समान अवसर के सिद्धांत प्रभावित होते हैं। याची ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा मुफ्त उपहार देने और वादा करना वोटरों को लुभाने का प्रयास है और यह एक तरह की रिश्वत है।

याचिका में कहा गया है कि हाल में शिरोमणि अकाली दल ने इसी कड़ी में वादा किया है कि वह 18 साल से ऊपर की महिलाओं को 2 हजार रुपये प्रति महीने देगा वहीं आम आदमी पार्टी ने एक हजार रुपये प्रति महीने देने का वादा किया है। कांग्रेस ने महिलाओं को 2 हजार रुपये प्रति महीना देने के साथ-साथ साल में 8 सिलिंडर भी हाउस वाइफ को देने का वादा किया है। साथ ही कहा है कि 12 वीं पास लड़की को 20 हजार 10 पास लड़की को 10 हजार रुपये दिए जाएंगे और कॉलेज जाने वाली लड़की को स्कूटी दिया जाएगा। वहीं यूपी में कांग्रेस ने वादा किया है कि वह 12 में पढ़ने वाली लड़कियों को स्मार्ट फोन और कॉलेज जाने वाली लड़कियों को स्कूटी दी जाएगी। सपा ने वादा किया है कि महिलाओं को 1500 रुपये पेंशन और हर परिवार को 300 यूनिट प्रति महीने बिजली फ्री दी जाएगी। इस तरह से किए गए मुफ्त उपहार के वादे को रिश्वत की श्रेणी में माना जाए क्योंकि इससे वोटर प्रभावित होते हैं।

याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वह सुनिश्चित करें कि राजनीतिक पार्टियां इस तरह के मुफ्त उपहार के वादे न करें या वितरण न करें। इस बात को घोषित किया जाए कि पब्लिक फंड से चुनाव के पहले मुफ्त देने का वादा और वितरण स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव को प्रभावित करता है और यह फ्री और फेयर इलेक्शन के बुनियाद को झकझोरता है। साथ ही चुनावी प्रक्रिया को प्रदूषित करता है। मुफ्त उपहार और वितरण को अनुच्छेद-14 का उल्लंघन माना जाए। इसे रिश्वत घोषित किया जाए और आईपीसी की धारा-171 बी और सी के तहत अपराध माना जाए। चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह राजनीतिक पार्टियों के लिए शर्त तय करें कि वह ऐसा न करें। साथ ही चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि ऐसा करने वाले राजनीतिक पार्टियों का सिंबल सीज किया जाए और उनकी मान्यता रद्द की जाए। केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया जाए कि वह राजनीतिक पार्टियों को रेगुलेट करने के लिए कानून बनाएं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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