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Categories: बीच बहस

राज्यसभा की अवहेलना पर सुप्रीमकोर्ट तल्ख

उच्चतम न्यायालय ने राज्यसभा को दरकिनार करने के उद्देश्य से वित्त विधेयक को धन विधेयक के रूप में पेश करने पर मोदी सरकार पर तल्ख टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यसभा को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्र की बहुलता और शक्ति के संतुलन को दर्शाता है।

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को वित्त अधिनियम 2017 की धारा 184 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जो केंद्र सरकार को विभिन्न न्यायाधिकरणों के सदस्यों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से संबंधित नियमों को फ्रेम वर्क करने का अधिकार देता है। इसके साथ ही पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अधिनियम की धारा 184 के तहत केंद्र सरकार द्वारा पहले बनाए गए नियमों को रद्द कर दिया और नए नियमों के बनाने का निर्देश दिया। उच्चतम न्यायालय ने सरकार को न्यायाधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति के संबंध में फिर से नये मानक तय करने के निर्देश दिए। उच्चतम न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया कि न्यायाधिकरणों के सदस्यों की नियुक्तियों को उनके संबंधित पेरेंट एक्ट (मूल कानून) के अनुसार तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक कि केंद्र अधिनियम की धारा 184 के तहत नए नियम नहीं बना लेता।

इस बिंदु पर कि, क्या वित्त अधिनियम 2017 को धन विधेयक के रूप में पारित किया जा सकता है, न्यायालय ने कहा कि एक बड़ी पीठ द्वारा इसके परीक्षण की आवश्यक थी और इसे बड़ी पीठ को भेजा गया है। पीठ ने कहा है कि न्यायाधिकरणों के न्यायिक प्रभाव आकलन की जरूरत है। केंद्र को वित्त अधिनियम के प्रावधानों का पुनरीक्षण करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर यह भारत के विधि आयोग से परामर्श कर सकता है। मौजूदा ट्रिब्यूनल को समरूपता के आधार पर समामेलित किया जा सकता है।

इससे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की शीर्ष वाली पांच सदस्यीय कॉन्स्ट पीठ ने वित्त अधिनियम 2017 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। केंद्र ने वित्त विधेयक, 2017 के धन विधेयक के रूप में प्रमाणीकरण को उच्चतम न्यायालय में न्यायोचित ठहराते हुए कहा था कि इसके प्रावधानों में अधिकारियों ने अधिकारियों के भुगतान किए जाने वाले वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि से आते हैं।

इस कानून को चुनौती देते हुए कहा गया था कि संसद ने इसे धन विधेयक के रूप में पारित किया था। पीठ ने कहा था कि इस मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एन वी रमना, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना शामिल थे।

केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने दलील दी थी कि लोकसभा अध्यक्ष ने वित्त अधिनियम को धन विधेयक के रूप में प्रमाणित किया है और न्यायालय इस फैसले की न्यायिक समीक्षा नहीं कर सकती। वेणुगोपाल ने वित्त अधिनियम को धन विधेयक के रूप में पेश करने के निर्णय को न्यायोचित ठहराते हुए कहा था कि यह भारत की संचित निधि से मिलने वाले धन और उसके भुगतान के बारे में है। उन्होंने कहा था कि इसके एक हिस्से को नहीं बल्कि पूरे को ही धन विधेयक के रूप में प्रमाणित किया गया है, इसलिए इसके किसी हिस्से को अलग करके यह नहीं कहा जा सकता है कि यह धन विधेयक नहीं माना जा सकता है।

संविधान पीठ ने रोजर मैथ्यू और रेवेन्यू बार एसोसिएशन के मामले में 10 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रखा था। इस मामले से वित्त अधिनियम 2017 के प्रावधानों की संवैधानिकता पर सवाल थे और विभिन्न न्यायिक न्यायाधिकरण जैसे कि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण, आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण, राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण की संरचनाएं और शक्ति प्रभावित हुई थी।

इसके पहले केन्द्र ने वित्त विधेयक, 2017 के धन विधेयक के रूप में प्रमाणीकरण को उच्चतम न्यायालय में न्यायोचित ठहराते हुए कहा था कि लोकसभा की अध्यक्ष द्वारा वित्त विधेयक, 2017 को धन विधेयक के रूप में प्रमाणित किया गया है और इस फैसले की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती। सरकार ने कहा कि अदालत किसी विधेयक को धन विधेयक घोषित करने के स्पीकर के फैसले पर सवाल खड़े नहीं कर सकती और यह स्थापित कानून है। वेणुगोपाल ने वित्त अधिनियम को धन विधेयक के रूप में प्रमाणित करने के निर्णय को न्यायोचित ठहराते हुए कहा कि यह भारत की संचित निधि से मिलने वाले धन और उसके भुगतान के बारे में है। उन्होंने कहा कि इसके एक हिस्से को नहीं बल्कि पूरे को ही धन विधेयक के रूप में प्रमाणित किया गया है, इसलिए इसके किसी हिस्से को अलग करके यह नहीं कहा जा सकता है कि इसे धन विधेयक नहीं माना जा सकता।

वेणुगोपाल ने संचित निधि से न्यायाधिकरणों पर खर्च होने वाले धन से संबंधित प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधिकरणों के सदस्यों के वेतन और भत्ते संविधान के अनुच्छेद 110 (1) (जी) में उल्लिखित मामलों के तहत आएंगे। अटार्नी जनरल ने अपनी दलीलों के लिए आधार मामले में शीर्ष अदालत के उस फैसले का सहारा लिया जिसमें कहा गया था कि आधार कानून का मुख्य उद्देश्य संचित निधि से समाज के हाशिए वाले वर्गों तक सामाजिक योजनाओं का लाभ पहुंचाना है।

इस कानून को चुनौती देते हुए कहा गया है कि संसद ने इसे धन विधेयक के रूप में पारित किया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलील दी कि न्यायाधिकरण के सदस्यों को वेतन और भत्तों के भुगतान की बात करने वाला विधेयक अपने आप में ही इसे धन विधेयक नहीं बनाता है। उन्होंने न्यायाधिकरणों को स्वतंत्र बनाने पर जोर देते हुए कहा कि उनकी मुख्य न्यायिक ड्यूटी को नहीं लिया जा सकता है या फिर उन्हें कम से कम कानून मंत्रालय के नियंत्रण में लाया जा सकता है जैसा कि शीर्ष अदालत के 1997 और 2010 के फैसलों में कहा गया था।

कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है कि पांच न्‍यायधीशों की पीठ ने जो फैसला सुनाया है वह हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी जीत है। पहली फरवरी 2017 को तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश करते हुए 19 विशेष ट्रिब्‍यूनल में संशोधन का प्रस्‍ताव किया था। यह संशोधन प्रस्‍ताव मनी बिल के रूप में सामने आया था। मनी बिल पर केवल लोकसभा को संशोधन का अधिकार होता है। इस पर कई सदस्‍यों ने आवाज उठाई कि इससे कई ट्रिब्‍यूनल को कमजोर किया जा रहा है।

जयराम रमेश ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है कि फाइनेंस एक्‍ट 2017 के तहत जो संशोधन लाए गए थे वे नकारे हैं। अदालत ने कहा है कि ये संशोधन नहीं हो सकते हैं। इसके लिए कथित तौर पर लोकसभा और राज्‍यसभा में बहस होनी चाहिए। कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में साफ कहा है कि सरकार ने फाइनेंस एक्‍ट 2017 के तहत जो नियम बनाए हैं वो गैरकानूनी है। उन्‍होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले से मोदी सरकार की मंशा पर करारी चोट की है।

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This post was last modified on November 14, 2019 12:31 pm

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