तीखी बहस के बीच सुप्रीमकोर्ट ने कहा- वह सरकार का बंधक नहीं

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उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को शहरों से घर वापस जाने के इच्छुक प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षित यात्रा की व्यवस्था के संबंध में केंद्र से अपना जवाब दाखिल करने को कहा। साथ ही उसने केंद्र से यह भी कहा कि यदि इस विषय में कोई प्रस्ताव हो तो पेश करे। जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस  संजय किशन कौल और जस्टिस  बीआर गवई ने देश भर में फंसे प्रवासी मज़दूरों के मौलिक अधिकार के जीवन के प्रवर्तन करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान तीखी बहस हुई और पीठ को कहना पड़ा कि उच्चतम न्यायालय सरकार की बंधक नहीं है।

याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मजदूरों के मामले में सरकार आंखें बंद करके फैसले ले रही है। मजदूरों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। इस पर पीठ ने कहा कि अगर आपको सिस्टम में विश्वास नहीं है तो कोर्ट क्यों आपको सुने? भूषण ने कहा कि यह संस्थान संविधान द्वारा बनाया गया है। लेकिन अभी इन प्रवासी श्रमिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है और मैं इस दुख को व्यक्त करने का हकदार हूं।

इसका जवाब देते हुए पीठ ने भूषण से कहा कि आपको न्यायपालिका पर भरोसा नहीं है। यह संस्थान सरकार की बंधक नहीं है। पीठ ने भूषण से कहा कि वह पिछले 30 वर्षों से उच्चतम न्यायालय में प्रैक्टिस करने का दावा करते हैं, तो उन्हें पता होना चाहिए कि कुछ आदेश अनुकूल होते हैं और कुछ नहीं इसलिए उनको ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। प्रशांत भूषण ने पीठ से कहा कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि उन्हें इस प्रणाली में कोई विश्वास नहीं है। वह गलत हो सकते हैं लेकिन रिटायर्ड जज भी ऐसी ही राय व्यक्त कर रहे हैं।

पीठ की तीखी टिप्पणी सुनकर भूषण ने कहा कि अगर वकील के रूप में उनकी उपस्थिति से किसी को कोई आपत्ति है, तो वह इससे हटने के लिए तैयार हैं। लेकिन इस मामले को और भी वकील सामने लाएंगे। इस पर पीठ ने कहा कि उन्हें मामले से हटने के लिए कभी नहीं कहा गया। भूषण ने कहा कि लगता है केंद्र सरकार ने अपनी आँखें बंद कर ली हैं और तालाबंदी के दौरान प्रवासी कामगारों के संकट की स्थिति पर विचार करना चाहिए।

प्रशांत भूषण ने प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला और तर्क दिया कि सरकार उनके हितों की रक्षा के लिए बहुत कुछ नहीं कर रही है। भूषण ने कहा, “द हिंदू” की रिपोर्ट कहती है कि उनमें से 96% को मजदूरी नहीं मिल रही है, उनके पास बहुत कम खाना है। सरकार लोगों के मौलिक अधिकारों को लागू नहीं कर रही है और मैं इस अदालत से उनके मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए विनती कर रहा हूं।” देश भर में प्रभावित हो रहे लाखों प्रवासी मज़दूरों के इस मुद्दे पर अदालत से हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए भूषण ने जोर देकर कहा कि संविधान द्वारा बनाई गई संस्था होने के नाते सुप्रीम कोर्ट को नागरिकों के इस वर्ग की रक्षा करनी चाहिए।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार वास्तव में प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपने स्तर पर अच्छा कर रही है और इस मुद्दे से निपटने के लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारें विचार-विमर्श में लगी हुई हैं। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भूषण एक मात्र ही नहीं हैं, जिन्हें देश में लोगों के अधिकारों के बारे में चिंता है। उन्होंने यह भी कहा कि वास्तव में श्रमिकों को अपनी मूल भूमि पर वापस जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जहां भी वे होंगे, वहां उनके परिवार के साथ उनकी दैनिक जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा।

सॉलिसिटर जनरल ने आगे पीठ को आश्वासन दिया कि सरकार इस संबंध में आवश्यक कदम उठा रही है शहरों से गांवों में प्रवासियों का जाना “निवारक उपायों के उद्देश्य को नष्ट कर देगा क्योंकि इससे ग्रामीण क्षेत्रों के संक्रमित होने की आशंका है। उन्होंने इस विशिष्ट जनहित याचिका को दायर करने पर असंतोष व्यक्त किया और टिप्पणी की कि अपने नागरिकों की देखभाल और चिंता करने का काम वास्तव में सरकार का काम है, याचिकाकर्ता का नहीं।

याचिका में कहा गया है कि प्रवासी कामगार, जो चल रहे लॉकडाउन के कारण सबसे ज्यादा प्रभावित वर्ग के लोगों में से हैं, को कोविड-19 के परीक्षण के बाद अपने घरों में वापस जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। याचिका में कहा गया है कि जो लोग कोविद -19 के लिए नकारात्मक परीक्षण करते हैं, उन्हें आश्रय स्थलों में उनकी इच्छाओं के खिलाफ घरों और परिवारों से दूर ज़बरदस्ती नहीं रखा जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 19 (1) (डी) के तहत विस्थापित प्रवासी श्रमिकों के मौलिक अधिकार [स्वतंत्र रूप से भारत के किसी भी क्षेत्र में स्थानांतरित करने का अधिकार] और संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ई) [किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने का अधिकार ] इन क्षेत्रों में प्रवासी श्रमिकों को अपने परिवार से दूर रहने और अप्रत्याशित और कठिन परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर करने के लिए, अनिश्चित काल के लिए निलंबित नहीं किए जा सकते हैं, जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (5) के तहत परिकल्पना से परे एक अनुचित प्रतिबंध है।

इसके पहले पालघर लिचिंग को लेकर टीवी शो के दौरान रिपब्लिक टीवी के पत्रकार अर्णब गोस्वामी के आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने को लेकर उनकी गिरफ्तारी की मांग के मामले की सुनवाई पर वकील प्रशांत भूषण ने तंज कसा था कि कोरोना के कहर के मारे मजदूरों को लेकर दायर की गई याचिका से ज्यादा जरूरी कोर्ट को अर्णब की याचिका लगी। ट्विटर पर प्रशांत भूषण ने लिखा है, लॉकडाउन की वजह से राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों को लेकर जगदीप एस छोकर ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी इसे कोर्ट ने जरूरी नहीं समझा। एक हफ्ते तक इसे सुनवाई के लिए शामिल नहीं किया गया। लेकिन एफआईआर निरस्त करने के लिए अर्णब गोस्वामी द्वारा दायर की गई याचिका पर कोर्ट ने अगले दिन ही सुनवाई के लिए शामिल कर लिया।

(वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ जेपी सिंह क़ानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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