Friday, July 1, 2022

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप कंपनियों के खिलाफ 50,000 करोड़ रुपये के गबन की जाँच पर स्टे हटाया

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उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को सहारा ग्रुप को जोर का झटका दिया है। अदालत ने समूह से जुड़ी 9 कंपनियों के खिलाफ सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टीगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) की जांच रोक लगाने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ एसएफआईओ द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया। अदालत के इस निर्णय के बाद अब सहारा ग्रुप की कंपनियों के खिलाफ जांच होगी। पीठ ने पाया कि अंतरिम स्तर पर जांच को रोकना अनुचित था।

पीठ ने हाईकोर्ट से एसएफआईओ जांच को चुनौती देने वाली सहारा कंपनियों द्वारा दायर रिट याचिकाओं का जल्द से जल्द अधिमानतः गर्मी की छुट्टी के बाद फिर से खोलने के बाद दो महीने की अवधि के भीतर निपटारा करने का भी अनुरोध किया। पीठ ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश अनपेक्षित था और उसने जांच रोकने का भी अभूतपूर्व फैसला किया था। हाईकोर्ट ने 13 दिसंबर 2021 को जारी आदेश में सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय और उनकी पत्नी के खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर पर भी रोक लगा दी थी।

एसएफआईओ ने सहारा ग्रुप के प्रमुख के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट के 13 दिसंबर 2021 के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की थी, जिसमें बाद की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। उच्चतम न्यायालय 17 मई को एसएफआईओ की याचिका पर विचार करने को तैयार हुआ। जिसमें सहारा की कंपनियों को राहत देने के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।

एसएफआईओ की याचिकाओं ने सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड, सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड, सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड, किंग एम्बी सिटी डेवलपर्स लिमिटेड, सहारा क्यू शॉप यूनिक प्रोडक्ट्स रेंज लिमिटेड, सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड, सहारा क्यू गोल्ड कार्ट लिमिटेड और कंपनी के निदेशक के खिलाफ जांच पर रोक लगाने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 5 जनवरी, 2022 के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की पीठ ने जांच पर रोक लगाने के तीन कारण दर्ज किए थे।

हाईकोर्ट ने कहा था कि 6 कंपनियों के मामलों की जांच के लिए अक्टूबर 2020 में जारी आदेश प्रथम दृष्टया कंपनी अधिनियम की धारा 219 के प्रावधानों के विपरीत प्रतीत होता है क्योंकि ये 6 कंपनियां न तो होल्डिंग कंपनियां हैं और न ही सहायक कंपनियां हैं या प्रबंध निदेशक द्वारा प्रबंधित की जा रही हैं। पहले की 3 कंपनियों की जांच चल रही है।

हाईकोर्ट ने कहा था कि जांच के आदेश में कोई कारण नहीं बताया गया है जिसने केंद्र सरकार को जांच शुरू करने के लिए मजबूर किया एसएफआईओ की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह कंपनियों के बीच एक लाख करोड़ रुपये के पैसे के लेन-देन की जांच है और इसलिए जांच पिछले तीन वर्षों से चल रही है। एसजी ने हाईकोर्ट द्वारा निदेशकों, प्रमोटरों और कर्मचारियों के खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर पर रोक लगाने पर भी आपत्ति जताई ताकि वे देश से भाग न जाएं।

एसजी ने दलील दिया कि धारा 212 (3) के प्रावधान को एसएफआईओ बनाम राहुल मोदी के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशिका और अनिवार्य नहीं माना गया है। साथ ही, हाईकोर्ट ने कंपनी अधिनियम की धारा 219 (सी) की अनदेखी की। एसएफआईओ की ओर से मामले की पैरवरी कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दलील दी कि पूरा मामला एक लाख करोड़ रुपये का है। इस मामले में जिस तरह से कई कंपनियां संलिप्त हैं, उस स्थिति में जांच तीन माह में पूरी नहीं की जा सकती है। इसी वजह से सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय और उनकी पत्नी के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर जारी किया गया था, ताकि वे देश छोड़कर भागे नहीं।

सहारा समूह की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिबल ने प्रस्तुत किया कि कंपनी अधिनियम 2013, 2011 से संबंधित लेनदेन पर लागू नहीं है, जिनकी एसएफआईओ द्वारा जांच की जानी है। उन्होंने तर्क दिया कि कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 219 के तहत जांच कानूनी आधार के बिना है और कंपनियों के खिलाफ कोई प्रथम दृष्ट्या सामग्री नहीं है। उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि सहारा हाउसिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार 24,000 करोड़ रुपये की राशि जमा की है। साथ ही, समय-समय पर पारित विस्तार आदेशों से, ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने केवल सहारा क्यू शॉप मामलों के संबंध में विस्तार दिया है।

उन्होंने तर्क दिया कि यहां धारा 219 (सी) के अर्थ के भीतर कोई सामग्री नहीं है जो उन कॉरपोरेट निकायों को इंगित करती है जिनके खिलाफ 2020 में जांच का आदेश दिया गया है, जिसमें कंपनी के नामांकित व्यक्ति शामिल हैं जो कंपनी या उसके किसी भी निदेशक के निर्देशों के अनुसार कार्य करने के आदी हैं।

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के लिए बातचीत के स्तर पर जांच पर रोक लगाना उचित नहीं है। अदालत ने आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि हाईकोर्ट अंतरिम चरण में जांच पर रोक लगाने में सही नहीं था। हालांकि, इसने स्पष्ट किया कि इस आदेश का मामले के गुण-दोष पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

दरअसल मोटा रिटर्न पाने के लालच में लोगों ने सहारा की कंपनियों में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया। लेकिन मैच्योरिटी पर इन कंपनियों ने निवेशकों को पैसा देने के बजाय ठेंगा दिखा दिया। इन कंपनियों पर निवेशकों से 50,000 करोड़ रुपये जुटाने और फिर इन पैसों के गबन का आरोप है। गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) सहारा की कंपनियों के खिलाफ इस कथित धोखाधड़ी की जांच कर रहा था लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी।

कंपनी रजिस्ट्रार, मुंबई ने इन शिकायतों की जांच की थी और 14 अगस्त, 2018 को केंद्र सरकार से सहारा की कंपनियों के खिलाफ जांच शुरू करने की सिफारिश की थी। इनमें सहारा क्यू शॉप यूनीक प्रोडक्ट्स रेंज लिमिटेड, सहारा क्यू गोल्ड मार्ट लिमिटेड और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन शामिल हैं।31 अक्टूबर 2018 को कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने इस मामले की जांच का जिम्मा एसएफआईओ को सौंपा। एजेंसी ने जांच में पाया कि सहारा इंडिया कामर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड, सहारा इंजिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड और सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड ने हाई रिटर्न का लालच देकर निवेशकों से क्रमश: 14,100 करोड़, 17500 करोड़ और 19,400 करोड़ रुपये जुटाए थे। इस तरह विभिन्न स्कीमों के जरिए निवेशकों से करीब 50,000 करोड़ रुपये जुटाए गए थे।

एजेंसी के मुताबिक निवेशकों को मैच्योरिटी का पैसा नहीं दिया गया और उन्हें ग्रुप की दूसरी कंपनियों की स्कीमों में यह पैसा कन्वर्ट करने के लिए मजबूर किया गया। एजेंसी के मुताबिक इन छह कंपनियों के अलावा ग्रुप की तीन अन्य कंपनियां एंबी वैली लिमिटेड, किंग एंबी सिटी डेवेलपर्स कॉरपोरेशन लिमिटेड और सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड भी इस धोखाधड़ी में शामिल थीं।

एसएफआईओ के मुताबिक सहारा की इन नौ कंपनियों की आपस में साठगांठ थी। जांच में सामने आया कि इन कंपनियों ने एक दूसरे में भारी निवेश किया था। 27 अक्टूबर 2020 में छह और कंपनियों को भी इसमें संलिप्त पाया गया और इनको भी जांच के दायरे में लाया गया। एसएफआईओ ने कहा कि इन नौ कंपनियों ने प्रमोटर्स/डायरेक्टर्स और सहारा ग्रुप की दूसरी कंपनियों में फंड्स का बड़ा हेरफेर किया।

एसएफआईओ ने सुप्रीम कोर्ट के 2019 के एक फैसले का हवाला दिया और कहा कि मंत्रालय ने इस जांच की समय सीमा बढ़ाकर 31 मार्च, 2022 कर दी है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह दस्तावेजों को देखेंगे और उसके बाद सुनवाई की डेट देंगे।

दूसरी और सहारा ग्रुप ने 50,000 करोड़ रुपये के गबन के आरोपों पर सफाई दी है। कंपनी का कहना है कि वह निवेशकों की एक-एक पाई वापस कर चुकी है और इन आरोपों में कोई दम नहीं है। सहारा इंडिया ने कहा है कि उस पर लगाया गया 50,000 करोड़ रुपये के गबन का आरोप सही नहीं है और हमारे पास इसके सबूत हैं। जब हम सारा पैसा वापस कर चुके हैं तो फिर गबन और हेराफेरी का सवाल कहां से पैदा होता है। SFIO सहारा की कंपनियों के खिलाफ इस कथित धोखाधड़ी की जांच कर रहा था लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी।

एसएफआईओ के मुताबिक कंपनी रजिस्ट्रार को सहारा की इन कंपनियों के निवेशकों की तरफ से कई शिकायतें मिली थीं। उनका कहना था कि मैच्योरिटी के बावजूद उन्हें अपना पैसा नहीं मिल रहा है। कंपनी रजिस्ट्रार, मुंबई ने इन शिकायतों की जांच की थी और 14 अगस्त, 2018 को केंद्र सरकार से सहारा की कंपनियों के खिलाफ जांच शुरू करने की सिफारिश की थी। इनमें सहारा क्यू शॉप यूनीक प्रोडक्ट्स रेंज लिमिटेड, सहारा क्यू गोल्ड मार्ट लिमिटेड और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन शामिल हैं।

31 अक्टूबर 2018 को कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने इस मामले की जांच का जिम्मा एसएफआईओ को सौंपा। एजेंसी ने जांच में पाया कि सहारा इंडिया कामर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड, सहारा इंजिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड और सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड ने हाई रिटर्न का लालच देकर निवेशकों से क्रमश: 14,100 करोड़, 17500 करोड़ और 19,400 करोड़ रुपये जुटाए थे। इस तरह विभिन्न स्कीमों के जरिए निवेशकों से करीब 50,000 करोड़ रुपये जुटाए गए थे।

एसएफआईओ के मुताबिक सहारा की इन नौ कंपनियों की आपस में साठगांठ थी। जांच में सामने आया कि इन कंपनियों ने एक दूसरे में भारी निवेश किया था। 27 अक्टूबर 2020 को छह और कंपनियों को भी इसमें संलिप्त पाया गया और इनको भी जांच के दायरे में लाया गया। एसएफआईओ ने कहा कि इन नौ कंपनियों ने प्रमोटर्स/डायरेक्टर्स और सहारा ग्रुप की दूसरी कंपनियों में फंड्स का बड़ा हेरफेर किया।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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