Friday, January 21, 2022

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सुप्रीम कोर्ट का स्वत:संज्ञान: मजदूरों से हमदर्दी और संवैधानिक कर्यव्यबोध का नतीजा या केंद्र को बचाने की एक और पहल?

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उच्चतम न्यायालय ने अचानक मंगलवार 26 मई को प्रवासी मजदूरों की परेशानी का स्वत: संज्ञान लेकर पूरे देश को हतप्रभ कर दिया। उच्चतम न्यायालय का ह्रदय परिवर्तन या यू टर्न विधि क्षेत्रों में लोगों के गले नहीं उतर रहा है। चर्चा यही है कि जस्टिस एपी शाह, जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस मार्कण्डेय काटजू जैसे पूर्व न्यायाधीशों और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे सरीखे न्यायविदों की कड़ी आलोचना से उच्चतम न्यायालय को अचानक अपने कर्तव्यों और संविधान के प्रति अपने शपथ का इलहाम हुआ और उच्चतम न्यायालय ने प्रवासी मजदूरों की परेशानी का स्वत: संज्ञान लेकर केन्द्र, राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों से 28 मई तक इस मुद्दे पर जवाब मांग लिया है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि विभिन्न हाईकोर्टों ने जिस तरह इस मुद्दे पर रुख अख्तियार किया है वह सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है जिसका अनुकूल निदान उच्चतम न्यायालय  से ही निकल सकता है।

दरअसल यह मामला उच्चतम न्यायालय के ह्रदय परिवर्तन का नहीं प्रतीत होता है। बल्कि एक तीर से कई निशाने का प्रयास है, जिसे केवल एक तथ्य से समझा जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से इस मामले में न्यायालय की मदद करने को कहा है। इसी में सारा राज छिपा है। सनद रहे इन्हीं सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों से सहमत होकर 31 मार्च से 25 मई तक उच्चतम न्यायालय प्रवासी मजदूरों के सम्बंध में दाखिल विभिन्न याचिकाएं ख़ारिज करता रहा है और सरकार के उठाये गये क़दमों के प्रति संतुष्टि व्यक्त करता रहा है।

दरअसल उच्चतम न्यायालय के सरकार परस्त रवैये को गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मद्रास और आंध्र प्रदेश हाईकोर्टों के हालिया आदेशों ने रक्षात्मक कर दिया है और यहाँ तक कहा जाने लगा है कि उच्चतम न्यायालय का रवैया नकरात्मक है जबकि विभिन्न हाईकोर्टों ने अवसर के अनुकूल आगे बढ़कर संविधान के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन बिना किसी भेदभाव और पक्षपात के किया है। विभिन्न हाईकोर्टों द्वारा प्रवासी मजदूरों के मामले में केंद्र सरकार को पक्षकार बनाये जाने से भी सरकार और नौकरशाही की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं

क्योंकि कोर्ट में उठ रहे अप्रिय सवालों का जवाब देना असम्भव नहीं तो मुश्किल ज़रूर हो रहा है। केरल हाईकोर्ट केरल सरकार द्वारा मेहमान मजदूरों को आश्रय देने के लिए उठाए गए कदमों की निगरानी कर रहा है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रवासियों को गांव वापस लौटने के अधिकारों के मसले पर कठोर टिप्पणियां कीं, और सरकार को विशेष ट्रेनों पर अपनी स्पष्ट नीति बताने का निर्देश दिया। उड़ीसा हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रवासियों के मुद्दे पर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए थे।

गुजरात हाईकोर्ट ने तो कोरोना को लेकर जिस तरह गुजरात सरकार के स्वास्थ्य विभाग और प्रदेश भर की चिकित्सा व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी हैं उससे गुजरात मॉडल का बहुप्रचारित मिथक पूरी तरह धूल धूसरित हो गया है। यदि गुजरात सहित अन्य हाईकोर्ट में इस मसले पर सुनवाई जारी रही तो आगे और भी सरकार की छीछालेदर होना निश्चित है।

अब उच्चतम न्यायालय में 28 मई की सुनवाई में केन्द्र, राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगने का अर्थ यह है कि गुजरात हाईकोर्ट सहित अन्य हाईकोर्टों से प्रवासी मजदूरों सम्बन्धी सभी याचिकाएं उच्चतम न्यायालय में स्थानांतरित करने का आदेश पारित होगा ताकि केंद्र सरकार तथा भाजपा और अन्य फ्रेंडली पार्टियों की सरकारों को प्रवासी मजदूरों के प्रति अक्षम्य, अमानवीय और निष्ठुर व्यवहार के लिए हाईकोर्टों के अप्रिय आदेशों से बचाया जा सके। सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता निश्चित ही सरकारों को उबारने में उच्चतम न्यायालय के मददगार सिद्ध होंगे।

उच्चतम न्यायालय ने कल कहा कि कामगारों की यह भी शिकायत है कि उन्हें प्रशासन की तरफ से खाना और पानी नहीं दिया जा रहा है। देशभर में लॉकडाउन के चलते समाज के इस वर्ग को सरकार की तरफ से मदद की जरूरत है। खासकर इस मुश्किल वक्त में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की तरफ से कदम उठाए जाने की जरूरत है। योर ऑनर यही बात तो आप 31 मार्च से लगातार कह रहे हैं और सरकार के आश्वासन के बाद बिना किसी निर्देश के याचिकाएं ख़ारिज करते रहे हैं।

योर ऑनर 26 मई को आपने अचानक स्वत:संज्ञान लिया तो फिर सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से जवाब क्यों नहीं तलब किया कि 31 मार्च को उन्होंने उच्चतम न्यायालय में स्पष्ट कहा था कि सड़क पर आज की तारीख में कोई मजदूर नहीं है और सभी व्यवस्थाएं केंद्र सरकार द्वारा की गयी हैं। तो फिर कोर्ट को प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा का संज्ञान क्यों लेना पड़ रहा है ? यही नहीं सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने मार्च में ही उच्चतम न्यायालय में कहा था कि 21 दिन का लॉकडाउन बढ़ाने की कोई योजना नहीं है और मीडिया तीन महीने तक लॉकडाउन चलने की अफवाह फैला रही है। इसलिए मीडिया को यह निर्देश दिया जाए कि बिना पुष्टि के लॉकडाउन सम्बन्धी कोई समाचार न प्रकाशित करे। उच्चतम न्यायालय ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता की इस गलत बयानी पर आज तक क्यों नहीं जवाब तलब किया यह विधि क्षेत्रों में सर्वविदित है।

31 मार्च को, सॉलीसिटर जनरल ने उच्चतम न्यायालय से कहा था कि कोई भी प्रवासी मजदूर सड़क पर नहीं है, सभी को आश्रय घरों में रख लिया गया है । इस पूरी बहस में कोर्ट निष्क्रिय बनी रही और केंद्र की ओर से दायर स्टेटस रिपोर्ट को पूर्ण सत्य मानती रही। इस बीच, कई मीडिया रिपोर्टें सामने आनी शुरू हो चुकी हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि केंद्र का दावा सच्चाई से बहुत दूर था। ऐसी र‌िपोर्ट रही हैं कि प्रवासी मजदूरों ने सड़क के किनारे पुलों के नीचे शरण ली और उन्हें भोजन के लिए संघर्ष करना पड़ा। एक रिपोर्ट थी, जिसमें ये बताया गया था कि भूख से मजबूर प्रवासी मजदूरों को दिल्ली के एक श्मशान में केले बीनने पड़े थे।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के समक्ष ‘द हिंदू’ की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि लॉकडाउन की अवधि में 96% प्रवासी मजदूरों को राशन नहीं दिया गया है। 90% को मजदूरी नहीं दी गई है। प्रतिवाद में सॉलिसिटर जनरल ने एक लाइन का जवाब दिया था कि, ‘रिपोर्ट सच नहीं हैं’ और कोर्ट संतुष्ट हो गई थी। कोर्ट ने केंद्र के दावों पर सवाल उठाने की न इच्छाशक्ति दिखाई थी और न साहस दिखाया था।

21 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने, हर्ष मंदर और अंजलि भारद्वाज की याचिका का निस्तारण कर दिया, और एक मामूली टिप्पणी की कि केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता की ओर से पेश “सामग्री” को देखने और “मामले को हल करने लिए ऐसे कदम उठाने को, जो उपयुक्त लगे” कह दिया गया है। कोर्ट को यह मुद्दा इतना भी गंभीर नहीं लगा कि वह प्रवासियों को तत्काल, ठोस राहत सुनिश्चित करने के लिए एक सकारात्मक और ठोस दिशा निर्देश पारित कर दे। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सामग्र‌ियों, जिनमें दावा किया गया था कि प्रवासी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं प्राप्त हो रही है, पर बात भी नहीं की। चूंकि कोर्ट के निर्देश ढीले और अस्पष्ट हैं, इसलिए उनके प्रभावी अनुपालन की संभावना भी कम ही है।

एक्टिविस्ट स्वामी अग्निवेश की एक अन्य याचिका, जिसमें मांग की गई थी कि लॉकडाउन में बेसहारा लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, का भी खंडपीठ ने उस दिन निपटारा कर दिया ‌था। कोर्ट के निपटारे का आधार सॉलिसीटर जनरल का वह बयान था कि “याचिका में उठाए गए पहलुओं पर गौर किया जाएगा और यदि आवश्यक हुआ तो पूरक निर्देश भी जारी किया जाएगा”। स्वामी अग्निवेश द्वारा दायर एक अन्य जनहित याचिका पर भी अदालत की प्रतिक्रिया ऐसी ही थी, जिसमें लॉकडाउन के बीच कृषि कार्यों को करने में किसानों को होने वाली कठिनाइयों को उठाया गया था। पीठ ने मात्र एसजी तुषार मेहता का बयान दर्ज करने के बाद कि कृषि मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की पूरी निगरानी और कार्यान्वयन की जा रही है, याचिका का निपटारा कर दिया था।

स्वच्छता कर्मियों को व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण प्रदान करने के लिए दायर एक याचिका पर, कोर्ट एसजी द्वारा मौखिक रूप से प्रस्तुत जवाब कि केंद्र डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों का पालन कर रहा है, पर मान गई थी और मामले का निपटारा कर दिया था। लॉकडाउन के दौरान महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत मजदूरों को मजदूरी का भुगतान करने और अपने गांवों में वापस आने वाले सभी प्रवासियों को अस्थायी जॉब कार्ड जारी करने की मांग करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय और निखिल डे ने एक जनहित याचिका दायर की थी। 8 अप्रैल को, अदालत ने सॉलिसीटर जनरल के दावे के आधार पर कि वेतन के बकाया के लिए 5 अप्रैल को 6,800 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था, मामले को लंबे समय के लिए स्थगित कर दिया। और मामले को लॉकडाउन के दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया था।

3 अप्रैल को, अदालत ने प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पर लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा लिखे गए एक पत्र पर स्वतः संज्ञान लिया और पत्र को रिट याचिका में बदल दिया गया और केंद्र सरकार से एक रिपोर्ट मांगी गई। हालांकि, 13 अप्रैल को, अदालत ने बिना किसी कारण के एक पंक्ति के आदेश के जर‌िए रिट याचिका को खारिज कर दिया।

उच्चतम न्यायालय का मंगलवार 26 मई का यह आदेश 15 मई को इसी मसले पर दाखिल एक याचिका पर उसके रुख से बिल्कुल अलग है। उस दिन कोर्ट ने औरंगाबाद में ट्रेन से कटकर 16 मजदूरों की मौत के मामले में संज्ञान लेने से मना कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि अगर लोग रेल की पटरी पर सो जाएंगे तो उन्हें कोई नहीं बचा सकता। याचिकाकर्ता ने प्रवासी मज़दूरों का हाल कोर्ट के सामने रखते हुए इसी तरह की दूसरी घटनाओं का भी हवाला दिया था, लेकिन कोर्ट ने कहा था कि जो लोग सड़क पर निकल आए हैं, उन्हें हम वापस नहीं भेज सकते।

जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा था कि आप ने अखबार में छपी खबरों को उठाकर एक याचिका दाखिल कर दी है। कौन सड़क पर चल रहा है और कौन नहीं, इसकी निगरानी कर पाना कोर्ट के लिए संभव नहीं है।

इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि उच्चतम न्यायालय ने कल स्वीकार किया है कि उसने मीडिया रिपोर्ट और उच्चतम न्यायालय को मिली चिट्ठियों के आधार पर इस मामले का संज्ञान लिया है। पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि मीडिया लगातार प्रवासी मजदूरों की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को दिखा रहा है। लॉकडाउन के दौरान संसाधनों के अभाव में यह लोग सड़कों पर पैदल और साइकिल से लंबी दूरी के लिए निकल पड़े हैं। इन परेशान हाल लोगों को सहानुभूति और मदद की जरूरत है।

(वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ जेपी सिंह कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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