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चिदंबरम मामला: सुप्रीम कोर्ट ने विदेश भागने, सबूतों से छेड़छाड़, गवाहों को प्रभावित करने सरीखे लचर तर्कों की निकाल दी हवा

उच्चतम न्यायालय ने सीबी आई के उन तर्कों की हवा निकल दी जिन तर्कों के आधार पर कथित आर्थिक अपराधों में आरोपी बनाये गये राजनीतिज्ञों या अन्य लोगों के जमानत का विरोध करती है और हाईकोर्ट एवं अधीनस्थ न्यायालय उन्हीं लचर तर्कों के आधार पर जमानत प्रार्थनापत्र ख़ारिज कर देते हैं। सीबीआई का तर्क होता है कि आरोपी देश छोड़कर भाग सकता है, यदि जमानत दी गयी तो आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है और गवाहों को प्रभावित कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय का कहना है कि जब आरोपी का पासपोर्ट जमा करा लिया गया है और लुक आउट नोटिस जारी कर दी गयी है तो वह कैसे देश छोड़कर भाग सकता है? जब आर्थिक अपराध के दस्तावेज सीबीआई, भारत सरकार और कोर्ट में जमा हैं तो आरोपी सबूतों से कैसे छेड़छाड़ कर सकता है। जब इस बात के भी ठोस सबूत सीबीआई के पास नहीं हैं कि आरोपी ने किसी भी तरह से गवाह से सम्पर्क किया या उस पर दबाव बनाया तो अटकल के आधार पर कैसे मान लिया जाए कि आरोपी गवाहों पर दबाव बना सकता है।

इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने पूर्व वित्तमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया केस में सीबीआई की ओर से दर्ज मामले में ज़मानत दे दी है। हालांकि इसके बावजूद चिदंबरम रिहा नहीं हो पाएंगे क्योंकि वे इस मीडिया समूह से संबंधित मनी लॉन्डरिंग के एक अन्य मामले में 24 अक्टूबर तक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की हिरासत में हैं।

जस्टिस आर भानुमति, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस ऋषिकेश राय की पीठ ने चिदम्बरम को ज़मानत देते हुए कहा कि पूर्व वित्त मंत्री के न तो भागने की कोई आशंका है और न ही रत्ती भर इसका सबूत है कि उन्होंने किसी गवाह को प्रभावित करने की कोशिश की है। 21 अगस्त को गिरफ़्तारी के बाद पहली सुनवाई से ही सीबीआई उनकी ज़मानत का इन्हीं आधारों पर विरोध करती रही थी। हाईकोर्ट में भी उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज़ कर दी गई थी।

पीठ ने कहा कि जहां तक चिदम्बरम के विदेश भागने के जोखिम और सबूत से छेड़छाड़ की आशंका का संबंध है, हाईकोर्ट ने अपीलार्थी का पक्ष लेते हुए कहा है कि अपीलार्थी के विदेश भागने का जोखिम नहीं है, यानी उसके फरार होने की आशंका नहीं है। हाईकोर्ट ने सही कहा है कि पासपोर्ट के समर्पण और लुकआउट नोटिस को जारी करने से “उड़ान जोखिम” की आशंका नहीं के बराबर हो जाती है। जहां तक सबूत से छेड़छाड़ का सवाल है तो हाईकोर्ट ने सही कहा है कि मामले से संबंधित दस्तावेज अभियोजन पक्ष, भारत सरकार और न्यायालय के कब्जे में हैं इसलिए सबूतों के साथ अपीलार्थी के पास छेड़छाड़ का कोई मौका नहीं है।

पीठ ने कहा कि विद्वान सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि जब आरोपी  गंभीर आरोपों का सामना कर रहा है और जब वह अपने दोषी होने की संभावना पर संदेह करता है, तो विदेश भागने का जोखिम (उड़ान जोखिम) होता है। उनहोंने कहा कि अपीलकर्ता देश छोड़कर भाग सकता है इसलिए “उड़ान के जोखिम” के आधार पर अपीलकर्ता को जमानत नहीं मिलनी चाहिए। पीठ ने कहा की इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं है अपीलार्थी  एक “उड़ान जोखिम” है और उसके फरार होने की आशंका है।

पीठ ने कहा कि 15 मई 2017 को दर्ज की गई प्राथमिकी में हाईकोर्ट  ने अपीलकर्ता को 31 मई, 2018 को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है जो 20 अगस्त, 2019 तक जारी रही। 20 अगस्त को हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत की।         

अपीलार्थी की याचिका खारिज कर दी। 31 मई, 2018 से 20 अगस्त, 2019 के बीच, जब अपीलकर्ता को अंतरिम संरक्षण प्राप्त हो रहा था, अपीलकर्ता ने विदेश यात्रा का कोई आवेदन दाखिल नहीं किया था और न ही यात्रा के लिए अनुमति मांगी थी। यही नहीं प्राथमिकी दर्ज़ होने के बाद अपीलार्थी ने देश छोड़कर भागने का कोई भी प्रयास नहीं किया।
अपीलकर्ता ने कहा कि वह संसद सदस्य है और बार का वरिष्ठ सदस्य होने के नाते समाज में उसकी मजबूत जड़ें हैं। उसने पासपोर्ट को जमा कर दिया है और उसके खिलाफ लुकआउट नोटिस देखें जारी किया गया है। उसके देश से भाग जाने या मुकदमे से भगोड़ा होने की कोई संभावना नहीं है।

पीठ ने कहा की अपीलकर्ता की ओर के वरिष्ठ वकील के तर्कों में वजन है। क्योंकि जब अपीलार्थी ने अपने पासपोर्ट को जमा कर दिया है और जब उसके खिलाफ “लुकआउट नोटिस” जारी किया गया है तो अपीलार्थी “उड़ान जोखिम” नहीं है। गवाहों को प्रभावित करने की आशंका के सन्दर्भ में पीठ ने कहा कि सीबीआई  ने विभिन्न तिथियों पर अपीलार्थी की रिमांड की मांग करते हुए आवेदन पत्र दाखिल किए हैं। लेकिन इन आवेदनों में सीबीआई ने कभी आरोप नहीं लगाया था कि अपीलार्थी गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है और किसी भी गवाह (अभियुक्त) को अपीलार्थी और उसके पुत्र के बारे में जानकारी का खुलासा नहीं करने के लिए दबाव बनाया गया था। पीठ ने कहा कि किसी भी ठोस साक्ष्य के आभाव में यह नहीं माना जा सकता कि अपीलार्थी गवाहों को प्रभावित कर रहा है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश “… इसे खारिज नहीं किया जा सकता है कि याचिकाकर्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा……” की टिप्पणी किसी भी सामग्री से पुष्ट नहीं है और केवल आशंका और अंदाजा प्रतीत होती है।

पीठ ने कहा कि केवल अटकलों के आधार पर कि अपीलार्थी गवाहों पर दबाव डालेगा, बिना किसी ठोस आधार के अपीलकर्ता को नियमित जमानत देने से इनकार करने का कारण नहीं हो सकता। इसके अलावा, जब अपीलार्थी करीब दो महीने तक हिरासत में रहा, जांच एजेंसी के साथ सहयोग किया है और चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है। अपीलार्थी एक “उड़ान जोखिम” नहीं है और परिस्थितियों के मद्देनजर  मुकदमे से उसकी फरारी की कोई संभावना नहीं है तो अपीलार्थी को जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता है। सह-अभियुक्तों को पहले ही जमानत दी गई थी। अपीलार्थी की आयु 74 वर्ष है और उसे आयु संबंधी समस्याओं से पीड़ित माना जाता है। उक्त कारणों और मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, हम इस दृष्टिकोण के हैं कि अपीलकर्ता को जमानत दी जाए।

आईएनएक्स मामले में सीबीआई और ईडी यानी एनफ़ोर्समेंट डायरेक्टरेट दोनों के राडार पर   चिदंबरम थे। सीबीआई ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था, लेकिन ईडी ने पहले गिरफ़्तार नहीं किया था। जब लगा कि सीबीआई  मामले में उच्चतम न्यायालय से चिदम्बरम की जमानत हो सकती है तो ईडी इसमें कूद पड़ी और उनकी हिरासत मांगी थी। अधीनस्थ न्यायालय ने ईडी को पूछताछ की अनुमति दी। पूछताछ के बाद ईडी ने आईएनक्स मामले में ही मनी लांड्रिंग के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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