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Friday, September 24, 2021

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सुशांत केस: मीडिया ट्रायल साबित हुआ झूठा, नहीं मिले हत्या के सुबूत

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सुशांत की मौत का सच सामने आ चुका है। सुशांत की हत्या नहीं हुई, सुशांत ने आत्महत्या की थी। अब सीबीआई के सामने चुनौती है कि बिना संदेह सुशांत की आत्महत्या को उकसाकर कराई गई आत्महत्या साबित करे। दरअसल अभी तक मुंबई पुलिस और सीबीआई की पूछताछ में आत्महत्या के पीछे उकसाने का ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया है।

पिछले हफ्ते उच्चतम न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित हत्या और उकसाकर कराई गई आत्महत्या के मामलों में ऐसे फैसले दिए हैं, जिनकी कसौटी पर सुशांत की मौत का मामला सरल भाषा में कहें तो अवसाद से आत्महत्या का मामला ही प्रतीत होता है। हत्या के लिए मोटिव का होना जरूरी है, लेकिन सुशांत की मौत के मामले में कोई मोटिव मुंबई पुलिस और सीबीआई को नहीं मिला। सुशांत के पिता ने सुशांत के खाते में 15 करोड़ रुपये की हेराफेरी का आरोप लगाकर परोक्ष रूप से हत्या का मोटिव बताने की कोशिश की थी, पर ईडी और सीबीआई की जांच में पता चला है कि इतने रुपये खाते में नहीं थे और प्राइम सस्पेक्ट रिया चक्रवर्ती के खाते में कोई पैसा ट्रांसफर नहीं हुआ था।

अब सीबीआई के सामने सुशांत के आत्महत्या का मामला है, जिसकी जांच में आत्महत्या के लिए ठोस दुराशय का साक्ष्य होना बहुत जरूरी है। गुरुचरण सिंह बनाम पंजाब, क्रिमिनल अपील संख्या 40/2020, 2 अक्टूबर 2020 में उच्चतम न्यायालय के जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने व्यवस्था दी है कि आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306 आईपीसी) की सामग्री को जाहिर तौर पर होने के अनुमान के तहत नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे स्पष्ट और विशिष्ट होना चाहिए। पीठ ने एक ऐसे पति की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है, जिस पर पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था। गुरचरण सिंह को अपनी पत्नी की आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था।

सिंह पर उनके माता-पिता के साथ आईपीसी की धारा 34 के तहत पढ़ी गई धारा 304 बी और 498 ए के तहत आरोप लगाए गए थे। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने उल्लेख किया कि आईपीसी की धारा 304 बी और 498 ए के तहत उन्हें दोषी ठहराने के लिए सामग्री अपर्याप्त थी, लेकिन कहा कि भले ही पति के खिलाफ इसके लिए कोई आरोप तय नहीं किया गया हो, लेकिन उसे धारा आईपीसी की 306 के तहत पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया जा सकता है। एम्स ने सुशांत की विसरा जांच की और इस नतीजे पर पहुंची कि सुशांत की हत्या नहीं हुई। उसे जहर नहीं दिया गया, उसने खुदकुशी की थी। एम्स डॉक्टरों की टीम ने सुशांत सिंह राजपूत की पोस्टमार्टम, विसरा रिपोर्ट को दोबारा परखा और सारे मेडिकल एंगल पर मंथन करने के बाद ये नतीजा दिया।

मीडिया हाईप ने सुशांत की मौत के मामले को राष्ट्रीय हत्या/आत्महत्या का मामला बना दिया था। दो-दो राज्यों की पुलिस के बाद तीन-तीन टॉप एजेंसीज़ को, जिसकी जांच अपने हाथ में लेनी पड़ी। जिस मौत को हत्या बताकर पटना से मुंबई तक महीनों सियासी बवाल होता रहा। जब उस मामले की फोरेंसिक रिपोर्ट सामने आई तो मामला खुदकुशी का निकला। फोरेंसिक रिपोर्ट के मुताबिक सुशांत ने अपने बेडरूम के अंदर गले में फंदा लगा कर खुदकुशी की थी और खुदकुशी से पहले उन्होंने अपना कमरा अंदर से बंद कर लिया था।

सीबीआई को अपनी रिपोर्ट सौंपने के साथ-साथ फोरेंसिक एक्सपर्ट्स ने ये साफ कर दिया था कि इस मामले के दूसरे पहलुओं की तफ्तीश के बाद सीबीआई ही ये आखिरी फैसला करेगी कि मामला खुदकुशी का है या फिर कुछ और? और सीबीआई ने आख़िरकार वो फैसला कर ही लिया। वो इस नतीजे पर पहुंच गई कि मामला खुदकुशी का ही है। सीबीआई ने फोरेंसिक सबूतों को ध्यान में रखने के साथ-साथ जो दूसरे परिस्थितिजन्य साक्ष्य इकट्ठा किए, उन्होंने भी यही इशारा किया कि सुशांत की मौत के पीछे कोई साज़िश नहीं है।

एम्स की मेडिकल बोर्ड ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर जो ऑब्ज़र्वेशन पेश की, वो मुंबई के कूपर अस्पताल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मिलती-जुलती रही। मुंबई की कलीना फोरेंसिक लैब ने सुशांत की विसरा जांच की जो रिपोर्ट दी थी, एम्स के एक्सपर्ट्स ने जब विसरा की जांच की, तो वही बात सामने आई। मुंबई और दिल्ली की दोनों ही विसरा रिपोर्ट के मुताबिक मौत से पहले सुशांत को ज़हर जैसी कोई चीज़ नहीं दी गई। इसी के साथ ज़हर वाली साज़िश की बात भी ख़त्म हो गई।

सीबीआई ने सुशांत का लैपटॉप, हार्ड डिस्क, एक कैनन कैमरा और दो मोबाइल फ़ोन भी ज़ब्त किए थे, जिनकी फॉरेंसिक जांच की गई और इसमें भी कोई साज़िश सामने नहीं आई। मामले के आरोपियों समेत कुल 20 से ज़्यादा लोगों से पूछताछ हुई और सबके बयानों की अलग से जांच की गई, इसमें भी कुछ गड़बड़ी वाली बात सामने नहीं आई। इतना ही नहीं फॉरेंसिक जांच में सुशांत के गले के अलावा और कहीं कोई चोट के निशान भी नहीं मिले। ठीक इस तरह कपड़ों में भी कोई ज़ोर जबरदस्ती के सबूत नहीं थे।  यहां तक कि गले के लिगेचर मार्क को लेकर भी सीबीआई के फोरेंसिक एक्सपर्टस को किसी तरह के कोई शक वाली बात नज़र नहीं आई।

ऐसे में अब सीबीआई ने फिलहाल मामले की जांच खुदकुशी वाले एंगल से ही आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है। इस मामले में सुशांत के घर वालों की शिकायत पर पहले ही उसकी गर्लफ्रेंड रिया के साथ-साथ उसके घर वालों के खिलाफ़ सुशांत को खुदकुशी के लिए मजबूर करने की एफआईआर दर्ज है। अब जब ये साफ़ हो गया कि मामला खुदकुशी का है, सीबीआई अपनी तफ्तीश में ये पता करने की कोशिश करेगी कि वाकई सुशांत की खुदकुशी के लिए रिया और उसके घर वाले कितने जिम्मेदार हैं। इसके लिए सीबीआई क ठोस साक्ष्य जुटाना होगा, जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने आत्महत्या में दुराशय पर रूलिंग दी है।

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने अनवर अली बनाम हिमाचल प्रदेश, क्रिमिनल अपील नंबर 1121/2016 में 28 सितंबर 2020 को व्यवस्था दी है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में मोटिव साबित न कर पाना आरोपी के पक्ष में पलड़ा भारी करने वाला कारक होता है। पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा दो आरोपियों- अनवर अली एवं शरीफ मोहम्मद को दोषी ठहराये जाने के फैसले को निरस्त करते हुए उन्हें बरी करने का ट्रायल कोर्ट का निर्णय बरकरार रखा। दोनों दीपक नामक व्यक्ति की हत्या के अभियुक्त थे।

पीठ ने कहा कि सुरेश चंद्र बहरी बनाम बिहार सरकार 1995 एसयूपीपी(1) एससीसी 80 के मामले में इसी कोर्ट ने स्थापित किया है कि यदि मोटिव  साबित हो जाता है तो वह परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला में एक कड़ी बनेगी, लेकिन उसकी गैर-मौजूदगी को अभियोग निरस्त करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, लेकिन इसी कोर्ट ने ‘बाबू’ मामले में यह भी कहा है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में मोटिव की गैर-मौजूदगी एक ऐसा कारक जरूर है, जिसका पलड़ा सदैव अभियुक्त के पक्ष में झुका होता है। पीठ ने कहा कि दुराशय के घटक को मूल रूप से मौजूद होने के लिए ग्रहण नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसे दृश्यमान और विशिष्ट होना चाहिए।

बॉलीवुड के उभरते स्टार सुशांत सिंह राजपूत ने 14 जून को अपने बांद्रा स्थित फ्लैट में फांसी लगाकर सुसाइड कर लिया था। सुशांत के पिता की ओर से पटना में 25 जुलाई को दर्ज कराई गई एफ़आईआर में सुशांत की दोस्त और अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के ख़िलाफ़ पैसा ऐंठने और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था। इस बीच सुशांत की मौत के मामले में सितंबर आते-आते ड्रग का एंगल भी सामने आया, जिसकी पड़ताल में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने कई लोगों से पूछताछ की और 8 सितंबर को रिया की गिरफ़्तारी हुई। इसके बाद रिया चक्रवर्ती न्यायिक हिरासत में हैं।

रिया चक्रवर्ती की शिकायत पर सुशांत सिंह राजपूत की बहन प्रियंका सिंह, दिल्ली स्थित राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टर तरुण कुमार और अन्य के ख़िलाफ़ आईपीसी और एनडीपीएस एक्ट के तहत मुंबई के बांद्रा पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज की गई। इस पर अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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