Sunday, October 17, 2021

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स्वतंत्र और निडर न्यायपालिका के बिना कानून का शासन नहीं हो सकता: जस्टिस दीपक गुप्ता

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उच्चतम न्यायालय में वर्तमान में दो धारायें स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ रही हैं,एक धारा राष्ट्रवाद की आड़ में सरकार के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध दिखाई पड़ रही है तो दूसरी धारा संविधान और कानून के शासन की अवधारणा पर चलती दिख रही है। कई न्यायाधीश मौन हैं,क्योंकि वे या तो स्पष्ट रूप से किसी पक्ष के साथ दिखना नहीं चाहते अथवा उन्हें मुखर होने का अवसर नहीं मिलता। अब एक ओर जस्टिस अरुण मिश्रा प्रधानमन्त्री की खुलकर प्रशंसा कर रहे हैं और कई माननीय विभिन्न संवैधानिक एवं क़ानूनी मुद्दों पर संविधान से इतर फैसले राष्ट्रवाद के नाम पर सुना रहे हैं तो दूसरी तरफ जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड सरीखे न्यायाधीश भी हैं जो विभिन्न सार्वजनिक मंचों से खुलकर अपनी संवैधानिक राय व्यक्त कर रहे हैं।
शाहीनबाग़ की सड़क खुलवाने कि याचिका की सुनवाई को उपयुक्त माहौल न होने के कारण जस्टिस संजय कृष्ण कौल और जस्टिस के एम जोसेफ ने 23 मार्च तक टाल दी जो शायद सत्तापक्ष को रास न आये लेकिन कश्मीर से लेकर सीएए की संवैधानिकता के अत्यंत गम्भीर मसले को उच्चतम न्यायालय में टाला जा रहा है उसे क्या न्याय कहा जा सकता है? चुनावों में ईवीएम के दुरूपयोग की शिकायतें आम हैं और अब वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में 347 लोकसभा सीटों पर ईवीएम में मत पड़ने और मत निकलने में अंतर सामने आया है, जिसकी याचिकाएं उच्चतम न्यायालय में लम्बित हैं और इसकी सुनवाई भी टलती जा रही है। इससे चुनाव प्रणाली पर आम जन का विश्वास उठता जा रहा है पर उच्चतम न्यायालय को इसकी कोई चिंता नहीं है क्योंकि इससे कहीं न कहीं सत्ता पक्ष को लाभ मिल रहा है।यदि इस हेराफेरी का संतोषजनक उत्तर चुनाव आयोग नहीं दे पाया तो वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणाम पर ही गम्भीर प्रश्नचिन्ह लग जायेगा।
ऐसे माहौल में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के कार्यक्रम “लोकतंत्र और असहमति” (डिमॉक्रेसी एंड डिसेंट) पर अपने व्याख्यान में जस्टिस दीपक गुप्ता ने लोकतंत्र में असहमति की बात की। उन्होंने इस धारणा की आलोचना की कि जो लोग सत्ताधारी लोगों की बात नहीं मानते वे देश विरोधी हैं।उन्होंने कहा कि यद्यपि लोकतंत्र में जो बहुमत में होता है उसी का शासन होता है पर बहुसंख्यावाद लोकतंत्र के ख़िलाफ़ होता है।
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि एक स्वतंत्र और निडर न्यायपालिका के बिना क़ानून का शासन नहीं हो सकता। लोकतंत्र में असहमति की आजादी होनी चाहिए।आपसी बातचीत से हम बेहतरीन देश बना सकते हैं। हाल के दिनों में विरोध करने वाले लोगों को देशद्रोही बता दिया गया। जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि भारत जैसे देश में, जहां सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला जीतता है, ऐसी व्यवस्था पर लोकतंत्र का आधार है, अमूमन सत्ता में क़ाबिज़ होने वाले वोट देने वाले लोगों में बहुमत का प्रतिनिधित्व नहीं करता और बहुमत की तो बात ही छोड़ दीजिए।हम फ़र्ज़ करें कि उनको जनसंख्या के 51फीसद लोगों के वोट मिले तो क्या इसका मतलब यह है कि शेष 49 फीसद लोग अगले पांच वर्षों तक अपना मुंह बंद रखेंगे और कुछ नहीं बोलेंगे? क्या इसका यह अर्थ हुआ कि 49 फीसद के पास अगले पांच साल तक कोई आवाज़ नहीं होगी और जो हो रहा है उसको वे स्वीकार कर लें और इसका विरोध नहीं करें? इसलिए, लोकतंत्र में कोई सरकार जब चुनकर सत्ता में आ जाती है, तो यह 100 फीसद लोगों की सरकार होती है न कि 51फीसद की होती है भले ही उसको कितने ही प्रतिशत लोगों ने वोट दिया। हर नागरिक ने भले ही आपको वोट दिया या नहीं दिया, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार है।
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि सवाल करना, चुनौती देना, जांच करना, सरकार से उत्तरदायित्व की मांग करना, ये सब नागरिकों के अधिकार हैं। इन अधिकारों को अगर कोई छीन लेता है, हम एक ऐसा समाज बन जाएंगे जो सवाल नहीं करेगा और मृतप्राय बन जाएगा और जो आगे और विकास नहीं कर पाएगा। जस्टिस गुप्ता ने असहमति जताने और प्रश्न पूछने वालों को “देश-विरोधी” क़रार देने की हाल की धारणा पर रोष प्रकट किया। उन्होंने कहा कि नागरिकों को मिलकर शांतिपूर्ण विरोध जताने का अधिकार है। सरकार हमेशा ही सही नहीं होती। जब तक कोई क़ानून को नहीं तोड़ता, उसको विरोध प्रदर्शन और असहमति जताने का पूरा अधिकार है ।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के 15 फ़रवरी के अहमदाबाद के व्याख्यान पर जस्टिस गुप्ता ने कहा, “असहमति को आंख मूंद कर देश-विरोधी क़रार देना या लोकतंत्र-विरोधी करार देना संवैधानिक मूल्यों को संरक्षित करने की प्रतिबद्धता और संवाद आधारित लोकतंत्र को बढ़ावा देने के विचार पर कुठाराघात है।सिर्फ़ इस वजह से कि आप कोई विरोधी राय रखते हैं, आप देश विरोधी नहीं हो जाते। यह सरकार के ख़िलाफ़ हो सकता है, देश के ख़िलाफ़ नहीं।
जस्टिस गुप्ता ने बार एसोसिएशन में इस बात की बढ़ती धारणा के ख़िलाफ़ भी अपनी बात कही जिसमें वे राजद्रोह जैसे मामलों में आरोपियों की पैरवी नहीं करने का प्रस्ताव पास करते हैं।मैंने यह पाया है कि बार एसोसिएशन प्रस्ताव पास करते हैं कि वे अमुक मामलों में पैरवी नहीं करेंगे क्योंकि यह देश-विरोधी मामला है। यह ग़लत है। जब कोई बार एसोसिएशन इस तरह की बात करता है (कुछ ख़ास लोगों की पैरवी नहीं करेंगे), तो यह न्याय के रास्ते में रोड़ा अटकाना हुआ।जस्टिस गुप्ता ने यह भी याद दिलाया कि क़ानूनी बिरादरी नागरिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए हमेशा ही अग्रिम पंक्ति में रही है और उन्होंने वर्तमान पीढ़ी से आह्वान किया कि वे बार की संवैधानिक परंपरा को बनाए रखें।
जस्टिस गुप्ता ने इसके बाद फ़ैसलों में जजों की असहमति के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि कई बार असहमति के फ़ैसले भविष्य के क़ानून बन जाते हैं। उन्होंने अमेरिका में दासता पर फ़ैसले का ज़िक्र किया जिसमें दासता को संवैधानिक माना गया था। पर आठ जजों में से एक जज ने इससे असहमति जताते हुए अपना फ़ैसला दिया। असहमति का यह फ़ैसला भविष्य का क़ानून बना। इसके बाद उन्होंने एके गोपालन मामले में असहमति जताने वाले जज जस्टिस फ़ज़ल अली का ज़िक्र किया जिसे मेनका गांधी के मामले में आए फ़ैसले में स्वीकार किया गया।
महत्त्वपूर्ण असहमति के दूसरे मामले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने खरक सिंह मामले में न्यायमूर्ति सुब्बा राव की असहमति का ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है। कई साल बाद इस विचार को अब स्वीकार कर लिया गया है।उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति सुब्बा राव की असहमति अपने समय से काफ़ी आगे की बात थी।इसके बाद उन्होंने नरेश मिराजकर मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला की असहमति का ज़िक्र किया कि क्या न्यायिक कार्रवाई को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानकर इसे चुनौती दी जा सकती है या नहीं।जस्टिस गुप्ता ने कहा कि यह अभी भी अल्पमत का फ़ैसला है। पर यह बदलता है कि नहीं इसके बारे में समय ही बताएगा।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड के आधार मामले में और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा के सबरीमाला मामले में असहमति के फ़ैसले का भी उन्होंने ज़िक्र किया।उन्होंने बताया कि उनके लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण असहमति का फ़ैसला था न्यायमूर्ति एचआर खन्ना का एडीएम जबलपुर मामले में असहमति का फ़ैसला जिसकी वजह से उन्हें मुख्य न्यायाधीश का पद गंवाना पड़ा।
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि जहां तक असहमति की बात है कुछ भी पवित्र नहीं है। उन्होंने कहा कि कोई भी संस्थान आलोचना से परे नहीं है, फिर चाहे वो न्यायपालिका हो, आर्म्ड फोर्सेज हो।असहमति के अधिकार में ही आलोचना का अधिकार भी निहित है। अगर हम असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे तो ये अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला होगा। लोगों को एक जगह जमा हो कर विरोध करने का अधिकार है।लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से। सरकार ऐसे आंदोलन को यूं ही दबा नहीं सकती।उन्होंने कहा कि अगर हम असहमति को दबाने की कोशिश करेंगे, तो हम एक पुलिसिया राज्य बन जाएंगे और हमारे देश के निर्माताओं ने ऐसी कल्पना नहीं की थी।
एससीबीए के अध्यक्ष वरिष्ठ वक़ील दुष्यंत दवे ने जस्टिस गुप्ता से कहा कि आज के माहौल में, आपने जो कहा है उससे बहुतों को सुकून मिलेगा।आपका व्याख्यान आज के समय में काफ़ी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आपने हमें बोलने के लिए उत्साहित किया है ।

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