Saturday, November 27, 2021

Add News

103 किलो सोना चोरी मामला: तमिलनाडु की सीबी-सीआईडी करेगी सीबीआई की जांच

ज़रूर पढ़े

तमिलनाडु में उस समय केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की इज्जत की वाट लग गयी जब सीबीआई की हिरासत से 103 किलो सोना गायब हो गया और मद्रास हाईकोर्ट ने सीबीआई के विरोध के बाद तमिलनाडु सीबी-सीआईडी को मामले की जांच का आदेश दे दिया। सोना गायब होने से सीबीआई में चेन्नई से लेकर नई दिल्ली तक हड़कंप मच गया है क्योंकि सीबीआई के इतिहास में पहली बार होगा कि सीबीआई की जाँच किसी राज्य की पुलिस करेगी।

सीबीआई ने वर्ष 2012 में चेन्नई के सुराना कॉर्पोरेशन लिमिटेड के ऑफिस में छापा मारा था। इस दौरान 400 किलो सोने की छड़ें और गहने जब्त किए गए थे। गायब हुआ सोना इसी का हिस्सा है। सीबीआई ने पूरा सोना सुराना कॉर्पोरेशन की सेफ और वॉल्ट में रखकर सील कर दिया था।

सीबीआई के अनुसार उसने सेफ और वॉल्ट्स की 72 चाभियों को चेन्नई की प्रिसिंपल स्पेशल कोर्ट को सौंप दिया था। सीबीआई ने दावा किया कि जब्त किए जाने के दौरान सोने का वजन इकट्ठा किया गया था। लेकिन एसबीआई और सुराना के बीच कर्ज के मामले के निस्तारण के लिए नियुक्त किए गए लिक्विडेटर (परिसमापक) को सौंपते वक्त वजन अलग-अलग किया गया। और वजन में 103 किलोग्राम का अंतर आ गया। इस स्थिति में परिसमापक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सीबीआई को 103.864 किलोग्राम सोना वापस करने के लिए निर्देश देने की मांग की।

रामसुब्रमण्यम बनाम पुलिस इंस्पेक्टर, केंद्रीय जांच ब्यूरो मामले में मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस पीएन प्रकाश की एकल पीठ ने अपराध शाखा (क्राईम ब्रांच) को सीबीआई की हिरासत से 103 किलोग्राम सोने के गायब होने के बारे में जांच करने का निर्देश दिया है। जस्टिस पीएन प्रकाश ने इस संबंध में सीबीआई के अनुरोध को खारिज कर दिया, जिसमें सीबीआई ने पड़ोसी राज्य या राष्ट्रीय जांच एजेंसी से इस मामले की जांच कराने का अनुरोध किया था।

एकल पीठ ने सीबीआई से पूछा कि इस संबंध में चोरी की कोई प्राथमिकी क्यों नहीं दर्ज की गई। इस पर सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक ने कहा कि सीबीआई द्वारा एक आंतरिक जांच की जा रही है और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 के तहत सीबीआई के पास चोरी का मामला दर्ज करने का अधिकार नहीं है, यह स्थानीय पुलिस के क्षेत्र में आता है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि सीबीआई को चोरी के लिए एक प्राथमिकी दर्ज करने और जांच का निर्देश देने के लिए निर्देश दिया जाए, क्योंकि सीबीआई की प्रतिष्ठा में कमी आएगी, अगर जांच स्थानीय पुलिस द्वारा की जाती है।

एकल पीठ ने कहा कि यह अदालत इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हो सकती है, क्योंकि कानून इस तरह के आक्षेप को मंजूरी नहीं देता है। सभी पुलिसकर्मियों पर विश्वास करना पड़ता है और यह कहने के लिए झूठ नहीं बोलता है कि सीबीआई के पास विशेष सींग है, जबकि स्थानीय पुलिस केवल एक पूंछ है। यह सीबीआई के लिए एक अग्निपरीक्षा हो सकती है, लेकिन इसमें मदद नहीं की जा सकती है। यदि उनके हाथ साफ हैं, तो सीता की तरह वे उज्जवल हो सकते हैं, अगर नहीं तो उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

एकल पीठ ने कहा कि वजन के संदर्भ में एक पंचनामा को हल्के में नहीं लिया जा सकता है, खासकर इस प्रकृति के एक मामले में जब वजन का फर्क कुछ ग्राम का नहीं है, एक लाख ग्राम का है, तो इसलिए अदालत ने राज्य के सीबी-सीआईडी को इस संबंध में एक जांच करने का निर्देश दिया। एकल पीठ ने कहा कि सबसे पहले 103.97 किलोग्राम सोने की कथित कमी सीबीआई द्वारा की गई वास्तविक गलती हो सकती है या दूसरे, सीबीआई अधिकारियों की मिलीभगत करके इसे चार सौ ग्राम का बनाए रखा जा सकता है और इसमें अवैध सौदेबाजी की जा सकती है। यह अदालत इन संभावनाओं पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रही है। यह कहने और मामले का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

सीबीआई की दलील को न मानते हुए जस्टिस प्रकाश ने सीबी-सीआईडी को आदेश दिया कि वह एसपी रैंक के अधिकारी से मामले की जांच कराकर 6 महीने में रिपोर्ट दे। इस सीबी-सीआईडी ने कोर्ट से कहा कि अगर लोकल पुलिस उससे जुड़े मामले की जांच करती है तो इससे उसके सम्मान में कमी आएगी। इस पर जस्टिस प्रकाश ने कहा कि कानून इस तरह की दलीलों को मंजूरी नहीं देता। सभी पुलिसवालों पर भरोसा किया जाना चाहिए।

सीबीआई ने यह भी दावा किया कि जब्ती के दौरान सोने की छड़ों और गहनों को एक साथ तौला गया था। वहीं सीबीआई और सुराना के बीच कर्ज के सेटलमेंट के लिए अपॉइंट किए गए लिक्विडेटर को सोना सौंपते वक्त उसे अलग-अलग तौला गया था। वजन में अंतर की वजह यह हो सकती है। जस्टिस प्रकाश ने सीबीआई की दलीलों को न मानते हुए एसपी रैंक के अधिकारी की अगुवाई में सीबी-सीआईडी जांच का आदेश दिया। जस्टिस प्रकाश ने जांच को 6 महीने के अंदर पूरी करने का निर्देश दिया है।

सीबीआई ने इस बारे में कोर्ट में याचिका भी दी थी कि इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस द्वारा न कराई जाए। इस मामले में हाईकोर्ट के दखल और उसके फैसले के बाद सीबीआई को शर्मिंदा होना पड़ा है। इस बारे में एजेंसी का कहना है कि यदि स्थानीय पुलिस इस मामले की जांच करती है तो सीबीआई की प्रतिष्ठा नीचे आ जाएगी। एकल पीठ ने इस याचिका को खारिज कर दिया है और सीबी-सीआईडी को इस मामले में एफ़आईआर दर्ज करने के लिए कहा है। एकल पीठ ने इस फैसले के साथ कहा “यह सीबीआई के लिए अग्नि परीक्षा हो सकती है, लेकिन इसका कुछ नहीं किया जा सकता। अगर सीता की तरह उनके हाथ साफ हैं, तो वे बच जाएंगे और यदि नहीं, तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा”।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

करप्शन केस में जज श्रीनारायण शुक्ला के खिलाफ केस चलाने की सीबीआई को केंद्र की मंजूरी

जल्द ही लखनऊ की सीबीआई अदालत में कोर्ट मुहर्रिर आवाज लगाएगा जज श्रीनारायण शुक्ला हाजिर हो ! शुक्ला जी...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -