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Categories: बीच बहस

पाटलिपुत्र की जंग: दलों का तीसरा संगम बिगाड़ सकता है पहली दो धाराओं का खेल

बिहार का चुनावी तापमान पूरे शबाब पर है। एक तरफ जहां पार्टी अदलाबदली की कहानी तेज है, तो दूसरी तरफ सूबे की छोटी पार्टियां जिन्हें बटमार पार्टियां कहा जा रहा है, उनके खेल से बिहार भ्रमित भी है और लुभा भी रहा है। कहने के लिए दो गठबंधनों के बीच बिहारी समाज को निर्णय लेना है, लेकिन जिस अंदाज में सूबे की बटमार पार्टियां एक अलग संगम बनाने को तैयार हैं और उसमें उन पार्टियों की भी ललचाई नजरें लगी हुई हैं, जिनका खेल किसी गठबंधन में बनता नहीं दिख रहा।

माना जा रहा है कि अगर बटमार पार्टियों का यह संगम तैयार हो गया तो साफ़ है कि बिहार का यह चुनाव खंडित जनादेश का गवाह बन सकता है। फिर चुनाव परिणाम के बाद बिहार में जो खेल होगा उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि बिहार में विधानसभा चुनाव इस बार गठबंधन की राजनीति की प्रयोगशाला बन सकता है। यह बात इसलिए भी कही जा रही है, क्योंकि बिहार में सीधा मुकाबला दो गठबंधन के बीच है।

एक ओर नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए है तो दूसरी ओर आरजेडी के नेतृत्व में महा गठबंधन। दोनों ही गठबंधनों के बीच इस बार दिलचस्प मुकाबला है, लेकिन इसी बीच तीसरा संगम या गठबंधन बिहार की राजनीति को शापित कर सकता है और नीतीश और तेजस्वी के खेल और इरादे को धूल-धूसरित भी कर सकता है।

बिहार का जातीय समीकरण
आगे बढ़ें इससे पहले कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं। जनसंख्या के हिसाब से वोट प्रतिशत की बात करें तो बिहार में सवर्ण वोटरों की संख्या 15 फ़ीसदी के आसपास है। सवर्णों की यह आबादी बंटी हुई है, और कोई भी पार्टी दावे के साथ नहीं कह सकती कि पूरा सवर्ण उसी के पक्ष में है। केवल एक बात साफ़ है कि सवर्णों की बहुतायत आबादी बीजेपी के साथ जुड़ी रही है, लेकिन इस बार युवा सवर्ण बीजेपी से बेहद नाराज हैं और इसका खामियाजा भी बिहार की एनडीए सरकार को भुगतना पड़ सकता है। उधर एक बड़ा समीकरण ‘माय’ समीकरण है।

इस समीकरण पर लालू यादव अपना दावा करते थे और कमोबेश आज भी यह समीकरण राजद के साथ है, लेकिन यह भी साफ़ है कि माय का यह समीकरण भी अब पहले जैसा नहीं रहा। इसमें भी छेद हो चुका है। माय वोट प्रतिशत 30 फ़ीसदी के आसपास है। माय समीकरण का मतलब मुस्लिम और यादव वोट का एकीकरण है।

बाकी के 20 फ़ीसदी वोट दलित और 35 फ़ीसदी वोट गैर यादव ओबीसी वोट हैं। बिहार में बीते तीन दशक की राजनीति बड़ी दिलचस्प रही है। पिछले तीन दशक में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान के इर्द-गिर्द ही बिहार की राजनीति घूमती रही है। विधानसभा की बात करें तो पहले लालू यादव और बाद में नीतीश कुमार के चेहरे के आस-पास ही चक्कर काटती रही, लेकिन इस बार देखना होगा कि मुकाबला किस प्रकार से एनडीए बनाम महागठबंधन बनाम नया संगम होता है, क्योंकि इस बार की परिस्थितियां न ही नीतीश कुमार के लिए सहज हैं और न ही महागठबंधन के लिए। नीतीश कुमार को सरकार विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा, तो महा गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राजद को अपने पुराने कार्यकाल और लालू यादव की अनुपस्थिति का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

महागठबंधन में टूट की आशंका
सीट शेयरिंग को लेकर महागठबंधन के बीच जिस तरह की रार है, इससे पहले नहीं देखी गई। नीतीश के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है और उनकी छवि भी अब पहले जैसी नहीं रही। इसके साथ ही देश के सबसे युवा बिहार प्रदेश की जनता अब 70 के हो चले नीतीश पर दांव लगाने को तैयार नहीं है। इस बार करीब 40 लाख नए वोटरों पर सबकी निगाहें हैं और नीतीश से लेकर बीजेपी की नजरें इन युवाओं पर हैं। नीतीश ने इन युवाओं को लालू राज की कहानी रखने की तैयारी की है, लेकिन दूसरा सच ये है कि बिहार के ये युवा सब जानते हैं। उनकी बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। वे किसी जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर सोच रहे हैं। युवाओं की यह सोच एनडीए को घायल किए हुए है।

मामला यही तक का नहीं है। नीतीश के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को देख कर राजद नेता तेजस्वी फूले नहीं समा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि राजद को बड़ी सफलता मिलेगी और वे मुख्यमंत्री तक बन सकते हैं। राजद घमंड में है। अब जब सीटों की बंटवारे की बारी आई है तब राजद सभी घटक दलों को आंखें दिखा रही है। ऊपर से भले ही सब ठीक लगे, लेकिन भीतर से घटक दलों की परेशानी है और वे नए ठिकाने की तलाश कर रहे हैं। कांग्रेस भी आहत है और रालोसपा भी। वाम दल भी आहत हैं और वीआईपी भी। ऐसे में इन दलों के सामने एक नया गठबंधन उभरता दिख रहा है।

भले ही कांग्रेस उस नए गठबंधन का हिस्सा ना बने, लेकिन पप्पू यादव, ओवैसी, देवेंद्र यादव द्वारा रचित यह नया गठबंधन कई पार्टियों के लिए आस लेकर आया है। चर्चा है कि इस नए गठबंधन से रालोसपा भी जुड़ सकती है और वीआईपी जैसी पार्टियां भी। कहने के लिए चिराग पासवान की नजरें भी इस नए गठबंधन पर है। खबर के मुताबिक़ वाम दलों के नेताओं के साथ भी पप्पू यादव बात कर रहे हैं। यशवंत सिन्हा की पार्टी को भी इससे जोड़ने की बात कही जा रही है।

अगर ये गठबंधन सचमुच बन गया तो बिहार की पूरी राजनीति बदल सकती है। और फिर वोट बंटने से एक नया खेल तैयार हो सकता है। इसके दो परिणाम भी आ सकते हैं। एक परिणाम तो ये होगा कि जो पार्टी सबसे बड़ी होकर उभरेगी उसके साथ यह गठबंधन मोलभाव करेगा या फिर इस गठबंधन से टूटकर कई पार्टियां बड़ी पार्टी को सपोर्ट करेंगी।

एक अद्भुत नजारा देखने को मिलेगा। दूसरा परिणाम ये होगा कि अगर यह नया गठबंधन सरकार बनाने की चाबी अपने पास कर लेता है तो फिर नजारा कुछ और ही होगा। फिर न नीतीश और न ही तेजस्वी सीएम बन सकते हैं। ऐसी हालत में नए गठबंधन की जो बड़ी पार्टी होगी उसका भाग्य खुल सकता है। इस पूरे खेल में कांग्रेस एक नया दांव खेल सकती है। बिहार के लिए यह सब अजूबा ही होगा।

चिराग पासवान की कहानी
बिहार में चिराग पासवान तो खुद को दलित सीएम के चेहरे के रूप में भी प्रोजेक्ट कर चुके है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चिराग ने जोखिम भरा राजनीतिक दांव खेला है पर अपने सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए यह काफी है। मुकेश सहनी, उपेंद्र कुशवाहा ऐसे नेता हैं जो महागठबंधन में उचित स्थान नहीं मिलने के बाद तीसरे गठबंधन की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे में चिराग पासवान को उनका साथ मिल सकता है। पप्पू यादव ने तो उन्हें पहले ही समर्थन देने का एलान कर दिया है।

एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि एनडीए से नाराज वोटर महागठबंधन को वोट ना करें। ऐसे में उसके पास तीसरा विकल्प पेश किया जाना भी चिराग पासवान के दिमाग में चल रहा होगा। जो वोटर्स इन दोनों गठबंधनों को छोड़ तीसरे विकल्प की ओर जा सकते हैं, उनका प्रतिशत लगभग 15 के आसपास है। इसका मतलब साफ है कि एनडीए से जो वोट छटेंगे वह महागठबंधन या आरजेडी के पास नहीं जाएगा। यही कारण है कि पप्पू यादव, चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी आत्मविश्वास से भरपूर हैं।

दलितों पर केंद्रित राजनीति
इस बार बिहार में दलित राजनीति का प्रयोग खूब जम के होगा। चिराग पासवान ने जब से एनडीए में नीतीश कुमार को आंखें दिखाने की शुरुआत की है, तब से दलित राजनीति की मांग बिहार में तेज हो गई है। दलित राजनीति को ध्यान में रखते हुए दोनों गठबंधनों की ओर से दलित नेताओं को अपने-अपने पाले में करने की भी सियासत चमक रही है। चिराग पासवान के बागी तेवर को देखते हुए एनडीए के साथ-साथ महागठबंधन भी उन पर करीबी निगाह बनाए हुए है।

वहीं, जीतन राम मांझी जो कि दलित राजनीति के कर्ताधर्ता के रूप में खुद को पेश करने में लगे हैं, वह भी महागठबंधन को बाय-बाय कर एनडीए में वापसी कर चुके हैं। जनता दल (यू) को धूल चटाने के मतलब से आरजेडी ने श्याम रजक को अपने पाले में किया। श्याम रजक भी बिहार के दलित नेताओं में से एक हैं। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार का चुनाव बिहार में दलितों पर कितना केंद्रित रहेगा।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और बिहार की राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं।)

This post was last modified on October 1, 2020 3:46 pm

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