लोकसभा चुनाव में मेहनतकश आबादी के हक का मुद्दा नदारद रहा

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भारत की संसदीय राजनीति में यह दूसरा सबसे लंबा चलने वाला लोकसभा चुनाव है। इसकी अवधि 44 दिनों की है। अब चुनाव का अंतिम दौर चल रहा है और प्रचार अभियान खत्म हो चला है। लगभग डेढ़ महीने के इस दौर में मोदी की गारंटी नफरत से भरे भाषणों की रही। इंडिया गठबंधन की ओर से संविधान और जनकल्याण की योजनाओं को जनता के बीच ले जाने की रही। इसी दौरान बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूरों की बड़ी खेप ट्रेनों से सफर में थी। वह अपने राज्यों से दूसरे राज्य के शहरों में काम ढूंढने निकले थे।

बीबीसी के एक पत्रकार ने जब एक मजदूर से पूछा कि आप वोट दिये बिना क्यों जा रहे हैं? तब उस मजदूर ने कहा, मेरे परिवार के कुछ लोग हैं जो वोट दे देंगे; कमाई नहीं करेंगे तो घर कैसे चलेगा। इस संवाद में साफ है कि मजदूरों को मनरेगा से काम की गारंटी उन्हें न तो रोजगार और न ही न्यूनतम जीवन की सुविधा देने में कारगर है। पिछले कुछ सालों में मनरेगा से मजदूरों के बड़े पैमाने पर नाम काटे गये, और श्रम-भुगतान के दौरान देरी और भुगतान न करने की कई सारी घटनाएं घटीं। इसकी वजह से भी इस चुनाव के दौरान गांव में रुकने की कोई स्थिति ही नहीं थी। इस लोकसभा चुनाव में गांव में मजदूरों को काम मिल सके, यह मुद्दा भी नहीं बना।

भारत में प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या है। ये वे मजदूर हैं जिनकी पीठ पर भारत की एक चौथाई विकास का बोझ लदा हुआ है। ये मजदूर तीन महीने, छह महीने और साल भर के लिए शहरों में काम के लिए आते हैं और फिर कुछ समय के लिए गांव चले जाते हैं। इन मजदूरों का सबसे बड़ा हिस्सा रियल इस्टेट यानी इमारत बनाने और इससे जुड़े काम का हिस्सा होता है। गेहूं की कटाई के बाद मजदूर गांव से निकलकर आसपास के शहरों में और यदि लंबे समय के लिए काम पर जाना है तब मेट्रोपॉलिटन शहर में जाते हैं।

18 मई, 2024 में बिजनेस स्टैंडर्ड ने खबर लिखा कि राज्य के भीतर 15 प्रतिशत और एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करने वाले मजदूरों के प्रवास में 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इस गिरावट में एक पक्ष लोकसभा चुनाव तो है ही, वहीं दूसरा पक्ष अप्रैल के महीने से ही तेजी से बढ़ती गर्मी थी। इस लोकसभा चुनाव में न तो मजदूरों को गांव में सुविधा देने का मसला उठा और न ही मौसम की बढ़ती मार में जीवन की सुरक्षा की कोई गारंटी देने की बात ही उठाई गई।

इस लोकसभा चुनाव के दौरान ही मई दिवस आया और चला गया। चुनावी भाषणों में, खासकर प्रधानमंत्री मोदी की जबान पर जितनी तेजी से ‘धर्म’ से लबरेज मसले उठे उसमें मजदूर वर्ग की चिंताएं कहीं नहीं थीं। कोविड महामारी के दौरान मजदूरों के अधिकारों को बड़े पैमाने पर दो साल से तीन साल के लिए खत्म कर दिया गया। अब उसे बहाल करने के लिए किसी भी पार्टी ने मुद्दा नहीं बनाया। खासकर काम के घंटे, अतिरिक्त काम के घंटों का वेतन, बोनस, यूनियन बनाने का अधिकार, छंटनी और बंदी जैसे मसले मजदूर वर्ग के रोजमर्रा के जीवन और काम की स्थितियों से जुड़े हुए हैं।

आये दिन फैक्ट्रियों में दुर्घटनाएं और ब्लॉस्ट में मारे गये मजदूरों को मुआवजा और दोषी को सजा देने के प्रावधान इस तरह बना दिये गये हैं जिसमें मालिक को न्यूनतम नुकसान और मजदूर को जानलेवा नुकसान से जूझना पड़ रहा है। इमारतों और सड़क परियोजनाओं में लगी कंपनियां मजदूरों का जिस तरह से चयन और भुगतान कर रही हैं और हादसों में मजदूरों के साथ जो बर्ताव हो रहा है वह बेहद डरावना और अमानवीय है। इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किया है, लेकिन न तो सरकार पर इसका असर हुआ और न ही सरकार चलाने वाली पार्टियों ने इस दिशा में कोई राजनीतिक मुद्दा ही उठाया।

न्यूनतम मजदूरी एक ऐसी कागजी घोषणा हो चुकी है जिसका वास्तविक मजदूरी से कोई लेना-देना ही नहीं रह गया है। उपभोक्ता सूचकांक, महंगाई और श्रम भगुतान के बीच की आंकड़ेबाजी सिर्फ कागजी कार्यवाही बनकर रह गई है। इसी तरह का मसला मजदूरों के स्वास्थ्य बीमा का है। इस सदंर्भ में पार्टियां जरूर अपनी-अपनी घोषणाएं जारी करती हैं, लेकिन एक कल्याणकारी योजना की तरह आती हैं। ये एक राजनीतिक मुद्दा बनकर नहीं आती जिसमें सत्तासीन पार्टी की मजदूर वर्ग को लेकर अपनाई गई नीति की आलोचना करते हुए उसे बेहतर करने की बात कर रही हो।

मसलन, भाजपा की केंद्र सरकार को न्यूनतम वेतन को राष्ट्रीय स्तर पर 375 रुपया प्रतिदिन करने का प्रस्ताव दिया गया और जब इसे लागू करने की बात आई तब इसे मालिकों पर अतिरिक्त दबाव बन जाने का हवाला देते हुए इसे मना कर दिया गया। ज्यां द्रेज और रीतिका खेड़ा ने अपने शोध लेखों में कई सारे हवालों से बताया कि खेतिहर मजदूरों की आय में लगातार गिरावट आ रही है। वहीं यह भी रिपोर्ट सामने आयी है कि खेत पर जनसंख्या का दबाव भी पहले से अधिक बढ़ा है। वहीं खेती और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में रोजगार में गिरावट जारी है।

मजदूरों से जुड़ा एक बड़ा मसला, अभी हाल के दिनों में उठा है और वह है न्यूनतम मजदूरी बनाम जीवन जीने का भुगतान। भारत में जो वास्तविक राष्ट्रीय स्तर का न्यूनतम मजदूरी है वह 176 रुपये प्रतिदिन है। इसका आंकलन 2017 में अंतिम बार किया गया था। यह एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों में सबसे कम है। यह बांग्लादेश से भी काफी कम है।

सरकार 2025 में इस अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की मदद से न्यूनतम मजदूरी की जगह पर निर्वाह मजदूरी देने की दिशा में जाएगी। इसमें मजदूर की ‘जरूरतों’ को चिन्हित किया जाएगा। यहां ध्यान में रखना जरूरी है कि न्यूनतम मजदूरी, जिसका भुगतान भारत में कभी भी वास्तविक तौर पर लागू नहीं होता है, भुगतान की वह सीमा रेखा है जिसके नीचे जाने का अर्थ मालिक को कानून के दायरे में दंडित होना होता है। लेकिन, जीवन निर्वाह एक लचीली व्यवस्था है जिसमें श्रम के बदले भुगतान उसके श्रम के अवदान और अतिरिक्त श्रम से नहीं बल्कि श्रम की आवश्यक परिस्थितियों के लिए देय भुगतान से जाकर जुड़ता है। इसमें संभव है कि सरकार देय भुगतानों की सीमा रेखा तय करने में एक भूमिका निभाए लेकिन यह बहुत संभव है कि श्रम भगुतान को मालिक और मजदूर के बीच का मसला बनाकर छोड़ दिया जाये।

ठीक उसी तरह से जिस तरह कार्यस्थल पर मजदूर संगठन बनाना और मजदूरों के अधिकार को मुख्य तौर पर मालिक और मजदूर के बीच के संबंधों पर छोड़ दिया है। जब ये संबंध बिगड़ते और हिंसक हो उठते हैं तब कार्यस्थल से जुड़ी कानूनी कार्यवाहियां शुरू हो जाती हैं। यहां यह कहना मुनासिब होगा कि कार्यस्थल पर सरकारी संस्थानों की कार्यवाहियों में जितना हस्तक्षेप और अधिकार मालिकों का होता है उसका हजारवां अंश का अधिकार भी मजदूर के पास नहीं होता है। मारुति सुजुकी, मानेसर में मालिक और मजदूर के बीच हुए हिंसक कार्यवाहियों में सारी सजा मजदूरों के हिस्से आई जबकि मालिक सजा तो दूर वे इस पूरे मसले में पीड़ित की तरह प्रस्तुत हुए।

आने वाले चंद सालों में भारत दुनिया का सबसे बड़ी मेहनतकश आबादी वाला देश होगा। भारत के कुल मजदूरों का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा खेती में लगा हुआ है। एक तिहाई सेवा और एक चौथाई उद्योगों में लगा हुआ है। लगभग 50 करोड़ मेहनतकश आबादी का बड़ा हिस्सा काम के अभाव में है। खासकर गांव से शहर आकर काम खोजने वाले मजदूरों की जिंदगी सबसे तबाही और असुरक्षा से भरा हुआ है। गांव से शहर आकर शिक्षा हासिल करने की गति जितनी तेज हुई है उसके विपरीत गति में रोजगार चल रहा है।

पिछले दो सालों में अकेले दिल्ली में आवासों को ढहाने के क्रम में 10 लाख से अधिक लोगों को आवासविहीन कर दिया गया। जबकि, इसी दिल्ली में न्यूनतम मजदूरी तो दूर, उससे लगभग 60 से 70 प्रतिशत कम पर काम करने वाले मजदूरों की संख्या कुल की 60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है। ठेका मजदूरी अब एक नियम बन चुका है और काम के घंटे अब मालिकों के अधिकार क्षेत्र का हिस्सा बन चुका है। सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

यदि हम वोट का हिसाब लगाएं तब भी मजदूर एक निर्णायक वोट है। लेकिन, यदि हम उसकी आर्थिक ताकत देखें तब वह सबसे कमजोर हालत में है। भारत की संसदीय राजनीति में वोट का राजनीतिक मूल्य उसकी आर्थिक हैसियत के साथ जुड़ी हुई है। इन अर्थों में मजदूरों के वोट सबसे कमजोर वोट हैं। संभवतः यही कारण है कि चुनाव के समय में उनके वोट के हिस्से न्यूनतम भी नहीं आता। वे भारत की संसदीय राजनीति में किसी भी बहस का हिस्सा नहीं बनते और न ही किसी पार्टी के एजेंडे और भाषणों का हिस्सा बन पाते हैं।

भारत के मजदूर वर्ग का आंदोलन कई बार उतार चढ़ाव के साथ गुजरते हुए जा रहा है। जब भी मजदूर वर्ग एक राजनीतिक मसला बना है, एक राजनीतिक ताकत बनकर अपनी राजनीतिक मांगों को लेकर सामने आया है, जब भी वह अपनी मजदूरी, आजादी और संगठन की मांग को लेकर संघर्षरत हुआ है, जब भी उसने राजसत्ता की बात की है, …उसे राजनीतिक दायरे से ढकेल कर बाहर करने और यहां तक कि उसे ‘दुश्मन’ करार देने में कोई कोताही नहीं बरती गई।

विकास का अर्थ ही मजदूर का हाशियाकरण है। लेकिन, जब यह हाशियाकरण राजनीति के दायरे में भी होने लगे तब यह अधिक खतरनाक है। जिस वर्ग और समुदाय की कोई राजनीतिक आवाज नहीं होती, वह सबसे कमजोर अवस्था में है। इस हालात को समझना जरूरी है और आवाज को पुरजोर तरीके उठाना ही सबसे जरूरी है।

(अंजनी कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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