Thursday, December 9, 2021

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गीत और संगीत का अमर हमसफर यानी इंदीवर

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‘‘चंदन सा बदन चंचल चितवन’’, ‘‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में’’, ‘‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’’, ‘‘चांद को क्या मालूम चाहता है’’, ‘‘ओह रे ताल मिले नदी के जल में’’, ‘‘नदिया चले, चले रे धारा’’, ‘‘है प्रीत जहाँ की रीत सदा’’, ‘‘जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे’’, ‘‘दुश्मन न करे दोस्त ने जो काम किया है’’, ‘‘होठों से छू लो तुम’’ यह काव्यात्मक और अर्थपूर्ण गीत गीतकार इंदीवर के हैं। फिल्मी दुनिया के अपने पांच दशक के लंबे करियर में उन्होंने तीन सौ से ज्यादा फिल्मों में तकरीबन एक हजार गीत लिखे। सभी एक से बढ़कर एक दिल लुभाने वाले। फिल्मी दुनिया में मजरूह सुल्तानपुरी के बाद वे ऐसे दूसरे गीतकार थे, जिन्होंने फिल्मों में लंबी पारी खेली और आखिरी वक्त तक अपने चाहने वालों को नग्मा-ओ-गीत की सौगात पेश करते रहे। इंदीवर ने संगीतकार रोशन के साथ काम किया, तो उनके बेटे राजेश रोशन के साथ भी। देव आनंद, राज कपूर, मनोज कुमार, फिरोज खान, जितेन्द्र, राजेश खन्ना, राकेश रोशन और अमिताभ बच्चन जैसे सुपर स्टारों की फिल्मों में कई सदाबहार गाने लिखे। एक दौर में जब फिल्मों में अच्छी शायरी और कविताई चलती थी, तो उस दौर के मुताबिक शायराना गीत लिखे। बदलते दौर में जब रिदम गीत पर हावी हो गया, तो इंदीवर ने उस जमाने के फिल्मी माहौल और दिलचस्पियों को कोसा नहीं, बल्कि अपने आप को उस में ढाल लिया।

बप्पी लहरी के फास्ट संगीत, जिसको हम डिस्को के नाम से जानते हैं, उन्होंने उस म्यूजिक में खुद को इस तरह से फिट किया कि वे उनके भी फेवरिट गीतकार हो गए। “आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए“ (फिल्म-कुर्बानी) जैसा नये अंदाज का गाना उन्हीं का लिखा हुआ है। यही नहीं उन्होंने अपने जमाने की मशहूर पॉप म्यूजिक की जोड़ी नाज़िया हसन और ज़ोहैब हसन के लिए फास्ट बीट के गाने लिखे, जो खूब मकबूल हुए। उस वक्त इन गानों की लोकप्रियता का आलम यह था कि ये गीत जवां दिलों की धड़कन बने हुए थे। हर एक इन गानों का दीवाना था।  
उत्तर प्रदेश में झाँसी जिले के छोटे से कस्बे बरुआ सागर में पैदा हुए इंदीवर का असली नाम श्यामलाल बाबू राय था। कविता का शौक उन्हें बचपन से ही था। ‘आजाद’ तखल्लुस से वे कविताएं लिखते थे। उनकी नौजवानी का दौर, देश की आजादी के संघर्षों का दौर था। स्वाधीनता संग्राम से प्रेरित होकर इंदीवर ने भी देशभक्ति के गीत रचे। आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया। कविता की लोकप्रियता बढ़ी, तो वे कवि सम्मेलनों में शिरकत करने लगे। कवि सम्मेलनों में इंदीवर बड़े प्रभावशाली ढंग से अपनी कविताएं पढ़ा करते थे।

ऐसे ही एक कवि सम्मेलन में उन्होंने जब अपना इंकलाबी गीत ‘‘ओ किराएदारों, कर दो मकान खाली’’ पढ़ा, तो अंग्रेजी हुकूमत को यह नागवार गुजरा और उन्हें जेल में डाल दिया गया। कुछ दिन वे जेल में रहे, वापिस आए तो फिर कविता और कवि सम्मेलनों में रम गए। उस दौर में हर कवि-शायर की दबी-छिपी चाहत फिल्मों में गाने लिखने की होती थी। इंदीवर भी अपने दिल में यह चाहत पाले हुए थे। उनके सामने ऐसी कई मिसाल मौजूद थीं, जिसमें छोटे कस्बे-शहर से निकलकर गीतकारों ने देश भर में बड़ा नाम किया था। बहरहाल, अपनी इस चाहत को लेकर बाईस साल के इंदीवर मुंबई पहुंच गए। कुछ दिन की जद्दोजहद के बाद, साल 1946 में उन्हें फिल्म ‘डबल फेस’ में गाना लिखने का मौका मिला। लेकिन अफसोस! न फिल्म चली और न गाने।

नतीजा, इंदीवर फिर अपने कस्बे बरुवा सागर वापस लौट आए। शुरूआती नाकामी के बाद भी उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया। फिल्मों में काम की तलाश में वे बार-बार मुम्बई आते-जाते रहे। आखिर पांच साल बाद, इंदीवर की किस्मत का सितारा चमका। साल 1951 में मौसिकार रोशन के संगीत निर्देशन में उन्हें फिल्म ‘मल्हार’ में गाने लिखने का मौका मिला। इस फिल्म के सारे गाने हिट हुए। खास तौर पर ‘‘बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम“ गीत ने तो पूरे देश में धूम मचा दी। ‘मल्हार’ के गानों की कामयाबी के बाद, इंदीवर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वे पायदान-दर-पायदान बुलंदियां छूते चले गए। साल 1963 में उन्हें एक बार फिर रोशन के संगीत में फिल्म ’पारसमणि’ के गाने लिखने का अवसर मिला। इस अवसर को भी उन्होंने अपने हाथ से नहीं जाने दिया। ’पारसमणि’ अपने गानों की वजह से ही सुपर हिट हुई। इस फिल्म का गाना ‘‘रोशन तुम्हीं से दुनिया’’ उस जमाने में खूब चला और आज भी उसी तरह मकबूल है। वैसे तो इंदीवर ने अपने जमाने के सभी टॉप संगीतकारों के साथ काम किया। लेकिन उनकी जोड़ी संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी के साथ खूब जमी। कल्याणजी-आनंदजी के साथ उन्होंने तकरीबन चालीस फिल्में कीं। शुरूआत साल 1965 में आई फिल्म ‘हिमालय की गोद’ से हुई।

जिसके सभी गाने लोगों ने पसंद किए। इसके बाद तो जैसे एक सिलसिला शुरू हो गया, इस जोड़ी के हिट गीत-संगीत का। आगे का दौर कल्याणजी-आनंदजी और इंदीवर की मिली-जुली सफलता का दौर था। इंदीवर जितने अच्छे गीत लिखते, उतना ही बेहतरीन संगीत कल्याणजी-आनंदजी देते थे। सच बात तो यह है कि इस जोड़ी के हिट गीत-संगीत की वजह से ही एक के बाद एक लाइन से फिल्में सुपर हिट हुईं। यकीन न हो तो उन फिल्मों के नामों पर एक बार नजर डाल लीजिए, जिसमें इस जोड़ी ने साथ काम किया। ‘उपकार’, ‘सरस्वती चंद्र’, ‘यादगार’, ‘सफर’, ‘सच्चा झूठा’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘पारस’, ‘उपासना’, ‘कसौटी’, ‘धर्मात्मा’, ‘हेराफेरी’, ‘डॉन’, ‘कुर्बानी’, ‘कलाकार’ आदि इन फिल्मों का नाम आते ही, उनके गाने खुद-ब-खुद जेहन में आ जाते हैं। ‘‘नफरत करने वालों के सीने में’’, ‘‘पल भर के लिये कोई हमें’’ (फिल्म-जॉनी मेरा नाम), ‘‘ये मेरा दिल प्यार का दीवाना’’ (फिल्म-डॉन), ‘‘नीले नीले अंबर पर चांद जब’’ (फिल्म-कलाकार) आदि। निर्माता-निर्देशक-कलाकार मनोज कुमार, फिरोज खान और राकेश रोशन की हिट फिल्मों के पीछे भी कल्याणजी-आनंदजी का संगीत और इंदीवर के शानदार गीत थे। ‘‘कस्मे-वादे, प्यार-वफा’ (फिल्म-उपकार), ‘‘दुल्हन चली पहन चली’’, ‘‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’’ (फिल्म-पूरब और पश्चिम) ‘‘आया न हमको प्यार जताना’’ (फिल्म-पहचान), ‘‘तेरे चेहरे में वो जादू है’’ (फिल्म-धर्मात्मा), ‘‘क्या देखते हो सूरत तुम्हारी’’(फिल्म-कुर्बानी), ‘‘तेरा साथ है कितना प्यारा कम’’ (फिल्म-जांबाज) मनोज कुमार और फिरोज खान की फिल्मों के ये ऐसे सदाबहार गीत हैं, जिनका जादू शायद ही कभी कम हो। ये गीत जब भी कहीं बजते हैं, अपनी ओर ध्यान खींचते हैं। इन गानों में एक अलग सी कशिश नजर आती है।  
गायक मुकेश अपनी दर्द भरी आवाज के लिए जाने-पहचाने जाते हैं और उनके लिए यह दर्द भरे गीत इंदीवर ने रचे। महबूब की जुदाई, बेवफाई और उससे उपजा दर्द-ओ-गम इंदीवर की कलम से निकला और मुकेश की नायाब आवाज ने इन गीतों को अमर कर दिया। ‘‘वक़्त करता जो वफ़ा आप हमारे होते’’ (फिल्म-दिल ने पुकारा), ‘‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’’ (फिल्म-पूरब और पश्चिम), ‘‘हम छोड़ चले हैं महफ़िल को’’ (फिल्म-जी चाहता है), ‘‘जिस दिल में बसा था प्यार तेरा’’ (फिल्म-सहेली), ‘‘हमने तुमको प्यार किया है कितना’’ (फिल्म-दुल्हा दुल्हन), ‘‘दरपन को देखा तून जब-जब किया’’ (फिल्म-उपासना), ‘‘जो प्यार तूने मुझको दिया था’’ (फिल्म-दुल्हा दुल्हन) जैसे गीतों को आये एक लंबा अरसा गुजर गया, पर ये गीत आज भी दिलों पर गहरा असर करते हैं। गायक मुकेश और किशोर कुमार ही नहीं, लता मंगेशकर के भी कई सदाबहार गीत इंदीवर के बोलों की ही वजह से आज भी पसंद किए जाते हैं।

मिसाल के तौर पर ‘‘छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए’’ (फिल्म-सरस्वतीचंद्र), ‘‘एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली’’(फिल्म-हिमालय की गोद में), ‘‘बाबुल प्यारे…’’(फिल्म-जॉनी मेरा नाम), ‘‘गंगा मइया में जब तक कि पानी रहे’’(फिल्म-सुहागरात), ‘‘हम थे जिनके सहारे वो’’ (फिल्म-सफर), ‘‘जिस पथ पे चला, उस पथ’’ (फिल्म-यादगार), ‘‘शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया’’ (फिल्म-आखिर क्यों), ‘‘साजन मेरा उस पार है’’(फिल्म-गंगा जमुना सरस्वती)।
फिल्मी दुनिया में इंदीवर की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह उनके गीतों की भाषा है। अपने गीतों में वे न तो पूरी तरह उर्दू-अरबी अल्फाज का इस्तेमाल करते थे, न शुद्ध हिंदी का। उनके गीतों की जबान मिली-जुली है। उसमें हिंदी भी है और उर्दू भी। उर्दू जबान से लबरेज उनके कई गीतों में एक आध खालिस लफ्ज हिंदी का आ जाता था, तो हिंदीनुमा गीतों में वे उर्दू अल्फाजों का भी बेझिझक इस्तेमाल करते थे। हृदय, प्रियतम, प्रिय, अमानुष, नैय्या, आंचल, सुंदर आदि शब्द उनके गीतों में कहीं असंगत नजर नहीं आते। एक लिहाज से कहें तो इंदीवर के गीतों की जबान, हिंदोस्तानी जबान है, जो पूरे देश में जानी जाती है। कवि सम्मेलनों और मुशायरों से सीखकर, उन्होंने अपनी एक जबान ईजाद की थी, जो सभी के समझ में आती है और सीधे दिल में उतरती है। फिल्मी दुनिया में सफल होने के लिए नये गीतकारों को उनकी सीख थी, ‘‘यदि उर्दू का शायर फिल्मों में हिट होना चाहता है, तो उसे अपने गीतों में हिंदी का पुट देना चाहिए और हिंदी के गीतकार को अपने गीतों में उर्दू को पुट देना होगा। फिल्मों में कोई भी एक जबान के साथ हिट नहीं हो सकता।’’ हिंदी फिल्मों के हिट गीतों को सुनें, तो इंदीवर की यह बात पूरी तरह सच नजर आती है।

आठवें दशक में जब फिल्मी दुनिया के संगीत में बड़ा बदलाव आया, तो वे इंदीवर ही थे जो इस दौर में भी नई पीढ़ी की पसंद के गीत ‘‘रंभा हो मैं नाचूं’’ (फिल्म-अरमान), ‘‘तम्मा-तम्मा लोगे तम्मा’’ (फिल्म-थानेदार), ‘‘गुप चुप गुप चुप लाम्बा लाम्बा घूंघट काहे को डाला’’ (फिल्म-करण अर्जुन)  लिखे, जो बिनाका गीतमाला में टॉप पर रहे। निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन और उनके भाई राजेश रोशन के साथ इंदीवर ने कई फिल्में की। उनके सदाबहार गीतों की वजह से ही ये फिल्में आज भी याद की जाती हैं। इन फिल्मों में ‘कामचोर’, ‘खुदगर्ज’, ‘खून भरी मांग’, ‘काला बाजार’, ‘किशन कन्हैया’, ‘किंग अंकल’, ‘करण अर्जुन’ और ‘कोयला’ शामिल हैं। यही नहीं अदाकार जितेन्द्र और दक्षिण के निर्माता-निर्देशकों की फिल्मों में संगीतकार बप्पी लहरी के साथ भी उन्होंने लाइन से सुपर हिट फिल्में दी। ‘दीदारे यार’, ‘मवाली’, ‘हिम्मतवाला’, ‘जस्टिस चौधरी’, ‘तोहफा’, ‘कैदी’, ‘पाताल भैरवी’, ‘आसमान से ऊंचा’ इनमें से कुछ फिल्में हैं। हालांकि यह सभी फिल्में और इनका गीत-संगीत हिट हुआ, लेकिन इन गीतों में वे इंदीवर कहीं नजर नहीं आते, जिनकी पहचान काव्यात्मक और अर्थपूर्ण गीत थे। ‘‘नैनों में सपना, सपने में सजना’’, ‘‘ताकी ओ ताकी’’, ‘‘लड़की नहीं तू लकड़ी का खंभा है’’, ‘‘उई अम्मा उई अम्मा’’, जीजाजी जीजाजी’’ आदि कई गीत इंदीवर के स्तर के नहीं हैं। हालांकि इस दौरान उन्हें जब भी मौका मिला, उन्होंने अपनी कलम के जौहर दिखलाए और बतलाया कि उनकी कलम अभी सूखी नहीं है।

उसमें ऐसे कई जज्बाती रंग हैं, जो गीतों के तौर पर निकलने को बेताब हैं। ‘‘हर किसी को नहीं मिलता’’, ‘‘हो जाता है प्यार न जाने कोई’’,  ‘‘रूप सुहाना लगता है’’, ‘‘तुम मिले दिल खिले’’ ‘‘ये तेरी आँखें झुकी-झुकी’’, ‘‘न कजरे की धार न मोतियों का हार’’, ‘‘ आदि गानों की कामयाबी के पीछे उनके उम्दा लेखन का बड़ा योगदान है।  

इंदीवर ने जीवन के हर पड़ाव, शादी-त्यौहार के लिए भी कई बेमिसाल गीत लिखे। जीवन का उन्हें खासा तजुर्बा था। वे देश की संस्कृति और गांव-देहात के रीति-रिवाज और रस्मों से अच्छी तरह वाकिफ थे। लिहाजा जब भी उन्हें ऐसी कोई सिचुएशन पर गीत लिखने का मौका मिला, तो उन्होंने कमाल कर दिखाया। ‘‘मल दे गुलाल मोहे आई होली आई रे’’ (फिल्म-कामचोर), ‘‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है’’ (फिल्म-रेशम की डोरी)। खास तौर पर शादी से जुड़े इंदीवर के गीत कभी पुराने नहीं होंगे। शादी के मौके पर यह गीत बार-बार सुने जाएंगे। इन गीतों में अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू आती है। ‘‘मैं तो भूल चली बाबुल का देस’’ (फिल्म-सरस्वतीचंद्र), ‘‘महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज’’ (फिल्म-अनोखी रात), ‘‘मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनियां’’ (फिल्म-सच्चा झूठा)।  अपने मधुर गीतों के लिए इंदीवर कई पुरस्कारों से नवाजे गए। फिल्मी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित अवार्ड ‘फिल्म फेयर अवार्ड’ के लिए उनका नाम पांच बार नॉमिनी हुआ। “एक तू ना मिला“ (फिल्म-हिमालय की गोद में, साल-1966), ‘‘समझौता गमों से कर लो’’ (फिल्म-समझौता, साल-1974), ‘‘बहना ने भाई की कलाई पर प्यार’’ (फिल्म-रेशम की डोरी, साल-1975), ‘‘दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा’’ (फिल्म-अमानुष, साल-1976) और ‘‘प्यार का तोहफा तेरा’’ (फिल्म-तोहफा, साल-1985)। जिसमें फिल्म ‘अमानुष’ के लिये इंदीवर को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। दिलों के नाजुक अहसास को खूबसूरत अल्फाज में बयां करने वाला यह बेहतरीन नग्मा-निगार 27 फरवरी, 1997 को यह कहकर जमाने से हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गया,‘‘जिंदगी से बहुत प्यार हमने किया/मौत से भी मोहब्बत निभाएंगे हम/रोते रोते जमाने में आए मगर/हंसते-हंसते जमाने से जाएंगे हम।’’
(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल शिवपुरी में रहते हैं।)

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