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ब्लैक लाइव्स मैटर: अमेरिका-पश्चिमी यूरोप में जनांदोलन की लहर के मायने

आधुनिक युग में मानव जाति की नियति तय करने वाली पश्चिमी दुनिया (साम्राज्यवादी दुनिया) विशेषकर अमेरिका ब्लैक लाइव्स मैटर नामक एक बड़े जनांदोलन की चपेट में है, 1960 के दशक में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में ब्लैक (अफ्रीकी-अमेरिकी) लोगों के समान नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन  (सिविल राइट मूवमेंट) के बाद अमेरिका को सबसे बड़े जनांदोलन का सामना करना पड़ा रहा है। 25 मई को 46 वर्षीय अफ्रीकी-अमेरिकी जार्ज फ्लॉयड की पुलिस द्वारा निर्मम हत्या के बाद अमेरिका से शुरू हुआ यह जनांदोलन पश्चिमी यूरोप के देशों में भी फैल चुका है। इसने आस्ट्रेलिया को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया। ऐसे समय जब कोरोना महामारी से बचाव के लिए लोगों से, घरों में दुबके रहने के लिए कहा जा रहा है और कम से कम भारत जैसे देशों में बहुलांश लोग हर तरह के अन्याय और नागरिक अधिकारों के हनन को चुपचाप बर्दाश्त करते हुए दुबके हुए भी हैं, उस स्थिति में भी लाखों की संख्या में अमेरिका के लोग-विशेषकर युवा- नस्लवादी अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतर आए।

अमेरिका, पश्चिमी यूरोप और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में लोग न केवल कोरोना के डर को, बल्कि शासकों की चेतावनियों, अदालतों के प्रतिबंधों और पुलिस की संगीनों की ऐसी-तैसी करते हुए अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतरे। कोई भी कर्फ्यू, कोई भी आंसू गैस, प्लास्टिक बुलेट या पुलिस की प्रताड़ना एवं गिरफ्तारी का कोई डर लोगों को घरों से निकल कर सड़कों पर संघर्ष करने से रोक नहीं पा पाया, लोग जान जोखिम में डालकर अमेरिका में करीब 400 वर्षों से चले रहे नस्लवाद को एक बार फिर चुनौती दे रहे हैं। (अमेरिका में 1619 युद्धपोत एक गोरा कप्तान लिओन 20 अफ्रीकी दासों को लेकर  वर्जीनिया  के जेम्स टाउन पहुंचा था, उस समय अमेरिका ब्रिटेन का एक उपनिवेश था।)  अपने शुरुआती दौर में अमेरिका में जनांदोलन इतना व्यापक, तीखा और आक्रामक था कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को कुछ समय के लिए ह्वाइट हाउस के आपातकालीन बंकर में छिपना पड़ा और बार-बार सेना बुलाने की चेतावनी देनी पड़ी।

इस जनांदोलन ने जहां एक ओर आधुनिकता, महानता, सभ्यता, जनतंत्र, समानता एवं स्वतंत्रता ( लिबर्टी)  के यूरोपीय-अमेरिकी  मुखौटे को तार-तार कर दिया और उनके असली विद्रूप (औपनिवेशिक, नस्लवादी, पूंजीवादी-साम्राज्यावादी) चेहरे को दुनिया के सामने उजागर किया, तो दूसरी ओर अमेरिकी-यूरोप जनता के एक बड़े हिस्से ने, अन्याय विरोधी गहन जनवादी लोकतांत्रिक चेतना का सबूत भी पेश किया। नस्लवाद विरोधी इस आंदोलन में ब्लैक लोगों के साथ बड़ी संख्या में श्वेत लोग भी शामिल हैं-विशेषकर श्वेत युवा। अमेरिका-यूरोप की सड़कों पर लोगों के हुजूम को देख कर कई बार यह कोई नहीं कह सकता है कि यह सिर्फ अश्वेतों का आंदोलन है, क्योंकि भारी संख्या में श्वेत लोग दिखाई दिए।

यह दृश्य इस आंदोलन का सबसे खूबसूरत पक्ष है। काश भारत में कभी दलितों के उत्पीड़न के खिलाफ तथाकथित उच्च जातियों का कोई ऐसा हुजूम दिखाई देता। इस आंदोलन ने यूरोपीय-अमेरिकी सत्ता-संस्थानों के  शीर्ष संस्थाओं एवं व्यक्तियों को अपने समाज के नस्लवादी अतीत एवं वर्तमान के लिए शर्मसार महसूस करने के लिए प्रेरित या मजबूर किया। पुलिस अधिकारियों, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्यों और कई अन्य संस्थानों के प्रमुखों ने घुटने टेक कर अश्वेतों से क्षमा याचना की। भारी संख्या में गोरे लोगों द्वारा घुटने टेककर अश्वेतों से क्षमा मांगने वाले मानवीय दृश्य आंखें नम कर देने वाले थे और मनुष्य की मुनष्यता पर भरोसा पैदा करते हैं। क्या कभी भारत में तथाकथित उच्च जातियां अपने अपराधों के लिए शूद्र-अतिशूद्र कही जाने वाली जातियों-विशेषकर दलितों से क्षमा मांगेंगे और अपने एवं अपने पुरखों के अपराधों के लिए शर्मसार होंगे। फिलहाल तो कोई उम्मीद नहीं दिखती। कनाडा के राष्ट्रपति जस्टिन ट्रूडो ने घुटने टेक कर नस्लवादी अतीत एवं वर्तमान के लिए माफी मांगी।

यूरोप-अमेरिका का कमोवेश पूरा बौद्धिक जगत- अकादमिक एवं गैर-अकादमिक बुद्धिजीवी- नस्लवाद विरोधी इस आंदोलन के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं। खुलेआम सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ही इन आंदोलनकारियों को दंगाई, लुटेरे एवं हिंसक भीड़ आदि कह कर संबोधित कर रहे हैं। यहां तक कि उन्होंने श्वेतों की श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने वाले नारे ‘ह्वाइट पावर’ स्लोगन को भी अपना लिया और उसे ट्वीट एवं रिट्वीट किया। अमेरिका के विभिन्न राज्यों एवं अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए पुलिस सुधारों सहित विभिन्न सुधारों की घोषणा की। अमेरिका के इतिहास में पहली बार खेल क्लबों-विशेषकर फुटबाल- के प्रमुख ने खेलों में नस्लवाद की ऐतिहासिक उपस्थिति के लिए खेद प्रकट किया और खिलाड़ियों-विशेषकर ब्लैक खिलाड़ियों को नस्लवाद विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सेदारी करने की इजाजत दी।

ट्रम्प द्वारा आंदोलनकारियों के खिलाफ सेना उतारने के प्रस्ताव को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर अमेरिकी रक्षा मंत्री एवं पेंटागन (अमेरिका रक्षा विभाग का मुख्यालय) ने खारिज कर दिया। सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गोरेपन को श्रेष्ठ साबित करने वाले विज्ञापनों को हटाने का निर्णय लिया। यह सच है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा ज्यादतियां एवं क्रूरता भी दिखी, लेकिन कुला मिलकर यूरोप-अमेरिका दोनों जगहों पर, प्रदर्शन करने एवं विचारों के अभिव्यक्त करने के लिए पर्याप्त जगह है, इसका गवाह यह आंदोलन बना। लोगों ने प्रतिमाओं को उखाड़ कर नदियों में फेंक दिया, आग के हवाले कर दिया, उन्हें विद्रूप कर दिया, लेकिन पुलिस ने कोई बर्बर हस्तक्षेप नहीं किया। भारत में इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

इस आंदोलन को भारत के संदर्भ में देखें, दो बातें साफ दिखीं। पहला यह कि यूरोप-अमेरिका के भीतर अन्याय के प्रतिरोध एवं प्रतिवाद की गहन संवेदना एवं चेतना मौजूद है और उसे अभिव्यक्त करने का साहस भी लोगों के पास है, जिसका अभाव भारतीय समाज में दिखता है। दूसरी बात यह कि शासन-सत्ता हर विरोध, प्रतिरोध एवं प्रतिवाद को राष्ट्र विरोधी एवं समाज विरोधी ठहराकर उसे कुचलने पर आमादा नहीं है। डोनाल्ड ट्रम्प जैसा कोई व्यक्ति (राष्ट्रपति) ऐसा करने की कोशिश करता भी है (ट्रम्प ने भरपूर कोशिश की) तो उसे शासन-सत्ता की विभिन्न संस्थाओं से समर्थन प्राप्त नहीं होता। अमेरिका के राष्ट्रपति जैसा ताकतवर व्यक्ति भी मनचाहे तरीके से आंदोलन को कुचल नहीं सकता।

यह तथ्य कम से कम इस बात का सबूत तो है ही कि अमेरिका-यूरोप में लोकतांत्रिक संस्थाएं किसी सनकी-मूर्ख राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के हाथ की कठपुतली नहीं हैं, जैसा कि भारत में अक्सर दिखता है। यूरोपीय-मीडिया का चरित्र गहरे स्तर पर चाहे जितना भी सत्ता-संरचना से जुड़ा हुआ हो, लेकिन नस्लवाद विरोधी इस आंदोलन में वह भारतीय मीडिया की तरह शासन प्रमुख की चाटुकारिता करता नजर नहीं आया। काफी हद तक उसने अपनी स्वायत्तता का परिचय देते हुए नस्लवाद के घिनौने इतिहास एवं वर्तमान से अपने पाठकों को परिचित कराने का काम करता रहा है। वाशिंगटन पोस्ट जैसे अखबारों ने अमेरिकी क्रांति ( 1776) के शिखर पुरुषों जार्ज वाशिंगटन आदि के नस्लवादी चरित्र को विस्तृत तथ्यों के साथ उजागर किया और नस्लवाद विरोधी लोगों के नजरिए को पर्याप्त जगह दिया।

यह जनांदोलन यूरोपीय-अमेरिकी महानता के इतिहास और प्रतीकों-स्मारकों की वास्तविक हकीकत से पूरी दुनिया को अवगत करा रहा है। यह यूरोप एवं अमेरिका के इतिहास को अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों एवं औपनिवेशिक देशों की जनता की नजर से देखने का प्रस्ताव कर रहा है। इस आंदोलन ने इस तथ्य को एक बार फिर पुरजोर तरीके से स्थापित किया कि यूरोप-अमेरिका में पूंजीवादी विकास एवं आर्थिक समृद्धि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका की निर्मम लूट, अमेरिका के मूल निवासियों (रेड इंडियन) के जनसंहार और अफ्रीकी दासों के व्यापार पर ही फली-फूली। यह अमेरिका एवं यूरोप के तथाकथित महान नेताओं की महानता का वास्तविक सच क्या है, इसे भी  उद्घाटित कर रहा है।

ब्लैक लाइव्स मैटर जनांदोलन ने जहां एक ओर अमेरिकी समाज में पिछले 400 वर्षों से विद्यमान संस्थागत एवं संरचनागत नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहा है, वहीं वह उन लोगों की प्रतिमाओं एवं स्मारकों को भी निशाना बना रहा है, जो लोग किसी भी तरह से अफ्रीकी लोगों को दोयम दर्जे का मानते थे, उन्हें गुलाम बनाकर उनका व्यापार करते थे, उन्हें गुलाम के रूप में रखते एवं उनसे काम कराते थे, अफ्रीकी लोगों को नस्ल के आधार पर दोयम दर्जे का मानते थे या जो लोग अफ्रीकी लोगों की दासता के पक्ष में थे। नस्ल के आधार पर अफ्रीकी लोगों को दोयम दर्जे का मानने वाले लोगों की सूची में जनांदोलनकारियों की नजर में गांधी भी शामिल हैं। इसके चलते 25 मई को जार्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद शुरू हुए प्रदर्शनों के निशाने पर अमेरिका में 2-3 जून को गांधी की वाशिंगटन डीसी स्थित प्रतिमा भी आई।

प्रदर्शनकारियों ने उनकी प्रतिमा को  विद्रूप कर दिया। बाद में उनकी प्रतिमा को ढंक दिया गया और प्रदर्शनकारियों के आक्रोश से बचाने के लिए उसकी सुरक्षा का मुकम्मल बंदोबस्त करना पड़ा। 8 जून को प्रदर्शकारियों ने लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर स्थिति गांधी की प्रतिमा को विद्रूप किया और उन्हें नस्लवादी के रूप में चिन्हित किया। उनकी प्रतिमा के आधार स्तम्भ पर प्रदर्शनकारियों ने रेसिस्ट (नस्लवादी) लिख दिया। गांधी की प्रतिमाओं को हटाने के लिए याचिकाएं भी प्रस्तुत की गईं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल को भी प्रदर्शनकारियों ने नस्लवादी के रूप में चिन्हित किया, जिनकी महानता को सम्मानित करते हुए नोबेल पुरस्कार समिति ने उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया था।

बहुत सारे तथ्य और स्वयं चर्चिल के कथन इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि वे नस्लवादी थे। वे अफ्रीकन, रेड इंडियन, भारतीय और चीनी लोगों को गोरों की तुलना में दोयम दर्जे का मानते थे। 1943 के बंगाल के अकाल में करीब 40 लाख लोगों की मौत के लिए भी उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार माना जाता है, उस दौरान वे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे। चर्चिल संबंधी इन तथ्यों का खुलासा विस्तार से शशि थरूर ने अपनी किताब ‘ऐन एरा ऑफ डार्कनेस: दि ब्रिटिश एम्पायर इन इंडिया’ (2016) में किया है।

लैटिन अमेरिकी लोगों के जनसंहार की शुरुआत करने वाले और उन्हें दास बनाकर लैटिन अमेरिका से दास व्यापार की शुरुआत करने वाले क्रिस्टोफर कोलंबस (1459- 20 मई 1506) की प्रतिमाओं को भी प्रदर्शनकारियों ने ध्वस्त कर दिया। उसकी कुछ प्रतिमाओं का सिर तोड़ दिया गया, कुछ को आग के हवाले कर दिया गया और एक प्रतिमा को झील में फेंक दिया गया। क्रिस्टोफर कोलंबस वह पहला व्यक्ति है, जिसने लैटिन अमेरिकी मूल निवासियों की जनसंहार की शुरुआत की, लैटिन अमेरिका एवं कैरेबियाई द्वीपों से लूट प्रारंभ किया और कुछ लैटिन अमेरिकी लोगों को दास बनाकर ले गया।

फिर तो लैटिन अमेरिकी महाद्वीप के विनाश, नरसंहार और लूट का सिलसिला ही शुरू हो गया। अमेरिकी इतिहासकार हावर्ड जीन अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री यूनाइटेड स्टेट’ (1980, 2009) में इस मार्मिक कहानी को तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है। लैटिन अमेरिकी महाद्वीप मूल निवासियों के जनसंहार, लूट और विनाश की त्रासद भरी कहानी को एडुवार्डो गैलिनों ने अपनी किताब ‘ओपेन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका : फाइन सेंचुरीज ऑफ पीलेज ऑफ कंटीनेंट’ में बयां की है।

10 मई को ब्रिटेन के ब्रिस्टल शहर में स्थित 17 वीं शताब्दी के दास व्यापारी एडवर्ड क्लोस्टोन की प्रतिमा को प्रर्दशनकारियों ने गिराकर हार्बर नदी में फेंक दिया। इस व्यापारी ने करीब 80,000 अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर अमेरिका में बेचा था। उसे ब्रिटेन को समृद्ध बनाने वाले एक महान व्यक्ति के रूप में सदियों से सम्मानित किया जाता रहा। लेकिन नस्लवाद का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों ने उसे दास व्यापारी और हत्यारे के रूप में चिन्हित किया। लंदन के म्यूजियम के बाहर लगी दास व्यापारी राबर्ट मिलिगन की प्रतिमा को प्रशासन ने अपनी पहलकदमी पर हटा दिया। ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के प्रदर्शनकारियों के निशाने पर वे सभी व्यक्तित्व और स्मारक आए जो किसी भी रूप में दास व्यापार, दासता, नस्लवाद और मूल निवासियों के जनसंहार से जुड़े हुए हैं।

इसमें स्कॉटिश राजनीतिज्ञ हेनरी डुनडास का स्मारक और बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय भी शामिल हैं। लियोपोल्ड द्वितीय को 1 करोड़ लोगों के जनसंहार के लिए जिम्मेदार माना जाता है। उसका शासन काल 1865 से 1890  तक रहा। मारे गए लोगों में बहुलांश कांगो के थे। अफ्रीकी देश कांगो बेल्जियम का उपनिवेश था। अमेरिका के वर्जीनिया राज्य ने खुद ही अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों की दासता के समर्थन में लड़ने वाले जनरल राबर्ट ई. ली की प्रतिमा को हटाने का निर्णय लिया, जिसे प्रदर्शनकारियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। ऐसी अन्य प्रतिमाएं हटाने पर भी अमेरिका के विभिन्न राज्य विचार कर रहे हैं। राबर्ट ई. ली अमेरिका में दासता खत्म करने लिए 1861 से 1865 तक चले युद्ध में उन दक्षिणी राज्यों के संघ ( कांफिडरेशन स्टेट) की सेना का एक कमांडर था, जो दासता को कायम करने के पक्ष में संघर्ष कर रहा था।

अब प्रदर्शनकारियों के निशाने पर जार्ज वाशिंगटन और थॉमस जेफर्सन जैसे लोग भी आ गए हैं। यह स्थापित तथ्य है कि अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन दास-दासियों को मालिक थे और उन्होंने अपनी वसीयत में 160 दास-दासियां छोड़ी थीं। अमेरिकी स्वाधीनता के घोषणा-पत्र के रचयिता थॉमस जेरफर्सन अपनी यौनेच्छा की पूर्ति के लिए छांट-छांट कर नीग्रो युवतियां खरीदते थे और उनसे उत्पन्न लड़कियों को वेश्या कारोबारियों को बेचते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनकी दो लड़कियों को वेश्या कारोबार के लिए बेचा गया, जिससे उस जमाने में प्रति लड़की 1500 डॉलर मिले। अमेरिका के 10 वें राष्ट्रपति जॉन टाइलर भी अपनी नीग्रो दासियों से पैदा हुई बेटियों को वेश्यावृत्ति के लिए बेचते थे।

अमेरिका के विभिन्न राज्यों ने करीब उन 800 प्रतिमाओं और स्मारकों को स्वयं ही हटा दिया, जिनका संबंध नस्लवाद से था। प्रदर्शनकारी नस्लवाद एवं उपनिवेशवाद को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि उपनिवेशवाद की पैदाइश नस्लवाद है और इस नस्लवाद ने उपनिवेशवाद के लिए भौतिक एवं वैचारिक आधार तैयार किया। अकारण नहीं है कि ब्लैक लाइव्स मूवमेंट आंदोलन दास व्यापारियों, दास रखने वालों, दासता का समर्थन करने वालों के साथ ही साथ उपनिवेशवाद के प्रतीकों को भी निशाना बना रहा है, जिसका एक उदाहरण भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की नींव डालने वाले लार्ड क्लॉइव की प्रतिमा को ( इंगैण्ड से) को हटाने के लिए सैकड़ों लोगों द्वारा ऑनलाइन याचिका दाखिल करना है। ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन यूरोप-अमेरिका के अब तक के स्थापित इतिहास एवं विरासत पर गंभीर प्रश्न उठा रहा है और इतिहास, विरासत एवं नायकों-महानायकों को नए सिरे से देखने और उनका पुर्नमूल्यांकन करने की मांग कर रहा है। जिसका प्रस्थान बिंदु श्वेत श्रेष्ठता बोध से हर स्तर पर मुक्ति है।

ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन ने खुद को केवल नस्लवाद एवं उपनिवेशवाद के ऐतिहासक-सांस्कृतिक प्रतीकों तक सीमित नहीं रखा है, क्योंकि अमेरिका में नस्लवाद केवल सांस्कृतिक, वैचारिक या मनोवैज्ञानिक मामला नहीं, भारत की वर्ण-जाति व्यवस्था की तरह यह व्यवस्थागत, संस्थागत एवं संरचनागत समस्या है। नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष करने वालों का एक बड़ा हिस्सा इस तथ्य से परिचित है कि अमेरिका में नस्लवाद व्यवस्थागत, संस्थागत एवं संरचनागत समस्या है, जिसकी जड़ें अमेरिकी पूंजीवाद के जन्म एवं विकास में निहित हैं।

यह सिर्फ गोरे लोगों का कालों की तुलना में श्रेष्ठताबोध की मानसिकता तक सीमित नहीं है यानि नस्लवाद की जड़ें अमेरिकी पूंजीवाद, अमेरिकी समाज व्यवस्था और राजनीति से गहरे तौर पर जुड़ी है, जिसने अमेरिका की सभी संस्थाओं को किसी न किसी स्तर पर अपने गिरफ्त में ले रखा है, सतह पर जिसका सबसे क्रूर एवं घिनौना रूप काले लोगों के प्रति पुलिस के रवैए में दिखाई देता है। आमतौर पर किसी भी देश की पुलिस का रवैया उस देश की बुनियादी बनावट को अभिव्यक्त करती है। इसको भारत के उदाहरण से भी समझ सकते हैं। भारत में पुलिस का आदिवासियों, दलितों, मुस्लिमों, महिलाओं एवं गरीबों के प्रति रवैया भारतीय समाज की बुनियादी बनावट एवं सोच को ही अभिव्यक्ति प्रदान करता है।

अमेरिका में नस्लवाद की जड़ें कितनी गहरी और संस्थागत हैं, इसका एक अंदाज कोविड-19 से होने वाली मौतों के तथ्य से भी लगाया जा सकता है। ‘दि गार्जियन’ की रिपोर्ट के अनुसार काले लोगों की कोविड-19 से मौत की दर श्वेत लोगों की तुलना में दो गुना से अधिक है। जहां प्रति 1 लाख पर 20.7 श्वेत लोगों की मौत हुई, वहीं 50.3 अश्वेत लोगों की हुई। लैटिनों और एशियन अमेरिकी लोगों में यह दर क्रमश: 22.9 और 22.7 है। जबकि अमेरिका की कुल आबादी में अश्वेत लोगों का अनुपात करीब 13.4 प्रतिशत है। कुछ आंकड़े यह अनुपात 12.7  प्रतिशत बताते हैं। अधिकांश अध्येताओं का यह मानना है कि अमेरिका में नस्लवाद की समस्या गोरे लोगों की सिर्फ मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं है, यह अमेरिका की समग्र व्यवस्था से नाभिनाल से जुड़ा हुआ है। सारे तथ्य इसकी पुष्टि करते हैं।

सबसे पहले पुलिस और जेल से जुड़े कुछ आंकड़े लेते हैं, क्योंकि इस आंदोलन की शुरुआत पुलिस द्वारा एक 46 वर्षीय काले व्यक्ति जार्ज फ्लॉयड की पुलिस द्वारा निर्मम हत्या से हुई थी, एक पुलिस अधिकारी जार्ज फ्लॉयड की गर्दन को 8 मिनट 46 सेकेंड तक अपने घुटनों के नीचे दबाए रखा, वह चिल्लाता रहा कि मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं- ‘आई कैन नॉट ब्रीथ’। और अंत में उसकी मौत हो गई। वैसे कालों के साथ घटने वाली यह कोई पहली घटना नहीं थी, वर्ष-दर-वर्ष ऐसी घटनाएं होती रहती हैं और ऐसे पुलिस अधिकारी न्यायपालिका द्वारा आसानी से बरी भी हो जाते रहे हैं। बहुत कम मामलों में ऐसे पुलिस अधिकारियों को सजा होती है। इसे लेकर अश्वेत लोगों में सबसे अधिक आक्रोश है, इसी कारण से सबसे अधिक पुलिस सुधारों की बात की जा रही है।

2019 की जनगणना के अनुसार अमेरिका में अश्वेत लोगों (काले) की संख्या अमेरिका की कुल जनसंख्या का 13.4 प्रतिशत है। इस तरह अमेरिका में करीब 36 मिलियन यानी 3 करोड़ 60 लाख अश्वेत अफ्रीकी-अमेरिकी लोग रहते हैं। इसमें से अधिकांश ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों द्वारा गुलामों के रूप में लाए गए 4 लाख अफ्रीकी लोगों के वंशज हैं, लेकिन पुलिस की गोली से मारे जाने के मामले में अश्वेत लोगों का अनुपात एक चौथाई है। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार 2019 में पुलिस के हाथों 1004 लोग मारे गए, जिसमें 236 अफ्रीकी-अमेरिकी थे यानि मारे गए कुल लोगों का करीब एक चौथाई। अमेरिका में अश्वेत कैदियों का अनुपात 37.5 प्रतिशत है, जबकि अश्वेत आबादी 13.4 प्रतिशत है।

दासता-नस्लवाद के 400 वर्षों का इतिहास और वर्तमान समय के सारे तथ्य इस बात को प्रमाणित करते हैं कि नस्लवाद व्यवस्थागत एवं संरचनागत समस्या है और इसके समाधान के लिए व्यवस्थागत एवं संरचनात्मक परिवर्तन की जरूरत है। डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति के दावेदार जो बिडेन ने भी यह स्वीकार किया कि नस्लवाद की समस्या एक व्यवस्थागत एवं संरचनागत समस्या है। इसको इससे भी समझा जा सकता है कि करीब 155 वर्ष पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के कार्यकाल में दासता के खत्म करने की घोषणा के बाद भी आखिर क्यों नस्लवाद अमेरिकी समाज की बुनियादी पहचानों में से एक बना हुआ है। आखिर क्यों अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के बराक ओबामा के 8 वर्षों तक राष्ट्रपति रहने के बावजूद भी कालों की स्थिति में कोई बुनियादी या बड़े पैमाने का कोई परिवर्तन क्यों नहीं दिखाई दिया, करीब स्थिति जस की तस बनी रही है, मनोवैज्ञानिक स्तर पर चाहे जो फर्क पड़ा हो।

हां यह सच है कि बराक ओबामा डोनाल्ड ट्रम्प की तरह श्वेत की श्रेष्ठता कायम रखने की खुली राजनीति नहीं करते थे और न ही अश्वेतों के प्रति घृणा एवं हिंसा को खुलेआम प्रोत्साहन देते थे। इसके उलट अश्वेतों के प्रति उनके भीतर एक गहरी सहानुभूति थी, लेकिन इस सहानुभूति का कालों की स्थिति पर कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि ओबामा जिस व्यवस्था को संचालित कर रहे थे, उसकी बुनियाद में कालों का शोषण-उत्पीड़न निहित है, जिसे न तो ओबामा बदल सकते थे और न ही उन्होंने उसे बदलने की कोई कोशिश की, क्योंकि अमेरिका के जिस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को वे संचालित कर रहे थे, उसकी नाभि का एक तत्व नस्लवाद भी है, जिसका जन्म पूंजीवाद के जन्म के साथ ही हुआ था।

अश्वेतों के प्रति सतह पर दिखने वाली पुलिस की क्रूरता एवं बर्बरता की भले ही अश्वेत के प्रति श्वेत पुलिस वालों की नस्लीय घृणा में दिखती हो, लेकिन जड़ें बहुलांश अश्वेत लोगों की बदतर आर्थिक हालात में निहित है, जो ऐतिहासिक तौर पर उनका पीछा करती आर रही है। 2018 में अमेरिका में 8.1 प्रतिशत श्वेत गरीबी रेखा के नीचे, जबकि अश्वेतों के के संदर्भ में यह प्रतिशत 20.8 था। बच्चों (18 वर्ष तक)  के मामले में अश्वेतों के संदर्भ में यह 32.0 प्रतिशत था। गोरे बच्चों के संदर्भ में यह प्रतिशत 11.0 था। 1947 में श्वेतों की तुलना में अश्वेतों की औसत पारिवारिक आय 51.1 प्रतिशत यानि करीब आधी थी। 1960 के दशक के सिविल राइट मूवमेंट के बाद  कालों के सशक्तिकरण के लिए बने कानूनों के बाद इसमें थोड़ी सी वृद्धि हुई, यह श्वेतों की तुलना में 61.3 प्रतिशत हो गई, लेकिन 2017 में यह पुन: कम होकर 59.1 प्रतिशत हो गई। यहां यह ध्यान देना जरूरी है कि 20 जनवरी 2009 से 19 जनवरी 2017 तक बराक ओबामा राष्ट्रपति थे। सारे आंकड़े बताते हैं कि इस दौर में भी श्वेतों की तुलना में अश्वेतों की आय में गिरावट जारी रही है। 2016 के आंकड़े बताते हैं कि कालों की औसत कुल संपदा श्वेतों की तुलना में सिर्फ 9 प्रतिशत थी।

अमेरिका में अश्वेतों के बीच बेरोजगारी की दर आम तौर पर श्वेतों की तुलना में दो गुना रहती है। इतना ही नहीं, अमेरिका में श्वेत लोगों की तुलना में अश्वेत को कम मजदूरी या तनख्वाह मिलती है। अश्वेत लोग श्वेतों की तुलना तीन-चौथाई से कम मजदूरी पाते हैं। अश्वेत लोगों को ऐसे काम मिलते हैं, जिसमें मजदूरी बहुत कम है। उच्च मजदूरी या तनख्वाह वाली नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। सबसे अधिक तनख्वाह वाली नौकरियों में श्वेतों का प्रतिनिधित्व 79 प्रतिशत है, जबकि अश्वेतों का प्रतिनिधित्व 9.6 प्रतिशत है, दोनों की जनसंख्या क्रमश: 74 प्रतिशत और 13.4 प्रतिशत है।

जीवन- प्रत्याशा, प्रसव के दौरान मृत्यु दर और बाल मृत्युदर- 2019 में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि 2017 में अश्वेत लोगों की जीवन- प्रत्याशा श्वेत लोगों की तुलना में 4 वर्ष कम थी। अश्वेत समुदाय की महिलाओं में प्रसव के दौरान मृत्यु दर 42.8 प्रतिशत, जबकि श्वेत समुदाय के महिलाओं के संदर्भ में यह दर 13.0 प्रतिशत थी यानि काले समुदाय की महिलाओं की प्रसव के दौरान मृत्यु-दर गोरे समुदाय की महिलाओं की तुलना में तीन गुना अधिक थी। काले समुदाय में बाल मृत्यु दर गोरों की तुलना में दो गुनी थी। 2019 के आंकड़े बताते हैं कि 73.7 प्रतिशत गोरे लोगों के पास अपना घर था, जबकि सिर्फ 44.0 प्रतिशत कालों के पास अपना घर था यानि आधे से अधिक काले लोग किराए घरों में  रहते हैं या बेघर थे। भारत के दलितों की तरह अमेरिका में भी काले लोगों को गोरों के इलाके में घर खरीदना या किराए पर लेना एक मुश्किल भरा काम है।

अमेरिका में दास प्रथा के करीब 155 वर्ष पूरे हो गए हैं। 1861-1865 तक चले गृहयुद्ध में करीब 6 लाख मारे गए थे। उसके बाद काले को अधिकार प्रदान करने के लिए तीन संविधान संशोधन हुए, कई सारे सिविल राइट मूवमेंट हुए, जिसमें 1963 से 1968 तक मार्टिन लूथर किंग के नेतृत्व में चला सिविल राइट मूवमेंट भी शामिल है। बहुत सारे अन्य सुधारों की भी घोषणा हुई, कालों की जीवन स्थितियों में एक हद सुधार भी हुआ, लेकिन नस्लवाद बदले रूपों में बदस्तूर जारी रहा।

एक बार फिर एक व्यापक एवं तीखा नस्लवाद विरोधी आंदोलन दिखाई दे रहा है, आंदोलन के दबाव में कई सारे सुधारों की घोषणाएं भी हुई हैं, डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बिडेन अमेरिका से नस्लवाद की समाप्ति के लिए व्यवस्थागत एवं संरचनागत परिवर्तन की बातें कर रहे हैं, जबकि डोनाल्ड ट्रम्प गोरे-कालों के बीच नफरत एवं विद्वेष पैदा करके गोरे लोगों के बहुमत का समर्थन जुटाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। लेकिन नस्लवाद विरोधी आंदोलनकारी ऐतिहासिक अनुभवों से सबक लेते हुए जो बिडेन पर भी भरोसा करने को तैयार नहीं, दिख रहे हैं, भले ही वे तात्कालिक तौर पर डोनाल्ड ट्रम्प को हराने के लिए जो बिडेन के पक्ष में नवंबर में होने वाले चुनावों में मतदान करें।

नस्लवाद विरोधी आंदोलन अध्येताओं एवं कार्यकर्ताओं के सामने यह एक स्थापित तथ्य है कि अमेरिका में नस्लवाद एक व्यवस्थागत, संस्थागत एवं संरचनागत समस्या है, तो तय है कि इसका समाधान भी व्यवस्थागत, संस्थागत एवं संरचनागत समाधान करने से होगा। इसके लिए निम्न उपाय सुझाए जा रहे हैं-

  • सबके लिए स्वतंत्रता और न्याय: बिना किसी अपवाद के समान अधिकार और समान अवसर।
  • राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र का विस्तार
  • तात्कालिक दिखावे के सतही समाधान की जगह समग्रता में समाधान

इसके लिए निम्न ठोस उपाय किए जाने की मांग की जा रही है-

  • सबके लिए रोजगार
  • ऐसा रोजगार जिससे सम्मानजनक जिंदगी जी जा सके।
  • जो लोग बेरोजगार हैं, उनके लिए ऐसी न्यूनतम आय की गारंटी, जिसमें गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सके।
  • सभी के लिए खाद्य सुरक्षा
  • सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण एवं सुरक्षित आवास की व्यवस्था
  • सभी के स्वास्थ्य की सुरक्षा की सार्वजनिक गारंटी
  • सभी के लिए शिक्षा का समान अवसर
  • सभी के लिए सामाजिक सुरक्षा
  • आय एवं संपत्ति में असमानता को कम से कम करना
  • सांस्कृतिक विविधता के लिए पूर्ण लोकतांत्रिक स्पेस
  • पुलिस एवं न्याय व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन

उपरोक्त मांगें इस बात का सबूत हैं कि अन्याय के शिकार किसी समुदाय की अन्याय से मुक्ति अकेले नहीं हो सकती है, उसे अपने साथ सबके लिए न्याय की मांग करनी होगी। यही अन्याय के शिकार लोगों की आपसी एकता का आधार बन सकता है, जो सबको न्याय दिला सकता है।

अमेरिका-यूरोप में नस्लवाद विरोधी ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन न केवल अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों के लिए बल्कि पूरी मनुष्य जाति के लिए एक उम्मीद की किरण ले आया है। जार्ज फ्लॉयड की हत्या के विरोध में शुरू हुआ यह आंदोलन जंगल की आग की तरह पूरे अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप के विभिन्न हिस्सों में फैल गया और एक व्यापक शक्ल अख्तियार कर लिया। देखते-देखते यह वर्तमान एवं ऐतिहासिक अन्याय के प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। मानव जाति के कठिन से कठिन दौर में भी अपने लिए बेहतर भविष्य का रास्ता निकालती रही है, ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन इस बात का संकेत है कि अन्याय, शोषण-उत्पीड़न के शिकार सभी तरह के बंटवारों को तोड़कर एकजुट हो सकते हैं और धरती से अन्याय और शोषण उत्पीड़न के सभी रूपों का खात्मा कर सकते हैं और स्वतंत्रता, समता, न्याय और सबके लिए समृद्धि आधारित एक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण कर सकते हैं।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on July 22, 2020 12:46 pm

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