जयंती पर विशेष: संत रविदास की दार्शनिक चेतना

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दर्शन अपने आप में अति व्यापक और गूढ़ शब्द है। दुनिया भर में दर्शन और फिलॉस्फी को अपने-अपने ढंग से व्याख्यायित किया गया है। आमतौर पर दर्शन को सत्य को जानने की कला के रूप में परिभाषित किया जाता है। परंतु दर्शन में यह सत्य किसी वस्तु या विषय का अंतर्वस्तु, उसके होने के कारण और उसकी उपादेयता- इन सबकी वैचारिकी है। वैसे भी दर्शन की मान्य परिपाटी में प्रत्येक दार्शनिक कुछ-न-कुछ प्रतिपादित/स्थापित करते हैं। रविदास के समय के प्रायः सभी चिंतक और विचारक भी कुछ नई पद्धति को स्थापित करने की चेष्टा कर रहे थे। उस समय में कबीर और रविदास ही हैं जो स्थापित रूढ़ियों और परंपराओं से सीधे-सीधे टकराते हैं।

वे उन सभी रूढ़ियों-परंपराओं के खिलाफ थे, जो मनुष्य के खिलाफ हैं और एक सभ्य समाज के लिए असभ्य है। इन रूढ़ियों, आडंबरों और वर्णाश्रम व्यवस्था पर वज्रपात करने में रविदास सबसे आगे दिखते हैं। वे न केवल व्यवस्था के विरुद्ध लड़ रहे थे अपितु एक बेहतर समाज की अवधारणा की रूपरेखा भी प्रस्तुत करते हैं। बेगमपुरा की अवधारणा में वे सभी के लिए भोजन की कामना करते हैं और छोटे-बड़े सभी में समता, मैत्री, बंधुत्व की बात करते हैं। समाज होगा तो भूख होगी, अन्न की जरूरत होगी। समाज में विविधता भी होगी। उनकी बेगमपुरा की अवधारणा पाश्चात्य का यूटोपिया नहीं है, न ही यहां का रामराज्य। इस अवधारणा का समाज अवश्य निर्मित और विकसित हो सकता है।

डॉ. धर्मवीर के अनुसार ‘साहित्यिक दृष्टि से रैदास के साथ तीन अपराध हुए हैं। पहले अपराध में उनके जीवन वृत्त को किंवदंतियों से भर दिया गया। दूसरे अपराध में उनकी वाणी को नष्ट किया गया। तीसरे अपराध में जो कुछ वाणी शेष बच गयी थी, उसे प्रक्षिप्त कर दिया गया।’ रविदास जी के पदों को पढ़ते हुए धर्मवीर जी की बातें प्रमाणित होती हैं बावजूद इसके रविदास जी के पदों से उनके दार्शनिक चिंतन को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। वे अपने समय के सबसे क्रांतिकारी अगुवा थे। समाज की दुर्गति और उसके कारण पर उनके गहन अध्ययन और समझ का परिणाम था कि वे सीधे-सीधे वेद, शास्त्र, यज्ञ, होम और योग के महिमा-मंडन को न केवल खंडित करते हुए नकारते हैं अपितु उसका प्रबल विरोध भी करते हैं।

पोथी वांचै बेद उचारै, घर-घर कथा सुनावै।

पता नहीं हम कहां जागिंगे, घर लगी बाहर बुझावे।

चारिउ वेद किया खंडौति। जन रैदास करै डंडौति।

आरती क्या ले कर जोवै? सेवक दास अचंभो होवै।।

बावन कंचन दीप धरावै। जड़ बैराग दृष्टि न आवै।।

कोटि यग जो कोउ करै। राम नाम सम तऊ न निस्तरै।

ढूढ़ै कोउ खट सास्त्रन में, किउ कोउ बेद बखानै।

सांस उसांस चढ़ावै बहु विध बैठाहि सुन्न समाधी।

रविदास यहीं नहीं रूकते हैं। वे राम की अवधारणा को भी नकारते हैं। वे मूर्ति पूजा, तिलक-माला के विरुद्ध बात रखते हैं। बड़ी ही बेबाकी से एकदम स्पष्ट रूप से वे जप-तप, तीर्थ यात्रा और पूजा पद्धति के भी विरुद्ध खड़े हैं-  

रैदास हमारो राम जी, दशरथ लारि सुत नांहि।

राम हमउ मंहि रमि रहयो, विसब कुटंवह मांहि।  

माथे तिलक हाथ जप माला, जग ठगने को स्वांग बनाया।

मारग छाड़ि कुमारग डहकै, साची प्रीत बिन राम न पाया।

का मथुरा, का द्वारिका, का काशी, हरिद्वार?

रैदास खोजा दिया आपना, तो मिल्या दिलदार।

रविदास समाज को अंधविश्वास, आडम्बर, स्वर्ग-नरक, धरम-करम से भी सचेत करते हैं।

ऊब का का कहि देवलि देव समाऊं।

जल के तरंग जल मांहि समाई, कहि का को नाव धरिए।

ऐसे तैं मैं एक रूप हैं, आपन ही निखरिए।

कहै रैदास उब का कहि गाऊं, जो कोई औरहि होई?

जा स्यों गाइहि गाइ कहत है, परम रूप हय सोई।।

केवल विरोध करने से समाज नहीं चला करता है, न ही समाज की दुर्दशा कम होती है। समाज को बेहतर बनाने के लिए विचारों से मजबूत करना होता है, आचरण से मजबूत करना होता है तभी जनमानस तैयार होता है। रविदास अपने वचनों में यही बात कह रहे थे। वे एक ओर जहां व्यवस्था के विरुद्ध खड़े थे तो वहीं दूसरी ओर वे इस सृष्टि के होने और बनने, समाज के विकास, व्यक्ति के चरित्र की बुनियादी बातें, घर-गृहस्थी के आचरण पर भी बात कर रहे होते हैं। जाति-व्यवस्था पर करारा प्रहार ‘जात-पात में जात है ज्यों केलन के पात’ की बात वे अकारण नहीं कहते हैं। दरअसल रविदास आजीवक परंपरा के बड़े स्तंभ हैं। वे अपनी पूरी वैचारिकी में एक बहुत बड़े फलक पर बड़े योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहे थे।

रविदास के दर्शन और वैचारिकी को समझने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम उनके पूरे कथन को बहुत ही बारीकी से देखें और समझें। अक्सर नादानी में हम रविदास जी के कुछ पंक्तियों, दोहों और पदों की अलग-अलग व्याख्या करके समझने का प्रयास करते हैं। इसके खतरे बड़े हो जाते हैं, इतना कि रविदास निर्गुण भक्ति शाखा के कवि मान लिये जाते हैं। इसी कारण उनकी धार्मिक चेतना, उनके ब्रह्म के बारे में विचार, उनके ब्रह्म की अवधारणा पर बात होने लगती है। यह कैसे हो सकता है कि जो व्यक्ति असाधारण है, क्रांतिकारी स्वरूप का है, वैचारिकी में बहुत आगे है, वह वेद-पुराण, पूजा-पाठ, तीर्थ आदि का विरोध करे और फिर अंदर के ईश्वर में ध्यान लगाने की बात करे? 

भौ साकर है दुतर अति, किंधू मूरख जान।

रैदास गुरु पतवार है, नाव की नाव जान।।

माया दीपक पे रख कर, नर पतंग अंधियाय।

रैदास गुरु श ग्यानि जिनु, बिरला को बच जाय।।

इसलिए रविदास जी का पूरा दर्शन एक स्पष्ट वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन की रूपरेखा थी जिसमें वे जनमानस को तैयार कर रहे थे। इस जनमानस को तैयार करने में वे इतने सफल थे कि उस समय में उनके अनुयायियों ने भौगोलिक सीमाओं के साथ-साथ आपसी सीमाएं भी तोड़ दी थी। वे अपने समय में कोई पंथ नहीं चलाये, पर उनके अनुयायियों ने चलाया।

उनके पद और वचन जनश्रुतियों में तो पांच सौ साल तक सुरक्षित रहे। ऐसे जननायक की दार्शनिकता और उनका सामाजिक सरोकार किसी से जुड़ा था तो वह बुद्ध की परंपरा थी। इसलिए रविदास के दार्शनिक चिंतन पर बहुत ही शोधपरक कार्य किये जाने की आवश्यकता है जिससे कि हम उन तारीखों को जान सकें कि कैसे एक व्यक्ति का वैचारिक आंदोलन जन-जन तक पहुंचकर जन आंदोलन बना और हम आज के समय में इनमें से क्या-क्या और किन-किन रूपों में उनके अवदानों को ले सकते हैं।

(अमित कुमार चर्चित कहानीकार और विज्ञान कथा लेखक हैं। इनकी अभी तक नौ किताबें प्रकाशित हैं। संप्रति गोरखपुर में रहते हैं।)

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