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लंबे समय तक सुनायी देगी दिल्ली चुनावों में आप के जीत की गूंज

दिल्ली चुनाव का शोर अब पूरी तरह थम चुका है लेकिन देश की राजधानी में होने वाली इस सियासी जंग की गूंज लंबे अवधि तक भारतीय राजनीति में गुंजायमान होती रहेगी। ये तय है।

एक ऐसा चुनाव जिसमें भड़काऊ बयानों की बयार थी, राजनैतिक नैतिकता और आदर्शों के सारे मापदंड भस्मीभूत हो चुके थे। छल-कपट, धूर्तता, अवसरवादिता, शोर, भड़काऊ बयान, गगन को भेदते नारे, जन आकांक्षा, विकास के तर्क, धर्म, राष्ट्रवाद वगैरह-वगैरह …सब कुछ तो था इस राजनैतिक जंग में।

इस सियासी जंग के मोहरे बहुत पहले से ही सजाए जाने लगे थे, दोनों तरफ के मोहरे बड़े सावधानी और चालाकी के साथ आगे बढ़ाए जा रहे थे। टीम केजरीवाल ने चुनावी वर्ष में लोकलुभावन कार्यों का डोज चौगुना कर दिया था, पिछले तीन महीने से लोगों के बिजली बिल बिल्कुल नहीं आ रहे थे या सड़क किनारे लगे ठेलों के चाय-पान के बिल की तरह आ रहे थे, पानी बिल्कुल मुफ्त आ रहा था तो बसों में बैठ कर दिल्ली घूमने के लिए महिलाओं को फ्री पास उपलब्ध था। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी अपने सेनापति अमित शाह के नेतृत्व में अपने विशाल दल-बल और राजनैतिक रण कौशल के साथ एक-एक मुहल्ले में पहुंच चुकी थी।

टीम केजरीवाल के विकासवादी कार्यों से ध्यान भटकाने के लिए बीजेपी की तरकस से एक से बढ़कर एक दिव्यास्त्र निकल रहे थे। जेएनयू और जामिया जैसे उच्च शिक्षण संस्थान में राष्ट्रवाद का शिगूफा छोड़कर पूरी दिल्ली को इस मुद्दे में उलझा देने की रणनीति थी। अमित शाह एंड कम्पनी से 40 स्टार प्रचारक, 200 से अधिक सांसद, 6 राज्यों के मुख्यमंत्री, सबसे बड़े संगठन आरएसएस के हजारों स्वयंसेवकों सहित सत्ता सहयोगी पूंजीवादी मीडिया के सहयोग से दिल्ली का दिल जीतने की कोशिश जारी थी। बीजेपी ने टीम केजरीवाल के आक्रमण के प्रत्युत्तर में अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन एक्ट (CAA), शाहीनबाग, हिन्दू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान, आतंकवाद, राष्ट्रवाद, बिरियानी पॉलिटिक्स और बजरंबली को अपना हथियार बनाया।

भाषाई मर्यादा की इतनी गिरावट शायद ही इससे पहले किसी चुनाव में देखा गया हो। चुने हुए लोकप्रिय मुख्यमंत्री को आतंकवादी बताया जा रहा था तो कोई बयानों की गोलियां बरसा रहा था, केंद्रीय मंत्रियों का हुजूम नुक्कड़ नाटकों में व्यस्त रहा, गृहमंत्री स्वयं घर-घर जाकर पर्चे बांटने में जुटे रहे। कुल मिलाकर बीजेपी के सेनापति अमित शाह जी ने एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया जिसमें अभिमन्यु की वीरता के चर्चे तो हो सकते थे लेकिन उसका शहीद होना तय दिख रहा था।

लेकिन इसका अंदाजा सेनापति अमित शाह को भी नहीं रहा होगा कि उनके रचित चक्रव्यूह को भेदने के लिए सामने अभिमन्यु नहीं बल्कि अर्जुन (केजरीवाल) है। शाह एंड कम्पनी की हर चाल का जवाब टीम केजरीवाल ने सधी अंदाज में दिया और बीजेपी के तमाम दावों को झुठलाते हुए ऐसी प्रचंड जीत हासिल की जो भारतीय राजनैतिक इतिहास की नजीर बन गई।

केजरीवाल सम्पूर्ण भारतीय राजनीति के किसी चमकदार धूमकेतु की तरह अवतरित होने वाले इकलौते राजनेता नही हैं। कई मौकों पर केजरीवाल के परम विरोधियों को भी सोचना पड़ता है कि उनके विरोध का मुद्दा कहां से लाएं। केजरीवाल के पास न तो कांग्रेस की तरह की लम्बी स्वर्णिम ऐतिहासिक राजनैतिक पृष्ठभूमि रही है न बीजेपी की तरह का साम्प्रदायिक कट्टरपंथी हिंदुत्व का एजेंडा, न वामपंथियों की तरह मानववादी साम्यवादी आदर्शवाद व कठोर राजनैतिक सिद्धान्त, न ही अंबेडकरवादियों की तरह समाज के बड़े वंचित तबके के सहानभूति व अपार जनसमर्थन, न ही समाजवादियों की तरह समाज के मध्यम वर्ग, पिछड़े, शोषितों व अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने का राजनैतिक अनुभव और सबसे बढ़कर न ही कोई नेतागिरी का पूर्व अनुभव लेकिन फ़िर भी केजरीवाल का व्यक्तित्व और भारतीय राजनैतिक दलों का रवैया उन्हें एक अलग दर्जे का कुशल राजनेता व कुशल प्रशासक के रूप में जरूर स्थपित करता है।

देश के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार के रूप में प्रतिष्ठित गांधी परिवार के दामाद व भारतीय राजनीति के गुंडागर्दी युग के गुरु के रूप में स्थापित मोदी-शाह की जोड़ी तथा देश के बड़े कॉरपोरेट परिवार अम्बानी-अडानी जैसे लोगों पर एक साथ हल्ला बोलकर राजनीतिक जीवन की शुरुआत करना कोई इतना आसान काम नहीं था लेकिन केजरीवाल की प्रतिबद्धता व संकल्प ने जनमानस को अपने साथ आने के लिये जैसे विवश कर दिया और एक सामान्य इंसान को भारत ही नहीं वरन विश्व के चमकदार चर्चित चेहरे के रूप स्थापित कर दिया। दिल्ली के एलजी व अमित शाह एंड कम्पनी की तमाम रूकावटों व अड़चनों के बावजूद केजरीवाल ने अपने चुनावी वादों को निभाने की प्रतिबद्धता भी दिखायी।

प्रारंभिक दिनों में उन्होंने अपनी झल्लाहट का प्रदर्शन भी बखूबी किया और अनर्गल बयानबाजी व धरना पॉलटिक्स में भी व्यस्त रहे। लेकिन धीरे-धीरे एक परिपक्व राजनेता की तरह खुद को तराशा। अनर्गल बयानबाजी, दोषारोपण, धरना पॉलटिक्स को छोड़कर एक गम्भीर संजीदा राजनेता की तरह ख़ुद को ढाला। ये उसी का प्रतिफल है कि बिजली बिल, पीने का पानी, दिल्ली के अस्पतालों की स्थिति और सबसे बढ़कर दिल्ली की शिक्षा का काया-कल्प कर दिया गया जिससे विरोधी भी इंकार नहीं कर सकते।

हालांकि तमाम खूबियों के बाद भी ऐसा नहीं कि केजरीवाल आलोचनाओं से परे रह सके। और इसके पीछे कई महत्वपूर्ण सार्थक कारण भी रहे हैं। सबसे पहले तो कई कट्टर आप समर्थक भी अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नही ढूंढ पा रहे हैं कि प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव जैसे विशिष्ट योग्यता वाले प्रतिभाशाली और प्रभावशाली व्यक्ति कैसे और किन हालात में पार्टी की विचारधारा से खुद को अलग कर लिए। यहां एक बात इंगित कर दूं कि इन दोनों ने न तो वीके सिंह व किरण बेदी की तरह आप के स्थापना के पूर्व से ही केजरीवाल से अलग थे और न ही इन्हें आप कपिल मिश्रा व कुमार विश्वास की तरह सीधे तौर पर बीजेपी का एजेंट कह सकते हैं।

अगर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत के आईने में केजरीवाल के व्यक्तित्व और राजनीतिक सोच का आकलन करें तो बहुत कुछ स्प्ष्ट हो जाएगा। केजरीवाल की इस जीत के मायने और भविष्य की राजनीति में इसके प्रभाव को समझने के लिए दिल्ली चुनाव में आप की जीत के सूत्र को समझने की बहुत जरूरत है और इन्ही सूत्रों में केजरीवाल की राजनैतिक सोच और उनकी विचारधारा का भी बखूबी पता चल जाएगा। आइए सबसे पहले दिल्ली चुनाव में आप की जीत के कारणों को समझने का प्रयास करते हैं।

1. केजरीवाल की विकासवादी सोच – तमाम बहस के बीच जो एक बात निर्विवाद रूप से केजरीवाल के विरोधियों को भी माननी पड़ती है वो है केजरीवाल के विकासवादी कार्य और जनता के बुनियादी मुद्दों पर उनका जोर। दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में युगांतकारी परिवर्तन तो हुए ही हैं इसके साथ-साथ महिलाओं के लिए फ्री बस यात्रा, मुफ्त पानी, लगभग मुफ्त बिजली, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए मोहल्ला क्लीनिक, भ्रष्टाचार पर लगाम आदि कार्य केजरीवाल को औरों से बहुत अलग कर देता है। कुल मिलाकर जन आकांक्षाओं को पूरा करने की प्रतिबद्धता केजरीवाल को एक जनप्रिय राजनेता बना देता है इसमें कोई शक नहीं है।

2. बीजेपी की विभाजनकारी नीतियों को जनता द्वारा खारिज किया जाना: दिल्ली चुनाव में असल मुद्दों से भटकाने के लिए बीजेपी ने तमाम तरह के पैंतरेबाजी की लेकिन हर चाल, हर दांव उल्टा पड़ा। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि दिल्ली चुनाव में बीजेपी ने साम्प्रदायिक कार्ड जमकर खेला। हिन्दू-मुस्लिम, अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन एक्ट, भारत-पाकिस्तान, आतंकवाद जैसे मुद्दों को तो उछाला ही गया। साथ ही साथ इस चुनाव में बजरंगबली की भी एंट्री हो गई। लेकिन जनता ने बीजेपी की इन साम्प्रदायिक नीतियों को सिरे से खारिज कर दिया।

3. मुख्यमंत्री का चेहरा न होना: लोकप्रिय छवि वाले केजरीवाल के सामने बीजेपी द्वारा मुख्यमंत्री का विकल्प न देना भी बीजेपी के लिए घाटे का सौदा रहा। हर्षवर्धन एक बेहतर विकल्प हो सकते थे लेकिन पूर्वांचल के मतदाताओं को लुभाने हेतु मनोज तिवारी को थोड़ा ज्यादा तवज्जो दिया गया लेकिन पूर्वांचल के मतदाताओं ने भी इसे खारिज कर दिया।

4. छात्र आंदोलन: पिछले कुछ महीनों से राजधानी दिल्ली की सड़कों पर हो रहे छात्र आंदोलनों ने बीजेपी की नींव को झकझोर दिया। जेएनयू और जामिया जैसे श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों ने जिस तरह से सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला वह अभूतपूर्व है। इससे पहले इस तरह के छात्र आंदोलन बिरले ही देखने की मिलते थे, मेरे अनुसार तो जेपी आंदोलन के बाद इस तरह का छात्र आंदोलन और कभी नही हुिेआ।

5. केंद्र सरकार की विफलता: केंद्र सरकार की विफलता और अलगाववादी आक्रामक नीतियां दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए काफी भारी पड़ी। आर्थिक बदहाली की मार झेल रही जनता को बढ़ती महंगाई, रेकॉर्ड स्तरीय बेरोजगारी, सरकारी निकायों के निजीकरण का मुद्दा जनता को हजम नहीं हो पाई जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में उपर्युक्त मुद्दे काफी प्रभावकारी रहे। इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन यहां एक अहम प्रश्न ये भी है कि कमोवेश यही मुद्दे लगभग 9 महीने पूर्व लोकसभा चुनाव के वक्त भी थे लेकिन आम आदमी पार्टी का सारा विकासवादी मॉडल क्यों धरा रह गया था। इस प्रश्न का उत्तर अपने में कई सियासी रहस्यों को समेटे हुए है और इस एक प्रश्न के उत्तर में ही केजरीवाल की राजनैतिक महत्वाकांक्षा की झलक भी मिल जाएगी तथा और भविष्य में इस चुनाव के परिणाम को भी भली-भांति समझा जा सकता है।

लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी दिल्ली में 56 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल की थी, कांग्रेस के 22.5 प्रतिशत और आप को मात्र 18.1 प्रतिशत मत ही मिल सके थे। यहां दो बात बहुत महत्वपूर्ण है। पहली तो जब वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की जनता अपने घरों से निकली थी तो मोदी के प्रति उसका समर्थन इस कदर था कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों के मतों को मिलाकर भी बीजेपी को हराना संभव नहीं था फिर मात्र 9 महीने के बाद अचानक क्या हो गया कि लोकसभा चुनाव की फिसड्डी पार्टी प्रचंड जीत दर्ज कर ली ?

और दूसरी ये कि अगर कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव का 50% भी परफॉर्मेंस विधानसभा में दोहरा पाती तो नतीजे क्या होते ? जानकारी के लिए बता दूं कि वर्ष 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का मत प्रतिशत 9.65 फीसदी था और 2020 में पार्टी को मात्र 4.27 प्रतिशत वोट मिले हैं। विशेषज्ञों के एक अनुमान को मानें तो अगर दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का मत प्रतिशत 15 होता तो लगभग 55 सीटें बीजेपी की झोली में होतीं। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी 32.19 फीसदी मत हासिल की थी जबकि 2020 में बीजेपी को दिल्ली में 38.51 फीसदी वोट मिले हैं जो पिछली बार की तुलना में छह फीसदी ज्यादा ही हैं।

यानि आंकड़ों के विश्लेषण से एक बात तो स्पष्ट है कि बीजेपी की साम्प्रदायिक और धार्मिक राष्ट्रवाद की नीति पूरी तरह सफल रही है ये अलग बात है कि इसका फायदा उसे सीटों के रूप में नहीं मिला। पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी के मत प्रतिशत में बढ़ोत्तरी के बावजूद भी टीम केजरीवाल की इस बड़ी जीत का सीधा कारण बीजेपी विरोधी मतों का ध्रुवीकरण रहा। बीजेपी की आक्रामक सांप्रदायिेक नीतियों ने जो असुरक्षा का भाव उत्पन्न किया उसका जवाब था मतों का यह अभूतपूर्व ध्रुवीकरण, खासकर अल्पसंख्यकों ने जिस तरह से धर्मनिरपेक्ष मतों के विभाजन को रोका वो काफी अहम और निर्णायक सिद्ध हुआ।

यहां महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला मसला ये है कि आख़िर धर्मनिरपेक्ष मतों का ध्रुवीकरण सॉफ्ट हिंदुत्व की सियासत साधने वाले केजरीवाल को ही क्यों मिला ? ये वोट कांग्रेस में ट्रांसफर क्यों नहीं हुए ? जबकि कायदे से अगर देखा जाए तो बीजेपी की साम्प्रदायिक और अलगाववादी नीतियों के ख़िलाफ़ असली लड़ाई तो कांग्रेस ने ही लड़ी। केजरीवाल पहले ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने अनुच्छेद 370 पर सरकार का समर्थन किया। शाहीनबाग के मुद्दे पर जब बीजेपी ने केजरीवाल को घेरा तो केजरीवाल की धर्मनिरपेक्षता की हवा ही निकल गई।

पूरे चुनाव के दरम्यान इस मुद्दे पर केजरीवाल अपने को अलग करते दिखे। उनमें इतनी हिम्मत नहीं दिखी कि वो शाहीनबाग जाकर अपने लोकतांत्रिक हितों के लिए महीनों से संघर्ष कर रहे आंदोलनकारियों से मिलें या उनके आंसू पोछें। शाहीनबाग जाना तो दूर शाहीनबाग के समर्थन में खड़े होने की नैतिकता भी नही दिखा पाए। जय श्रीराम के प्रत्युत्तर में जय बजरंगबली को अवतरित करने वाले अवतारी पुरुष केजरीवाल कमोवेश बीजेपी के जुड़वे भाई की तरह ही दिखे। वैसे भी अन्ना आंदोलन से निकले इस राजनेता की वैचारिक पृष्ठभूमि बीजेपी की आइडियोलॉजिकल थिंक टैंक आरएसएस की रही है ये बात किसी से छिपी नहीं है।

तो क्या ये मान लिया जाए कि एक बड़े साम्प्रदायिक पार्टी के बाद एक छोटे साम्प्रदायिक पार्टी की विरासत को आगे बढ़ाई गई है ? प्रश्न महत्वपूर्ण है लेकिन स्पष्ट उत्तर देना मेरे ख्याल से अभी जल्दबाजी होगी। अगर सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो दिल्ली विधानसभा चुनाव स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार के साम्प्रदायिक अलगाववादी एजेंडे के खिलाफ जनता का मैंडेट है और केजरीवाल अब केवल हल्के राजनेता भर नहीं रह गए हैं बल्कि वो चुनाव जीतने के हथकंडे भी सीख गए हैं और राजनेताओं वाली कुटिलता व अवसरवादिता को भी धारण कर रहे हैं।

इस मायने से मैं उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरह देखता हूं जिनकी सबसे बड़ी खासियत चुनाव जीतने के हथकंडे एवं सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने की जुगाड़ टेक्नोलॉजी है। साम्प्रदायिक होते हुए भी अपने चेहरे पर धर्मनिरपेक्षता की कई मोटी परत इस कदर चढ़ा लेते हैं कि बड़े से बड़े राजनैतिक शूरमा भी गच्चा खा जाएं। केजरीवाल का चरित्र अगर किसी वर्तमान भरतीय राजनेता से मेल खाता है तो नीतीश कुमार इसके सबसे बेहतर उदाहरण हैं। याद कीजिए, पहली बार केजरीवाल मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए उस कांग्रेस से भी हाथ मिलाने में संकोच नहीं किए थे जिसके विरोध के हवनकुंड से इनका जन्म हुआ था। विगत लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस से गठबंधन करने की भरसक कोशिश की गई थी, ये अलग बात है कि गठबन्धन नहीं हो पाया।

मेरा अभी भी यही मानना है कि गठबंधन नहीं करना कांग्रेस की बड़ी राजनैतिक भूल थी और इसका खमियाजा कांग्रेस उठा रही है। बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडे के ख़िलाफ़ मुखर होकर लड़ने वाली कांग्रेस दिल्ली की अधिकांश सीटों पर अपनी जमानत भी बचा पाने में नाकाम रही। कांग्रेस की संघर्ष की जमीन पर सियासी फसल को आम आदमी पार्टी ठीक उसी प्रकार काट ले गई जिस प्रकार अक्सर वामपंथियों के संघर्ष का प्रतिफल कांग्रेस उठाती रही है। उम्मीद करता हूं कि कांग्रेस के सियासी रणनीतिकार बैठकर अपने इस लचर प्रदर्शन के कारणों की विस्तृत समीक्षा करेंगे।

अब जबकि दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान केजरीवाल के तीसरी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेने के लिए सजाया जा रहा है तो देखना दिलचस्प होगा कि केजरीवाल द्वारा खुले तौर पर शाहीनबाग के समर्थन में खड़ा न होना, जय श्रीराम के जवाब में जय बजरंगबली को उतारना बीजेपी को मात देने के लिए चुनावी हथकंडा भर था या इनकी मूल विचारधारा ? देखना होगा कि क्या शपथग्रहण के बाद केजरीवाल शाहीनबाग के आंदोलनकारियों के आसूं पोछने की हिम्मत जुटा पायेंगे ?

दूसरी बात आप के विरोध में सबसे ज्यादा जाती है वो है आप पर बीजेपी की बी टीम की तरह काम करने का आरोप। इसके पीछे भी मजबूत तर्क हैं जिससे इंकार करना आपियों के लिये आसान नहीं होगा। दिल्ली फतह के बाद क्या एक बार फिर आप की चुनाव लड़ने की नीति बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाली ही होगी ? प्रायः देखा गया है कि आप को केवल उन्हीं राज्यों में अपना राजनैतिक अस्तित्व दिखाई पड़ता है जिन राज्यों में बीजेपी हारने की स्थिति में होती है।

विदित है कि आप के चुनाव लड़ने के इस फैसले के कारण धर्मनिरपेक्ष मतों के बंटवारे का लाभ भी बीजेपी को कई बार मिल चुका है। आने वाले दिनों में बिहार और बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी धर्मनिरपेक्ष मतों के ध्रुवीकरण के लिए कार्य करती है या अपने उम्मीदवारों को उतारकर धर्मनिरपेक्ष मतों के बंटवारे की जुगत लगाती है। वैसे भी केजरीवाल के पुराने दोस्त रहे नीतीश कुमार ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल सरकार के खिलाफ़ जमकर चुनाव प्रचार किया।

मैं याद दिलाना चाहूंगा कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनते समय जब अपने दोस्त नीतीश बाबू की बुलाहट पर केजरीवाल पटना आये थे और मीडिया में लालू यादव के साथ उनकी गले मिलती तस्वीर आयी तो केजरीवाल दिल्ली जाते ही किसी सिद्ध राजनेता की तरह अपने बयान से खुद का बचाव यह कहते हुए किया कि लालू यादव जबरदस्ती उनके गले मिल लिए। यहां भी केजरीवाल के चरित्र का पता आसानी से लगाया जा सकता है।

वहीं केजरीवाल उस समय मौन का चादर ओढ़ लिये जब नैतिक बाबू अपनी नैतिकता को बीजेपी की हवेली पर गिरवी रखकर प्रचंड जनादेश का अपमान करते हुये पल्टासन का श्रेष्ठ नमूना दिखाया और बीजेपी के साथ सरकार का गठन किया। मेरे अनुसार दिल्ली से बाहर चुनाव लड़ने के मामले मे केजरीवाल का चरित्र बिल्कुल बहन मायावती जी की तरह दिखता है। जिन राज्यों में बीजेपी कमजोर हालत में होती है वहां धर्मनिरपेक्ष मतों का बंटाधार कर बीजेपी को जिताने की अप्रत्यक्ष कोशिश जरूर करते हैं।

कुल मिलाकर टीम केजरीवाल को सांप्रदायिक कहकर अति उतावलापन दिखाना जनादेश का अपमान होगा लेकिन केजरीवाल का राजनैतिक पादुर्भाव संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि से हुआ है, उनकी विचारधारा भी व्यापक, समृद्धशाली और पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष नहीं है ये तय है। सारांशतः केजरीवाल के व्यक्तित्व का अर्थ नीतीश कुमार और बहन मायावती के सम्मिलित राजनैतीक गुणों को समेटे हुए एक राजनेता की है।

उम्मीद करता हूं कि केजरीवाल जिन धर्मनिरपेक्ष मतों के सहारे फासीवादी, अलोकतांत्रिक और साम्प्रदायिक बीजेपी को करारी शिकस्त प्रदान की है उस जनमत का अपमान नहीं करेंगे और खुद को केवल विकासवादी तथा चुनाव जीतने वाले राजनेता तक सीमित नहीं करके अपने वैचारिक स्तर को भी समृद्ध और व्यापक बनायेंगे। फिलहाल तो टीम केजरीवाल को ऐतिहासिक जीत की बधाई !

(दया नन्द स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

This post was last modified on February 13, 2020 3:55 pm

Janchowk

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