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Categories: बीच बहस

विसंगितयों से भरा पड़ा है सुप्रीम कोर्ट का फैसला: माले

नई दिल्‍ली।

सीपीआई (एमएल) की प्रतिक्रिया:

यह महत्‍वपूर्ण है कि अयोध्‍या में विवादित स्‍थल पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय का फैसला किसी भी तरह से 6 दिसम्‍बर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्‍वंस की कायरतापूर्ण और आपराधिक घटना को सही नहीं ठहराता है। लेकिन यह निर्णय विवाद का यथार्थपरक समाधान करने में भी असफल रहा है- स्‍वयं न्‍यायालय द्वारा बताया गया आधार और निकाले गये निष्‍कर्ष के बीच की असंगति इसे अस्‍पष्‍ट और यथार्थ से दूर कर रही है।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने बिल्‍कुल ठीक कहा है कि बाबरी मस्जिद विध्‍वंस की कार्रवाई कानून के राज का स्‍पष्‍ट उल्‍लंघन था, ऐसे में इस विवाद में भूमि के मालिकाने का फैसला भी तथ्‍यों व सबूतों के आधार पर होना चाहिए था, धार्मिक भावनाओं के आधार पर नहीं। लेकिन पूरी विवादित भूमि केन्‍द्र के माध्‍यम से मन्दिर बनाने के लिए देने और गिरा दी गई मस्जिद के एवज में नई मस्जिद बनाने हेतु 5 एकड़ भूमि किसी अन्‍य स्‍थान पर देने का फैसला सर्वोच्‍च न्‍यायालय की खुद की राय के साथ ही न्‍याय नहीं कर रहा है।

न्‍यायालय की बेंच द्वारा सर्वसम्‍मति से दिये गये फैसले में निहित असंगति इसी फैसले के परिशिष्ट में दिये इस तथ्‍य में भी जाहिर हो रही है जिसमें बताया गया है कि पांच न्‍यायाधीशों में से एक की राय भिन्‍न थी जिनका हिन्‍दू मान्‍यताओं के अनुरूप मानना है कि विवादित स्‍थल ही राम की जन्‍मस्‍थली है। हालांकि इसी निर्णय में इस बात को भी जोर देकर कहा गया है कि मामले पर फैसला तथ्‍यों के आधार पर होना चाहिए, धार्मिक मान्‍यताओं के आधार पर बिल्‍कुल नहीं।

पूरी भूमि को मन्दिर निर्माण के लिए देकर और सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड को मस्जिद कहीं और बनाने की सलाह देकर सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने न्‍याय के सिद्धान्‍तों के ऊपर धार्मिक भावनाओं को ही प्राथमिकता देने वाला उदाहरण प्रस्‍तुत किया है, इससे भविष्‍य में अन्‍य स्‍मारकों– जिन्‍हें आरएसएस मन्दिर पर बना बताता रहता है, जिनमें ताजमहल भी शामिल है– के विरुद्ध साम्‍प्रदायिक अभियानों को बढ़ावा मिलने का खतरा बढ़ेगा।

इसीलिए हमारी मांग है कि मस्जिद गिराने के दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा सुनायी जाये। सर्वोच्‍च न्‍यायालय और चुनाव आयोग इस बात की भी गारंटी करें कि इस फैसले का झारखण्‍ड चुनावों में जहां नामांकन प्रक्रिया चल रही है, राजनीतिक चारा के रूप में इस्‍तेमाल नहीं होगा और चुनाव आचार संहिता का पालन होगा।

हम भारत की शांति और न्‍यायपसंद जनता से अपील करते हैं कि इस बात की गारंटी रहे कि सामाजिक सद्भाव को बिगड़ने नहीं दिया जायेगा और अयोध्‍या में राम मन्दिर के नाम पर 90 के दशक में देश में हुए साम्‍प्रदायिक खूनखराबे की पुनरावृत्ति हरगिज नहीं होने देंगे। लोकतंत्र और न्‍याय की ताकतें हर हाल में मन्दिर के नाम पर संघ ब्रिगेड को उन्‍माद भड़का कर अल्‍पसंख्‍यक समुदायों को और आतंकित करने और उनके नागरिक अधिकार छीनने एवं आम लोगों की आजीविका, रोजगार और मूलभूत अधिकारों के जरूरी सवालों को पीछे धकेलने की साजिश में कामयाब नहीं होने देंगी। स्‍वतंत्रता, बराबरी, भाईचारा और न्‍याय हमारे लोकतांत्रिक गणराज्‍य के चार महत्‍वपूर्ण संवैधानिक स्‍तंभ हैं और इस अदालती फैसले के बहाने हमारे गणराज्‍य की इस संवैधानिक नींव को ध्‍वस्‍त करने के संघ-भाजपा ब्रिगेड के मंसूबों को पूरा नहीं होने दिया जायेगा।

सीपीआई (एम) की प्रतिक्रिया:

-लम्बे समय से अटके अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय दे दिया है। अदालत ने 2.77 एकड़ की विवादित भूमि हिन्दू पक्ष को एक न्यास के जरिये मन्दिर बनाने के लिए दी है। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को अलग से 5 एकड़ जमीन मस्जिद बनाने के लिए दिए जाने के निर्देश दिए हैं।

– इस आदेश के जरिये सर्वोच्च न्यायालय ने उस विवाद का अंत करने की कोशिश की है, जिसका इस्तेमाल साम्प्रदायिक ताकतें उन्माद फैलाने के लिए करती रही थीं, जिसके चलते बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और लोगों की जानें गईं ।

– सीपीएम शुरू से ही कहती रही है कि यदि समझौते से समाधान संभव नहीं है तो न्यायालयीय निर्णय से इसका हल किया जाना चाहिए । हालांकि इस निर्णय ने एक न्यायिक समाधान प्रस्तुत किया है मगर इस फैसले के कुछ आधार ऐसे हैं जिन पर सवाल खड़े होते हैं ।

– खुद अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना गैरकानूनी था। यह एक आपराधिक कार्रवाई थी, धर्मनिरपेक्ष सिध्दांतों पर हमला था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बाबरी मस्जिद ध्वंस के मामलों की सुनवाई तेज की जानी चाहिए और अपराधियों को सजा दी जानी चाहिए ।

– कोर्ट ने 1991 के धार्मिक पूजागृह कानून की सराहना की है । इसी के साथ इस कानून के कड़ाई से पालन और भविष्य में किसी भी धर्म स्थल को लेकर दोबारा ऐसा विवाद उठाने और उसका इस्तेमाल करने की सख्त मनाही की है ।

– माकपा पोलित ब्यूरो ने इस निर्णय का ऐसा कोई भी भड़काऊ इस्तेमाल न करने का आग्रह किया है जिससे साम्प्रदायिक सौहार्द्र में बिगाड़ पैदा हो।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

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