Wednesday, February 1, 2023

पलायन की मार्मिक दास्तानों से भरा पड़ा है पहाड़

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ का अपने जन्म स्थान पंचूर आ कर माता का आशिर्वाद लेना सदियों पहले सन्यासी बने राजा गोपीचन्द के लुप्त हो रहे भजन को पुनर्जीवित करने के साथ ही पहाड़ के पलायन की एक टीस लोगों को याद दिला दी। कभी पहाड़ों में गोपीचन्द का भजन खूब गाया जाता था। विख्यात लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने भी इस भजन को आवाज देकर इसे संरक्षित करने का प्रयास किया है। पहाड़ के कुछ अन्य लोक गायकों और सन्यासियों ने भी इसे गा कर रिकार्ड किया है। हमने भी इस भजन को खूब सुना और गुनगुनाया। पहाड़ों में सन्यास लेने के पीछे कई मार्मिक किस्से हैं, जिनमें एक किस्सा अजय मोहन (योगी आदित्य नाथ) का भी है । अजय मोहन के माता पिता ने भी कभी नहीं चाहा होगा कि उनका बेटा योगी आदित्यनाथ बने। लेकिन मामा महंत अवैद्य नाथ की नजरों से भांजे अजय के अंदर का बैरागी छिप न सका और वह अजय को योगी आदित्यनाथ बनाने अपने साथ गोरखपुर ले गये। माता पिता भी इंकार नहीं कर सके।

दरअसल गोपीचन्द का उत्तराखण्ड से कोई संबंध नहीं था। गोपीचन्द प्राचीन काल में रंगपुर (बंगाल) के राजा थे। वह भर्तृहरि की बहन मैनावती के पुत्र माने जाते हैं। इन्होंने अपनी माता से उपदेश पाकर अपना राज्य छोड़ा और वैराग्य लिया था। कहा जाता है कि वह गोरखनाथ के शिष्य हुए थे और त्यागी होने पर इन्होंने अपनी पत्नी पाटमदेवी से, महल में जाकर भिक्षा माँगी थी। अजय मोहन ने भी अपनी माता के बजाय मामा से दीक्षा ली थी और उन्होंने भी गोपीचन्द की तरह गोरख पंथ अपनाया था।

अब सवाल उठता है कि जब गोपीचन्द का उत्तराखण्ड से कोई सम्बन्ध नहीं था तो उनका भजन गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक इतना क्यों गाया जाता था? दरअसल यह भजन पहाड़ के पलायन का एक बहुत ही मार्मिक पहलू बयां करता है। पहाड़ के बच्चे बचपन में ही रोजगार की तलाश में मैदान आ जाते थे। कुछ बच्चे पहाड़ों से दूर एक नयी दुनिया का सपना लेकर भाग कर दूर मैदानी क्षेत्रों में आ जाते थे। इनमें कुछ बच्चे मैदानी नगरों में घरेलू नौकर तो कुछ छोटे-छोटे होटल रेस्तरां में बर्तन धोने की नौकरी कर लेते थे। उस समय कहा जाता था कि पहाड़ का नौकर और पहाड़ का भोटिया कुत्ता बहुत वफादार होता है। इसलिये मैदान में आजीविका कमा रहे लोग जब अपने गांव लौटते थे तो उनसे सम्पन्न लोग पहाड़ से नौकर या कुत्ता लाने की फरमाइश करते थे और फरमाइश पूरी हो जाती थी।

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पहाड़ से आने वाले बच्चों में से कुछ तो मैदानों में धक्के खाकर कुछ ही समय बाद लौट आते थे तो कुछ दशकों बाद अपने बाल बच्चों समेत या अकेले गांव लौटते थे। कुछ साधारण हालत में तो कुछ सम्पन्न व्यवसायी या नौकरी पेशा के तौर पर लौटते थे। कुछ बच्चे एक बार गये तो फिर कभी नहीं लौटे। कुछ ऐसे भी होते थे जो आदित्यनाथ की तरह जोगी बन कर कभी कभार लौटते थे जिन्हें माता पिता तक नहीं पहचान पाते थे। गढ़वाल का विख्यात रामी बौराणी गीत और नाटक उस जमाने के पलायन का आईना है। इस नाटक में एक पति पूरे 12 साल बाद साधू वेश में अपने गांव आता है तो उसकी पत्नी रामी उसे नहीं पहचान पाती है। रामी बौराणी की यह लोक कथा पहाड़ी नारी के स्त्रित्व और पति के प्रति वफादारी की एक मिसाल भी है। जो कि 12 साल तक पति की प्रतीक्षा करने के बाद भी परपुरुष की छाया भी सहन नहीं करती। यह विडम्बना ही है कि पहाड़ छोड़ कर मैदान आये कुछ लोगों ने अपनी नयी गृहस्थी बसा दी और पहाड़ी गांव में रह रही पत्नी को जीतेजी विधवा की तरह जीने को मजबूर कर दिया। इस वर्ग में कई राजनेता गिनाये जा सकते हैं, जिनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेता भी रहे।

पहाड़ से भागे हुये कुछ बच्चों ने बहुत तरक्की कर मिसाल भी पेश की जिनमें बदरी प्रसाद बमोला भी एक थे। डा. योगेश धस्माना के अनुसार बद्री प्रसाद एकमात्र शर्त बंद कुली थे जिन्होंने 1890 से लेकर 1894 तक स्वयं मजदूरी की। एक बंधुआ मजदूर के रुप में कार्य करने वाले बदरी प्रसाद बमोला रुद्रप्रयाग के ऐसे अज्ञात पहाड़ी व्यक्ति थे जिन्होंने फिजी में गन्ने की खेती में लगे भारतवर्षीय लोगों को न सिर्फ अंग्रेजों की बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया बल्कि फिजी में एक सशक्त राजनीतिक दल का गठन कर उसका नेतृत्व भी किया और स्वयं भी संसद में पहुंचकर प्रतिपक्ष के नेता के पद को सुशोभित किया। उस जमाने में फौज में भर्ती होने के शैक्षिक योग्यता के बजाय शरीर शौष्ठव और युद्ध में जाने का हौसला देखा जाता था, इसलिये घर से भागे हुये पहाड़ी बच्चे किशोरावस्था पार करने के बाद लैंसडौन और रानीखेत पहुंच कर भर्ती हो जाते थे और फिर सैनिक के रूप में घर पहुंचते थे। कुछ बच्चे कोटद्वार, रामनगर और हल्द्वानी में बसों और ट्रकों में क्लिनरी करने के बाद ड्राइवर बन कर घर लौटते थे।

जब बच्चा जवान हो कर घर लौटे तो उसे पहचानना आसान नहीं होता। खास कर साधू वेश में लौटे शख्स को पहचानना तो लगभग नामुमकिन ही है। इसीलिये कई बार कुछ ठग साधू वेशधारी दशकों पहले घर से भागे हुये बच्चे के घर पहुंच कर उनकी भावनाओं का दोहन भी करते थे। कोई भी सामान्य व्यक्ति साधरणतः सन्यासी नहीं बनता। योगी आदित्यनाथ की तरह बाल बैरागी बहुत कम होते हैं। लेकिन ज्यादातर मजबूरी में सन्यास धारण करने को विवश हो जाते हैं। महिला सन्यासिनों की कहानियां तो और भी अधिक दारुण होती है। इसलिये बारह बरसों बाद अजय मोहन की तरह कोई सन्यासी अपनी मां के पास पहुंच जाय तो वे अत्यंत मार्मिक क्षण होते हैं।

(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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