Sunday, May 29, 2022

आईएएस कैडर नियमों में प्रस्तावित बदलाव को लेकर केंद्र और राज्य आमने-सामने

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केंद्र में चाहे जिस दल की सरकार हो राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारों को राज्यपाल के माध्यम से अस्थिर करने और राज्य सरकारों के कामकाज में रोड़ा अटकाने के आरोप अब तक लगते रहे हैं लेकिन अब केंद्र की भाजपा नीत मोदी सरकार नौकरशाहों को नियंत्रित करके राज्य सरकारों पर नकेल लगाने की जुगत में लगी है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) कैडर के नियमों में केंद्र सरकार नए संशोधन का प्रस्ताव लायी है, जिसको लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। यह संशोधन राज्यों में तैनात आईएएस व आईपीएस की केंद्र में प्रतिनियुक्ति को लेकर है, राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। यह संशोधन विधेयक संसद में पारित होने के बाद इन लोकसेवकों की प्रतिनियुक्ति में केंद्र का अधिकार बढ़ जाएगा।

आईएएस प्रतिनियुक्ति नियमों में केंद्र के प्रस्तावित संशोधन के तहत कोई राज्य किसी अधिकारी को केंद्र में भेजने में देरी करते हैं, तो उस अधिकारी को कैडर से रिलीव कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार ही केंद्र में पोस्ट होने वाले अधिकारियों की संख्या तय करेगी, राज्य उसे मानेंगे। अधिकारी को लेकर राज्य-केंद्र के बीच किसी असहमति में केंद्र का फैसला माना जाएगा। केंद्र को जनहित में अधिकारियों की जरूरत होने पर राज्य तय समय में उन्हें रिलीव करेंगे। संशोधन में यह भी प्रस्ताव है कि यदि कोई राज्य सरकार समय पर केंद्र के फैसले को लागू नहीं करती और उक्त अधिकारी को उसकी राज्य की सेवाओं से मुक्त नहीं करती है तो केंद्र सरकार की ओर से तय तारीख से ही अधिकारी को अपने राज्य के कैडर से मुक्त मान लिया जाएगा। फिलहाल, अभी अधिकारी को केंद्र में जाने के लिए राज्य सरकार से एनओसी लेनी पड़ती है।

इस बीच प्रस्तावित संशोधन का सूचना एवं मंत्रालय के सचिव अपूर्व चंद्रा ने समर्थन किया है। चंद्रा ने कहा कि इससे केंद्र सरकार को और अधिकारी मिल सकेंगे। वहीं आईएएस कैडर नियमों में संशोधन के प्रस्ताव को लेकर गैर बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री इसके विरोध में हैं। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र ,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने ऐतराज जताया है।

अपूर्व चंद्रा ने कहा कि साल 2014 में अधिकारियों की नियुक्ति में कमी आई है। अधिकारियों की संख्या कम होने से केंद्र सरकार का प्रशासनिक ढांचा कमजोर होता है। उन्होंने कहा कि मेरे पास केंद्र और राज्य दोनों के साथ काम करने का अनुभव है और इन बदलावों को लागू करने में मदद मिलेगी। वर्तमान में केंद्र के पास 40 फीसदी जरूरत के मुकाबले केवल 18 फीसदी नियुक्तियां हैं।

कई बार अधिकारियों के मुद्दे पर राज्य और केंद्र के बीच टकराव देखने को मिला है। दो साल पहले इसी मुद्दे पर केंद्र और बंगाल सरकार के बीच जमकर टकराव देखने को मिला था। दिसंबर 2020 में बंगाल सरकार ने तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्र में भेजने की बात नहीं मानी थी। सीएम ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर दूसरी बार पीएम को पत्र लिखा है और कहा है कि इस पर फिर से विचार नहीं किया गया तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

गत 12 जनवरी को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर बताया था कि केंद्र सरकार आईएएस कैडर नियमों में बदलाव करना चाहती है। राज्यों से 25 जनवरी तक इस पर राय देने को कहा है। राज्य सरकारें केंद्र के इस फैसले के विरोध में उतर आयी हैं। विरोध करने वालों में अधिकतर गैर भाजपा शासित राज्य हैं।

नये नियम के लागू होने के बाद केंद्र सरकार राज्य सरकारों की बिना अनुमति के किसी भी आईएएस अधिकारी को प्रतिनियुक्ति पर बुला सकती है। अभी तक व्यवस्था है कि केंद्र में प्रतिनियुक्ति के लिए राज्यों के आईएएस अधिकारी अपनी इच्छा जाहिर करते हैं। इसके बाद राज्य सरकारें अपने अफसरों की सूची बनाने के बाद प्रतिनियुक्ति पर भेजती है। अफसरों को राज्य सरकार से एनओसी लेनी होती है।

केंद्र सरकार संसद के बजट सत्र में इस संसोधन को पेश कर सकती है। माना जा रहा है कि बजट सत्र में यह मुद्दा केंद्र व विपक्ष के बीच फिर से टकरार की वजह बन सकता है। केंद्र के आईएएस कैडर नियमों में बदलाव के फैसले को लेकर आईएएस भी नाराज हैं। आईएएस अफसरों की नाराजगी देख राज्य सरकारें अब इन नियमों में केंद्र से बदलाव न करने की मांग कर रही हैं।

आईएएस कैडर नियम संशोधन के विरोध में अब दक्षिणी राज्य भी सामने आ गए हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने कहा है कि सरकार का ये फैसला राज्यों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी केंद्र के इस फैसले को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। वहीं, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस संशोधन को संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है।

अफसरों के लिए केंद्र और राज्य में टकराव बहुत पुराना है। 2021, मई में आईएएस अलपन बंद्योपाध्याय की प्रतिनियुक्ति को लेकर केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार में टकराव हुआ। 2020, दिसंबर में ममता सरकार ने तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्र में भेजने की बात नहीं मानी थी। 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का तमिलनाडु की जयललिता सरकार से आईपीएस अफसरों को लेकर विवाद हुआ था।

आंकड़ों के अनुसार, एक जनवरी 2021 तक देश में कुल 5200 आईएएस अधिकारी थे। इसमें से 458 केंद्र में नियुक्त थे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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