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Categories: बीच बहस

सतही है कोरोना से लड़ने की भारत की तैयारी

कोरोना संक्रमण से बचाव को लेकर बीते गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। बेहद भावपूर्ण तरीके से उन्होंने अपनी बात रखी। लोगों को जिस बात को लेकर प्रधानमंत्री से आशा थी, उस आशा पर प्रधानमंत्री खरे तो नहीं उतरे अव्वलन बिना किसी पैकेज और सब्सिडी की घोषणा के वह जनता से ही कुछ मांग कर चले गए। उन्होंने जनता को ताली और थाली बजाने का आह्वान भी किया। हालांकि यह सराहनीय है लेकिन जब संक्रमण का दूसरा और तीसरा चरण आएगा तो थाली और ताली से काम नहीं चलने वाला है। दूसरी ओर दुनिया पर जब नजर दैड़ाते हैं तो स्थितियां भिन्न दिखती हैं। मसलन इटली के प्रधानमंत्री गिउसेप कोंटे ने कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझने के लिये बीते बुधवार को 25 अरब यूरो यानी 28.3 अरब डॉलर के पैकेज की घोषणा की।

इटली के वित्त मंत्री रॉबर्टो गुआलतिएरी ने कहा कि इनमें से आधी राशि का इस्तेमाल तत्काल किया जाएगा और आधी राशि को सुरक्षित कोष में रखा जाएगा। इटली ने कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझने के लिये पिछले सप्ताह 7.5 अरब यूरो के पैकेज की घोषणा की थी। उल्लेखनीय है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से इटली में अब तक 631 लोगों की मौत हो चुकी है। उसी प्रकार कोरोना के खिलाफ अमेरिका में आपातकाल का ऐलान खुद वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए फेडरल फंड में 50 अरब डॉलर रकम देने की घोषणा की है।

जिस प्रकार इटली और अमेरिका ने आपातकालीन आर्थिक पैकेज की घोषणा की है उसी प्रकार चीन, जापान, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, कनाडा कोरिया और सिंगापुर आदि देशों ने भी अपने-अपने तरीके से आपातकालीन फंड की घोषणा की है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। नि:संदेह यह शासन की हृदयहीनता को चिंहित करता है।

सवा सौ करोड़ से भी अधिक की आबादी वाले भारत में कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए सिर्फ 65 केन्द्र हैं, जो अभी कुछ दिन पहले तक प्रति दिन मात्र 90 टेस्ट किया करते थे। अभी उन्हें हर रोज 500 से 700 सैंपल टेस्ट करने पड़ रहे हैं। ऐसे सेंटरों को बढ़ाने की जरूरत है। अभी तक कोरोना के लगभग 13 हजार सैंपल परीक्षण किए गए हैं, जो नाकाफी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के देशों को इस महामारी पर रोक लगाने के लिए ज्यादा से ज्यादा परीक्षण करने की सलाह दी है। दक्षिण कोरिया 5 हजार प्रतिदिन की औसत से अब तक 2 लाख 40 हजार टेस्ट कर चुका है, जबकि भारत जैसा देश सिर्फ 12 से 13 हजार हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि इटली में हर 10 लाख आबादी पर 826 लोगों का टेस्ट किया जा रहा है, जबकि भारत में 10 लाख लोगों पर लगभग 3 लोगों की टेस्टिंग हो रही है।

सरकार को हर एक टेस्ट की 5000 रुपए की लागत आती है। भारत अपने कुल बजट का सिर्फ 3.7 फीसदी ही स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करता है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च सेंटर के एडवांस्ड रिसर्च इन वायरोलॉजी सेंटर के पूर्व प्रमुख डॉ. जैकब जॉन ने बताया है कि भारत का मौसम और जनसंख्या इस वायरस को फैलाने में अनुकूल है। डॉ. जैकब का कहना कि 15 अप्रैल तक कोरोना मरीजों की संख्या में 10 से 15 गुना की बढ़ोतरी होगी। उन्होंने यह भी कहा है कि कोरोना से बचने के लिए सरकार सतही प्रयास कर रही है, जबकि इसके लिए गंभीर प्रयास करने की जरूरत है।

मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को कोराना से कैसे बचाव किया जाए इस बारे में देश के प्राइवेट डॉक्टरों की कार्यशाला का आयोजन करना चाहिए था। देश के प्राइवेट अस्पतालों में कोरोना का फ्री इलाज की सुविधा दी जाए इसकी आपात घोषणा करनी चाहिए थी। सरकारी अस्पतालों में मात्र कुछ सौ बेड वाले वार्ड बना कर इस संक्रामक बीमारी से बचने की योजना बनाई गयी है लेकिन इससे बहुत ज्यादा फायदा होना नहीं है। सच पूछिए तो एक दिन के जनता कर्फ्यू से भी काम नहीं चलेगा इसे कम से कम दो हफ्ते तक के लिए जारी रखा जाना चाहिए।

इस वायरस के कारण दुनिया के बाजार पर भी बेहद बुरा असर पड़ा है। कई देशों ने बाजार को लेकर पैकेज जारी किया है। उदाहरण के लिए कनाडा ने अपनी जनता और व्यापारियों के लिए 1300 अरब रुपये की प्रत्यक्ष आर्थिक मदद दी है। टैक्स में छूट के लिए 2800 अरब रुपये अलग से जारी किया गया है। हर व्यापारी को उसके कर्मचारियों को वेतन देने के लिए 13 लाख रुपये की वेतन सब्सिडी दी गयी है। दो बच्चों वाले एकल अभिभावक को 77 हजार रुपये दिए जाएंगे। चीन ने भी अपने बाजार को बचाने के लिए अलग से पैकेज जारी किया है। अमेरिका ने तो अपने व्यापारी और कर्मचारियों के लिए मानों पूरा खजाना ही खोल दिया हो।

युनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी आदि यूरोपीय देशों ने भी व्यापारिक पैकेज की घोषणा की है। कोरोना के कारण भारत के बाजार पर भी भयंकर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। शेयर बाजार धराशायी हो गया। दुकान, मॉल, कल-कारखाने, पार्क, रेस्तरां आदि के बंद होने के कारण बेरोजगारी की भी स्थिति भयावह हो गयी है। ऐसे में भारत सरकार को भी व्यापार और स्वास्थ्य जगत के लिए पैकेज देना चाहिए लेकिन प्रधानमंत्री जनता से ही कुछ मांगने के लिए प्रस्तुत हुए। उन्होंने अपने संबोधन में तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं। एक लोग बाहर न निकलें, दूसरा एक दिन के लिए जनता कर्फ्यू लगाएं और शाम में ताली, थाली, लोटा, ग्लास आदि बजाएं।

प्रधानमंत्री की बातों से यही लगा कि कोरोना को लेकर सरकार सतही तैयारी कर रखी है। अभी तो कोरोना का प्रथम चरण है जैसा कि विशेषज्ञ बताते हैं, कोरोना अपने दूसरे या तीसरे चरण में भयावह रूप पकड़ेगा। ऐसे में केवल ताली और थाली बजाने से इस बीमारी के भयावह महामारी वाले रूप को रोक पाना संभव नहीं हो पाएगा। इसके लिए तो ठोस और मुकम्मल चिकित्सा और स्वास्थ्य प्रबंधन की जरूरत होगी लेकिन सरकार की तैयारी नाकाफी दिख रही है। वैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान का स्वागत किया जाना चाहिए। इससे थोड़ा लाभ होगा। लोगों में सामूहिकता आएगी, जिससे जनता का आत्मबल मजबूत होगा। इससे रोग प्रतिरोधन की क्षमता में बढ़ोतरी होगी।

(गौतम चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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This post was last modified on March 20, 2020 7:41 pm

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