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Categories: बीच बहस

भाजपा की उम्मीदों का ‘चिराग’ बुझा सकता है नीतीश का आरक्षण राग

बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान प्रचार अभियान चरम पर था। पहले दौर का मतदान होने तक आरक्षण मुद्दा कहीं भी चर्चा में नहीं था। लेकिन अचानक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन राव भागवत का बयान आया कि देश में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा किए जाने की ज़रूरत है। वह चुनाव लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की पार्टियां मिलकर लड़ रही थीं और कांग्रेस भी उनके साथ थी।

तीनों पार्टियों का महागठबंधन भाजपा पर भारी पड़ता दिख रहा था। ऐसे में भागवत का बयान लालू और नीतीश के लिए मनचाही मुराद साबित हुआ। उन्होंने भागवत के बयान को लपकने में जरा भी देरी नहीं की और उसे इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी हर सभा में सफाई देनी पड़ी कि उनकी सरकार ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे कि आरक्षण पर जरा भी आंच आए।

यही नहीं, मोदी ने कुछ सभाओं में तो खुद को पिछड़ी जाति और दलित मां का बेटा भी बताया और कहा कि उनके रहते कोई ताकत आरक्षण को खत्म नहीं कर सकती और वे इसे बचाने के लिए अपनी जान की बाजी भी लगा देंगे। लेकिन उनकी कोई सफाई-दुहाई काम नहीं आई। लालू और नीतीश लोगों को यह समझाने में कामयाब रहे कि दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों को मिल रहे आरक्षण को भाजपा और संघ खत्म करना चाहते हैं। लालू यादव तो इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने चलते चुनाव में ही कह दिया था कि भागवत का बयान बिहार में भाजपा की तकदीर का फैसला कर चुका है। चुनाव नतीजों ने उनके कहे को साबित भी कर दिया। भाजपा की करारी हार हुई। राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) और कांग्रेस के महागठबंधन को लगभग तीन चौथाई बहुमत हासिल हुआ। बाद में भाजपा के भी कई नेताओं ने माना था कि भागवत के बयान से उनकी पार्टी को नुकसान हुआ।

पांच साल पुराने इस घटनाक्रम को यहां पेश करने का आशय यह है कि बिहार की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा काफी महत्व रखता है और यह भी कि यह मुद्दा भाजपा की दुखती रग है, जिसकी इस चुनाव में उनके सहयोगी नीतीश कुमार ने अनायास ही एंट्री करवा दी। दूसरे दौर के मतदान से पहले वाल्मीकिनगर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछड़ी जातियों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण दिए जाने की बात कही। यह बात उन्होंने वाल्मीकिनगर इलाके के थारू जाति के लोगों को जनजाति में शामिल किए जाने की मांग के संदर्भ में कही। नीतीश कुमार के इस बयान का सीधा आशय पिछड़ी जातियों को रिझाना और पिछड़ों को रिझाने का मतलब उन अगड़ी जातियों को खिझाना यानी चिढ़ाना, जो कि भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक हैं।

दरअसल नीतीश कुमार के आरक्षण संबंधी इस बयान से यह साफ हो गया है कि एक गठबंधन में होते हुए भी भाजपा और जनता दल (यू) के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दोनों पार्टियां चुनाव मैदान में एक दूसरे की संभावनाओं को कमजोर करने में लगी हुई हैं। हालांकि भाजपा की ओर से आधिकारिक तौर पर तो यही कहा जा रहा है कि बिहार में एनडीए के नेता नीतीश कुमार ही हैं और चुनाव के बाद भी वही नेता रहेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा इस बार अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए चुनाव लड़ रही है। समूचे उत्तर भारत में बिहार ही एकमात्र ऐसा सूबा है जहां आज तक भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं बन पाया है। चूंकि नीतीश कुमार और उनका जनता दल (यू) भी भाजपा की इस हसरत से अनजान नहीं है, लिहाजा वह भी इस बात का इंतजाम करने में लगा है कि ‘हम नहीं तो भाजपा भी नहीं।’

एनडीए में शामिल पार्टियों के बीच खटपट तो चुनाव का ऐलान होने से पहले सीटों के बंटवारे को लेकर ही शुरू हो गई थी। सबसे पहले अपने मनमाफिक सीटें न मिलने पर पासवान परिवार की लोक जनशक्ति पार्टी ने गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नेता मानते हुए लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा कि उनकी पार्टी केंद्र में एनडीए का हिस्सा बनी रहेगी, लेकिन बिहार में वह अकेले चुनाव लड़ेगी। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी पार्टी सिर्फ जनता दल (यू) के खिलाफ ही अपने उम्मीदवार मैदान में उतारेगी और बिहार में अगली सरकार भाजपा-लोजपा गठबंधन की बनेगी।

चिराग पासवान के इस कदम को भाजपा की रणनीति का ही हिस्सा माना गया। इस धारणा को तब और बल मिला जब भाजपा के कई नेता लोजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर गए। हालांकि भाजपा की ओर से यही कहा जाता रहा कि बिहार में एनडीए के नेता नीतीश कुमार ही हैं और चुनाव के बाद भी वे ही नेता रहेंगे, भले ही भाजपा और जनता दल (यू) में किसी को भी कम या ज्यादा सीटें मिलें। लेकिन चुनाव प्रचार के लिए दिल्ली से बिहार पहुंचे कुछ भाजपा नेताओं ने अपने भाषणों में स्पष्ट रूप से चिराग पासवान की तारीफ करते हुए उन्हें संभावनाओं से भरा नेता बताया। इसके अलावा भाजपा के कई प्रादेशिक नेताओं के बयानों भी से यही संकेत मिला कि भाजपा इस बार मौका मिलने पर अपना ही मुख्यमंत्री बनाएगी।

इतना सब होने के बाद भी प्रधानमंत्री का चुनावी दौरा शुरू होने तक जनता दल (यू) की ओर से ऐसा कोई बयान नहीं दिया गया था, जिससे कि चिराग और भाजपा की मिलीभगत का संकेत मिले। जनता दल (यू) के नेता चिराग पर हमला कर रहे थे लेकिन ऐसा दिखा रहे थे कि मानो चिराग स्वतंत्र रूप से राजनीति कर रहे हैं और सिर्फ नीतीश कुमार को ही नहीं, बल्कि पूरे एनडीए को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालांकि जानते सब थे कि चिराग को परदे के पीछे से भाजपा की मदद मिल रही है और उसी के दम पर वे इतनी उछलकूद कर रहे हैं।

नीतीश कुमार चाहते थे और उन्हें उम्मीद भी थी कि प्रधानमंत्री मोदी जब चुनाव प्रचार के लिए बिहार आएंगे तो वे लोजपा को लेकर स्थिति स्पष्ट करेंगे, लेकिन मोदी ने दूसरे दौर के मतदान तक अपनी तीन बिहार यात्राओं के दौरान इस बारे में कुछ नहीं कहा। जब मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में चिराग को लेकर कुछ नहीं कहा तो जनता दल (यू) की ओर से भी चिराग और भाजपा के रिश्ते पर खुल कर कहा जाने लगा है। जनता दल (यू) के नेता राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय झा ने सार्वजनिक रूप से कहा कि चिराग एक जमूरा हैं, जिनको कोई मदारी नचा रहा है।

उन्होंने मदारी का नाम नहीं लिया, लेकिन सब जानते हैं कि चिराग को नचाने वाले मदारी लालू यादव या तेजस्वी यादव तो हो नहीं सकते। चिराग लगातार प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें अपना नेता बता रहे हैं और भाजपा-लोजपा की सरकार बनने की बात कर रहे हैं। इसलिए संजय झा ने भले ही नाम नहीं लिया हो, पर उनका इशारा बहुत साफ था। उन्होंने एक तरह से भाजपा को संदेश दिया है कि उसका खेल नीतीश कुमार और उनकी पार्टी की समझ में आ रहा है।

मोदी ने अपनी सभाओं में चिराग और उनकी पार्टी के अलग चुनाव लड़ने को लेकर तो चुप्पी साधे रखी लेकिन कुछ बातें ऐसी ज़रूर कही, जिससे नीतीश के मुंह का स्वाद बिगड़ गया। मोदी ने अपने पहले ही चुनावी दौरे में कहा कि मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार के शुरू के दस साल तो केंद्र में यूपीए की सरकार से लड़ने में और डेढ़ साल राष्ट्रीय जनता दल के साथ सरकार चलाने में बर्बाद हो गए। उनके यह कहने का सीधा मतलब यही रहा कि बिहार में जो कुछ भी काम हुआ है, वह नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने के बाद उनकी (मोदी की) वजह से ही हो पाया है।

यही नहीं, पहले दौर के मतदान से एक दिन पहले भाजपा की ओर से अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के जो विज्ञापन दिए गए उनमें भी सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ भाजपा का चुनाव चिन्ह ही था और स्लोगन लिखा था- ‘भाजपा है तो विश्वास है’ इस विज्ञापन पर जब नीतीश कुमार की ओर से ऐतराज जताया गया तो अगले दिन नया विज्ञापन जारी किया गया, जिसमें मोदी के साथ नीतीश की तस्वीर और दोनों पार्टियों के चुनाव चिन्ह भी थे।

जो भी हो, कुल मिलाकर भाजपा और जनता दल (यू) के गठबंधन की कहानी बिल्कुल साफ है। नीतीश कुमार का आरक्षण को लेकर दिया गया बयान उसी कहानी का विस्तार है। नीतीश यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि उनके इस बयान से उन्हें कुछ फायदा हो या न हो, भाजपा को ज़रूर नुकसान पहुंच सकता है। वे यह भी जानते हैं कि भाजपा चाहते हुए भी उनके इस बयान का विरोध नहीं कर सकती। ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार के इस दांव को भाजपा नहीं समझ रही है। वह खूब समझ रही है। लेकिन नीतीश का यह दांव उसके लिए एक तरफ कुआं और एक तरफ खाईं जैसा है, लिहाजा इस मसले पर वह चुप्पी साधे हुए हैं।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 4, 2020 6:28 pm

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