Friday, July 1, 2022

ये प्रायोजित आस्थाओं का दौर है!

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ये प्रायोजित आस्थाओं का दौर है। जिसमें न धर्म की कोई भूमिका है न ही अध्यात्म के लिए कोई स्थान। यहां बस सत्ता और उसकी राजनीतिक जरूरत है और फिर उसके हिसाब से धर्म का इस्तेमाल। इस काम के लिए भले ही आस्था की बलि चढ़ा दी जाए उससे इसको कोई फर्क नहीं पड़ता है। और अगर बिल्कुल साफ तौर पर कहें तो यह काम कोई और नहीं बल्कि धर्म के नाम पर कथित हिंदू संगठनों का एक गिरोह संचालित कर रहा है जिसका नाम है संघ। इसके नेतृत्व में हिंदू आस्थाएं मंदिरों में नहीं बल्कि मस्जिदों और मुस्लिम मोहल्लों में ढूंढी जा रही हैं। क्योंकि इसका वजूद ही नफरत और घृणा पर आधारित है लिहाजा वह हर उस काम को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है जिससे इसके दायरे को और व्यापक किया जा सके। 

लेकिन आइये पहले आस्था के ही प्रश्न को हल करते हैं। सामान्य तौर पर आस्था और विश्वास किसी का भी किसी चीज में हो सकता है। लेकिन आज हम धार्मिक आस्था के मसले पर केंद्रित करेंगे। किसी शख्स का किसी धर्म, उसके किसी प्रतीक या फिर उससे जुड़ी किसी चीज में आस्था हो सकती है और उसका बिल्कुल सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन अगर कोई ऐसी चीज वजूद में नहीं है बल्कि उसे बनावटी तरीके से पैदा या फिर पेश कर दिया जा रहा है और फिर लोगों पर उसे थोप दिया जा रहा है तो उससे जुड़ी आस्थाओं का वह स्थान नहीं होगा जो किसी स्वाभाविक आस्था का होता है। 

यह कोई आस्था नहीं बल्कि शुद्ध रूप से उसके जरिये दूसरे के धार्मिक स्थल पर कब्जा करने, उससे जुड़े समुदाय को नीचा दिखाने और फिर ताकत के बल पर उसे अपने मातहत लाने की कुत्सित मंशा का हिस्सा है। और अगर इस तरह के किसी मामले में उसकी कोई आलोचना करता है या फिर उसे मजाक के हद तक ले जाता है तो उसे एकबारगी न तो खारिज किया जा सकता है और न ही उसको दरकिनार करने की जरूरत है। और एक ऐसे समय में जबकि सरकार, सत्ता और संस्थाओं से लेकर समाज का बहुमत हिस्सा एक पक्ष में एकजुट हो तो इस तरह की आलोचनाएं और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं। 

कुछ ठोस उदाहरण के जरिये इसको और स्पष्ट किया जा सकता है। ज्ञानवापी का ही मसला लीजिए। एक संगठन उसे दूसरी बाबरी मस्जिद बनाने का अभियान छेड़े हुए है। और सूबे तथा देश की मौजूदा सत्ता का उसको खुला समर्थन हासिल है। ऐसे में स्थानीय कोर्ट संवैधानिक कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का खुला उल्लंघन कर जांच का आदेश दे देती है और उसके लिए एक कमीशन तक नियुक्त कर देती है। ऊपर से कमीशन के अगुआ मामले की गोपनीयता को बनाए रखने की जगह संबंधित संगठन की कठपुतली साबित हो जाते हैं। कोर्ट किस हद तक पक्षपाती है उसका पता इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने द्वारा गठित कमीशन की रिपोर्ट का इंतजार किए बगैर वह वादी पक्ष के वकील की पहल और निशानदेही पर छुट्टी के दिन न केवल काम करती है बल्कि मस्जिद के एक हिस्से को सील करने का स्थानीय प्रशासन को निर्देश देती है। और इन सबसे आगे बढ़कर जिस कोर्ट को देश में संवैधानिक व्यवस्था के संचालन की जिम्मेदारी मिली है वह सुप्रीम कोर्ट मामले में याचिका होने के बावजूद मौन धारण किए रहता है। धार्मिक स्थलों के यथास्थिति संबंधी 1991 के कानून के तहत इन सारी कवायदों को रोकने की जगह वह खुद पूरे मामले की सुनवाई शुरू कर देता है। ये सारी स्थितियां संविधान में इस मामले में दर्ज कानून के बिल्कुल विपरीत हैं। अब अगर ऐसे में कोई सवाल उठाता है और एक हद तक मजाक और व्यंग्य के स्तर तक उसको ले जाता है तो भला उसे कैसे रोका जा सकता है?

बहरहाल बावजूद इसके अगर आपकी आस्था को चोट पहुंचती है तो उस पर भी बात होगी। लेकिन उससे पहले आप से ज़रूर यह सवाल होगा कि किसी भी मिलती-जुलती चीज को आप शिवलिंग घोषित कर देंगे और फिर पूरे देश से उसमें आस्था व्यक्त करने की उम्मीद भी करने लगेंगे। लेकिन जब दूसरे किसी धर्म का मामला आएगा तो आप का रवैया इसके बिल्कुल उलट होगा। मसलन दूसरे किसी की असली मस्जिद पर चढ़कर आप तांडव करेंगे। वहां आप भगवा फहराएंगे और यहां तक कि उसके ऊपर से पेशाब करने से लेकर हर तरह की जलील हरकत को अंजाम देंगे। आप के आस्था की यह परिभाषा वहां कहां चली जाती है? यानि आपकी आस्था आस्था और दूसरे की आस्था कूड़ा।

वैसे भी धर्म में जैसे ही राजनीति का मिश्रण होता है आस्थाएं अपनी पवित्रता खोने लगती हैं। ऐसे में अगर कोई आस्था राजनीतिक लक्ष्य से प्रेरित है तो उसे आस्था का नाम ही नहीं दिया जा सकता है। और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय संविधान में धर्म एक व्यक्तिगत मामला है। और आस्था भी व्यक्तिगत तौर तक ही सीमित है। जैसे ही यह सामूहिक रूप लेती है यह उन्मादी भीड़ में तब्दील हो जाती है। और उसी के साथ उसके अंधविश्वास में बदलने का खतरा बढ़ जाता है। जिसमें न तो विवेक के लिए कोई स्थान बचता है और न ही बुद्धि की उसे दरकार होती है। और अंत में वह अपने ऊपर से नियंत्रण खो देती है और उसको संचालित करने वाली ताकतें ही उसकी दिशा तय करती हैं। ऐसे में अगर निहित स्वार्थी ताकतों का कोई गिरोह उसकी अगुआई करने लगे तो भला उसे कहां लेकर जाएगा उसका सिर्फ और सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। लिहाजा इस तरह के किसी भी अंधविश्वास को समर्थन देना या फिर उसे किसी भी तरह की छूट देना न केवल देश बल्कि पूरे समाज के लिए खतरनाक है। यहां तक कि संविधान में भी इस बात को पूरी ताकत के साथ कहा गया है कि सरकार समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को स्थापित करने की कोशिश करेगी और उसके लिए हर जरूरी पहल करेगी। वह न केवल अंधविश्वास को खत्म करेगी बल्कि उसके लिए सचेतन तौर पर पूरे देश में अभियान संचालित करेगी। 

यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि आस्था बहुत कमजोर होती है। और अगर कोई भूल से उसका शिकार हो गया है तो ऐसे समय में क्या किया जाना चाहिए। मसलन सोशल मीडिया पर एक तस्वीर घूम रही है जिसमें कंगारू के शेप वाले एक डस्टबिन की लोगों ने पूजा शुरू कर दी। अब इसमें उनकी आस्था को सम्मान देने के नाम पर डस्टबिन को देवता का दर्जा तो दिया नहीं जा सकता है? ऐसे में उन्हें इसकी सच्चाई के बारे में बताने और समझाने की जरूरत है न कि उनकी कमजोर आस्था के दोहन के जरिये उसे ईश्वरीय दर्जा देकर धर्म के धंधे को आगे बढ़ा दिया जाए।

रही बात विवाद खोजने की तो उसके हजार बहाने हैं। आज फव्वारे को लिंग घोषित किया गया है। यह नहीं होगा तो कल वहां पड़े किसी लोहे के सामान को लिंग घोषित कर दिया जाएगा। आप ताकतवर हों तो कुछ भी अपने मुताबिक मनवाया और लागू करवाया जा सकता है। भौतिक तौर पर न मिले तो कल्पना का सहारा लेकर यह कहा जा सकता है कि वहां किसी खास स्थान पर कोई चीज लगी थी जिसे हटा दिया गया। और फिर उसको लेकर वितंडा खड़ा किया जा सकता है। ऐसे में अगर सरकार, कोर्ट और तमाम संस्थायें आपके साथ हों फिर तो कुछ भी बहुत आसान हो जाता है।

लेकिन यहां एक बात ध्यान देने की है अगर इतिहास की कब्र में उतरेंगे तो उसमें बात मुगलों तक ही नहीं जाएगी। फिर उसके पीछे बौद्धों तक जा सकती है और उससे भी पीछे सिंधु घाटी सभ्यता तक की बात हो सकती है। और फिर इस कड़ी में तमाम ऐसे लोग जो मुगलों पर आक्रमणकारी होने का आरोप लगा रहे हैं वह खुद उन्हीं की कतार में खड़े मिलेंगे। हमें नहीं भूलना चाहिए कि आर्य बाहर से आए थे और उन्होंने यहां की एक बसी-बसाई सभ्यता को नष्ट किया था। इसलिए गड़े मुर्दों को उखाड़ने का मतलब है इतिहास के चक्र को पीछे ले जाना इससे न तो देश का भला होगा न ही समाज का बल्कि एक तेजी से आगे बढ़ते हुए देश को पतन का नया रास्ता ज़रूर मिल जाएगा।

मैंने ऊपर प्रायोजित आस्थाओं का दौर क्यों कहा? दरअसल अब असली आस्थाओं की कोई कीमत नहीं रही। अगर होती तो बनारस में हजारों शिवलिंगों और मूर्तियों को कूड़े के हवाले नहीं किया जाता। और न ही उसके खिलाफ उठे स्वरों को दबाया जा सकता था। क्योंकि आस्थायें हैं और होंगी भी लेकिन अब उनकी कोई आवाज नहीं होगी। आवाज होगी इन प्रायोजित आस्थाओं की। यानि आस्थाओं का भी अपहरण कर लिया गया है। 

अब उन्हीं आस्थाओं पर बहस होगी जिनमें सत्ता और संघ की रुचि होगी। और इसके साथ ही आस्थाओं के उन परंपरागत प्रतीकों को भी बाजार के हवाले कर उनसे पैदा होने वाली श्रद्धाओं को खत्म कर दिया जाएगा। जैसा कि बनारस में हुआ। काशी कोरिडोर भले बना लेकिन वह आस्था नहीं रही। उसमें भव्यता है, वैभव है, दिखावापन है लेकिन आस्था नहीं है। वहां बाजार है। मॉल है। होटल और व्यापार है। लेकिन श्रद्धा नहीं है। ऐसे में अगर इन स्थानों से आस्थायें निकाल दी जाएंगी तो फिर श्रद्धालु कहां बचेंगे? अगर कुछ बचेगी तो वह उन्मादी भीड़, जो सब कुछ ध्वस्त करने के लिए तैयार है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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