आजादी की लड़ाई के विरोधी और अंग्रेजी हुकूमत के पैरोकार भला कैसे हो सकते हैं देशभक्त

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आज की तारीख में उन क्रांतकारियों की आत्मा रो रही होगी, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले उन समाजवादियों की आत्मा भी आहत होगी, जिन्होंने देश में स्वराज का सपना देखा था। आज की तारीख में जब खुशहाली के रास्ते जाना चाहिए था ऐसे में भावनात्मक मुद्दे समाज पर हावी हैं। जो लोग आजादी की लड़ाई और आजादी के विरोधी थे, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत भाती थी वे आज न केवल आजाद भारत की सत्ता पर काबिज हैं बल्कि देश के संसाधनों पर कब्जा कर बैठे हैं। आजादी के लिए सब कुछ लुटा देने वाले क्रांतिकारियों के परिजन फटेहाल और गुरबत की जिंदगी काट रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस पर इन दिखावे के राष्ट्रवादियों का ढकोसला देखने को मिलेगा। देखिएगा कैसे देश के सबसे बड़े देशभक्त होने का दावा किया जाएगा। 370 धारा खत्म करने के बाद इस स्वतंत्रता दिवस पर कैसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को देश के सबसे बड़े नायक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।
आजादी की लड़ाई के इतिहास का अध्ययन करें तो यह वह शख्स था जो अंग्रेजी हुकूमत में विश्वास रखता था और आजादी की लड़ाई की मुखालफत करता था। बंगाल में संविद सरकार में उप मुख्यमंत्री रहते हुए जो पत्र इस व्यक्ति ने अंग्रेज गवर्नर को लिखा था। वैसा कम से कम कोई देशभक्त नहीं कर सकता है। मोदी सरकार के धारा 370 हटाने के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे उस पत्र को पढ़ने से स्पष्ट हो रहा है कि मुखर्जी न केवल आजादी की लड़ाई के विरोधी थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के पैरोकार भी थे। 26 जुलाई 1942 को लिखे मुखर्जी के उस पत्र के आधार पर अंग्रेजों के रहमोकरम पर मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने मिलकर बंगाल में संविद सरकार बनाई थी। उस समय हिंदू महासभा के अध्यक्ष सावरकर और मुस्लिम लीग के मो. अली जिन्ना थे। 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ा गया तो बंगाल में संविद सरकार के मुख्यमंत्री फजल उल हक और उप मुख्यमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।
महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे बड़े नेताओं को तो अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था। उस समय के युवा समजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण की अगुआई में समाजवादी भूमिगत रहकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ युद्ध छेड़े थे। तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने यह पत्र लिखा था। पत्र में उन्होंने अंग्रेज गवर्नर से कहा था कि किसी भी सूरत में इस आंदोलन को कुचलना है। उस समय मुखर्जी ने अंग्रेजी हुकूमत की पैरवी करते हुए अंग्रेजों को भारत के लिए अच्छा बताया था। वह उस समय आजादी की लड़ाई की जरूरत नहीं समझते थे। उन्होंने कसम खा ली थी कि किसी भी सूरत में वह आंदोलन को बंगाल में घुसने नहीं देंगे। मतलब श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। यदि वह देशभक्त होते तो सरकार से इस्तीफा देकर आंदोलन में कूद पड़ते। वह किसी पार्टी और नेता का आंदोलन नहीं बल्कि जनता का आंदोलन था।
इस पत्र के पढ़ने से जनसंघ, आरएसएस और भाजपा का चेहरा पूरी तरह से बेनकाब हो जाता है। मौजूदा हालात में इन संगठनों के जितने भी नेता हैं ये सब श्यामा मुखर्जी को अपना आदर्श मानते हैं। धारा 370 हटाने के बाद तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी को देश का सबसे बड़ा नायक साबित किया जा रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यदि ये लोग मुस्लिमों को नकार कर देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के पक्ष में रहे हैं तो फिर मुस्लिम लीग से मिलकर बंगाल में संविद सरकार क्यों बनाई थी ? यदि बंटवारे का जिम्मेदार महात्मा गांधी और नेहरू को मानते हैं तो फिर जिन्ना से दोस्ती कैसी ?
चाहे जनसंघ हो, आरएसएस हो या फिर भाजपा इन संगठनों के क्रियाकलापों और गतिविधियों से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि ये लोग अंग्रेजों को देश का हितैषी औेर मुगलों को घातक मानते रहे हैं। अक्सर इन लोगों को यह कहते सुना जाता है कि अंग्रेजों ने तो भारत में आकर देश पर अहसान ही किया है। अंग्रेजों  ने ही देश की सत्ता से मुगलों को बेदखल किया है। आज की परिस्थितियों में भी हिंदू सेना को महाराना विक्टोरिया को श्रद्धांजलि देते हुए देखा गया।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि श्यामा प्रसाद को अपना आदर्श मानने वाले आज सत्ता में बैठे राष्ट्रवाद का राग अलापने वाले ये लोग कैसे देशभक्त हो सकते हैं ? जिनके आदर्श अंग्रेजी हुकूमत के पक्षधर थे। आजादी की लड़ाई के प्रबल विरोधी थे। नतीजतन उनके अनुयायी देशभक्त कैसे हो सकते हैं ?
ये सब लोग हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्षधर रहे हैं। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि संविधान के रहते देश को हिंदू राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता है। यह सुप्रीम कोर्ट का भी कथन है कि संविधान के मूल को नहीं छेड़ा जा सकता है। जमीनी हकीकत यह है कि आज यदि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं तो इस संविधान और आजादी की वजह से। आज यदि पाकिस्तान को ललकार रहे हैं तो इस आजादी और संविधान की वजह से ही। विश्व का भ्रमण कर रहे हैं तो हिंदुत्व की वजह से नहीं बल्कि आजाद भारत के इस संविधान के रहमोकरम पर।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि  इन लोगों से संविधान की गरिमा को बचाये रखने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? कैसे धर्मनिपरपेक्ष ढांचे को बचाये रखा जा सकता है ?  ये वे लोग हैं जिनके आदर्श अंग्रेजी हुकूमत के कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे । इनमें अधिकतर वे लोग हैं, जिन्होंने उन क्रांतिकारियों की मुखबिरी की थी जो देश की आजादी की लड़ाई के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। आजादी की लड़ाई में एक भी जगह ऐसी नहीं मिलेगी जिसमें इन लोगों ने खुलकर अंग्रेजों से बगावत की हो। यदि लड़ाई लड़ी भी तो बाद में टूट गये। यहां तक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और सावरकर के अंग्रेजी यातनाओं के सामने टूटने की बातें सामने आती है। सावरकर ने तो बाकायदा महारानी विक्टोरिया को पत्र लिखा था कि ये जो युवा आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं ये भटक गये हैं। हम लोग इन्हें समझाकर रास्ते पर ले आएंगे। और अंडमान की जेल से छूटने के लिए उन्होंने इस तरह के 6 पत्र लिखे थे।
आजाद भारत में 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई तो समाजवादियों के साथ ही बड़े स्तर पर संघी भी जेलों में डाल दिये गये थे। तब जो आंदोलनकारी इंदिरा गांधी से माफी मांग ले रहे थे, उन्हें छोड़ दिया जा रहा था। तब भी अधिकतर संघी इंदिरा गांधी से माफी मांगकर जेल से बाहर आ गये थे। हां, लाल कृष्ण आडवाणी ने इंदिरा गांधी से माफी नहीं मांगी थी। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वास्थ्य का बहाना बनाकर खुद को एम्स में जरूर शिफ्ट करवा लिया था।
मात्र भारत माता की जय बोल देने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता है। देशभक्ति के लिए देश के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है। जनता के लिए संघर्ष करना पड़ता है। देश के लिए मरना-मिटना पड़ता है। ये जितने भी लोग आज की तारीख में सत्ता पर काबिज हैं ये किसी बड़े आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल नहीं रहे। भले ही सत्ता में बैठे लोग राष्ट्रवाद का ढकोसला पीटते घूम रहे हों पर आप सर्वे कर लीजिए इन लोगों में से बहुत कम के बच्चे आपको सेना में दिखाई देंगे। बहुत कम खेती करते देखे जाएंगे। अधिकतर या तो बड़े पदों पर सुशोभित हैं या फिर व्यापार कर देश के संसाधनों को लूट रहे हैं। कारपोरेट घरानों को देश के संधाधनों का जमकर दोहन करा रहे हैं। जिन किसानों और मजदूरों के बेटे सरहदों की रक्षा कर रहे हैं। रात दिन मेहनत कर लोगों के लिए अन्न उपजा रहे हैं, उन लोगों को तो ये लोग दोयम दर्जे का नागरिक समझते हैं। देश में जितने भी काम हो रहे हैं बस संपत्तिशाली लोगों के लिए हो रहे हैं।

सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों पर आये दिन बलात्कार, यौन शोषण के आरोप लग रहे हैं। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने पर बस एक बात ही रटी रटाई बोली जा रही है कि अब ये लोग कश्मीर से दुल्हन ला सकेंगे। मतलब आज की तारीख में भी भगत सिंह के उस कथन को चरितार्थ कर रहे हैं जिसमें उन्होंने आरएसएस को मानसिक रोगियों का संगठन करार दिया था।
इन लोगों के संगठन और क्रियाकलापों से तो यही लगता है कि इनका एकमात्र काम देश और समाज में सांप्रदायिकता फैलाना है। यही वजह है कि ये मुस्लिमों के खिलाफ आग उगलते रहे हैं। हां सत्ता के लिए मुस्लिम इनके हो जाते हैं। जैसे हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग से मिलकर आजादी से पहले बंगाल में संविद सरकार बनाई थी उसी ही तरह आज की तारीख में भाजपा भी तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं के वोट हासिल करने के लिए हर हथकंडा अपना रही है। मुस्लिमों को गले लगा रही है, भले ही वह दिखावा हो।

राष्ट्रवादी होने के लिए हर वर्ग, हर जाति और हर धर्म को साथ लेकर देश का विकास करना होता है। मॉब लिंचिंग,  बलात्कार, बेरोजगारी, किसान आत्महत्या, निजी संस्थाओं में शोषण और दमन जैसे मुद्दे पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न कोई ट्वीट करते हैं और ही कभी इन मुद्दों पर जुबान खोलते हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाये गये सभी तंत्रों को बंधुआ बनाकर राष्ट्रवादी नहीं बना जा सकता है। सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को किसी भी सूरत में दबाने को लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है। सत्ता में बैठे भ्रष्ट नेताओं को संरक्षण देने और विपक्ष के भ्रष्ट नेताओं को सरकार में ले लेने से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल देश और समाज के लिए न कर पार्टी और सत्ता के लिए करने को राष्ट्रवाद नहीं कह सकते हैं। 

(लेखक चरण सिंह पेशे से पत्रकार हैं और आजकल नोएडा से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं।)

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