Tue. Nov 19th, 2019

नियुक्तियों के माध्यम से न्यायिक स्वतंत्रता को रौंद रही है सरकार: जस्टिस मदन बी लोकुर

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रिटायर्ड जस्टिस मदन बी लोकुर।

क्या उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को असंवैधानिक घोषित किये जाने के बावजूद आज भी उसका अघोषित अस्तित्व बना हुआ है और उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्तियां असंवैधानिक एनजेएसी के ही माध्यम से हो रही हैं। बस फर्क यह है कि प्रस्तावित एनजेएसी में चार लोग यानि चीफ जस्टिस अध्यक्ष के रूप में कानून मंत्री पदेन सदस्य, पैनल में दो और प्रतिष्ठित व्यक्ति होने थे लेकिन अब दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों के बिना यह काम कर रही है। यह गम्भीर आरोप हम नहीं लगा रहे हैं बल्कि तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली को प्रेस कांफ्रेंस करके तीखी आलोचना करने वाले चार जजों में से एक जस्टिस मदन बी लोकुर (अवकाश प्राप्त) ने लिखत पढ़त में लगाये हैं।   

उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस मदन लोकुर ने आरोप लगाया है कि सरकार नियुक्तियों के माध्यम से न्यायिक स्वतंत्रता को रौंद रही है। जस्टिस मदन लोकुर ने कहा है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सरकार को अधिक अधिकार देने का एक प्रस्तावित सुधार था, जो कि असंवैधानिक होने के रद्द हो गया लेकिन केंद्र सरकार के व्यवहार के कारण आज भी किसी न किसी रूप मे प्रभावी है।

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जस्टिस लोकुर ने कहा कि मौजूदा सरकार द्वारा 2015 में पारित एनजेएसी को उसी वर्ष उच्चतम न्यायालय द्वारा असंवैधानिक पाए जाने पर निरस्त कर दिया गया था। चीफ जस्टिस  की अध्यक्षता में  एनजेएसी में केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री एक पदेन सदस्य के रूप में तथा दो प्रतिष्ठित व्यक्ति पैनल में होने का प्रस्ताव था। उन्हें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानांतरण की सिफारिश करनी थी। एनजेएसी की असंवैधानिकता की घोषणा के बावजूद, मेरा मानना है कि अब इसके प्रमुख कार्य पैनल के दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों के बिना एक निकाय द्वारा की जा रही है। (इसको दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अब चीफ जस्टिस और कानून मंत्री मिलकर न्यायपालिका में नियुक्तियां कर रहे हैं।)

द इंडियन एक्सप्रेस में बुधवार को प्रकाशित एक ऑप-एड लेख में, जस्टिस लोकुर ने कहा कि असंवैधानिक एनजेएसी को दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों की सलाह की अब आवश्यकता नहीं है। दरअसल, एनजेएसी को वापस लाने के लिए अब संविधान में संशोधन की भी आवश्यकता नहीं है। यह अघोषित रूप से अस्तित्व में है। वर्तमान समय में, इन गम्भीर और चिंतनीय मुद्दों पर चुप्पी उचित नहीं है।

जस्टिस लोकुर ने कई मामलों का हवाला दिया जिसमें सरकार ने उच्चतम न्यायालय के उस कॉलेजियम द्वारा की गई नियुक्तियों को खारिज कर दिया, जो भारत में उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्तियां करता है। इनमें से कई मामलों में, कुछ न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को बिना किसी स्पष्टीकरण के अस्वीकार कर दिया गया लेकिन फिर उन्हें किसी और हाईकोर्ट में नियुक्त कर दिया गया गया। जस्टिस लोकुर ने कहा कि फाइल में दर्ज़ किये गए कारणों का पता नहीं है लेकिन अगर उनका खुलासा किया जाता यह निश्चित रूप से संस्था के हित में होता। यदि कोई न्यायाधीश आंध्र प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अयोग्य या अनुपयुक्त था, तो वह गुजरात के लिए उपयुक्त कैसे हो गया?

जस्टिस लोकुर ने ऐसे कई उदाहरणों का हवाला दिया जिसमें सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिशों को नहीं माना। जस्टिस लोकुर ने अगस्त के अंत में अख़बारों में छपी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत के चीफ जस्टिस ने कानून मंत्री को लिखा था कि कॉलेजियम द्वारा की गई 43 सिफारिशें सरकार के पास लंबित हैं और उच्च न्यायालयों में रिक्तियां लगभग 37 प्रतिशत हैं। “इसके अलावा, कोलेजियम 10 व्यक्तियों की नियुक्ति पर विचार नहीं कर सकता क्योंकि सरकार ने उनसे सम्बन्धित कुछ जानकारिया नहीं भेजी। इससे यही निष्कर्ष निकल रहा है कि न्यायिक नियुक्तियों में सरकार की ही चल रही है।  

जस्टिस लोकुर ने कहा कि जिस तरह से मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश वीके ताहिलरमानी के प्रस्तावित स्थानान्तरण को लागू किया गया उस पर भी सवाल उठाया। कॉलेजियम ने ताहिलरामनी को मेघालय उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया, यह कदम उनके पदावनत होने के समकक्ष के रूप में लिया गया। लोकुर ने कहा कि वह इस सवाल पर विचार नहीं कर रहे हैं कि क्या स्थानांतरण होना चाहिए था, लेकिन इसको लेकर जो चर्चाएं थीं उसे बता रहे हैं। विशेष रूप से, जस्टिस लोकुर ने उन प्रेस में रिपोर्टों का हवाला दिया जिसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा ताहिलरमानी के प्रोफाइल को उद्धृत किया गया था। लोकुर ने टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने केंद्रीय जांच ब्यूरो को इंटेलिजेंस ब्यूरो की उस रिपोर्ट पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने को कहा है जिसमें जस्टिस ताहिलरमानी द्वारा चेन्नई के बाहरी इलाके में दो फ्लैटों की खरीद की जानकारी दी गयी है। सीबीआई कथित तौर पर यह देखेगी कि क्या जस्टिस ताहिलरमानी ने आधिकारिक दस्तावेजों में उक्त दोनों संपत्तियों की घोषणा की थी?

जस्टिस लोकुर ने सवाल उठाया है कि क्या आईबी पर आंख बंद करके विश्वास किया जाना चाहिए? क्या भारत के चीफ जस्टिस को अंधेरे में रखा गया था की जस्टिस ताहिलरमानी की जासूसी की जा रही थी ? कितने अन्य न्यायाधीशों पर जासूसी की जा रही है? क्या यह कुछ असामान्य और भयावह नहीं है कि न्यायाधीश, जिनसे  बिना किसी भय या पक्षपात के निर्णय देने की अपेक्षा की जाती है, उनकी  आईबी से निगरानी करायी जाती है। क्या न्यायाधीशों की स्वतंत्रता की गारंटी इन परिस्थितियों में दी जा सकती है?

जस्टिस लोकुर ने जस्टिस विक्रम नाथ के मामले का भी उदाहरण दिया जिनके नाम की अप्रैल में कोलेजियम द्वारा आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सिफारिश की गई थी। लेकिन कुछ समय बाद, सरकार ने पुनर्विचार के लिए सिफारिश को वापस भेज दिया। 22 अगस्त को कॉलेजियम ने फ़ाइल में बताए गए कारणों के आधार पर सिफारिश पर पुनर्विचार किया और गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति की सिफारिश की। फ़ाइल में दिए गए कारणों को नहीं बताया गया लेकिन यह निश्चित रूप से संस्था के हित में होता यदि उनका खुलासा किया जाता।

यदि एक न्यायाधीश आंध्र प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अयोग्य या अनुपयुक्त था , तो वह गुजरात के लिए कैसे उपयुक्त हो गया ? (अर्थात जिसको सरकार या कानून मंत्री जहां चाह रहे हैं वहां चीफ जस्टिस के सहयोग से नियुक्त कर रहे हैं)
जस्टिस लोकुर ने एक अन्य उदाहरण गुजरात उच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस अकील कुरैशी का दिया, जिन्हें मई में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की गई थी जस्टिस अकील कुरैशी “अंदाज़ा लगाओ? सरकार ने कुछ आपत्तियों के साथ 23 और 27 अगस्त को चीफ जस्टिस  को दो सूचनाएं भेजीं। इसके बाद कॉलेजियम ने 5 सितंबर को अपनी सिफारिश को संशोधित किया और जस्टिस अकील कुरैशी की त्रिपुरा हाईकोर्ट में नियुक्ति की सिफारिश कर दी। इसका भी कोई कारण नहीं बताया गया।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं साथ ही कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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