उदय प्रकाश की नजर से देखिए क्रिकेट के बहाने समाज, राजनीति, बाजार, नस्ल और देशों के बीच रिश्तों की नई दुनिया

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अगर भू-भौगोलिक राजनीतिक दृष्टि से देखें, तो ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच का यह सेमिफाइनल ही असल में वर्ल्ड कप का फ़ाइनल था। 
उसी तरह जैसा भारत और पाकिस्तान के बीच का कोई भी मैच हुआ करता है। चाहे लीग मैच ही क्यों न हो। एजबेस्टन का पूरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था, पुराने ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच का मुक़ाबला देखने के लिए। क्रिकेट की मुख्यधारा का इतिहास ही यूरोप में इन दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच के समर से बना है। उसी तरह जैसे हमारे उपमहाद्वीप में भारत और पाकिस्तान के बीच, पहले हॉकी और बाद में क्रिकेट का मुक़ाबला। मैच बिल्कुल एकतरफ़ा था। बोरिंग। कहीं कोई मुक़ाबला ही नहीं। 
मेरा भी मन उचटा हुआ था। बचपन से रेडियो कमेंट्री फिर स्कूल और कॉलेज के शुरुआती दिनों में इस खेल में खिलाड़ी की तरह शामिल होना। बहुत पुरानी स्मृतियां हैं, यह जानते हुए भी कि जिस ब्रिटिश साम्राज्य ने हमारे देश को अपना उपनिवेश बनाया, उसी ने यह खेल भी दिया। सच कहें तो उसी अंगरेजी राज ने हमें कॉलेज, अख़बार, पत्रकार और हिंदी खड़ी बोली दी, जो आज भी पहले जैसे ही ‘कोलोनियल’ हैं और खड़ी बोली तो ख़ैर, आज ‘राज भाषा’ है।

क्या मनोरंजक विरोधाभास है, जिस लीग मैच में भारत के जीतने के लिए पाकिस्तान में प्रार्थनाएं की जा रहीं थीं, सेमिफाइनल में न्यूज़ीलैंड से भारत के हारने पर कश्मीर में जश्न मनाया गया। 
क्या निष्कर्ष निकालेंगे? 
क्या सांप्रदायिकता, राष्ट्रवाद, वैश्विक पूंजी और उससे जन्म लेने वाली मेटा-नेशनलिज्म (महा-राष्ट्रवाद) और सार्वभौमिक नस्लवाद (हमारे यहां वर्णवाद या जातिवाद) का कोई रिश्ता बनता है? टीवी के चैनल देखिये, विखंडित करिये, विश्लेषित करिये, बहुत कुछ साफ होता जायेगा। 
भाजपा के बरेली से विधायक की उच्च सवर्ण बेटी ने एक दलित युवा से जिस मंदिर में विवाह किया, उसके महंत का नाम एक कूट है। महंत का नाम है – परसुराम सिंह। 
जैसे कोई नाम हो – नाथूराम गांधी।  
यह ‘आर्टिकल 15’ के दौर की घटना है।

पता नहीं क्यों, कल से मुक्तिबोध की एक पंक्ति बार-बार गूंज रही है -‘ब्रह्म राक्षस गांधी जी की चप्पल पहने घूम रहे हैं।’

कमलेश्वर जी ने एक उपन्यास लिखा था- ‘कितने कितने पाकिस्तान’, जिस पर उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया। अब अगर कोई लिखे- ‘कितने कितने कश्मीर’, …तो ?

लता मंगेशकर जी का ट्वीट दिलचस्प है और बहुत संकेतक – ‘धोनी, तुम रिटायर मत होना ‘।

अब लॉर्ड्स में मुक़ाबला वैसा ही है, जैसा कोई भी फ़ौरी समकालीन मुक़ाबला मुमकिन हो सकता है। 
ब्रिटिश साम्राज्य, जिसका सूरज कभी नहीं डूबता था और जिसे पहली बार दक्षिण एशिया के इसी हमारे उपमहाद्वीप के बूढ़े, निहत्थे, महान गुजराती बनिये ने डुबाया, उसी ब्रिटिश राज के पुराने ‘कालापानी’ में ऑस्ट्रेलिया भेजे गये उन्हीं की संतानों ने उसी पुराने पुरखों को सेमिफ़ाइनल में हराया।

बरेली के विधायक के साथ भी यही हुआ।

परसुराम सिंह बहुत अजीब सा, रहस्यभरा व्यक्तिवाचक संज्ञा (encrypted proper noun) है।

अब नाथूराम गांधी भविष्य में होंगे या परसुराम सिंह ?

हमारे समय की महान लोकगायिका लता मंगेशकर, जिनके पूर्वजों का इतिहास मौजूदा शासकों के सबसे सहजात और प्रामाणिक जीवन-स्रोत का प्रतीक है, उन्हीं का यह ट्वीट , गुलज़ार के गीत के ज़रिये -‘धोनी तुम रिटायर मत होना ‘ एक गैब या ट्रांस या इलहाम में आयी कोई भविष्यवाणी है क्या?

जनसांख्यिकी की पूरी बायो-जेनेटिक केमिस्ट्री बदल रही है। 
एंजेला सैनी की अत्यंत चर्चित किताब, ‘सुपीरियर’ पढ़ना शुरू किया है। परसों ही ई-बुक हासिल हुई है। बहुत कुछ समझ में आता है, जैसे – अगर नस्लवाद को समझना हो तो एंथ्रोपोलोजी या बायोजेनेटिक्स की किताबें नहीं, पॉवर पॉलिटिक्स को पढ़ना-समझना चाहिए। (नस्ल की जगह ‘जाति’ पढ़ लीजिये।)

ध्यान रखें, हमारे समय का जो ‘नायक’ इतने विशाल बहुमत के साथ केंद्रीय सत्ता पर आता है, उस पर उस विशाल ‘बहुमत’ का उतना ही बड़ा दबाव भी होता है। 
यह कोई नहीं जानता। 
यहां तक कि वह ख़ुद भी। 
सदा एक कालजयी उत्तरपर्व प्रतीक्षा करता रहता है।

क्या होगा मीडिया और बाक़ी तीनों स्तंभों का, समय जल्द बतायेगा।

जनता ही जनार्दन होती है।

दिखने लगे और साफ…. तो सब कुछ ज़रा साफ हो।

लॉर्ड्स का मैच अब क्रिकेट के विशेषज्ञ और बेटिंग-फिक्सिंग करने वाले सटोरिये देखेंगे। 
इसमें कमाई करने वाले वे भी हो सकते हैं, जो हमारे देश के बैंकों को लूट कर फ़रार हैं।

टैक्स देते रहिये।
जय जय बोलते रहिये।

(क्रिकेट और उसके बहाने दूसरे पक्षों पर की गयी साहित्यकार उदय प्रकाश की यह रोचक टिप्पणी उनकी फेसबुक वाल से साभार ली गयी है।)

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