बीच बहस

बीजेपी के खिलाफ वोट करके लोग अपनों को देंगे श्रद्धांजलि!

दुनिया में डेल्टा प्लस वायरस के खतरे की घंटी बज चुकी है। और यह भारत में भी प्रवेश कर चुका है। बताया जा रहा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में इससे जुड़े 50 से ज्यादा मामले पाए गए हैं। इतना ही नहीं अमेरिका, जापान, इंग्लैंड, नेपाल से लेकर दुनिया के तमाम देशों में इसके अब तक कुल 200 से ज्यादा मामले सामने आए हैं। अमेरिका और यूरोप लाखों अपनों को खोने के बाद अब कोई लापरवाही नहीं बरतना चाहते। यही वजह है कि वहां बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन का अभियान चल रहा है। और अमेरिका में तो एक बड़े हिस्से का वैक्सीनेशन भी हो गया है। जिस आबादी के लिए अब मास्क पहनकर चलना जरूरी नहीं रह गया है। और ट्रम्प कालीन पिछली भूलों से सबक लेते हुए डेल्टा जैसे किसी नये म्यूटेंट से निपटने की वहां तैयारी का आलम यह है कि मामला सामने आते ही संक्रमित शख्स को क्वारंटाइन कर दिया जाएगा। और क्वारंटाइन की शक्ल जरूरत पड़ने पर एक और समाज के तैयार करने की हद तक जा सकती है। लेकिन भारत में जबकि तीसरी वेव के आने की बात शुरू हो गयी है।

एम्स के निदेशक रनदीप गुलेरिया ने तो यहां तक चेतावनी दे डाली है कि अगर कोरोना संबंधी व्यवहार और अनुशासन का पालन नहीं किया गया तो वह अगस्त में ही नमूदार हो सकती है। हालांकि दुनिया के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने इसके अक्तूबर में आने की आशंका जताई है। साथ ही कहा है कि वह पहली दोनों से ज्यादा तीव्र और खतरनाक हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए हमारे यहां क्या तैयारी हो रही है? वह कोई नहीं जानता। गुलेरिया ने भी यह जो भविष्यवाणी की है वह किस आधार पर की है? विशेषज्ञों की कौन कमेटी है जो इस नतीजे पर पहुंची है? वह काम कैसे कर रही है और कौन-कौन लोग उसमें शामिल हैं? कहीं कोई जिक्र नहीं है। यहां सब कुछ हवा में चल रहा है। और अगर कुछ चल भी रहा है तो उसे बताया नहीं जा रहा है। जो कुछ भी है वह पारदर्शी नहीं है। ऐसी स्थिति में तमाम तरह की आशंकाओं को बल मिल जाता है। बहरहाल अमेरिका और पश्चिमी देशों की तैयारियों के मुकाबले हम कहां खड़े हैं यह एक मौजूं प्रश्न बन जाता है। होना तो यह चाहिए था कि जिस स्वास्थ्य व्यवस्था के इंफ्रास्टक्चर की कमी के चलते हमें लाखों की संख्या में अपनों को खोना पड़ा है।

उसको दुरुस्त करने के लिए ऊपर से लेकर नीचे तक अभियान चलाया जाता और सरकारों का यह एकसूत्रीय मंत्र होना चाहिए था। लेकिन केंद्र समेत क्या किसी सरकार ने इस दिशा में पहल की? कोरोना से निपटने के नाम पर सिर्फ वैक्सीनेशन का अभियान चलाया जा रहा है। और उस अभियान की भी सच्चाई यह है कि अभी तक देश में कुल 3.6 फीसदी लोगों को ही वैक्सीनेट किया जा सका है। लेकिन आप के सामने यह डाटा आएगा ही नहीं और आप सवाल भी नहीं करेंगे। ऊपर से आपका मुंह एक दिन में 80 लाख लोगों के टीकाकरण के कथित रिकॉर्ड के जरिये बंद कर दिया जाएगा। जबकि उसकी भी सच्चाई यह है कि विभिन्न राज्यों में रोजाना नियमति होने वाले टीकाकरण को रोक कर उसके इंजेक्शन को रिकार्डधारी दिन के लिए बचा लिया गया था। और फिर उसी को रिकार्ड बनाने में इस्तेमाल कर लिया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर सरकार सचमुच में दिसंबर तक देश में पूर्ण टीकाकरण करना चाहती है तो उसे रोजाना इस रिकार्ड वाले आंकड़े को हासिल करना होगा। लेकिन क्या ऐसा हो रहा है या फिर उसे हासिल करने की कोशिश की जा रही है? ऐसा कुछ भी नहीं है। देश के सर्वोच्च इवेंट मैनेजर ने एक दिन में 80 लाख टीकों के लक्ष्य को हासिल कर यह बता दिया कि अब आप उसी के ख्वाब में बने रहिए। और टीकाकरण के पूरे अभियान को सफल मानकर बैठ जाइये।

मौतों का रिकॉर्ड तोड़ने वाले यूपी ने उसे छुपाने के मामले में भी रिकॉर्ड तोड़ा है। हालांकि लाख कोशिशों के बाद भी योगी सरकार इसमें सफल नहीं रही। गंगा में तैरती लाशों और किनारे की कब्रों ने पहले ही इस सच्चाई को नंगा कर दिया था और अब ग्राउंड स्तर से आ रही अलग-अलग मीडिया रिपोर्टें उसे तथ्यात्मक जामा पहनाने का काम कर रही हैं। आर्टिकल 14 के हवाले से सामने आयी रिपोर्ट ने 24 जिलों के सच को बाहर कर दिया है। जिसमें पिछले साल के मुकाबले 1700 फीसदी और 43 गुना ज्यादा मौतों में बढ़ोत्तरी की बात कही गयी है। एक पत्रकार ने इसके मुताबिक पूरी यूपी में होने वाली मौतों की संख्या 8 लाख के करीब बताया है। ऊपर से लोगों के छिने रोजगार और घर-घर फैली भूख किसी सरकार के लिए प्राथमिक एजेंडा होता। और कुछ नहीं कर पाती तो जिन लोगों की हम सम्मान से विदाई नहीं कर सके उनके लिए एक दिन का शोक या दो मिनट का मौन तो रख ही सकते थे। लेकिन यह सरकार है कि खुद भी सब कुछ भूल जाना चाहती है और दूसरों से भी आशा करती है कि वो अपनों को भूल जाएं। लिहाजा अपनी सारी जिम्मेदारियों से निजात हासिल कर और सबको एक बार फिर नफरत और घृणा के नशे में डुबो देने के लिए उसने सांप्रदायिकता के अभियान को तेज कर दिया है।

यूपी इस समय बीजेपी के एजेंडे में है। लखनऊ और दिल्ली के बीच उजागर हुई लड़ाई के बावजूद दोनों यह जानते हैं कि 2022 उनके लिए कितना जरूरी है। लिहाजा दोनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। और किसी भी विपक्षी पार्टी से पहले वो चुनावी मूड में आ गए हैं। और इसकी कमान सीधे-सीधे संघ ने संभाल ली है। योगी सरकार के पास उपलब्धियों के नाम पर दिखाने के लिए कुछ नहीं है। लिहाजा संघ ने अपनी पूरी ताकत सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दिशा में झोंक दी है। और यह काम केवल यूपी में नहीं बल्कि पूरे देश के स्तर पर संचालित किया जा रहा है। क्योंकि उसका मानना है कि देश में किसी भी तरह का सांप्रदायिक उन्माद यूपी के चुनाव के लिए फायदेमंद साबित होगा। लिहाजा उसने अपने जहर का पिटारा खोल दिया है। केंद्रीय रूप से धर्मांतरण और जनसंख्या वृद्धि को मुद्दा बनाया जा रहा है। जिसके जरिये अल्पसंख्यक उसके सीधे निशाने पर होंगे।

धर्मांतरण के एक मामले में जामिया के एक मौलाना की गिरफ्तारी इसी का संकेत हैं। और इसके अलावा जगह-जगह से धर्मांतरण के झूठे या सही मामले उद्गारे जाएंगे। और इस काम में किसी और से ज्यादा राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल किया जाएगा। एक ऐसे समय में जबकि अल्पसंख्यकों के लिए अपनी जान के लाले पड़े हैं। योगी जब चाहते हैं किसी अल्पसंख्यक का घर क्या उनकी मस्जिद तक जमींदोज कर देते हैं। ऐसी डरी हुई स्थिति में क्या कोई शख्स धर्मांतरण कराने के बारे में सोच भी सकता है? और अगर कुछ लोग धर्मांतरण किए भी हैं तो वह अपनी शादी समेत दूसरी जरूरतों के लिए किए होंगे जिसको कि संवैधानिक मान्यता हासिल है। लेकिन आपदा में अवसर देखने वाली संघी जमात के लिए तो यह मौका है। कोई पूछ सकता है कि अगर कोई धर्मांतरण करता भी है तो वह उसकी अपनी मर्जी है। हिंदू धर्म से अगर कोई बाहर जा रहा है तो बजाए उन कारणों को तलाशने और उन्हें ठीक करने के दूसरे धर्म पर हमला तो विकल्प नहीं हो सकता। जिस धर्म में एक पूरी जमात को इंसान का दर्जा न हासिल हो बराबरी तो बहुत दूर की बात है क्या वह उस धर्म और उसके ढांचे में खुश रह सकता है? लिहाजा इन बुराइयों को हल करने और एक नया हिंदू समाज बनाने की जगह अपनी सड़ी गली व्यवस्था को बरकरार रख आप दूसरे धर्मों पर हमले के जरिये उसे नहीं रोक सकते हैं।

बहरहाल मैं बात कर रहा था सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की। तो यह केवल यूपी के स्तर पर नहीं बल्कि दूसरी जगहों से भी कैसे बड़ी गोलबंदी की जा सकती है उसकी तैयारी शुरू हो चुकी है। असम में मुख्यमंत्री हेमंत विश्व सर्मा का यह बयान कि दो बच्चों से ज्यादा पैदा करने वालों को सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित होना पड़ेगा। इसके अलावा कश्मीर के पंडोरा बाक्स को फिर से खोला जा रहा है। आज पीएम मोदी के साथ कश्मीर के राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की हुई बैठक कितना कश्मीर के अंदरूनी सुधार और विकास के लिए है और कितना उसके पीछे कोई बड़ी सांप्रदायिक साजिश यह देखने की बात होगी।

होना तो यह चाहिए था कि इतनी मौतों के बाद न केवल मोदी बल्कि योगी को भी अपनी कुर्सी से खुद हट जाना चाहिए था। और नहीं हटने पर उनके खिलाफ आंदोलन का ऐसा उफान खड़ा होना चाहिए था कि दोनों उसमें खुद बह जाते। जैसा कि ब्राजील में हो रहा है। बोलसोनारो के खिलाफ पूरा ब्राजील उठ खड़ा हुआ है। वहां सड़कों पर जनता का सैलाब उमड़ पड़ा है। और यह बात अब तय होने जा रही है कि बोलसोनारो कम से कम लोकतांत्रिक तरीके से तो अपनी कुर्सी पर नहीं बने रह सकेंगे। लेकिन यहां क्या हुआ दोनों नकारे नेता अभी भी देश के न केवल भाग्यविधाता बने हुए हैं। बल्कि हर तरीके से देश को अपनी मुट्ठी में लेने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि समय चला गया है या फिर ये आखिरी तौर पर जीत गए हैं। इनकी लाख कोशिशों के बाद भी लोग इनके झांसे में नहीं आएंगे। उन लोगों ने जिन्होंने अपने सगों को खोया है उनको इतनी जल्दी नहीं भूल पाएंगे। और यह बात सभी जानते हैं कि उनके एक बड़े हिस्से को बचाया जा सकता था लेकिन ऐसा अगर नहीं हो सका तो उसके लिए सत्ता में बैठे ये नेता जिम्मेदार हैं। लिहाजा अपनों के जाने का बदला लेने का वक्त आ गया है। और इनके खिलाफ यूपी में पड़ा एक-एक वोट अपनों के लिए सही मायने में श्रद्धांजलि होगी।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

This post was last modified on June 25, 2021 7:47 pm

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