Monday, December 5, 2022

जिंदा बचने के लिये अधिक बच्चे पैदा करते हैं आदिवासी, दलित और पसमांदा समाज के हाशिए के लोग

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परसों घोषित हुये राष्ट्रपति चुनाव परिणाम में आरएसएस भाजपा के संख्या बल वाली विधायिका ने द्रौपदी मुर्मू की शक्ल में एक आदिवासी महिला को देश का पहला नागरिक बना दिया। द्रौपदी मुर्मू के तीन बच्चे (2 पुत्र, 2 पुत्री) हुए लेकिन उनके 2 बेटों की अकाल मौत हो गई। जबकि छोटी बेटी की मौत बचपन में ही हो गई थी। अब बात आरएसएस चीफ मोहन भागवत की। मोहन भागवत ने जनसंख्या नियंत्रण पखवाड़े के तहत बेंग्लुरु में आयोजित 14 जुलाई को एक कार्यक्रम में उद्विकास के डार्विन के सिद्धांत ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ का उल्लेख करते हुए कहा कि योग्यतम की उत्तरजीविता (सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट) उन जानवरों पर लागू होती है, जो खाते हैं पीते हैं, और आबादी बढ़ाते हैं। 

भागवत ने कहा कि जो मजबूत है वह बच जायेगा यह जंगल का क़ानून है। मोहन भागवत का उपरोक्त बयान सीधे-सीधे देश की प्रथम नागरिक श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का अपमान है, जिन्होंने चार बच्चे पैदा किये हैं, जिनमें से अब केवल एक जीवित है। मोहन भागवत का बयान सीधे दलित, बहुजन आदिवासी अल्पसंख्यक समुदाय का अपमान है क्योंकि सबसे ज़्यादा बच्चे वही पैदा करते हैं। ये समुदाय इतने ज़्यादा बच्चे क्यों पैदा करते हैं इसका एक ही जवाब है – योग्यतम की उत्तरजीविता।  

दरअसल जनसंख्या वृद्धि का सबसे बड़ा कारण ग़रीबी और ग़रीबी से पैदा होने वाला असुरक्षाबोध है। आर्थिक और तकनीकी विकास होने के साथ ही विगत कुछ वर्षों में एक बात विशेषकर वैज्ञानिक हलकों में चर्चा के केंद्र में रही है कि मनुष्य का उद्विकास अब लगभग नहीं होने वाला है क्योंकि मनुष्य ने खुद को प्राकृतिक प्रतिकूलताओं से बचाने वाले तमाम आविष्कार कर लिये हैं। यानि अब वो प्रकृति की प्रतिकूलताओं के प्रति ढलने के लिये मजबूर नहीं बल्कि प्राकृतिक प्रतिकूलता को कृत्रिम तरीकों से अपने अनुकूल बनाने में सक्षम है। लेकिन उपरोक्त वैज्ञानिक कथन अर्द्ध-सत्य है। अर्द्ध-सत्य इसलिये क्योंकि मौजूदा उपभोगवादी व्यवस्था में तमाम सहूलियतें सिर्फ़ समाज के 20 प्रतिशत हिस्से को ही हासिल हैं। जबकि शेष 80 प्रतिशत अभी भी प्राकृतिक प्रतिकूलताओं के प्रति संघर्षरत हैं। उन्हें न तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सहूलियतें हासिल हैं न ही भौतिक विज्ञान के आविष्कारों की। 

जैव उद्विकास का चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत ‘प्रजातियों का प्राकृतिक चयन’ और ‘स्वस्थतम की उत्तरजीविता’ (सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट) पूरी तरह से आदिवासी- दलित-बहुजन समाज के लोगों पर लागू होती है। यही कारण है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, समुदायों में अधिक बच्चे पैदा करने का चलन है। जहाँ पैदा होने के साथ ही बच्चे का प्रकृति के साथ संघर्ष शुरु हो जाता है और उचित इलाज और ज़रूरी जीवनरक्षक संसाधनों के अभाव में प्रकृति द्वारा यह चयन किया जाता है कि कौन सा बच्चा जिंदा रहेगा, कौन सा नहीं। जैसे कि दलित बहुजन वर्ग के बहुतायत बच्चे ‘न्यूमोनिया’ और ‘लू’ के शिकार हो जाते हैं। जो बच जाते हैं वो आगे कुपोषण की आग में झुलसते हैं। और जीवन के अंत तक इन जातियों के बच्चे ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की होड़ में रोटी, ज़रूरी कपड़े, इलाज और मकान के लिये संघर्ष करने में जुट जाते हैं। 

केस के तौर पर एक बहुजन परिवार का अध्ययन

इलाहाबाद के पाली गांव की 56 वर्षीय राजकुमारी के 8 बेटे और 3 बेटियां पैदा हुईं। जिसमें से 6 बेटों की मौत हो गई। 3 बच्चे पेट में खराब हो गये। राजकुमारी की बड़ी बेटी उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की ढेलहा पहसीं में एक कृषि मजदूर परिवार में ब्याही गई है। 36 वर्षीय अनारकली ने 14 बच्चों को जन्म दिया। वो बताती हैं कि उनके चार बच्चे जन्म लेने के बाद मर गये। इनमें से तीन बच्चे एक साल के भीतर मर गये। जबकि चौथा बच्चा 8 साल का होकर बीमारी से मर गया। अनारकली के तीन बच्चे तो कोख में ही मर गये। 

राजकुमारी के बड़े बेटे मयाराम के 8 बच्चे हुये उसमें से एक बचा है। 7 मर गये। पैदा होते ही खत्म हो गये, कुछ पेट में ही खत्म हो गये। राजकुमारी की दूसरी बेटी राधा के 5 बच्चे हुये सब मर गये। राधा की शादी कटेहरी गांव हँड़िया जिला इलाहाबाद में एक साधारण किसान परिवार में हुई है। राधा के दो बच्चे तो मरे हुये ही पैदा हुये। जबकि तीन बच्चे जन्म के बाद नहीं जी पाये। 

वहीं राजकुमारी की जेठानी गुलाब कली के 6 बच्चे हुये। 1 बच्चा खत्म हो गया। 1 पेट में खराब हो गया। उनकी बड़ी बेटी मनोरमा के दो बच्चे खत्म हो गये 5 बच्चे हैं। गुलाब कली के बड़े बेटे दयाराम के 3 बच्चे पैदा होकर खत्म हो गये। उसके बाद 2 बच्चे बचे हैं। पिछले साल कोरोना में दयाराम की भी मौत हो गई। गुलाब कली के मझले बेटे राजेंद्र कुमार के 4 बच्चे हुये जिनमें तीन बचे। वहीं गुलाब कली की नातिन (बेटी की बेटी) ऊषा (20 वर्ष) जिसका ब्याह मुंगरा बादशाहपुर, जिला जौनपुर में हुआ है, ने पिछले साल एक बेटे को जन्म दिया था। जो एक महीने का होकर मर गया। राजकुमारी देवी की देवरानी की बेटी आरती (उम्र 25 वर्ष) के पिछले साल एक बेटा पैदा हुआ। जो पैदा होने के चार महीने बाद मर गया। 

अनारकली के पहले की पीढ़ी यानि उनकी मां, चाची, ताई मामी, बुआ की भी कई संतानें कोख से लेकर 10 साल की आयु तक मरी हैं। बता दूँ कि खुद अनारकली और उसके सभी सगे संबंधी रिश्तेदार कृषि मजदूर हैं। बच्चों और बड़ों की बीमार होने पर वो झोलाछाप (बंगाली, मद्रासी) डॉक्टर और नीम हक़ीम ओझा के पास लेकर जाते हैं। गौरतलब है कि कृषि मजदूरों को पूरे साल में सिर्फ़ गिने चुने दिन ही काम मिलते हैं ऊपर से मजदूरी भी बहुत कम मिलती है।    

पश्चिम बंगाल में बर्द्धमान की झूमा मंडल की 10 वर्षीय बिटिया जन्मजात सेरेब्रल पल्सी नामक न्यूरोलॉजिकल बीमारी से ग्रस्त है। उनकी बिटिया के ट्रीटमेंट के सिलसिले में दो वर्ष पूर्व दिल्ली कड़कड़ड़ूमा स्थित अमर ज्योति और दीन दयाल उपाध्याय इंस्टीट्यूट जाना हुआ। वहां मैंने पाया कि अधिकांश विकलांग बच्चे आर्थिक, समाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों के थे। शारीरिक और मानसिक रूप से अपंग बच्चे भी सबसे ज़्यादा दलित बहुजन और हाशिये के समुदाय के थे।

एक स्त्री के पास 15-20 साल होता है बच्चा पैदा करने का समय   

इलाहाबाद जिले के फूलपुर कस्बे में ‘प्रयाग नर्सिंग होम’ चलाने वाली गाइनकलॉजिस्ट डॉ. अपर्णा बताती हैं कि एक स्त्री के पास ठीक-ठाक 15 वर्ष होते हैं बच्चे पैदा करने के लिये। वो बताती हैं कि उनके यहां हर वर्ग समुदाय की स्त्रियां आती हैं। लेकिन फिर भी आनुपातिक तौर पर बहुजन दलित और मुस्लिम समाज की स्त्रियां ज़्यादा आती हैं। वो बताती हैं कि कथित छोटी जातियों में अपने बच्चों के जीवन को लेकर असुरक्षा का भय होता है। उनके यहां छोटे बच्चे ज़्यादा मरते हैं। इसी वजह से वो ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं। कई बार महंगाई, शिक्षा और अच्छी परवरिश का हवाला देकर टोकने पर स्त्रियां यहां तक कि उनके पति भी कहते हैं बच्चे के साथ कोई दुर्घटना हो गयी तो बाद में दूसरा बच्चा कहां से लायेंगे। बुढ़ापे में हमारा सहारा कौन होगा। 

डॉ. अपर्णा बताती हैं कि उन्होंने कई स्त्रियों की चौथी पांचवीं डिलिविरी करवायी है। सवर्णों में अमूमन बेटे की चाहत में ही तीसरी चौथी डिलिविरी तक मामला जाता है लेकिन अन्य जातियों में दो बेटे होने के बाद भी चौथी पांचवीं डिलिविरी के मामले उनके पास आते हैं। डॉ अपर्णा बताती हैं कि ये महिलायें इतनी जल्दी जल्दी गर्भ धारण करती हैं कि कई बार उनका अपना शरीर इसके लिये तैयार नहीं होता है। वो खुद भी कुपोषित होती हैं। एक बार गर्भधारण के बाद पूरा शरीर इक्जास्ट हो जाता है। इसीलिये अमूमन एक डिलीवरी से दूसरी डिलीवरी के बीच 3-4 साल का गैप रखने की सलाह दी जाती है। लेकिन इन्हें जाने क्यों इतनी जल्दी मची होती है कि साल भीतर ही गर्भधारण कर लेतीं हैं। जबकि एक स्त्री के पास स्वस्थ तौर पर मां बनने के लिये अधिकतम 15-18 वर्ष का समय होता है। 

डॉ अपर्णा अमूमन दूसरी डिलिविरी के समय ही लगे हाथ नसबंदी करवाने की भी सलाह प्रसूता और उनके साथी को देती हैं। वो बताती हैं कि सवर्ण स्त्रियां जिनके एक बेटा या बेटी पहले से होता है या दूसरी डिलिविरी में बेटा होता है तो वो दूसरी डिलिविरी के साथ ही नसबंदी भी करवा लेती हैं। लेकिन कथित छोटी जातियों में ये चीज नहीं होती है। वो औरतें नसबंदी नहीं करवाती हैं।       

85% आबादी में कुपोषण, भुखमरी, उच्च शिशु मृत्युदर 

भारत देश की 85 प्रतिशत आबादी दलित-बहुजन-आदिवासी- अल्पसंख्यक समुदाय की है। जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत का मुख्य संघर्ष किसी न किसी तरह रोटी कमाना है। भुखमरी, कुपोषण, शिशु मृत्युदर पर तमाम वैश्विक और राष्ट्रीय सूचकांक व रिपोर्ट में भारत देश की सबसे खराब रैंकिंग मेरे दावों को और पुख्ता करते हैं। 

‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स -2020’ के वैश्विक सूचकांक में भारत का स्कोर 27.2 है। दुनिया के 107 देशों में हुए इस सर्वेक्षण में भारत सूडान के साथ संयुक्त रूप से 94वें स्थान पर है। यह स्थिति बेहद गंभीर स्तर की मानी जाती है। अफ़ग़ानिस्तान, नाइजीरिया और रवांडा जैसे गिनती के कुछ देश ही इस सूचकांक में भारत से पीछे हैं।

‘हंगर-वॉच’ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लॉकडाउन से पहले जिन 56 प्रतिशत लोगों को रोज़ खाना मिलता रहा, उनमें से भी हर सात में से एक को सितंबर-अक्तूबर के महीने में अक्सर या कभी-कभी ही खाना नसीब हुआ। 45 फीसदी लोगों को खाने का इंतज़ाम करने के लिए कर्ज़ लेना पड़ा। कर्ज़ लेने वाले लोगों में दलितों की संख्या सामान्य जातियों के लोगों से 23 फीसदी अधिक थी। हर चार दलितों और मुसलमानों में से एक और क़रीब 12 प्रतिशत आदिवासियों को रोटी के लिए भेदभाव का सामना करना पड़ा।

‘नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे’ के नतीजे बताते हैं कि देश में कुपोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। भारत सरकार द्वारा 22 राज्यों में कराए गए इस सर्वेक्षण में पता चला है कि महिलाओं में एनीमिया की शिकायत आम है और बच्चे कुपोषित पैदा हो रहे हैं। इस कारण पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की लंबाई 13 राज्यों में सामान्य से कम है। 12 राज्यों में इसी उम्र के बच्चों का वजन लंबाई के मुताबिक नहीं है। सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक़, उम्र की तुलना में कम लंबाई वाले बच्चों की संख्या के मामले में बिहार में 43 फीसदी और गुजरात में 39 फीसदी है।

कुपोषित होने के कारण बच्चों में लंबाई कम होने की शिकायत है। उम्र के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों की संख्या बिहार में सबसे अधिक 22.9 फीसदी है। शिशु मृत्यु दर के, भूख और कुपोषण की स्थिति अभी भी देश में चिंतनीय स्तर पर है।

वर्ष 2019 में ‘द लैंसेट’ नामक पत्रिका द्वारा जारी रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 1.04 मिलियन मौतों में से तकरीबन दो-तिहाई की मृत्यु का कारण कुपोषण है।

हाल ही में न्यूज एजेंसी PTI की एक RTI के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने बताया था कि पिछले साल नवंबर तक 9,27,606 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। इनमें से 3.98 लाख बच्चे उत्तर प्रदेश और 2.79 लाख बच्चे बिहार में हैं।

आरएसएस भाजपा का एक अलाप- जनसंख्या कानून

जाहिर है आरएसएस-भाजपा लगातार बेबुनियाद और तथ्यहीन आरोप लगाते हुये देश समाज में झूठ और भ्रम फैला रहे हैं कि सबसे ज़्यादा बच्चे मुस्लिम धर्म के लोग पैदा करते हैं। जबकि असली आंकड़े इसके उलट हैं। अभी हाल ही में 11 जुलाई 2022 को विश्व जनसंख्या दिवस के मौके पर एक कार्यक्रम में जनसंख्या वृद्धि पर बोलते हुये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सांप्रदायिक ज़बान में कहा कि – “ऐसा न हो कि किसी एक वर्ग की आबादी बढ़ने की स्पीड ज़्यादा हो और जो मूल निवासी हों उनकी आबादी को जागरुकता के प्रयासों से नियंत्रित कर दिया जाए।” 

गौरतलब है कि देश के सबसे अधिक आबादी वाले सूबे उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार द्वारा पिछले साल जनसंख्या दिवस के दिन जनसंख्या विधेयक लाया गया। जिसके तहत दो से अधिक बच्चों वाले परिजनों को तमाम सुविधा सेवा और अधिकारों से वंचित किये जाने की बात प्रस्तावित की गयी है। जिसका ड्रॉफ्ट राज्य विधि आयोग के अध्यक्ष आदित्य मित्तल ने 16 अगस्त 2021 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सुपुर्द किया। उत्तर प्रदेश की ही तर्ज़ पर भाजपा शासित राज्य हिमाचल प्रदेश, असम और मध्यप्रदेश में भी जनसंख्या क़ानून बनाने की बात कही जा रही है।   

इससे पहले जुलाई 2021 में भाजपा के चार सांसदों सुब्रमण्यम स्वामी, राकेश सिन्हा, हरनाथ सिंह यादव, और अनिल अग्रवाल ने राज्यसभा में प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। जबकि रवि किशन, सुशील कुमार सिंह, विष्णु दयाल राम, और डॉ आलोक कुमार सुमन 23 जुलाई को प्राइवेट मेंबर बिल लोकसभा में पेश किया था। इस बिल में सिफारिश की गयी कि दो से अधिक बच्चे होने पर माता-पिता को सरकारी नौकरी छीनने, और मतदान करने, चुनाव लड़ने और राजनीतिक पार्टी समेत कोई भी संस्था या कोऑपरेटिव बनाने के अधिकार को समाप्त कर दिया जाये। साथ ही मुफ्त बिजली पानी, भोजन जैसी सब्सिडी खत्म कर दी जाये। इसके अलावा उन्हें किसी बैंक या वित्तीय संस्थाओं से लोन न मिल सके।  

भले ही जनसंख्या विधेयक को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर प्रचारित किया जा रहा हो लेकिन तथ्य तो यह है कि असम एनआरसी की तरह जनसंख्या विधेयक भी आदिवासी दलित बहुजन वर्ग के ख़िलाफ़ साबित होने जा रहा है। क्योंकि आर्थिक और समाजिक पहलू पर दोनों लगभग एक समान हैं। तो हम कह सकते हैं कि यदि जनसंख्या कानून ज़मीन पर लागू होता है तो आदिवासी दलित-बहुजन बहुसंख्यक आबादी को प्रतिनिधित्व के अधिकार, शिक्षा व जीने (खाद्य सुरक्षा)के अधिकार और मतदान के अधिकार से वंचित होना पड़ सकता है।

(प्रयागराज से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)  

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