Tuesday, November 29, 2022

जन्मदिन पर विशेष: पिता के उलट पर बनायी सोमनाथ ने राजनीति की राह

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वर्ष 1989 से 2004 तक लोकसभा में सीपीएम संसदीय दल के नेता और लोकसभा के पूर्व स्पीकर रहे सोमनाथ चटर्जी का जन्म असम के तेजपुर में 25 जुलाई, 1929 को हुआ था। वह मशहूर वकील और हिंदू महासभा के संस्थापक अध्यक्ष निर्मलचंद्र चटर्जी के पुत्र थे। शुरुआती पढ़ाई कोलकाता से करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय में गए। सोमनाथ मजदूर नेता और पेशे से वकील रहे। वर्ष 1968 में राजनीति में अपना पहला कदम रखने वाले सोमनाथ वर्ष 1971 में सीपीएम के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पहला लोकसभा चुनाव जीते‌। इस दिन के बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। सोमनाथ चटर्जी ने 35 साल तक एक सांसद के रूप में देश की सेवा की। उन्हें साल 1996 में उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से भी नवाजा गया था।चटर्जी वामपंथ के इकलौते नेता रहे जो लोकसभा अध्यक्ष के पद तक पहुंचे।

पिता हिन्दू महासभा के संस्थापक, बेटा वामपंथ का पुरोधा

सोमनाथ के पिता निर्मलचंद्र अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापकों में से एक थे।उन्होंने 1951-52 में लोकसभा चुनाव दक्षिण बंगाल से जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मदद से जीता था। कह सकते हैं कि सोमनाथ चटर्जी को राजनीति विरासत में मिली थी। 1959 तक वह दक्षिणपंथी नेता के रूप में सक्रिय रहे लेकिन वर्ष 1963 में निर्मलचंद लोकसभा चुनाव तत्कालीन अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा के समर्थन से ही जीते थे लेकिन सोमनाथ, अपने पिता की राह पर नहीं चले। इसके बजाय उन्होंने वामपंथ को चुना। वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सदस्य थे और 10 बार सांसद रहे। सोमनाथ अपने पिता की राजनीतिक विचारधारा को स्वीकार नहीं कर सके, वह वामपंथ के पुरोधा कहलाए।

सुषमा ने कसा था तंज

सोमनाथ के पिता और उनकी इस अलग-अलग विचारधारा को लेकर एक बार सुषमा स्वराज ने तंज भी कसा था। साल 1990 के दशक में एक बार संसद में बोलते हुए सुषमा ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ‘एक देश-एक संस्कृति’ के विचार पर बोलते हुए सोमनाथ चटर्जी का उदाहरण दिया था। सुषमा ने कहा था कि एक देश और एक संस्कृति का ही परिणाम है कि “एक बंगाली निर्मलचंद्र चटर्जी ने अपने बेटे का नाम सोमनाथ रखा।” इस दौरान सुषमा गुजरात के सोमनाथ मंदिर का जिक्र कर रही थीं।

चटर्जी के करीबी रहे अमर राय प्रधान ने दी थी NDA की नई परिभाषा

30 नवंबर, 2000 को बाढ़ के कारण जान-माल के नुकसान के संबंध में सदन में चर्चा करते हुए चटर्जी के करीबी रहे अमर राय प्रधान (कूचबिहार) ने तत्कालीन एनडीए सरकार को आड़ो हाथ लिया था। अमर राय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “मान्यवर उपाध्यक्ष जी, आज चार बजे हमारे वरिष्ठ नेता कामरेड सोमनाथ चटर्जी सूखे, बाढ़ और प्राकृतिक विपदा के ऊपर जो प्रस्ताव लाये हैं, मैं उसको पूरा समर्थन दे रहा हूं। एन.डी.ए. का नाम जो कुछ भी हो, लेकिन यह बात सही है कि एन.डी.ए. सरकार आने के बाद नेशनल डिजास्टर शुरू हो गया। Now, N.D.A means national disaster assured. आप देखिये, ओड़िशा से इसकी शुरूआत हुई, ओड़िशा और आन्ध्र प्रदेश में सुपर साइक्लोन आया।राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में सूखा पड़ा। पश्चिम बंगाल में बाढ़ आई। तमिलनाडु और पांडिचेरी में भी साइक्लोन आया। उपाध्यक्ष जी, पश्चिम बंगाल में जो भयंकर बाढ़ आई, उसके बाद हमारे कृषि मंत्री जी वहां गए।

मैं उनको बधाई देता हूं। उन्होंने वहां हवाई जहाज से चक्कर लगाया, सारा मामला ऊपर से देखा लेकिन नीचे जो आपने बैठक की और कहा कि यह नेशनल डिसास्टर है, यह भी सही है। मैं इसके लिए भी आपको बधाई देता हूं। लेकिन कितने आदमियों की जान गई, कितने पशुओं की जान गई, इसका भी अंदाजा लगाएं। वहां चार हजार करोड़ रुपए की फसल नष्ट हो गई है। नीतीश जी आप सरकार में हैं। लोग सहायता के लिए चिल्ला रहे हैं। अक्तूबर गया, नवम्बर जा रहा है, यह बताएं कि आपने कितना पैसा दिया ? वहां के लोगों की हालत बहुत दयनीय है। हजारों आदमी बेघर हो गए हैं। जाड़े के दिनों में पेड़ों के नीचे पड़े हैं। उनको खाने नहीं मिल रहा है, कपड़ा नहीं मिल रहा है। आपने ह्यूमन ग्राउंड पर भी पैसा नहीं दिया है। ह्यूमन राइट्स की बात छोड़ दीजिए। ह्यूमन लाइफ को बचाने के लिए कम से कम आप आगे बढ़ें।”

कांग्रेस में नेतृत्व का अभाव

बात 2003 की है जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे थे और अटल बिहारी वाजपेयी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण उनकी पार्टी भाजपा को अजेय माना जा रहा था। कोई भी विपक्षी दल इस स्थिति में नहीं था कि वह भाजपा के बढ़ते कदम को रोक सके। इस मामले में चटर्जी ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की। कांग्रेस के भविष्य पर बात करते हुए सोमनाथ चटर्जी ने कहा था कि, “स्वतंत्रता आंदोलन में इस पार्टी की मुख्य भूमिका रही है। उसे विभाजित करने वाले दलों के सामने हथियार नहीं डालने चाहिए। चटर्जी मुखर होने के कारण पार्टी के कॉमरेडों से सलाह लेने से कभी कतराते नहीं थे। सोनिया गांधी से मुलाकात करने के लिए भी उन्हें कभी अप्वाइंटमेंट लेने की जरूरत नहीं पड़ी।हालांकि कई विपक्षी नेता राजनीतिक वार्ता के लिए सोनिया गांधी से बातचीत करने में कतराते थे। चटर्जी ने एक बार एक रिपोर्टर से कहा भी था – “मैंने उनसे कहा कि लोग आपसे मिलने से डरते हैं। वह हंस पड़ीं और कहा कि उन्हें नहीं याद है कि किसी ने उनके ऑफिस में अप्वाइंटमेंट मांगा हो।”

सुप्रीम कोर्ट आलोचना से परे नहीं

वर्ष 2005 में लोकसभा अध्यक्ष रहते चटर्जी को सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ एक टिप्पणी के लिए उनकी काफ़ी आलोचना हुई। चटर्जी का कोर्ट पर आरोप था कि झारखंड विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव के दौरान आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट विधायिका के अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहा है। इस मामले में उनका कहना था कि, “मैं कोई पुतला नहीं हूं। मेरा मामला बहुत साधारण है। संवैधानिक रूप से हम अनुच्छेद 122 के अंतर्गत काम करते हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को (विधायिका) मैं स्वीकार नहीं कर सकता।”

सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष के रूप में 24 जुलाई 2006 से 24 घंटे का लोकसभा टेलीविजन शुरू कराया था। चटर्जी के लोकसभा अध्यक्ष के कार्यकाल में ही अत्याधुनिक संसदीय संग्रहालय की बुनियाद रखी गई। 

सोमनाथ चटर्जी ने अपनी ही पार्टी को दिखाया आईना

दस बार के सांसद सोमनाथ चटर्जी, चार दशकों तक सीपीएम से जुड़े रहे, 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के सत्ता में आने के बाद लोकसभा के अध्यक्ष बने थे। साल 2008 में यूपीए सरकार के अमेरिका से परमाणु करार पर मतभेद होने के कारण लेफ्ट पार्टी ने केन्द्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया। भारतीय वामपंथ की रीढ़ रहे तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात सीपीएम की इच्छा थी कि चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दें लेकिन चटर्जी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। उनका मानना था कि वह लोकसभा अध्यक्ष के रूप में दलगत राजनीति से ऊपर थे। चटर्जी संसदीय परंपराओं की दुहाई देते रहे।

 चटर्जी के करीबी सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी उन्हें पार्टी का आदेश मानने की सलाह दी। हालांकि मोहम्मद सलीम और नीलोत्पल बसु ने चटर्जी को अनावश्यक सजा न देने के लिए पार्टी को समझाने की कोशिश की लेकिन विफल रहे और 24 जुलाई 2008 को प्रकाश करात के नेतृत्व वाली सीपीएम पोलित ब्यूरो ने उन्हें आजीवन पार्टी से निकाल दिया। चटर्जी ने इस दिन को अपने जीवन का सबसे उदास दिन करार दिया था। चटर्जी ने कहा था कि उनको यह उम्मीद नहीं थी कि उनकी पार्टी उनसे कम से कम इस्तीफा देने की वजह भी नहीं पूछेगी। 

साइकिल की सवारी करने के लगाए गए थे कयास

यदि पूर्व विदेशमंत्री नटवर सिंह और सोमनाथ चटर्जी के बीच एकरूपता की बात की जाए तो बड़ी समानता यह है कि दोनों के ही पुराने सियासी दल उन्हें ‘पार्टी द्रोही’ मानते हैं। ये दोनों ही सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के पसंदीदा रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद, सोमनाथ चटर्जी के सामने समाजवादी पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव रख गया। नटवर सिंह की तरह ही चटर्जी को भी अपने सियासी कार्यक्रमों में शिरकत कराने लगे। राजनीतिक महकमों में हलचल होने लगी कि क्या अब चटर्जी साइकिल पर सवार होंगे !

जब ममता ने की थी राष्ट्रपति चुनाव के लिए चटर्जी के नाम की सिफारिश और फिर पलटी बाजी

जून 2012 में राष्ट्रपति चुनाव जब नजदीक आते जा रहे थे, उस दौरान मुलायम सिंह यादव और पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आपसी बैठक कर चर्चा का माहौल गर्म कर रही थीं। यूपीए सरकार की ओर से राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का विरोध करते हुए उन्होंने मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर अपनी फेहरिस्त में मनमोहन सिंह, अब्दुल कलाम और सोमनाथ चटर्जी का नाम लिया था। हालांकि मनमोहन सिंह, एपीजे अब्दुल कलाम और सोमनाथ चटर्जी तीनों ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था।इस बीच कांग्रेस, ममता बनर्जी को मनाने के प्रयास करती रही। उधर राष्ट्रपति चुनाव से दो दिन पहले प्रणब मुखर्जी ने ममता बनर्जी को समर्थन देने के लिए अनुरोध करते रहे तब ममता बनर्जी ने कोलकाता में घोषणा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति का चुनाव देश का सबसे बड़ा चुनाव है और वह अपना मत बेकार नहीं जाने देना चाहती हैं इसलिए उन्होंने प्रणब मुखर्जी को अपना समर्थन देने का फैसला कर लिया है।

ममता ने क्यों कहा था, “दिल से नहीं लिया फैसला”

ममता ने एक कॉन्फ़्रेंस के दौरान कहा था कि, “उनकी पार्टी एपीजे अब्दुल कलाम को समर्थन देना चाहती थी लेकिन उन्हें कई राजनीतिक दलों का समर्थन नहीं मिल सका।” तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो विश्लेषकों का मानना था कि ममता पर उनके फैसले को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ओर से दबाव था कि वह पहले बंगाली राष्ट्रपति बनने जा रहे प्रणब मुखर्जी के रास्ते में रोड़ा अड़ा रही हैं। ऐसा करके वह केवल और केवल पश्चिम बंगाल के लोगों की भावनाएँ आहत कर रही हैं।पार्टी नेताओं से चर्चा के बाद ममता बनर्जी ने कहा, “प्रणब दा बंगाल से हैं लेकिन हमने ये निर्णय लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की वजह से लिया है।”

उनका कहना था, “प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने का निर्णय हमारा अपना नहीं है। हमने दबाव के चलते ऐसा फैसला किया है। यह बिना किसी आर्थिक लेन-देन के किया गया निर्णय है।” तृणमूल कांग्रेस के एक नेता का कहना था कि हमारे पास वोट न डालने का भी अधिकार था लेकिन हम अपना वोट ख़राब नहीं होने देना चाहते थे।

किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं, तो फिर सोमनाथ चटर्जी होंगे प्रधानमंत्री पद के दावेदार

 2014 के लोकसभा चुनावों में भाकपा नेता एबी वर्धन का कहना था कि मोदी को रोकने के लिए वाम मोर्चे को जो भी कुछ करना पड़ा, करेंगे। वह ममता बनर्जी के साथ जाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उस दौरान अनौपचारिक संवादों की शुरुआत हो चुकी थी। पार्टी नेतृत्व ऐसे नाम की तलाश में था, जिस पर भाजपा और नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए प्रधानमंत्री पद के लिए सभी की मंजूरी हो। राजनीतिक सूत्रों की मानें तो उनका कहना था कि “अगर क्षेत्रीय दलों की सरकार कांग्रेस के समर्थन से बनती है तो पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के नाम पर सहमति हो सकती है।”

चटर्जी के नाम पर नीतीश, शरद यादव, मुलायम,लालू, मायावती, जयललिता, करुणानिधि, ममता, वाम मोर्चा, शरद पवार, नवीन पटनायक सब सहमत होंगे।

चटर्जी ने कहा, भारतीय राजनीति को युवा रक्त की जरूरत 

2012 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अखिलेश यादव के चुनाव जीतने पर सोमनाथ चटर्जी ने उनके कार्यभार संभालने पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा था कि, आज भारतीय राजनीति को युवा रक्त की जरूरत है। उन्होंने कहा, ‘मैं बहुत खुश हूं कि अखिलेश सिंह यादव यूपी के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। भारतीय राजनीति को युवाओं की जरूरत है क्योंकि वे बहुत सारे नए और नए विचारों के साथ आते हैं। अधिक से अधिक युवाओं को राजनीति में आना चाहिए।”

बीजेपी के बढ़ते वर्चस्व को लेकर चिंतित थे चटर्जी

वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी बीजेपी के बढ़ते वर्चस्व को लेकर चिंतित रहने लगे थे। उनका मानना था कि भाजपा एक विभाजनकारी पार्टी है। जून 2017 में कारवां को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया था कि पश्चिम बंगाल में जिस तरह से बीजेपी बढ़ रही है, उससे वह एक दिन सत्ता में भी आ सकती है। उन्होंने कहा था कि वह चाहेंगे कि उनके जीवनकाल में बीजेपी बंगाल की सत्ता में न आए।

उनका मानना था कि लोगों को धर्म के नाम पर बरगलाना आसान है खासकर उन समुदायों को जो राजनीतिज्ञों की वजह से ही तमाम समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उन्होंने यूपी, असम में यही किया। अब यदि बीजेपी केरल, पश्चिम बंगाल में आती तो यहां भी यही करेगी’ 2017 में यूपी में योगी आदित्यनाथ के आने पर उन्होंने कहा था, ‘यूपी के चुनावों में सफलता मिलने के बाद यह उनका एक काफी सोचा-समझा प्रयोग है। इस देश को भगवान ही बचा सकता है।’  

चटर्जी ने क्यों कहा था, अपने मूल उद्देश्य से भटक गई हैं वामपंथी पार्टियां !

वामपंथी विचाराधारा के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष पद पर रहते हुए चटर्जी ने कभी संवैधानिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं का उल्लघंन नहीं किया। उन्होंने अपने दायित्वों को सदा अपनी पार्टी के हितों से ऊपर रखा। जिसके कारण चटर्जी को अपने जीवन के आखिरी कुछ दिन एकांतवास में  गुजारने पड़े। बावजूद इसके उन्होंने मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। अपनी मुखरता और स्पष्टवादिता को लेकर चटर्जी कई बार वह वामपंथियों के निशाने पर भी रहे। उनका कहना था कि सीताराम येचुरी के सुझाव को सेंट्रल कमेटी ने खारिज कर दिया है जिससे यह साबित होता है कि प्रकाश करात का समर्थक वर्ग वाम मोर्चे को नियंत्रित कर रहा है।

आज के वामपंथी दलों की हालत पर उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि, ‘निश्चित रूप से यह वामपंथी दलों के नेतृत्व की विफलता है। पार्टी अपने नेताओं को तो महत्व दे रही है लेकिन आम जनता , कामगार वर्ग, मजदूर और पीड़ित समाज से दूर होती जा रही है। अकुशल नेतृत्व की वजह से ही कम्युनिस्ट पार्टी सिर्फ बंगाल और केरल तक सीमित रह गई है’ आज वाम दल कमजोर होते जा रहे हैं, हालात ये हैं कि पश्चिम बंगाल में भी वाम दलों को नजरअंदाज किया जा रहा है। विभिन्न मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए मशहूर सोमनाथ सीपीएम से निकाले जाने के बावजूद भी आजीवन खुद को वामपंथी मानते रहे, यह सोमनाथ चटर्जी की कर्तव्यपराणयता का अद्भुत उदाहरण था।

(लेखक राजनीतिक, साहित्यिक और समसामयिक मुद्दों पर ब्लॉग लिखते हैं।)

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