Saturday, November 27, 2021

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‘उद्भावना’ का कहानी विशेषांक और ज्ञानरंजन के बिगड़े बोल

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विशेषांक का विशेष आकर्षण बीती सदी के सातवें दशक के प्रमुख कथाकार और लघु पत्रिका ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन का इंटरव्यू है। लेकिन इस इंटरव्यू में साक्षात्कारकर्ताओं (सवाल पांच लोगों ने तैयार किये हैं) ने ज्ञानरंजन से एक भी सवाल समकालीन कहानी पर नहीं पूछा है। यहां तक कि ज्ञानरंजन भी अपने तमाम जवाबों में मौजूदा कहानीकारों और उनकी कहानी पर कोई टिप्पणी नहीं करते। अपने समकालीन शेखर जोशी के लेखन से मुताल्लिक जब उनकी राय पूछी जाती है, तब भी वे उसका कोई माकूल जवाब न देकर, इतना भर कहते हैं, ”शेखर जोशी को हमने एक यादगार आयोजन में इलाहाबाद में ‘पहल—सम्मान’ दिया।…..हमने पहल के पिछले अंकों में उनकी कविताओं को छापा।”
ज्ञान जी से पूरी विनम्रता से माफी मांगते हुए कहूंगा, पूरा इंटरव्यू आत्म प्रचार से भरा हुआ है। हालांकि सवाल भी उनके ऊपर और ‘पहल’ पर ही केन्द्रित हैं। (सवाल, साक्षात्कारकर्ताओं पर ही हैं।) ज्ञानरंजन एक कहानीकार के अलावा बेजोड़ दानिश्वर भी हैं।

जिस पत्रिका का वे संपादन करते हैं, उसकी टैगलाइन ‘इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक (पत्रिका)’ है। लेकिन अफसोस, इंटरव्यू में एक भी सवाल या जवाब ऐसा नहीं है, जो मौजूदा दौर की सियासत और उससे उपजी समस्याओं पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कोई टिप्पणी करता हो। ऐसे दौर में जब वैज्ञानिक नजरिया और ऐसी सोच को बढ़ाने के काम में लगे लोगों पर नित्य नये हमले हो रहे हैं, खामोशी इख्तियार करना, किस बात की ओर इशारा करता है ? यह बात इसलिए और भी चुभती है कि इंटरव्यू ‘उद्भावना’ में प्रकाशित हुआ है।

इंटरव्यू में दो सवाल राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह से संबंधित भी हैं। दोनों ही लोग ज्ञानरंजन के समकालीन या उनसे थोड़े से वरिष्ठ हैं। दिवंगत भी हो चुके हैं। राजेन्द्र यादव से मुताल्ल्कि एक सवाल के जवाब में उनके उद्गार हैं, ”’हंस’ के विपुल आर्थिक स्रोतों के लिए उन्हें जाति, कुजाति, स्त्री—पुरुष, राजनैतिक नेताओं और कुलच्छन पूंजी से कोई परहेज नहीं था। उनका मछली मारने का तरीका निराला था।” यह इल्जाम ‘पहल’ पर भी लगाया जा सकता है। कोई भी बड़ी पत्रिका बिना आर्थिक संसाधनों के नहीं निकाली जा सकती। हिंदी की लघु पत्रिकाओं में ‘अकार’, ‘समयांतर’ और ‘समकालीन जनमत’ (इनमें कुछ नाम और भी हो सकते हैं।) को यदि छोड़ दें, तो ज्यादातर पत्रिकाएं सरकारी विज्ञापनों के ही बलबूते निकल रही हैं। ‘पहल’ भी अपवाद नहीं। लेकिन राजेन्द्र यादव और ज्ञानरंजन में बड़ा फर्क यह है कि राजेन्द्र यादव ने ज्ञानरंजन पर यह इल्जाम अपने जीते जी लगाया था, तो ज्ञानरंजन उनके मरने के आठ साल बाद यह बात कह रहे हैं। और कहने का ढंग भी व्यंग्यपूर्ण है। हालांकि ज्ञानरंजन, राजेन्द्र यादव की इस बात की सराहना करते हैं कि उन्होंने अनेक लेखकों को बनाया, उन्हें खुला मंच दिया। लेकिन साथ ही यह भी कह देते हैं कि ”हंस के केन्द्र में दलित और स्त्री की बड़ी भूमिका है, पर वे अश्लीलताओं की हद तक गये। उनके समर्थन में स्त्री लेखिकाएं हंसनियों की तरह आईं।”

यह बात कहते हुए ज्ञानरंजन और भी उदार हो सकते थे। हंस के केन्द्र में दलित और स्त्री की बड़ी भूमिका नहीं, बल्कि राजेन्द्र यादव दलित और स्त्रियों को साहित्य के केन्द्र में लाए। दलित, स्त्री और मुस्लिम रचनाकारों को उन्होंने एक बड़ा प्लेटफॉर्म दिया। हिंदी साहित्य में कई जरूरी विमर्श शुरू किए। अपने समय में तमाम जोखिम लेकर अपनी बात जोरदारी से की। साहित्यिक पत्रकारिता को आम आदमी तक ले गए। इससे उलट ‘पहल’ कभी आम आदमी की पत्रिका नहीं हो सकी। चंद इंटलेक्चुअल और विशेष लेखक वर्ग की पत्रिका बनी रही। इसका दायरा बेहद सीमित रहा। आईए अब इस लाइन पर भी जरा गौर करें,”उनके समर्थन में स्त्री लेखिकाएं, हंसनियों की तरह आईं।” यह लाइन किस मानसिकता की परिचायक है ?, आप खुद ही निर्णय करें।

ज्ञानरंजन ने कमोबेश ऐसी ही टिप्पणियां नामवर सिंह पर भी की हैं। वे कहते हैं, ”नामवर जी के अंतर्विरोध असहनीय हैं।…..अध्यापन, छात्र निर्वाचन समितियां, व्याख्यान, संगठन, कंजूसी, जाति, पाठ्यक्रम बहुत सारी गलियों में वे फंसे। मैं उस पर अधिक नहीं कहूंगा। (अब इससे अधिक भला क्या होगा ?)…नामवर जी के बनारस, सागर, जोधपुर, दिल्ली सभी शहरों में एक ठाकुर जीवित है। ठाकुर अपने गुण दोषों के साथ।” यही नहीं नामवर सिंह के बारे में वे आगे ‘तारीफ’ करते हुए कहते हैं कि ”वे हमारे सर्वोत्तम काना राजा थे। और देश की किसी भी भाषा में ऐसा काना राजा नहीं था।”

हो सकता है कि ज्ञानरंजन की इन बातों में बहुत सी सच्चाईयां हों, लेकिन आज जब नामवर सिंह हमारे बीच नहीं हैं, तब इस तरह की टिप्पणियां करने का कोई औचित्य नजर नहीं आता। बीते दो दशक से मैं भी हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाओं और तमाम अखबारों का अध्ययन करता रहा हूं। मुझे याद नहीं पड़ता कि ज्ञानरंजन ने राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह के जीते जी उन पर कभी इस तरह की तीखी टिप्पणियां की हों। आज वे जब हमारे बीच नहीं हैं, तो उनका मूल्यांकन सम्यक तरीके से होना चाहिए, न कि उन पर छिछले आरोप लगाए जाने चाहिए। अपने इसी जवाब में ज्ञानरंजन कहते हैं, ”हम सुरेन्द्र चौधरी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विजयमोहन सिंह और देवीशंकर अवस्थी को ओट में रखते हैं, यह हिंदी की सत्ता का खिलवाड़ है।”

जाहिर है कि यह बात उन्होंने नामवर सिंह के पसमंजर में ही कही है। नामवर सिंह के बरक्स वे सुरेन्द्र चौधरी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विजयमोहन सिंह और देवीशंकर अवस्थी को हिंदी आलोचना में तरजीह देते हैं। लेकिन वे यह भी टिप्पणी करते हैं कि नामवर सिंह हमारे सर्वोत्तम काना राजा थे। इसके मायने क्या समझे जाएं?, क्योंकि पूरी कहावत तो यह है कि ‘अंधों में काना राजा’। ज्ञान जी माफ कीजिएगा, नामवर जी के जिन अंतर्विरोधों को आप असहनीय बता रहे थे, यह अंतर्विरोध आपकी बात में भी नजर आता है। ज्ञानरंजन, नामवर सिंह की तमाम कमियों को गिनवाते और उन पर आरोप लगाते हैं। साथ ही यह बात भी स्वीकार करते हैं कि ”जब सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड की बात आई, तो जूरी में उन्होंने सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए, पचास वर्ष की आयु में मुझे चुना।”

ज्ञानरंजन की इस बात से यह साबित होता है कि नामवर सिंह उनसे कहीं ज्यादा उदार थे। रचनागत आलोचना के अलावा ज्ञानरंजन के प्रति उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं था। एक आलोचक के तौर पर जहां जरूरी लगा, उन्होंने ज्ञानरंजन और उनकी कहानी की आलोचना की, तो सराहना का भी कोई मौका नहीं छोड़ा। यही नामवर सिंह और ज्ञानरंजन के बीच बड़ा फर्क है। ज्ञानरंजन जी, इस साल अपना 85वां जन्मदिन मनाएंगे। वे शतायु हों और अपने आखिरी समय तक ‘पहल’ का संपादन करें, यही उनके चाहने वालों की कामना है। और उनके चाहने वालों में इत्तेफाक से मैं भी एक अज्ञानी अलेखक शामिल हूं।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल शिवपुरी में रहते हैं।)

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