Saturday, December 4, 2021

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बेटियों में खौफ का नाम है उत्तर प्रदेश!

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बहराइच में एक डेढ़ साल की बच्ची का रेप होता है और रेप के चंद घंटों बाद वह मर जाती है … लखीमपुर खीरी में आठ साल की बच्ची का रेप होता है और उसी के सलवार से उसका गला घोट कर मार दिया जाता है उसकी लाश गन्ने के खेत में  मिलती है तो वहीं हमीरपुर की एक छात्रा को आत्महत्या पर मजबूर होना पड़ा क्योंकि गांव के कुछ दबंगों द्वारा उसके साथ छेड़छाड़ करने और एक जश्न में जबरदस्ती नचवाने से आहत छात्रा ने जब पुलिस में उन शोहदों के ख़िलाफ़ शिकायत करनी चाही तो उसकी शिकायत को अनसुना कर दिया गया जिसका उसे गहरा आघात लगा और उसने आत्महत्या कर ली। अभी इन खबरों ने परेशान किया ही था कि मथुरा से दिल दहला देने वाली ख़बर आती है कि कुछ लड़कों ने घर में घुसकर एक 17 वर्षीय लड़की को  दो मंजिला छत से नीचे फेंक दिया। एक साल से लड़के उसे परेशान कर रहे थे और उसका यौन शोषण करते थे। पीड़िता की हालत गंभीर है।

उत्तर प्रदेश में बलात्कार, यौन शोषण और जान से मार देने की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं,  योगी सरकार “सुशासन” होने का लाख दावा करे लेकिन हालात सच बयां कर रहे हैं। ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा बुलंद करने वाली सरकार बेटियों को सुरक्षित माहौल देने में असफल सिद्ध हो रही है और यह हम नहीं कहते आए दिन की होने वाली घटनाएं खुद कह रही हैं । अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब प्रदेश की योगी सरकार ने अपने चार साल का कार्यकाल पूरा होने पर एक डेवलपमेंट बुकलेट जारी की। “सेवा और सुशासन के चार वर्ष” शीर्षक वाली इस बुकलेट में सरकार ने जमकर अपनी उपलब्धियों का ब्यौरा दिया।

लखीमपुर में बलात्कार और हत्या की घटना।

बुकलेट में तमाम विकास कार्यों के बखान के साथ महिला सुरक्षा की भी बात कही। वैसे भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किसी भी मौके पर  इस बात पर जोर देना नहीं भूलते कि जब से उनकी सरकार ने उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली हैं, तब से ही प्रदेश की महिलाओं के लिए एक भयमुक्त वातावरण बनाने की दिशा में कारगर काम किए जा रहे हैं, उनका दावा तो यहां तक है कि बलात्कार के मामलों में अब जल्द कार्रवाई होने और बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलने के कारण बलात्कारी काफी डरे हुए हैं और पहले के मुकाबले उनकी सरकार के कार्यकाल में बलात्कार, यौन हिंसा, छेड़खानी जैसी घटनाओं में काफी हद तक कमी आई है।

जाहिर सी बात है, जब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार यह मान चुकी है कि उसकी वजह से आज प्रदेश की महिलाएं, स्कूल कॉलेज  जाने वाली छात्राएं, नाबालिग बच्चियां, सब एक महफूज वातावरण में सांस ले रही हैं, उसकी वजह से ही आज बलात्कारी से लेकर मनचले, शोहदे सब डर के साए में जी रहे हैं, तो अपनी इस इतनी बड़ी उपलब्धि का बखान भला सरकार अपनी बुकलेट में क्यों न करती। पर सरकार की बुकलेट और उसके दावे कुछ भी कहें, आए दिन प्रदेश में होने वाली बलात्कार, यौन हिंसा, छेड़खानी की घटनाएं हमें यह बताती हैं कि हालात आज भी बेकाबू हैं, आज भी बलात्कारी नहीं बल्कि महिलाएं डर के वातावरण में जी रही हैं इतना ही नहीं बल्कि पुलिस के उपेक्षापूर्ण रवैए के कारण पीड़िताएं अपनी जान तक देने में मजबूर हो  रही हैं और यह महज हमारा आकलन नहीं बल्कि प्रदेश का वह सूरत-ए-हाल है, जिसकी बयानी खुद यौन हिंसा की घटनाएं कर रही हैं। 

 लगातार हम ऐसी घटनाओं से रू-ब-रू  हो रहे हैं जो महिला सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं। एक तरफ सरकार मार्च माह में अपने चार साल का जश्न मनाती है तो दूसरी तरफ़ ठीक उसके बाद एक एक कर सामने आने वाली बलात्कार की घटनाएं दिल दहला देती हैं। हमीरपुर, आगरा, मेरठ, हापुड़, उन्नाव, हाथरस, बंदायू, आगरा, प्रयागराज, लखीमपुर खीरी, बहराइच,  मथुरा,  ओर से आने वाली खबरों ने मौजूदा “सुशासन” के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि बेटियों को सम्पूर्ण सुरक्षा देने के जिस संकल्प के साथ प्रदेश में भाजपा सरकार सत्तासीन हुई थी आखिर उस संकल्प का क्या हुआ? हम इन घटनाओं का जिक्र करें, उससे पहले हमें यह मानने में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि महिलाओं के पक्ष में ठोस कदम उठाते हुए उनके लिए हिंसामुक्त, भयमुक्त वातावरण बनाने का जितना दावा योगी सरकार करती रही है, तस्वीर ठीक उसके उलट दिखाई देती है। पहले बात हमीरपुर जिले की, कुछ दिन पहले एक छात्रा को आत्महत्या पर मजबूर होना पड़ा पर  उससे पहले भी ऐसी ही एक घटना ने सुशासन की पोल खोल दी।

एमएलए सेंगर, फाइल फ़ोटो।

जिस महीने योगी सरकार अपने सुशासन के चार साल का जश्न मना रही थी उसी महीने यानी मार्च में हमीरपुर से आई एक खबर ने रोंगटे खड़े कर दिए। हमीरपुर के भरुआ सुमेरपुर थाना क्षेत्र के एक गांव की 14 वर्षीय छात्रा ने अपने ही गांव के शोहदे की छेड़खानी और ब्लैकमेलिंग से तंग आकर खुद को आग के हवाले कर दिया। पीड़िता की मां के मुताबिक लड़का आए दिन बेटी को परेशान करता था जिसकी शिकायत उसने पुलिस से भी की थी लेकिन समय रहते पुलिस ने जब उसके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की तो उनकी बेटी ने क्षुब्ध होकर ऐसा कदम उठा लिया तो वहीं आगरा की घटना को भला कौन भूल सकता है, इस घटना ने यह साबित कर दिया था कि अभी भी बलात्कारी बैखौफ होकर अपने मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं, फिर बलात्कारियों के अंदर डर पैदा करने का लाख दावा यह सरकार करती रहे।

घटना 29 मार्च की है, बलात्कार की शिकार महिला ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया कि सोमवार (29 मार्च) की शाम 6 बजे के करीब अपने पति के साथ बाइक से एत्मादपुर से अपने मायके एत्मादौला जा रही थी इसी बीच तीन युवकों ने उनका रास्ता रोक लिया और न केवल उनके साथ मार पिटाई की बल्कि जबरन झाड़ियों में खींचकर ले गए, उन्हें निर्वस्त्र कर उनका वीडियो बनाया, तीनों युवकों ने उसका रेप किया और उनके साथ लूटपाट भी की। अभी इस घटना का शोर थमा भी नहीं था कि मेरठ और हापुड़ से परेशान करने वाली खबरें सामने आईं। मेरठ के सरधना में ट्यूशन से लौट रही दसवीं की छात्रा को उसी के गांव के चार युवकों ने अगवा कर गैंगरेप किया। अपने साथ हुई इस घटना से छात्रा इतनी आहत थी कि उसने घर पहुंचकर ज़हरीला पदार्थ खा लिया। अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई तो वहीं हापुड़ जिले से एक किशोरी को अगवावकर सामूहिक दुष्कर्म करने और आरोपियों द्वारा शव को नोएडा एक अस्पताल में छोड़कर फरार होने का मामला सामने आया। 

ये तो वे तमाम घटनाएं हैं जो 19 मार्च के बाद, महज दस से बारह दिनों के अंदर सामने आईं यानी जिस दिन मुख्यमंत्री जी अपने चार साल के “सेवा और सुशासन” की लंबी चौड़ी लिस्ट उत्तर प्रदेश की जनता के सामने पेश कर रहे थे, हर क्षेत्र में सरकार के कार्यों की मिसालें दे रहे थे, तो वहीं दूसरी तरफ़ प्रदेश की बेटियां गैंगरेप, छेड़खानी से आहत होकर अपनी जानें दे रही थीं। इसी साल जनवरी से लेकर जून की बात करें तो हमारे सामने लगातार रेप, गैंगरेप के बाद हत्या या पीड़िता द्वारा आत्महत्या की खबरें सामने आ रही हैं। कोई दिन ऐसा नहीं होता जब अख़बार देखो और इस तरह की घटनाओं से सामना न हो। रोज अख़बार पढ़ो और रोज शर्मसार होने वाली स्थिति उत्तर प्रदेश में पैदा हो गई है।

हम कैसे भूल सकते हैं इसी साल जनवरी की शुरुआत में ही बंदायू जिले के अघैती थाना क्षेत्र से एक विचलित करने वाली खबर सामने आती है जहां मंदिर में पूजा करने गई एक पचास की आंगनबाड़ी सहायिका के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई। मंदिर के महंत और उसके दो साथियों पर रेप का आरोप है। रेप के बाद खून से लथपथ महिला को आरोपी उसके घर छोड़ फरार हो जाते हैं। यह नए साल की शुरुआत थी, जब हमें ऐसी वीभत्स घटना से सामना हुआ पर सिलसिला यहीं नहीं थमता, बदस्तूर उत्तर प्रदेश में ऐसी घटनाएं जारी हैं, कहीं बेटियां पुलिस के उपेक्षापूर्ण रवैए से आत्मदाह, आत्महत्या करने को मजबूर हो रही हैं तो कहीं रेप, छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज करने पर पीड़ित परिवार के सदस्य को सरेआम मौत के घाट उतार दिया जा रहा है, उसके बावजूद यह दावा किया जाना कि अब प्रदेश में महिलाएं सुरक्षित हैं, बलात्कारी डरे हुए हैं सरकार की जल्दबाजी ही दिखाता है।

बीते दस मार्च को लखनऊ विधान भवन के सामने आखिर एक रेप पीड़ित बेटी को क्यों आत्मदाह के लिए मजबूर होना पड़ा, क्या इसका जवाब है हमारे सिस्टम के पास। यदि समय रहते वहां मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा उसे न बचा लिया जाता तो एक बेटी के संघर्ष का सच उसी के साथ दफन हो जाता। वह सुल्तानपुर की रहने वाली थी, वह कहती है कुछ दिन पहले एक युवक ने उसके साथ दुष्कर्म किया । इस मामले में पीड़िता ने आरोपित और उसके दोस्त के ख़िलाफ़ जब पुलिस में एफआईआर लिखवाई तो पुलिस ने उन्हें पकड़ा तो जरूर लेकिन जेल नहीं भेजा और थाने से ही छोड़ दिया। पुलिस के इस रवैए से आहत युवती ज्वलनशील पदार्थ लेकर विधान भवन के सामने पहुंच गई और खुद पर छिड़काव करने लगी इस बीच वहां ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों द्वारा उसे पकड़ लिया गया। 

   याद कीजिए संभल जिले की उस दलित लड़की को जिसने रेप होने के बाद और रेपिस्ट के परिवार वालों द्वारा आए दिन डराने धमकाने से आहत होकर इसी साल आत्महत्या कर ली। एक साल पहले उसका रेप हुआ। आरोपी युवक को जेल भी हुई लेकिन आए दिन आरोपी के परिवार की ओर से मिल रही जान से मारने की धमकी और केस खत्म करने का दबाव इतना बढ़ता रहा कि पीड़िता अपना मानसिक संतुलन खोने लगी और एक दिन उसने मौत को गले लगा लिया। ऐसी ही दास्तान बुलंदशहर की उस 19 वर्षीय रेप पीड़िता की भी है जिसने पुलिस के रवैए से परेशान होकर अंततः आत्महत्या कर ली। घटना चार महीने पहले की है जब एक कानून की छात्रा को सुसाइड करने को मजबूर होना पड़ा।

अपने पीछे वह सुसाइड नोट छोड़ गई जिसमें लिखे एक एक शब्द ने यह ज़ाहिर किया कि एक रेप पीड़िता के लिए चुनौतियों की ऐसी दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं कि वह लड़ते लड़ते इतनी धाराशायी हो जाए कि वह अपराध के लिए खुद को ही दोषी मानने लगे। एक बलात्कार उसका शारीरिक होता है और उसके बाद यह समाज और सिस्टम बार बार उसका मानसिक बलात्कार करता है। मृतका के सुसाइड नोट के मुताबिक चार युवकों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया जिसमें से एक उसका परिचित था तीन उसके दोस्त। पुलिस ने उसकी शिकायत दर्ज तो की लेकिन आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जिससे वह बेहद आहत थी। उसके पिता ने बताया कि पुलिस की निष्क्रियता से परेशान होकर उनकी बेटी ने खुदकुशी कर ली। फेहरिस्त लंबी है, उससे गई गुना लंबा हैं इन बेटियों और इनके परिवार का संघर्ष।  जो जीवित हैं और अपने पर हुए यौन हिंसा के खिलाफ़ लड़ रही हैं उनके लिए भी राह आसान नहीं। 

हम यहां साफ देख सकते हैं कि घटनाएं इस हद तक घट रही हैं जहां पीड़िता के परिवार के किसी सदस्य को सरेआम जान से मार दिया जाता है। हाथरस की घटना को भला भुलाया जा सकता है, जहां एक  पिता को इसलिए अपनी जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी के साथ हुई छेड़खानी की एफआईआर दर्ज करवाई थी। जमानत पर छूटे मुख्य आरोपी द्वारा पीड़िता के पिता को दिनदहाड़े गोलियों से छलनी कर हत्या कर दी गई। अभी इस घटना को हुए कुछ ही दिन बीते थे कि कानपुर से भी ऐसी ही एक घटना सामने आई। अपनी नाबालिग बेटी के साथ हुई गैंगरेप की पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाने के बाद एक पिता को ट्रक ने कुचलकर मार डाला। परिवार का आरोप है कि यह अकस्मात घटी घटना नहीं बल्कि हत्या है और इसमें पुलिस की भी मिलीभगत है क्योंकि आरोपी के पिता दरोगा हैं।

पीड़िता और स्वामी चिन्मयानंद।

ये घटनाएं इस ओर इशारा करती हैं कि इस क़दर खौफ पैदा किया जा रहा है कि पीड़ित परिवार न केवल न्याय की उम्मीद छोड़ दे बल्कि शिकायत तक दर्ज करवाने की हिम्मत न कर सके। महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराध में दोषियों के लिए “जीरो टॉलरेंस” रखने का वादा करने वाली योगी सरकार के आंकड़ों के खेल भले ही बेहतर कानून व्यवस्था का दावा करें, महिलाओं के पक्ष में बहुत कुछ सकारात्मक करने का ढिंढोरा पीटे लेकिन तस्वीर ठीक इसके उलट है आए दिन होने वाली गैंगरेप, यौन हिंसा की घटनाएं हमें यह बताती हैं कि सच वह नहीं जिसे बताया जा रहा है बल्कि वह है जिसे छुपाया जा रहा है यानी अपराधी बैखौफ होकर ऐसे कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं, पुलिस भी बलात्कार, यौन हिंसा, छेड़खानी जैसे गंभीर अपराधों पर न केवल काबू करने में नाकाम साबित हो रही है बल्कि पुलिस की घोर लापरवाही बलात्कारियों के हौसले बुलंद कर रही है। ऐसे असंख्य उदाहरण हमारे सामने हैं जहां पुलिस द्वारा दोषियों के खिलाफ़ त्वरित कार्रवाई की बजाय पीड़ित पक्ष को ही एफआईआर तक दर्ज करवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। 

आए दिन अखबारों के पन्ने यौन हिंसा, रेप, गैंगरेप, छेड़खानी की खबरों से पटे रहते हैं। विडंबना तो यह है कि ज्यादातर मामलों में पुलिस शिकायत तक दर्ज नहीं कर रही जिसका परिणाम यह हो रहा है कि पीड़ित को आत्मदाह पर मजबूर होना पड़ रहा है और उससे भी भयावह तस्वीर यह है कि पुलिस द्वारा दोषियों के खिलाफ़ कोई सख्त कार्रवाई न करने के चलते न जाने कितनी बेटियां अपनी जान दे चुकी हैं। पीड़ित पक्ष को डराने धमकाने, केस वापस लेने, जान से मार देने जैसे सच ही हमारे सामने नहीं हैं बल्कि केस दर्ज करवाने के चलते सरेआम मार देने तक के मामलों को हम देख रहे हैं तब यह कैसे मान लिया जाए कि महिलाओं के पक्ष में बहुत कुछ बेहतर हो रहा है।

महिलाओं के साथ बढ़ती छेड़छाड़ और रेप की घटनाओं को देखते हुए यूपी सरकार और पुलिस इससे पहले भी कई अभियान चला चुकी है लेकिन इन अभियानों की सफलता और गंभीरता तब धाराशाई होती नजर आती है जब लगातार हम महिला हिंसा की घटनाओं में इजाफा देखते हैं। लगातार घटित होने वाली ये घटनाएं उस “सुशासन” पर बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न लगाती हैं, जिसका यह दावा है कि यौन हिंसा, बलात्कार के मामलों में जल्द से जल्द सुनवाई होने और बलात्कारियों को कड़ी सजा मिलने के कारण अब रेपिस्टों के हौसले पस्त हैं। सरकार कहती है कि उसने अपराधियों, बलात्कारियों के बीच भय पैदा कर प्रदेश की बेटियों को एक सुरक्षित माहौल दिया है लेकिन यही प्रदेश की बेटियां “बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओ” का नारा देने वाली सरकार से सवाल कर रही हैं कि आख़िर हमें कब तक डर के साए में जीना पड़ेगा? तो मुख्यमंत्री जी उत्तर प्रदेश बलात्कार प्रदेश बनता जा रहा है, बदमाशों, अपराधियों का प्रदेश बनता जा रहा है,  इसे मानिए और अपने सुशासन की डायरी में बेटियों के इंसाफ की कहानियां भी दर्ज कीजिए।

(सरोजिनी बिष्ट स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल लखनऊ में रहती हैं।)

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