Saturday, October 16, 2021

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यूपीः मरते लोग और जलते सवाल नहीं, विपक्ष को दिख रही हैं मूर्तियां

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विडंबना ही है कि कभी भारतीय राजनीति में ‘मंडल’ के बरअक्स ‘कमंडल’ था, अब राम मंदिर के जवाब में परशुराम मंदिर खड़ा हो गया है!

मामला राजनीतिक है। विवेक तिवारी से लेकर गैंगस्टर विवेक दुबे और हनुमान पांडेय का फेक एनकाउंटर करने वाली यूपी पुलिस और उससे ऐसा करवाने वाली योगी सरकार और भाजपा से ब्राह्मण वर्ग नाराज़ हो गया है। भाजपा से नाराज़ ब्राह्मण वर्ग अपने लिए एक अदद राजनीतिक ठिकाना ढूंढ रहा है।

यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में ब्राह्मण समुदाय का ठिकाना बनने की होड़ मच गई है। सपा-बसपा में ब्राहमण मतदाताओं को अपने पाले में लपकने की होड़ का नतीजा है कि यूपी की राजनीति में परशुराम राजनीतिक मुद्दा बन गए हैं।

वहीं ब्राह्मण समुदाय का पुराना ठौर रही कांग्रेस भी धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश में मजबूत हो रही है। जबकि बसपा दलित-ब्राह्मण जातीय गठजोड़ के चलते ही पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई थी। यही कारण है उन्होंने कई मंचों से गरीब ब्राह्मणों को आरक्षण देने की बात की थी।

खुद को लोहिया का राजनीतिक उत्तराधिकारी बताने वाली सपा के प्रमुख अखिलेश यादव ने सत्ता में आने पर परशुराम की 108 फीट ऊंची मूर्ति लगवाने का एलान किया है। इसके लिए परशुराम चेतना ट्रस्ट पीठ बनवाने की बात भी कही है।

वहीं सपा के एलान के एक दिन बाद ही बहुजन समाज पार्टी ने कह दिया है कि वह सत्ता में आई तो परशुराम जी के नाम पर सपा की परशुराम प्रतिमा से भी ज्यादा भव्य प्रतिमा लगवाएगी। बसपा ने इसमें एक नयी बात यह जोड़ी है कि वह सत्ता में आने पर ‘ब्राह्मण समुदाय की आस्था और स्वाभिमान के खास प्रतीक माने जाने वाले’ श्री परशुराम के नाम पर जगह-जगह बड़े अस्पताल भी बनवाएगी।

इससे पहले 24 अगस्त 2018 को यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने कहा था, “हम अगर सत्ता में आए तो भगवान विष्णु के नाम पर इटावा के निकट 2000 एकड़ से अधिक भूमि पर नगर विकसित करेंगे। हमारे पास चंबल के बीहड़ों में काफी भूमि है। नगर में भगवान विष्णु का भव्य मंदिर होगा। यह मंदिर कंबोडिया के अंगकोरवाट मंदिर की ही तरह होगा।”

सपा-बसपा के परशुराम प्रेम पर गंवई समाज के भिन्न-भिन्न वर्ग-जाति के लोगों से बात करके उनकी प्रतिक्रियाएं जानने की कोशिश की…
परशुराम मूर्ति मुद्दे पर सीमांत किसान राजीव कुमार पटेल कहते हैं, “भाजपा आरएसएस तो संविधान विरोधी हैं ही, जाहिर है वे संविधान विरोधी काम करते आए हैं आगे भी करेंगे ही करेंगे, लेकिन जो संविधान को मानने वालें हैं, जिन्हें संविधान ने बराबरी में खड़े होने, जीने, खाने, पढ़ने, बढ़ने अधिकार दिया है। जो संविधान बचाने को कृतसंकल्प हैं, वही लोग यदि संविधान विरोधी बात करने लगें तो इससे बुरा और क्या होगा देश के लिए, संविधान के लिए, समाजिक न्याय के लिए।”

मैजिक डाला ड्राइवर अशोक यादव कहते हैं, “जब कोई राजनीतिक पार्टी अपनी जमीन, अपना जनाधार खो देती है और उसके बावजूद भी जमीन पर नहीं उतरती है तो उसके पास जमीनी मुद्दे भी नहीं होते हैं। उसके पास जनता के मुद्दे नहीं होते। फिर तो वो ऐसे ही हवा-हवाई मुद्दे उछालती है। बेकार बेकाम की बातों पर अपना और जनता का सिर खपाती है।”

पेशे से शिक्षक अरविंद पांडेय कहते हैं, “ब्राह्मण सिर्फ़ पुजारी नहीं होता। वो मनुष्य भी होता है और उसकी भी तमाम मानुषिक ज़रूरतें होती हैं। उसे भी भूख लगती है, उसके घर के लोग भी बीमार पड़ते हैं। उसके बच्चों को शिक्षा और रोजगार की ज़रूरत होती है। हमें मंदिर नहीं चाहिए न राम का, न परशुराम का। हमें अस्पताल चाहिए, स्कूल-कॉलेज पुस्तकालय चाहिए, कल-कारखाने चाहिए।”

अरविंद ने कहा कि परशुराम ब्राह्मण समुदाय का आदर्श कभी नहीं रहे, क्योंकि वो ब्राह्मण नहीं बल्कि संकर ब्राह्मण (ब्राह्मण पिता क्षत्रिय माता की संतान) हैं। उन्हें जबर्दस्ती ब्राह्मण समुदाय पर थोपा जा रहा है। ये आरएसएस से जुड़े ब्राह्मण समाज के संगठन हैं जो परशुराम को ब्राह्मण समुदाय का आदर्श बताकर पेश कर रहे हैं, क्योंकि परशुराम की छवि हिंदू राष्ट्रवाद के बिल्कुल मुफीद बैठती है।

उन्होंने कहा कि दरअसल सत्ता को अपना शासन बनाए रखने के लिए परशुराम जैसे ब्राह्मण चाहिए। ब्राह्मणों को सप्तर्षियों की संतति माना जाता है। हालांकि आज के युग में किसी जाति का संगठन बनाना कबीलाई मानसिकता और क्रूरता है, लेकिन फिर भी यदि किसी ब्राह्मण संगठन द्वारा किसी को ब्राह्मण प्रतीक बनाना ही है तो सप्तर्षियों में से किसी को बनाएं। वशिष्ठ तो राम के कुलगुरु भी थे। मंगल पांडेय, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों को बनाया जाए। यहां मैं प्रतीक की बात कर रहा हूं इनके मंदिर बनाने की नहीं।”

निर्माण मजदूर गुलाब भारतीय कहते हैं, “विपक्ष वंचित जनों की आवाज़ होती है, लेकिन जब विपक्ष भी वंचित जनों की आवाज़ बनने के बजाय सत्तावर्गधारी समुदाय के हितों और प्रतीकों को ही स्थापित करने की बात करने लगे तो वंचित जन क्या करें, कहां जाएं? क्या जुल्म है कि जो सत्ता में है वो भी ब्राह्मणों के हितों की चिंता कर रहा है जो विपक्ष में है उसे भी ब्राह्मणों की चिंता सता रही है! क्या क़यामत है कि ब्राह्मणों की पार्टी भी ब्राह्मणों की फिक्र में घुली जा रही है, दलितों और पिछड़ों की पार्टियां भी ब्राह्मणों की चिंता में दुबली हुई जा रही है!”

बीएड छात्रा शुचिता कहती हैं, “संसदीय राजनीति की यही विद्रूपताएं हैं। जब विचारधारा गौण और सत्ता प्रमुख लक्ष्य हो जाता है तो यही होता है, जो सपा-बसपा में हो रहा है। जब वर्ग संघर्ष और अस्मिता का संघर्ष छोड़कर सारे दल ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता की कुर्सी हथियाने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं तो कलम और थर्मामीटर की बात भूलकर तीर और तलवार की बात करने लगते हैं।”

उन्होंने कहा कि जब किसी पार्टी के एजेंडे में समाजिक राजनीतिक आर्थिक बदलाव शामिल होगा तो उसके मुद्दे में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, मनोरंजन, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता, शांति और सुरक्षा की बात होगी। जब पार्टियों के एजेंडे में समाजिक-आर्थिक बदलाव नहीं शामिल होगा तो वो वर्तमान की दमनकारी व्यवस्था को और मजबूती देने वाले प्रतीकों को स्थापित करने वाली मूर्तियों की स्थापना की बात करेंगे।   

जनचौक न्यूज पोर्टल के संस्थापक संपादक महेंद्र मिश्रा कहते हैं, “आरएसएस तो चाहता ही है कि ब्राह्मणवाद और हिंदू राष्ट्रवाद राजनीतिक विमर्श बना रहे। वो इस खेल का माहिर खिलाड़ी है। जब भी वो तमाम राजनीतिक पार्टियों को हिंदू राष्ट्रवाद की अपनी मुफीद पिच पर खेलने के लिए विवश कर देता है उसकी जीत आसान हो जाती है। पहले वो कांग्रेस से ये गलती करवाता था। अब सपा-बसपा से करवा रहा है।”

उन्होंने कहा कि याद कीजिए 2017 के गुजरात चुनाव को। जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जनता से जुड़े जमीनी मुद्दे को उठाने के बजाय खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण और मंदिर जाने में मोदी से होड़ ले रहे थे और एंटी इनकम्बेसी के बावजूद भाजपा ने आसानी से जीत हासिल करते हुए सत्ता कायम रखी। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को भी याद कीजिए, जब सपा-कांग्रेस गठबंधन को श्मशान-मरघट के सांप्रदायिक मुद्दे में उलझाकर भाजपा पहली बार प्रचंड बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई थी।”

महेंद्र मिश्रा आगे कहते हैं, “आरएसएस के लिए इससे अच्छा क्या होगा कि देश की सारी पार्टियां ही उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने, उन्हें पूरा करने में लग जाएं। जो काम भाजपा कर रही है वही सपा, बसपा कांग्रेस करने लगें।”

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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