Sunday, May 22, 2022

बहु आयामी गरीबी के आईने में उत्तर-प्रदेश

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उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाना है- ऐसा योगी सरकार का संकल्प है। उनका संकल्प है कि विकास के दरवाजे सबके लिए खोल दिए जायेंगे। एक भारत, श्रेष्ठ भारत कि संकल्पना में, उत्तर प्रदेश को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। गरीबी मुक्त उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश कि संकल्पना का प्रमुख आधार रहा है। लेकिन क्या उनकी पांच वर्षों के कार्यकाल में इस संकल्पना ने मूर्त रूप लिया? क्या उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश बना या कितने कदम आगे बढ़ा-इसकी पड़ताल करने कि आवश्यकता है।

उत्तम प्रदेश होने का आधार क्या है? भूख और गरीबी मुक्त प्रदेश बनाना एवं एक ऐसा विकास जो न केवल तीव्र गति से हो रहा हो बल्कि जिस विकास प्रक्रिया में सबकी भागेदारी भी सुनिश्चित की जा सके, योगी सरकार की आर्थिक नीति का आधार रही है। भय और भ्रष्टाचार रहित समाज की स्थापना इसकी मूल संकल्पना में रही। हम केवल इसके पहले उद्देश्य को लें। मानव के गरीबी मुक्ति के आधार क्या हैं? क्या उपभोग व्यय ही गरीबी आंकने का आधार होना चाहिए? इस आधार से तो मनुष्य की केवल मौलिक किन्तु आंशिक गरीबी ही दूर होती है और इसीलिए वैश्विक स्तर पर गरीबी को मापने और हटाने का आधार, ‘बहु आयामी गरीबी’ ने ले लिया है। नीति आयोग ने भी अभी हाल में बहु आयामी गरीबी की उसी अवधारणा एवं प्रक्रिया को अपना लिया है। इससे तुलना एवं विश्लेषण करना सरल एवं तार्किक हो जायेगा । आइये जाने क्या है ‘बहु आयामी गरीबी’? विभिन्न आयामों-सुविधाओं से वंचित रह जाना इस अवधारणा का मूल है।

स्वास्थ्य, शिक्षा एवं जीवन स्तर इसके तीन प्रमुख आयाम हैं जिन्हें समान महत्व का माना गया है और इन्हें बारह संकेतकों द्वारा मापा जाता है। सभी मानते हैं कि भौतिक एवं मानवीय विकास मूलतः इन्हीं पर निर्भर करते हैं। तीन आयामों में सम्मिलित बारह सुविधाओं  या संकेतकों द्वारा बहु आयामी गरीबी का सूचकांक बनाया जाता है और यही परिवार की बहु आयामी गरीबी का आधार बनता है। आइए स्वास्थ्य, शिक्षा एवं जीवन स्तर को प्रभावित करने वाले कारकों को जाने। स्वास्थ्य सम्बन्धी आयाम में पोषण, बाल और किशोर मृत्युदर एवं मातृत्व स्वास्थ-प्रसवपूर्व देखभाल सम्मिलित हैं। दूसरी तरफ, स्कूल शिक्षा के वर्ष एवं स्कूल में उपस्थिति, शिक्षा की वंचना के आधार में सम्मिलित है। इसी भांति, जीवन स्तर को बेहतर बनाने वाले या वंचित करने वाले कारक, उनकी उपलब्धता या अनुपलब्धता से प्रभावित होते हैं। इसमें सम्मिलित हैं खाना बनाने वाली गैस, स्वच्छता,पीने का पानी, बिजली, घर, सम्पत्ति और बैंक खाता। स्पस्ट है कि बहु आयामी गरीबी, गरीबी कि एक व्यापक अवधारणा है और जनता के प्रति सजग और सचेत सरकारें, इसको न केवल मानती हैं वरन प्राप्त करने के लिए दिलोजान से प्रयास भी करतीं हैं। अब देखना है कि योगी सरकार अपने इस राज धर्म को कितना चरितार्थ कर पाई है।

पहले यह देखा जाए कि उत्तर प्रदेश में बहु आयामी गरीबी से ग्रस्त और त्रस्त कितने प्रतिशत लोग हैं। इस तरह कि गरीबी से संत्रस्त जनता का प्रतिशत उत्तर प्रदेश में 37.97 प्रतिशत रहा और उत्तर प्रदेश, देश का तीसरा सबसे गरीब राज्य है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश चूँकि सबसे बड़ी जनसँख्या वाला राज्य है अतः बहु आयामी गरीबी के अंतर्गत आने वाली जनसंख्या की संख्या अत्यधिक है। सर्वाधिक बहु आयामी गरीबी, बिहार (51.91%) में रही है और झारखण्ड दूसरे स्थान (42.16%) पर था। केरल में सबसे कम (0.71%) ऐसी गरीबी थी। उत्तर प्रदेश की एक बड़ी जनसँख्या (44.47%) पोषण रहित  भोजन करने के लिए अभिशप्त है। बिहार में इस विवशता का प्रतिशत सर्वाधिक (51.88%) है। सिक्किम में यह सबसे कम (13.32%) है। प्रसव पूर्व देखभाल से वंचित स्त्रियों का प्रतिशत उत्तर प्रदेश में 35.45 रहा और उत्तर प्रदेश, इस वंचना में देश में दूसरे स्थान पर है। बिहार की स्थिति (45.62%) इस सन्दर्भ में सबसे सोचनीय रही। प्रसव पूर्व देखभाल करने में केरल,देश में सबसे बेहतर राज्य है। स्कूल में उपस्थिति के सन्दर्भ में वंचित जनसँख्या का प्रतिशत उत्तर प्रदेश में 11.91 रहा और इसमें उत्तर प्रदेश, देश में दूसरे स्थान पर रहा ।

स्वच्छता-सफाई से वंचित राज्यों में उत्तर प्रदेश, देश में छठे स्थान पर है किन्तु इसने निश्चय ही इस क्षेत्र में इधर काफी सुधार किया है । फिर भी, अभी भी 31.20 प्रतिशत जनसँख्या स्वच्छता से वंचित है। झारखण्ड की स्थिति सबसे दयनीय है। केरल सबसे स्वच्छ राज्य रहा। बिजली की उपलब्धता जीवन को सुचारू रूप से चलाने एवं विकास प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए अति आवश्यक है ।बिजली की अनुपलब्धता एक बड़ी कमी है । बिजली कि वंचना में उत्तर प्रदेश, देश में दूसरे स्थान पर रहा है लेकिन यह भी मानना चाहिए कि बिजली कि स्थिति में योगी सरकार ने काफी सुधार किया है। बिजली से वंचित लोगों का प्रतिशत 2015-16 में 27.43 था लेकिन अब इस सुविधा से वंचित लोगों का प्रतिशत घट कर केवल 9.0 रह गया है ।जहाँ तक सम्पत्ति कि उपलब्धता से वंचित लोगों का प्रश्न है इसमें इसकी स्थिति काफी सुधरी हुई लगती है।बड़ी आबादी होने के बावजूद इस सुविधा से वंचित जनसँख्या का प्रतिशत केवल 12.4 रहा ।

नगालैंड में इस सन्दर्भ में सबसे ख़राब स्थिति रही जहाँ इसका प्रतिशत 33.91 रहा। बहु आयामी गरीबी का यह विश्लेषण यह खुलासा कर देने के लिए पर्याप्त है कि उत्तर प्रदेश कि एक बड़ी जनसँख्या गरीबी कि गिरफ्त में भी है और संत्रस्त भी। फिर भी इस विवेचना के दायरे को और भी आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। भीतर झांकने पर पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के अंदर जिलों के भीतर भी गरीबी-असमानता कि गहरी खाई है। लखनऊ, गरीबी से सबसे कम ग्रस्त है। यहाँ जनसंख्या का 12.16 प्रतिशत ही गरीब है। इसके पश्चात कानपुर नगर (14.34%)एवं गौतम बुद्ध नगर (17.08%) का स्थान आता है। इसके विपरीत कुछ ऐसे जिले भी हैं जो कि अभी भी गरीबी के घर बने हुए हैं। लखीमपुर खीरी (59.95%), बलरामपुर (69.45%) और बहराइच (71.88%)के साथ गरीबी के टापू बने हुए हैं। सबसे दयनीय स्थिति श्रावस्ती जिले की है जहाँ कि जनसँख्या का 74.38 प्रतिशत गरीब है ।

उपर्युक्त विश्लेषण के क्या निहितार्थ हैं? नीति आयोग ने गरीबी कि अवधारणा को न केवल व्यापक रूप दिया है वरन ज्यादा पारदर्शी भी बनाया है। इसके परिणाम स्वरूप गरीबी के सन्दर्भ में न केवल जनता के लिए नीति निर्माण करना सरल हुआ है वरन इससे लागू किये गए प्रोग्रामों कि उपादेयता का  बेहतर आंकलन कर पाना भी संभव बन पड़ा है। देश, गरीबी हटाओ का नारा भूला नहीं है और न ही उत्तर प्रदेश-उत्तम प्रदेश बन गया की उद्घोषणा को। उत्तर प्रदेश में गरीबी, अपने विविध आयामों के साथ विकराल रूप धारण कर खड़ी है। पोषण की समस्या का निदान नहीं हो पा रहा और न ही मातृत्व स्वास्थ्य- सुरक्षा का।

जीवन स्तर में सुधार के प्रयास नाकाफी हैं। श्रावस्ती और बहराइच जिलों की जनता जानना चाहती है कि उत्तर प्रदेश के बनने के इकहत्तर साल बाद भी उनकी गरीबी इकहत्तर प्रतिशत क्यों है ? मुख्यमंत्री बदलते गए लेकिन गरीबी का दंश नहीं गया। नीति नियंता वैरागी हों या सांसारिक, दोनों को नीति आयोग ने बता दिया है कि सार्थक परिणाम के लिए सार्थक कदम उठाने कि आवश्यकता होती है। नारों से मन भरता है-जीवन संवरता नहीं। बहु  आयामी गरीबी के आईने ने गरीबी का सच बता दिया है। अब आप ही बताइये, उत्तर प्रदेश- उत्तम प्रदेश बना कि नहीं?

(लेखक विमल शंकर सिंह, डीएवीपीजी कॉलेज, वाराणसी के अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष थे।)

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