Wednesday, May 18, 2022

उपराष्ट्रपति जी भगवाकरण ही नहीं, उस पर आपका सवाल भी गलत है

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पिछले दिनों उत्तराखंड में हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई शांति एवं सुलह संस्थान का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने यह सवाल पूछकर देशवासियों के बड़े हिस्से को बुरी तरह चौंका डाला कि भगवाकरण में गलत क्या है? इस सवाल के सिलसिले में उन्होंने यह भी कहा कि ‘हम पर प्रायः शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगाया जाता है’ और उसमें जोड़ा कि ‘भारतीयों को औपनिवेशिक मानसिकता त्याग देनी चाहिए और अपनी भारतीय पहचान पर गर्व करना सीखना चाहिए।’

इतना ही नहीं, अभी तक चली आती मैकाले की शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह खारिज करने का आह्वान करते हुए उन्होंने उसके भारतीयकरण को इस अंदाज में देश की नई शिक्षा नीति का केंद्र बताया, जैसे भगवाकरण व भारतीयकरण एक दूजे के पर्याय हों। चूंकि ये दोनों कतई पर्याय नहीं बल्कि विलोम हैं, इसलिए उनके इस आह्वान ने कई मायनों में यह भ्रम भी रचा था वे समझते नहीं हैं कि संविधान की कसौटी पर परखें तो भगवाकरण ही नहीं, उनका उसके बारे में यह सवाल पूछना भी गलत ही है।

दरअसल, 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद से ही उसके मंत्रियों सहित भारतीय जनता पार्टी के ज्यादातर नेता न सिर्फ शिक्षा बल्कि देश की प्रायः सारी प्रणालियों व संस्थाओं के भगवाकरण के कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष एजेंडे के तहत लगातार बढ़ती आक्रामकता के साथ बार-बार यह सवाल पूछते रहते हैं और जब भी पूछते हैं, उन्हें जवाब दिया जाता है। लेकिन वे उसे सुन नहीं पाते। क्योंकि उन्होंने अनसुनी की ऐसी परम्परा विकसित कर ली है, जिसमें न दूसरों के सवाल सुने जाते हैं और न ही अपने सवालों के उनके द्वारा दिये गये जवाब। परस्पर संवाद का तो खैर सवाल ही नहीं। इसलिए इस परम्परा के पूजकों द्वारा उन सवालों को भी पूछा जाता रहता है, जिनके जवाब कई बार दिये जा चुके होते हैं। लेकिन इस बार यह सवाल इस अर्थ में कहीं ज्यादा विचारणीय है कि उपराष्ट्रपति के मुखारविन्द से निकला है, संभवतः पहली बार।

गौरतलब है कि हम राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक कहते हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनके दायित्वों का निर्वहन करने वाले उपराष्ट्रपति स्वाभाविक ही दूसरे नागरिक हुए। राग-द्वेष से परे रहकर संविधान के अनुरूप सत्ता संचालन के उद्देश्य के प्रति जैसे समर्पण की अपेक्षा राष्ट्रपति से की जाती है, वह कमोबेश उपराष्ट्रपति से भी जुड़ती ही है। ऐसे में उपराष्ट्रपति के सवाल पर जानने से पहले इस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी है कि उन्होंने यह कहकर कि ‘हम पर शिक्षा के भगवाकरण का आरोप है’, भाजपा की केन्द्र व प्रदेश सरकारों पर प्रायः लगने वाले इस आशय के आरोपों को खुद पर क्यों ले लिया?

अगर उनका उद्देश्य यह जताना था कि उपराष्ट्रपति होने के बावजूद उनका और इन सरकारों का सम्बन्ध ‘वागर्थाविवसम्पृक्त’ है, तो इसे नरेन्द्र मोदी सरकार के दौरान तेजी से हो रहे देश की संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण के नया मुकाम हासिल कर लेने के अलावा और किस रूप में देखा जा सकता है? फिर भी, क्या उपराष्ट्रपति को भाजपा या उसकी सरकारों के प्रवक्ता के तौर पर उनकी ओर से सवाल पूछने या उन पर लगे आरोपों को खुद पर लगा मानकर सफाई देने का अधिकार है? अगर नहीं तो ‘भगवाकरण में गलत क्या है’ पूछकर क्या उन्होंने खुद को ही कठघरे में नहीं खड़ा कर लिया है?

तिस पर विडम्बना यह कि समझदार के लिए इशारा काफी मानें तो, वे अपने सम्बोधन में भगवाकरण को भारतीयकरण के बराबर रखकर खुद को ऐसा इशारा करने से भी नहीं बचा पाये, जिससे पता चलता है कि भगवाकरण में गलत क्या है? 

निस्संदेह, भगवाकरण के सरकारी सिलसिले में सबसे ज्यादा गलत यही है कि उसे भारतीयकरण का पर्याय बनाकर देश की विरासत व संस्कृति को संकीर्ण संदर्भ दिये जा रहे हैं, जबकि आज की तारीख में वह बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता के पैरोकारों की कुटिल मंशाओं का ही प्रतिनिधित्व करता है और किसी भी लोकतांत्रिक परम्परा या मूल्य से नहीं जुड़ता। दूसरे शब्दों में कहें तो वह देश के बहुलवादी स्वरूप और सारे धर्माें व पंथों के लिए बराबरी की गारंटी देने वाले संविधान की मूल भावना के ही खिलाफ है। तिस पर कोढ़ में खाज यह कि मैकाले को तो पता नहीं कि अपने अपराध का बोध था या नहीं, भगवाकरण के ‘उन्नायकों’ को अपने अपराध का किंचित भी बोध नहीं है। ये ‘उन्नायक’ उसकी आड़ में देश को जिन संकीर्णताओं और बेहिस टकरावों की ओर ले जा रहे हैं, भारत की परम्परा व पहचान कभी भी, यहां तक कि उसके अंधकारकाल में भी, उनसे जुड़ी नहीं रही।

यह विडम्बना तो हम आज अपने लोकतंत्र के साढ़े सात दशकों बाद देख रहे हैं कि हमारे उपराष्ट्रपति जानबूझकर ऐसा जता रहे हैं कि उनको नहीं मालूम कि भगवाकरण में गलत क्या है और भाजपाशासित कई राज्यों की सरकारें भगवाकरण के एजेंडे के तहत उस श्रीमद्भगवद्गीता को अपने स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल कर रही हैं, जो हिन्दू धर्म की अमानवीय वर्ण-व्यवस्था की खुल्लमखुल्ला हिमायत करती, ईश्वरनिर्मित बताती और भारतीय संविधान के समता के मूल्यों को मुंह चिढ़ाती है।

इन सरकारों का दावा है कि वे केंद्र की नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की तर्ज पर ही इस दिशा में बढ़ रही हैं और यह तक नहीं समझतीं कि अतीत की दुनिया में धर्म के नाम पर आई सत्ताओं ने घृणा का प्रसार ही किया है। फिर वे यही क्यों कर समझने लगीं उनसे जुड़े अंदेशों को दरकिनार करने के लिए ही हमारे संविधान में व्यवस्था की गई है कि वह किसी भी धर्म को प्रचारित या प्रोत्साहित नहीं करेगा, न ही किसी धर्म के प्रति पक्षपात करेगा-वह बहुसंख्यकों का धर्म हो तो भी, अल्पसंख्यकों का हो तो भी। यकीनन, इस बहुधर्मी-बहुभाषी देश की एकता व अखंडता की सुरक्षा का इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।  

आज उपराष्ट्रपति कुछ भी पूछें, संविधान की उलटी दिशा में यात्रा के अनर्थ चारो ओर दृष्टिगोचर होने लगे हैं। दुनिया भर में देश का मान व प्रतिष्ठा बढ़ाने के प्रधानमंत्री के दावे के विपरीत उदात्त देश के रूप में उसकी छवि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संकट का सामना करने लगी है। पिछले दिनों कर्नाटक में भगवाकरण के समर्थक अपनी शुभचिन्तक सरकार की शह पर अल्पसंख्यक समुदाय की छात्राओं के हिजाब पहनने को लेकर बवाल में अशालीनता व अभद्रता पर उतरने लगे तो श्रीलंका के एक समाचारपत्र ने एक कार्टून में उसकी महाभारतकालीन चीरहरण से तुलना कर डाली।

उसका आशय था कि महाभारतकाल में राजसभा में हुआ द्रौपदी का चीरहरण इक्कीसवीं सदी के भारत में अल्पसंख्यक छात्राओं के हिजाबहरण तक आ पहुंचा है। इस जगहंसाई के बावजूद भगवाकरण के मनमानी बरतने पर आमादा समर्थकों को इस सवाल का सामना करना गवारा नहीं कि जिस देश में नगा साधुओं के निर्वस्त्र संचरण और महिलाओं के लम्बे-लम्बे घूंघटों की परम्परा रही है, उसमें इन्हें बख्शकर केवल हिजाब का आक्रामक विरोध क्या उनकी अंधता का ही परिचय नहीं देता? हिजाब किसी धर्म का अनिवार्य अंग हो या नहीं, इस अंधता का औचित्य नहीं सिद्ध किया जा सकता।

सच तो यह है कि आजादी के बाद के अपने इतिहास में यह देश धर्म के आधार पर संकीर्ण नजरिये को लेकर शायद ही कभी इतनी आलोचना का शिकार हुआ हो क्योंकि उसकी पूर्ववर्ती सरकारें संविधान की विराट, व्यापक और उदार सोच से थोड़ी-बहुत इधर-उधर भले होती रही हों, समानता व धर्मनिरपेक्षता के मार्गदर्शक सिद्धांतों को तिलांजलि देकर उसकी सर्वथा उलटी दिशा में नहीं ही चलती थीं, जबकि पिछले कुछ बरसों में भगवाकरण के चक्कर में धार्मिक सद्भाव को ढोंग और धर्मनिरपेक्षता को अवांछनीय बनाकर हाशिये पर डाल दिया गया है, जिसके चलते धार्मिक अल्पसंख्यकों के दमन व उत्पीड़न की खबरें आम हो गई हैं। तथाकथित धर्मसंसदों और मन्दिरों के प्रबंधनों द्वारा उनके संहार व बहिष्कार तक के आह्वान किये जा रहे हैं। जहां पहले हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने वाली फिल्में टैक्स फ्री की जाती थीं, अब नफरत फैलाने वाली ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्में टैक्स फ्री की जाने लगी हैं।

इसके बावजूद उपराष्ट्रपति पूछ रहे हैं कि भगवाकरण में गलत क्या है तो सोचिये कि क्या हमें एक बार फिर वैसे ही अंधेरों के हवाले नहीं किया जा रहा है, जिनके कारण हम कभी लम्बी औपनिवेशिक दासता को अभिशप्त हुए थे? 

(कृष्ण प्रताप सिंह दैनिक अखबार जनमोर्चा के संपादक हैं।)

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