हमने नाइजीरिया को भी पछाड़ दिया है !

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भारत ने अब नाइजीरिया को पछाड़ दिया है। यह वाक्य आप को हैरान कर देगा कि नाइजीरिया और भारत का क्या मुकाबला कि उसे पछाड़ने का उल्लेख किया जा रहा है। लेकिन हमने जिस संदर्भ में नाइजीरिया को पछाड़ा है, वह है अत्यंत विपन्न लोगों की संख्या और अनुपात। भारत में गरीबी रेखा से जो जनसंख्या नीचे थी, उनमें 85 मिलियन लोगों की और वृद्धि हुयी है। यह कहना है कृषि अर्थशास्त्री डॉ. देवेंदर शर्मा का जो भारत में खेती किसानी और उससे जुड़े आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं, और इस विषय पर अक्सर पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखते रहते हैं। उनका यह भी कहना है कि ‘कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दुष्प्रभाव का आकलन अभी नहीं किया जा सका है।’

इस पर अभी अध्ययन चल रहा है। इसके निदान के बारे में चर्चा करते हुए वे सुझाते हैं कि “इस गम्भीर विपन्नता की स्थिति से उबरने के लिये दुनिया भर की सरकारों को, कम से कम 100 बिलियन डॉलर की रकम विभिन्न योजनाओं में खर्च करनी पड़ेगी, जो फिलहाल अर्थव्यवस्था की स्थिति को देखते हुए लगभग असंभव है। समाज में अमीर गरीब के बीच जो खाई दिनोंदिन बढ़ रही है, उसके असर सामाजिक ताने बाने और अपराध पर भी पड़ेंगे। ऐसा मेरा मानना है। 

सरकार का आर्थिक मॉडल क्या है, यह सवाल सरकार के किसी भी व्यक्ति या समर्थक से पूछिए वह आप को नेहरू मॉडल, नरसिम्हा राव मॉडल और मनमोहन सिंह मॉडल की हज़ार कमियां गिना जाएगा, सत्तर साल की आर्थिक कमियां जो उसे व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी से एंटायर इकोनॉमिक्स के रिसर्चरों ने दी हैं, बता जाएगा, पर वर्तमान सरकार की आर्थिक नीति क्या है, इस पर वे कुछ नहीं बोलेंगे। नीति आयोग की नीति की बात कीजिये तो, वह निजीकरण का प्रबल पक्षधर है लेकिन निजीकरण किस नीति के अंतर्गत हो, यह वह स्पष्ट नहीं कर सकेगा। पूरी सरकार और पूरा थिंकटैंक एक अजीब सी नीति और विचार धुँधता की गिरफ्त में है। आज इसी का परिणाम है कि 2016 की नोटबन्दी के बाद से जीडीपी, मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स, आयात निर्यात, रुपये की कीमतें जो गिरना शुरू हुईं वह अब तक गिर रही हैं। आज हमारी तुलना में बांग्लादेश जैसा एक नया देश बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और हम धर्म की पिनक में मदहोश हो, श्रेष्ठतावाद की खोह में सरीसृप की तरह पड़े हुए हैं। 

दुनियाभर के देशों में जब से कोरोना जन्य लॉक डाउन ने लोगों को घरों में बंद कर के उनकी औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगाई है, तब से उनकी आर्थिक दुरवस्था से निपटने के लिये, अनेक देशों के केंद्रीय बैंकों ने लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर के नोट छापे हैं और उन्हें बाजार में डाला है। इतनी भारी संख्या में नोटों के छापने का कारण यह है कि लोगों तक यह नकदी पहुंचाई जाय जिससे वे बाजार में इसे खर्च करें, जिससे बाजार में मांग बढ़े और अर्थचक्र चल निकले। आज की स्थिति में बाजार मांग की कमी से जूझ रहा है। उसे गति देना बहुत ज़रूरी है। लोगों के पास, नकदी की कमी हो गयी है, ऐसा नौकरियां जाने और बाजार सहित अन्य क्षेत्रों में आर्थिक मंदी के काऱण हुआ है। अब उन्हें अपने मूलभूत आवश्यकताओं के लिये धन चाहिए तो नकदी धन दिया जा सके, सरकारों ने अतिरिक्त मुद्रा छापने पर विचार किया। 

इसके अतिरिक्त दुनियाभर की विभिन्न सरकारों ने आर्थिक पैकेज जिसे राहत पैकेज या स्टिमुलस पैकेज कहते हैं भी अपने अपने देश के लिए जारी किया है। लेकिन इस पर, मोर्गन स्टेनले इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट के चीफ ग्लोबल स्ट्रैटजिस्ट रुचिर शर्मा का कहना है कि, “महामारी के दौरान सरकार द्वारा जारी किए गए आर्थिक पैकेज, जिसे स्टिमुलस पैकेज भी कहा जाता है, ने गरीबों के बजाय अमीरों का ही अधिक भला किया है और इसका लाभ उन्हें ही मिला।” 

जबकि संक्रमण और संक्रमण जन्य मृत्यु के आंकड़े देखिये तो अधिकतर पीड़ित मध्यम और निम्न वर्ग के ही लोग रहे हैं। यह स्थिति वैश्विक है। रुचिर शर्मा आगे कहते हैं कि, “स्टिमुलस पैकेज का अधिकांश भाग वित्तीय बाजारों में ही झोंका गया है, जहां से वह केंद्रित होकर अति समृद्ध लोगों के खजाने में ही गया।” 

16 मई के फाइनेंशियल टाइम्स में लिखे एक लेख में रुचिर कहते हैं कि, “इसी अवधि में अति समृद्ध लोगों की पूंजी में 5 ट्रिलियन से 13 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि हुयी है। हैरानी की कोई बात नहीं कि अमीरों के लिए बाजार में पैसा भरा पड़ा है पर दुनिया अपने लोगों को महामारी के इस संकट से निकालने के लिये धनाभाव से जूझ रही है।”

यह आंकड़ा भारत के संदर्भ में ही नहीं बल्कि वैश्विक है। 

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि, यह सब जनता के हित के लिये, जनता को ही दी गयी मदद के धन को सरलता से अति समृद्ध लोगों की जेब में डालना है। वित्तीय संस्था ब्रूकिंग्स ने अनुमान लगाया है कि, दुनियाभर में 144 मिलियन आबादी, वर्ष 2020 में गरीबी रेखा के नीचे आ गयी है। अब अगर केवल भारत की बात करें तो विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आकलन के अनुसार अपनी जनसंख्या को गरीबी रेखा के नीचे पहुंचाने में भारत ने नाइजीरिया को पछाड़ दिया है। बड़ी संख्या में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली भारतीय जनसंख्या में अब तक 85 मिलियन आबादी और जुड़ गयी है। अभी कोरोना के दूसरी लहर का आकलन अभी शेष है। 

हम अक्सर एक बेहतर अर्थव्यवस्था की ओर वापस लौट जाने की बात करते है, उसकी उम्मीद बंधाते हैं, और बार-बार अपनी जनता को याद दिलाते हैं कि हम 5 ट्रिलियन की इकॉनमी की ओर बढ़ चलेंगे। पर जब हम, यह सब दिलासा भरी बातें कहते हैं तो, दुनियाभर में कोरोना ने आर्थिकी का कितना नुकसान पहुंचाया है और उससे उबरने में कितनी पूंजी लगेगी और उसका रोडमैप क्या होगा, इसे हम या तो भूल जाते हैं या जानबूझकर कर इन जटिल और बेचैन करने वाले सवालो से दूरी बना लेते हैं। संभवतः हम यह भी समझ नहीं पाते हैं कि, इस गम्भीर विपन्नता से निकलने और महामारी पूर्व की स्थिति में पहुंचने के लिये दुनियाभर के देशों को कुल 100 बिलियन डॉलर व्यय करने की आवश्यकता पड़ेगी। रुचिर शर्मा इस धनराशि को वैश्विक आंकड़े के रूप में बताते हैं।

हमने अब तक कोरोना के स्टिमुलस पैकेज के रूप में जो भी धन व्यय किया है उसने अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं किया है, बल्कि वह रही सही पूंजी भी अति धनिक लोगों के ही पास पहुंच कर एकत्र हो गयी है और इससे आर्थिक विषमता की खाईं और चौड़ी हुयी है। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि गरीबों के लिये जारी किए गए आर्थिक पैकेज की रकम गरीबों के पास न पहुंचे और वह पूंजीपतियों के पास ही सिमट जाय। सरकार ने कुछ पैसा ज़रूर गरीबों को उनके खातों और हांथ में दिया और उसका उद्देश्य था वे अपनी ज़रूरतों पर खर्च करें, लेकिन, स्टिमुलस पैकेज का अधिकांश भाग, लुभावनी नाम वाली योजनाओं और कॉरपोरेट को राहत पहुंचाने के नाम पर बाजार में कोई मांग पैदा किये बिना ही, पूंजीपतियों के पास पहुंच गया।

पूंजी, पूंजी को खींचती है और श्रम, शोषित होने को अभिशप्त रहता है। यह सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है। पिछले कुछ सालों से, सम्पन्न देशों के केंद्रीय बैंक जैसे हमारे यहां रिज़र्व बैंक हैं, अक्सर जितनी नोटें छापनी चाहिए, उससे अधिक नोटें छापता रहा है और उसे बाजार में डालता रहा है। पर यह गुत्थी, अब भी अर्थ शास्त्रियों को समझ में नहीं आयी कि, यह सब करेंसी, जिन्हें गरीबों में उनकी बेहतरी के लिये सरकार ने छाप रही है, वह उन गरीबों का जीवन बेहतर किये बगैर, कैसे अति धनिकों की तिजोरी में एकत्र हो जा रही हैं ? आज भी दुनियाभर की सरकारें, इस संकट से रूबरू हैं कि, वे देश में व्याप्त विपन्नता का कैसे सामना करें। डॉ. देवेंदर शर्मा एक रोचक तथ्य बताते हैं। वे कहते हैं कि “यदि इन्हीं स्टिमुलस पैकेज का कुछ अंश भी गरीबों तक इस मुसीबत की घड़ी में उनके पास पहुंच गया होता तो भी यह दुनिया कुछ बेहतर होती। पर ऐसा हुआ क्यों नहीं यह एक जटिल औऱ गम्भीर प्रश्न है।”

यूँ तो अमीर और गरीब के बीच खाईं तो पहले से ही विद्यमान थी, पर इस महामारी ने इस अंतर को और बढ़ा दिया है। यह अंतर अब बेहद अप्रिय स्तर तक पहुंच गया है। अमेरिका की शोध संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिसी स्टडी ने एक अध्ययन में बताया है कि, खरबपतियों की संयुक्त पूंजी में 44.6 % की वृद्धि हुयी है। यह एक गम्भीर संकेत है कि विपन्नता के सागर में समृद्धि का यह द्वीप एक खतरनाक बिंदु की ओर जा रहा है। जिस अवधि में खरबपतियों की संयुक्त दौलत में 44.6 % का इजाफा हो रहा है, उसी अवधि में 80 मिलियन लोगों की नौकरियां चली गयीं। उनकी रोजी रोटी पर पड़ा इस दुष्प्रभाव ने, उन्हें अचानक अर्श से फर्श पर लाकर पटक दिया है। आज अमेरिका के 50 अति धनिकों के पास जितनी कुल सम्पत्ति है, वह 150 मिलियन आबादी की कुल पूंजी के बराबर है। यह आज के आर्थिकी का कमाल है। अर्थव्यवस्था के मॉडल का दुष्परिणाम है। 

भारत में स्थितियां इसी तरह की हैं। बस संपत्ति के आंकड़े में अंतर है। डॉ. देवेंदर शर्मा मूलतः एक कृषि अर्थशास्त्री हैं तो वे एक उदाहरण कृषि सेक्टर से देते हैं। वे कहते हैं कि, “2013 के नेशनल सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) के एक आंकड़े के अनुसार, लगभग 50% आबादी, खेती किसानी पर निर्भर है और वह औसतन, ₹ 6,424 पर, जो कुछ खेती से मिलता है और कुछ अन्य स्रोतों से, (यानी आधा अंश अन्य स्रोतों से), पर गुजर बसर करती है।” 

इसीलिए आज देश के किसान पिछले 7 महीने से अपनी नियमित आय के लिये सरकार से मांग करते हुए एक शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। सरकार ने 2022 में उनकी कृषि आय को दुगुनी करने का वादा भी किया है, पर सरकार को आज तक यह पता नहीं है कि वह इस वादे को कैसे पूरा करेगी। किसान, सरकार से उन्हीं के वादे के अनुसार, स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने, 5 जून 2020 को बनाये तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने और एमएसपी को कानूनी रूप दिए जाने के लिये 26 नवम्बर से संघर्षरत हैं। वे कृषि के कॉरपोरेटीकरण के खिलाफ हैं और देश की कृषि संस्कृति को बचाना चाहते हैं। पर सरकार ने एक शर्मनाक खामोशी अख्तियार कर रखी है। 

अक्टूबर 5, 1942 में ऑक्सफोर्ड फैमीन रिलीफ नामक एक गैर सरकारी संस्था का गठन अकाल और अमीर तथा गरीब के बीच बढ़ती खाई का अध्ययन करने के लिये किया गया था। इसे ऑक्सफैम कहा गया। इसमें 20 देशों के अर्थशास्त्री सम्मिलित हैं जो आर्थिक विषमता पर नियमित अध्ययन करते रहते हैं। इसी ऑक्सफैम ने एक ‘इनइक्विलिटी वायरस रिपोर्ट’ के नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। उस रिपोर्ट के अनुसार, देश के अरबपतियों की पूंजी में 35% की वृद्धि कोरोना महामारी के दौरान हुयी है। ऑक्सफैम ने अपनी रिपोर्ट को सरलीकृत करते हुए कहा है कि, देश के 11 अरबपतियों के पास जितनी पूंजी है, उससे देश में 10 साल तक, मनरेगा कार्यक्रम चलाया जा सकता है। यानी उनकी पूरी पूंजी 10 साल के मनरेगा बजट के बराबर है। इसे ऐसे समझें, शीर्ष में 1% के पास जो सम्पत्ति है वह निम्न स्तर पर 953 मिलियन लोगों की कुल हैसियत के बराबर है। 

महामारी के दौरान ध्वस्त हो रही आर्थिकी को संभालने के लिये दुनियाभर के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने जनता को नकद धन देने की योजना को लागू करने पर बल दिया। सरकार ने हालांकि ₹ 2000 की रकम किसान सम्मान निधि के रूप में दिया है लेकिन विपन्नता को देखते हुए यह राशि नाकाफी है। कम से कम 6,000 प्रति माह देने की बात भी विशेषज्ञों की तरफ से कही गयी। पर सरकार ने इसे नहीं माना। जो महामारी में राहत के नाम पर पैकेज दिए गए वे टैक्स कंसेशन, तथा अन्य राहत के रूप में कॉरपोरेट को ही दिए गए। इसका यही परिणाम निकला कि राहत के धन से पूंजीपति ही अधिक समृद्धि हुए। 

जनता को दी गयी नक़द रकम कैसे जनता की आर्थिक स्थिति में बदलाव लाती है, इसका एक उदाहरण डॉ. देविंदर शर्मा ने अपने लेख में दिया है। दो साल पहले 2018 में एक चैरिटेबल संस्था, फाउंडेशन फ़ॉर सोशल चेंज ने कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के साथ मिल कर एक अध्ययन किया। उन्होंने, वैनकोवूर क्षेत्र के, 50 गृहरहित लोगों को, कुल 7,500 कनाडियन डॉलर, (यूएस $ 6,206) प्रति व्यक्ति की दर से दिया। उन्होंने इस पर भी नज़र रखी कि वे 50 लोग किसे और किस तरह से यह धन व्यय करते हैं। इसके बेहद आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए। इसी तरह के परिणाम अन्य जगहों पर किये गए अध्ययनों में भी आये हैं। 

जब गरीबों को नकद धन देने की बात की गयी तो, यह भी कहा गया कि, यह नक़द धन बेकार ही दिया जा रहा है, गरीब जनता इस धन का सदुपयोग नहीं करेगी और यह रकम वह अनाप शनाप रूप से खर्च कर डालेगी। यह धारणा, न केवल भारत में ही फैल रही थी, बल्कि यही धारणा दुनियाभर के गरीबों के बारे में फैलाई जा रही थी। लेकिन जब उपरोक्त अध्ययन किया गया तो उसके सुखद परिणाम सामने आए। जिन लोगों को यह नक़द धन दिया गया उन्होंने उसका खर्च सोच समझकर और अपनी जरूरतों के अनुसार ही किया और उस धन का दुरुपयोग नहीं किया। उन्होंने इसका उपयोग, अपनी असली ज़रूरतों को पूरी करने, खाने, कपड़े, घर और अन्य उपयोगी चीजों पर व्यय किया। उन्होंने भोजन और अन्य, ज़रूरी चीजों पर जो व्यय किया उनमे 37% की वृद्धि हुई और शराब आदि पर 39% व्यय कम हुआ।

उन्होंने जीवन की मूलभूत समस्याओं, रोटी, कपड़ा, मकान के ही मद में इस नकद धन को व्यय किया। यह प्रवृत्ति पूरी दुनिया में किये गए अलग-अलग अध्ययनों में सामने आयी। इस व्यय का असर बाजार पर भी पड़ा और बाजार में मांग बढ़ी औऱ रौनक भी। इससे यह निष्कर्ष अर्थशास्त्रियों ने निकाला कि यदि नकदी धन गरीबो में बांटा और उन्हें अपनी मूलभूत ज़रूरतों के अनुसार व्यय करने के लिये प्रेरित किया जाय तो उन्हें गरीबी के दलदल से खींच कर निकाला जा सकता है। यह मुफ्तखोरी नहीं है, और न ही दान है। यह उस तबके को उनके आर्थिक संकटों से निकालने का उपक्रम है, जो महामारी के कारण आर्थिक मंदी का संकट झेल रही है। 

अब यह सवाल उठता है कि सरकार ने जो राहत पैकेज जारी किए थे, उनका क्या लाभ जनता को मिला ? कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान सरकार ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज जारी किए। पांच दिन लगातार, वित्तमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस चलती रही। पर आज इस पर सरकार का कोई भी नुमाइंदा ज़ुबान खोलने को राजी नहीं है कि, उक्त राहत पैकेज का लाभ किसे मिला। लोगों को इस महामारी से निपटने के लिए इस राहत पैकेज से कितनी राहत नसीब हुयी। सरकार ने केवल घोषणा करना और अपनी मन की बात तक करने में खुद को केंद्रित कर रखा है। सरकार ने बजाय गरीब परिवारों को नकद धन देने के, कॉरपोरेट को टैक्स कंसेशन, आर्थिक स्टिमुलस पैकेज, बैंकों में उनके कर्ज़ राइट ऑफ करने, उन्हें उबारने के लिये तरह तरह के बेलआउट पैकेज दिए।

पर इन सबसे गरीबों की स्थिति में बहुत फर्क नहीं पड़ा, अलबत्ता कॉरपोरेट की ही पूंजी बढ़ी। यह एक बेहद हैरान करने वाला तथ्य है कि जब आम जनता की आय घट रही है, वे गरीबी रेखा से नीचे जा रहे हैं, उनकी नौकरियां जा रही हैं, उनका जीवनस्तर नीचे गिर रहा है, वे बच्चों की स्कूल फीस नहीं दे पा रहे हैं, उनका बजट अस्तव्यस्त हो रहा है, उनके मेडिकल खर्चे अनाप शनाप तरीके से बढ़ रहे हैं तब देश के कॉरपोरेट, और उनमें भी सरकार के बेहद प्रिय अम्बानी और अडानी ग्रुप की संपत्तियों में कैसे बेशुमार वृद्धि हो रही है ? यही क्रोनी कैपिटलिज्म यानी गिरोहबंद पूंजीवाद है। 

सरकार ने हर साल बजट में कॉरपोरेट को बेहद उदारता से धन और वित्तीय राहत दी। बैंकों ने दिए गए ऋणों को रिकार्डतोड़ तऱीके से माफ किये। इस पर कुछ मित्र यह कह सकते हैं कि, यह माफी नहीं है, बल्कि यह राइट ऑफ है। यह राइट ऑफ भी एक प्रकार से कर्ज की माफी ही है, और यह शब्द चातुर्य का एक उदाहरण है। पर जब किसानों की ऋणमाफी की बात आती है, उन्हें आर्थिक पैकेज देने की बात आती है तो सरकार से लेकर पूरी कॉरपोरेट लॉबी इसके खिलाफ खड़ी हो जाती है और सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता इस कदम को मुफ्तखोरी कहने लगते हैं।

यदि गरीबों को राहत देना मुफ्तखोरी है तो कॉरपोरेट को राहत देना मुफ्तखोरी क्यों नहीं है ? यह कहा जाता है कि जब जनता को अधिक पैसा देंगे या नोट अलग से छाप कर देंगे तो इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी। अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार यह कुछ हद तक सही भी लग सकता है। पर यह उपचार असामान्य परिस्थितियों के लिये है, न कि नियमित अर्थव्यवस्था के लिये। आज हम आर्थिकी के बेहद असामान्य दौर से गुज़र रहे हैं। हमें विशेषज्ञों से, हर पूर्वाग्रहों से अलग हट कर एक प्रोगेशनल राय, उपचार और निदान ढूंढना होगा कि हम कैसे इस भयावह आर्थिक दौर से सफलता पूर्वक बाहर निकलें। 

(रिटायर्ड आईपीएस अफसर विजय शंकर सिंह का लेख।)

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