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Monday, September 20, 2021

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बंगाल चुनाव: सम्भावना और राजनीतिक संघर्ष

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लेख- सुकेश झा

आगामी  27 मार्च से लेकर 29 अप्रैल तक पांच राज्यों में चुनाव होने हैं जिसमे बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल प्रमुख हैं। पॉन्डिचेरी अपेक्षाकृत एक छोटा राज्य है और वहाँ मात्र 30 विधानसभा की सीटें हैं। अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के शोर को देखा जाय तो लगता है मानो सिर्फ बंगाल में ही चुनाव हैं जबकि तमिलनाडु में सीटों की संख्या 234 है और असम में सत्ताधारी दल बीजेपी को जबरदस्त चुनौती मिल रही है। उत्तर भारत में भी जनता की रूचि बंगाल के चुनाव में ही है। 

अगर बंगाल के चुनाव को देखा जाय तो वहां मुख्यतः तीन दल चुनाव में हैं, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी नेतृत्व में सेक्युलर फ्रंट और तीसरा दल है मीडिया। जी, हां मीडिया क्योकि बंगाल चुनाव में बीजेपी है ये सिर्फ हिंदी मीडिया को ही पता है, जबकि जमीनी हकीकत ये है की बीजेपी को बंगाल में एक योग्य उम्मीदवार तक नहीं मिल रहा है। पूरे देश मे मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी के पास कोई एक चेहरा तक नहीं है बंगाल के लिए, एक नारा तक नहीं है। यानि की जमीन पर लड़ाई मूलतः तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन के बीच ही है। अगर दलवार चुनाव और उसकी तैयारी पे नजर डालें तो तीनो दलों के भूत और वर्तमान को समझना होगा तभी भविष्य स्पष्ट दिखेगा। 

तृणमूल कांग्रेस पिछले दो टर्म से राज्य की सत्ता पे है। “माँ माटी मानुष” के नारे के साथ सत्ता में आयी ममता बनर्जी ने भले ही बंगाल के लिए कुछ नहीं किया हो लेकिन बंगाल में वह एक मजबूत दावेदार है। हालाँकि 2018 के बाद से ही TMC एक निरंतर क्षरण के दौर से गुजर रही है, पिछले तीन सालो में ऐसा कोई महीना नहीं गुजरा होगा जब TMC के किसी बड़े नेता ने BJP नहीं ज्वाइन किया हो। आज ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा टक्कर देने वालो में पुराने TMC के नेता ही हैं जिनमे शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, दिनेश त्रिवेदी प्रमुख हैं। ध्यान से देखा जाए तो TMC के इस पतन का कारण इस दल के निर्माण में ही लिखी हुई थी। 

अगर TMC के इतिहास पे नजर डालें तो इसका जन्म ही कॉर्पोरेट के हितो के लिए हुआ था। दस साल पहले सोची समझी रणनीति के तहत वाम का किला ढहाया गया, क्योकि वह केंद्र और राज्य में अम्बानी-जिंदल (उस वक़्त अडानी उतने मजबूत नहीं थे) जैसे कॉर्पोरेट की मनमानी नहीं चलने दे रही थी। कॉर्पोरेट ग्रुप ने एक सोची समझी रणनीति के तहत ममता बनर्जी को अपना टूल बनाया और साथ लिया दक्षिण भारत के नक्सली समूह का, TMC को धन, बल, हथियार एवं भावनात्मक मुद्दे से मजबूत किया गया। उस वक़्त अटल बिहारी की केंद्रीय सरकार ने इसके सभी गैरकानूनी कर्मों पर आँखे बंद कर इसे हिटलर की ताकत दी और इसने न सिर्फ वामपंथी सरकार गिरायी बल्कि सैकड़ो वामपंथी कार्यकर्ताओ की भी हत्या की। धन-बल के लिए शारदा चिट फण्ड घोटाले तक को दबा दिया गया और वो पैसा TMC नेताओं को स्थापित करने में खर्च कर दिया गया। आश्चर्य तो इसमें ये है की बंगाल की जनता ने भी इस मुद्दे पर दोषियों के पक्ष में ही वोट डाले।

वर्तमान में लगातार नेताओ के पलायन से TMC कमजोर जरूर हुई है, लेकिन स्थनीय माफियाओ, बिल्डर और वोट जुटा पाने वाले दलालों का समर्थन अभी भी इसे प्राप्त है जो की इसके मजबूती का सबसे बड़ा कारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्पोर्ट्स क्लब के दबंग नेता और असंगठित व्यवसाय के माफियाओ में TMC की अभी भी पैठ है। TMC ने बंगाल में जो सबसे घिनौना काम किया वो था धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीती। इससे इसे तत्कालिक लाभ तो जरूर मिला लेकिन इस ध्रुवीकरण ने प्रतिक्रियात्मक धुर्वीकरण की जमीं तैयार कर दी और भाजपा को हिन्दू कार्ड खेलने का उचित अवसर दे दिया जो आज उसकी सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है। कॉर्पोरेट का समर्थन अब ममता के पक्ष में बिलकुल नहीं है इससे इसे अब लड़ने में धन की भी दिक्कत हो रही है। कुल मिला कर इस बार TMC के लिए करो या मरो की स्थति है और यही कारण है कि ममता बनर्जी अपने विधानसभा सीट भवानीपुर को छोड़ कर नंदीग्राम से लड़ रही है।   

अगर मीडया प्रायोजित दल बीजेपी की बात की जाए तो इतना कहना ही काफी होगा कि जिस दल के पास 18 सांसद हों, उस दल को राज्य के चुनाव में पर्याप्त उम्मीदवार ही नहीं मिल रहे हैं। अब तक घोषित 280 उम्मीदवार में 79 TMC के पूर्व विधायक हैं और करीब 28 अन्य दलों के, उससे भी ज्यादा हास्यास्पद बात ये है की अब तक कुल 07 उम्मीदवारों ने बीजेपी की लिस्ट में नाम आने के बाद चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया और लिस्ट के फर्जी होने की घोषणा की।

चुनावो को चेहरे के नाम पे लड़ने वाली भाजपा बंगाल में अभी तक कोई चेहरा नहीं ढूंढ पाई है, कोई मुख्यमंत्री की घोषणा नहीं हुई बल्कि चेहरे की तलाश में वो कभी सौरभ गांगुली तो कभी मिथुन चक्रवर्ती के दरवाजे पे जाती है। भाजपा के पास कॉर्पोरेट का अथाह पैसा है जिसके दम पर वो ये चुनाव जितना चाहती है क्यों की दरअसल अभी तक वाम के लाल रंग के कारण बंगाल एक ऐसा मजबूत गढ़ था जहाँ अडानी अम्बानी अपना खेल खुल कर नही खेल पा रहे थे, ममता ने भी अपने अस्तित्व के लिए इन दोनों को ख़ास तवज़्ज़ो नहीं दी, इसलिए अडानी अम्बानी गैंग के लिए 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जीतना एक निर्णायक प्रश्न है। वह बंगाल को भी देश की ‘मुख्य धारा’ में शामिल करने के लिए हर कीमत देने को तैयार है, बीजेपी का विकास “मॉडल” अब बंगाल में भी दोहराए जाने को तैयार है।

हम सब जानते हैं कि अडानी का कब्जा पूरे देश की कोस्टल लाइन पर हो गया है। अडानी ग्रुप के पास देश का सबसे बड़ा पोर्ट नेटवर्क है। पश्चिमी तट के जितने भी प्रमुख बन्दरगाह है वह मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उसके नियंत्रण में आना शुरू हो गए थे। 2014 से 2019 के दौर में पूरी तरह से उसके कब्जे में आ चुके हैं। देश के पूर्वी तट पर भी एक-एक करके बन्दरगाह वह अपने कब्जे में कर रहा है, अब सिर्फ बंगाल का हल्दिया पोर्ट ही ऐसा है जहाँ उसे राज्य सरकार के प्रतिकार का सामना करना पड़ता है, हल्दिया पोर्ट से नेपाल तक को माल सप्लाई होता है, अतः ये चुनाव क्रोनी कैपिटल के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

ममता बनर्जी की ध्रुवीकरण की राजनीती ने भाजपा के लिए  खाद पानी का काम किया है और उसका हिंदुत्व कार्ड भी आसानी से चल निकला है। बाबरी मस्जिद कांड और मोदी लहर के बावजूद जिस बंगाल में आज तक BJP का खाता नहीं खुला था, ममता जी के ध्रुवीकरण की राजनीति ने महज दस साल में 18 सांसद भाजपा को दे दिए, अब बंगाल के सुखी सम्पन्न वर्ग के लोगो को भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे में राष्ट्र का विकास दिख रहा है और वे अपने पड़ोस के मुल्ले टाइट करने का ख्वाब देख रहे हैं। कुल जमा भाजपा के लिए दिल्ली जरूर आसान था लेकिन कोलकाता अभी दूर है। उसे अभी मीडिया कॉर्पोरेट्स और मध्यवर्ग का समर्थन जरूर हासिल है लेकिन जहां तक आम वोटर की बात है वह पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड है कि कौन नेता तृणमूल का है और कौन भाजपा का क्योकि जनता तृणमूल के गुंडागर्दी से त्रस्त है और उससे मुक्ति देने का दावा करने वाली पार्टी अंततः उसी तृणमूल के नेताओ से बनी पार्टी है इसलिए उनका विश्वास क्रमशः भाजपा से कम होता जा रहा है । 

बंगाल में 35 सालो तक शासन करने वाली वामपंथी दल आज बड़े संकट के दौर से गुजर रही है।  पिछले लोकसभा में उसके एक भी उम्मीदवार जीत नहीं पाए और साल दर साल उसकी विधानसभा में उपस्थिति जीरो की और अग्रसर हो रही है। उसके किले में सेंध लगाने वाली ममता बनर्जी की पार्टी आज स्वयं आपदाग्रस्त है। जिस कॉर्पोरेट्स के पैसे से उसने अपना महल खड़ा किया था। आज उसी क्रोनी कैपिटल के जबड़े में एक-एक कर उसके सभी नेता आते जा रहे हैं और भजपा में शामिल होते जा रहे हैं ऐसे में वामपंथी दलों में एक आशा का संचार हुआ है। उन्हें इस लड़ाई में अपने आगे बढ़ने का संकेत नजर आ रहा है, साथ ही अभी वामदलों ने दो काम किये हैं। पहला उन्होंने एक सेक्युलर फ्रंट बनाया है जो अल्पसंख्यको का ध्यान आकर्षित कर रहा है तथा उन्होंने अपने टीम में काफी युवा चेहरों को शामिल किया है जो जनता को नयेपन का अहसास करा रही है। उनके जन समर्थन का अहसास इस बात से लगाया जा सकता है कि इस विपरीत दौर में भी उन्होंने ब्रिगेड मैदान में 11 लाख लोगो की रैली की है, जबकि इसी वक्त भजपा जैसे दल को 2-4 लाख लोगों के जुटाने के लाले पड़ गए। 

नंदीग्राम में जहा एक ओर शुभेंदु अधिकारी BJP से और ममता बनर्जी तमसा से हैं वही CPM ने अपने युवा तुर्क नेत्री मीनाक्षी मुखर्जी को खड़ा कर सबको चौका दिया। 

तृणमूल के गुंडों से उन्होंने हाल में मुहतोड़ संघर्ष किया है और सड़क गलियों में उन्हें करार राजनैतिक जवाब दिया है। CPM ने अपने खोए हुए जनाधार और पार्टी ऑफिस पे वापस कब्जा भी किया है। सेकुलर फ्रंट की स्पष्ट नितियों से उन्होंने दलित और अल्पसंख्यक वोटरों को निश्चिंतता का अहसास भी कराया है कि उनका वोट आगे चल कर अमित शाह की झोली में नहीं जा गिरेगा।

2019  के लोकसभा चुनाव में इनका करीब 22% वोट भाजपा के पाले  में शिफ्ट हो गया था जिसका मूल कारण जनता का तृणमूल के गुंडागर्दी से, अत्याचार से त्रस्त होना और लोगों को लगा जमीं पर धन-बल से सिर्फ भाजपा ही इन गुंडों को ठिकाने लगा सकती है। लेकिन तृणमूल नेताओं के लगातार भाजपा में आने से जनता अब दोनों पे विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है, साथ ही साथ अल्पसंख्यक वोटरो को अपना नेता BJP में चले जाने वाली स्थिति से भी निजात चाहिए है,  ऐसे में आशा है की उस 22% शिफ्ट का करीब-करीब आधा वोट जरूर वाम में वापस आएगा। लेफ्ट ने इस बार चुनावी प्रचार में पदयात्रा कलाकारों संस्कृतकर्मियो का अच्छा उपयोग भी किया है। इस सेकुलर फ्रंट में बिहार की तरह कांग्रेस फिर से एक कमजोर कड़ी साबित हो सकती है जबकि उसने काफी ताकत लगा कर गठबंधन से 90 सीट झटके हैं। कांग्रेस के सीटो पर कार्यकर्ताओं का उत्साह और प्रचार अभियान की तीव्रता में उतनी वयापक नहीं है, उन्हें सिर्फ परम्परागत वोट की ही आशा है। 

नई ऊर्जा नीति और नए स्ट्रेटेजी से लैस लेफ्ट फ्रंट इस बार बंगाल कुछ बड़े उलटफेर करने की तैयारी में है बस EVM कोई खेल न कर दे, क्योकि बंगाल चुनाव में कॉर्पोरेट्स के बड़े हित साधे हुए हैं। अगर सीधी नजरों में देखा जाए तो TMC और लेफ्ट फ्रंट के बीच एक जोरदार टक्कर है, जिसमे भाजपा भी कुछ सीटें अवश्य जीतेंगी लेकिन बंगाल के कई भागों में लाल झंडे की  वापसी तय है।

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