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Categories: बीच बहस

बिहार में जो हो रहा है, वह किसी बगावत से कम नहीं!

सोचिए! अभी कुछ दिन पहले ‘मोदी-कॉरपोरेट’ ताकतों का डंका बज रहा था। कहा जा रहा था, ताकतवरों से कोई लड़ नहीं सकता! नीतीश कुमार को कोई हिला नहीं सकता। जनता? जनता की कोई बिसात नहीं! जो बिहारी प्रवासी मज़दूर करोना काल में हज़ारों मील चल कर, जान-माल खो कर, बिलखते बच्चों के साथ, पैदल घर पहुंचे हैं, वो भाजपा-जदयू को फिर से वोट देंगे! लेकिन मीडियाकर्मी भूल गए कि बिहार 1857-58 प्रथम सवतंत्रता संग्राम, 1942 Quit India Movement, 1940 में घटित स्वामी सहजानंद के नेतृत्व वाले किसान आंदोलन, 1960 कें समाजवादी आंदोलन, 1974 छात्र आंदोलन और 1974-75 के क्रांतिकारी उभार की उर्वर धरती है।

1857-58
यहां 1857-58 के अंग्रेज़-विरोधी महायुद्ध में राजपूत राजा कुंवर सिंह ने जगदीशपुर, आरा, बक्सर-रोहतास बेल्ट में ब्राह्मणों, राजपूतों, भूमिहार ब्राह्मणों, अहीरों, मुसलमानों और दलितों को साथ लेकर ऐसी लड़ाई छेड़ी कि अंग्रेज़ों की हार हुई।

वहीं नालंदा, बिहार शरीफ, गया, नवादा, जहानाबाद, मगध इलाके में भूमिहार ब्राह्मण जिवधर सिंह के नेतृत्व में दलित रजवारों, पासियों, मल्लाहों, अहीरों, पठानों ने मिल कर अंग्रेज़ों को खदेड़ दिया। दलित रजवार और अहीर (आज के यादव) कई जगह नेतृत्व में उभरे।

भागलपुर इलाके में भूमिहार ब्राह्मण उदय राय भट्ट, गुणी झा, दीन दयाल चौबे, याद अली, सूरजा मांझी, बाऊर मल्लाह ने नेतृत्व संभाला। मुंगेर में शहीदों ने सारे समीकरण धवस्त कर दिए। एक तरफ लमहुआ शाही और गंबीर झा लड़े, तो दूसरी तरफ नहार खान, ज़ोरावर खान, रोहन खान ने बलिदान दिया। वहीं चुलहई, लालू गुड़ायित, पोखन चौकीदार, रूपचंद और कमल ग्वाला ने मोर्चा संभाला।

सारन, छपरा, तिरहुत, गोपालगंज, महाराजगंज, सीवान इलाके में महाबोधी राय, रामू कोईरी (कुशवाहा), छप्पन खान ने क्रांतिकारी कमान संभाली। पासवान, अहीर, कुर्मी और चमार बिरादरी ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

तिरहुत, मुज़फ्फ़रपुर, वैशाली, हाजीपुर इलाके का नज़ारा भी अद्भुत था। यहां भूमिहार ब्राह्मणों के गांव बड़कागांव और धरमपुर-तरियानी के अहीर-ग्वालों और मुसलमानों ने जम कर भागीदारी की। बड़कागांव में रामदीन शाही और केदई शाही आगे रहे, तो धरमपुर-तरियानी में भागीरथ ग्वाला, राधनी ग्वाला और राज गोपाल ग्वाला प्रमुख रहे।

1857-58 क्रांति की आग दरभंगा, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, बेगुसराय भी पहुंची। सीमांचाल के जिले कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, मधेपुरा महीनों आज़ाद रहे। सभी जातियों ने हिस्सा लिया।

बिहार में 1857-58 की जंग, अंग्रेज़ी राज, अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित नील की खेती, अंग्रेज़ों द्वारा थोपे गए सामंतवाद और सूदखोरों के खिलाफ किसान विद्रोह था।

इसकी मांगे थीं:
1. बंधुआ प्रथा खत्म होनी चाहिए। बाज़ार की दर पर मज़दूरी तय की जानी चाहिए।
2. अंग्रेज़ों द्वारा लगान आधारित सामंती व्यवस्था खत्म की जाए। ज़मीन जोतने वालों में बांटी जाए।
3. ज़बरदस्ती करने वाले सामंतों पर कार्रवाई हो।
4. किसानों के कर्ज़ के जो बांड्स (bonds) हैं, उन्हें एक वर्ष के अंदर खत्म किया जाना चाहिए।
5. रजवारों और गरीब किसानों के लिए रोज़गार की व्यवस्था होनी चाहिए।

1942
1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन बिहार में इतना व्यापक और उग्र था कि अंग्रेज़ों को हवाई जहाज़ से फायरिंग करनी पड़ी!

सहजानंद सरस्वती
सहजानंद सरस्वती भूमिहार ब्राह्मण संत थे। 1940 में गेरुआ वस्त्र धारण करते हुए, उन्होंने लाल झंडे की कमान संभाली और अंग्रेज़ों की निरंकुश ज़मींदारी व्यवस्था के खिलाफ, कम्युनिस्ट पार्टी के आंदोलन को नये मुकाम पर पहुंचाया।

1960 और 1974
1960 में डॉ. राम मनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा, जिससे कर्पूरी ठाकुर जैसे पिछड़ों के नेता उभरे जो 1977 में बिहार के मुख्यमंत्री बने।

1974 का जय प्रकाश नारायण नेतृत्व वाला संपूर्ण क्रांति आंदोलन आज भी युवा-छात्रों के लिए मिसाल है। लालू यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान इत्यादि सभी जेपी आंदोलन की उपज हैं।

भाकपा-माले
यहीं पर मुसहरी, मुज़फ्फ़रपुर से क्रांतिकारी किसान आंदोलन की शुरुआत हुई। जुलाई 1975 में सामंती व्यवस्था और इमरजेंसी के खिलाफ भाकपा-माले का क्रांतिकारी आंदोलन चला, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिहार की तरफ ध्यान खींचा। भोजपुर-रोहतास बेल्ट में कुंवर सिंह के विद्रोह की याद फिर ताजा हो गई।

बहुआरा की लड़ाई
जुलाई 1975 के पहले हफ्ते में बहुआरा, भोजपुर में 96 घंटे, भाकपा-माले के सिर्फ छह योद्धाओं ने बड़ी-बड़ी पुलिस-अर्ध सैनिक टुकड़ियों से लोहा लिया। 1857-58 के बाद पहली बार ऐसा युद्ध बिहार में हुआ। ‘बहुआरा की लड़ाई’ का नेतृत्व बूटन मुसहर ने किया था। उनके साथ रामानंद पासी, विश्वनाथ चमार, सरजू तेली और डॉ. निर्मल इस युद्ध में प्रमुख थे। इसके बाद विनोद मिश्र के नेतृत्व में, भोजपुर, पटना, मगध, सिवान इलाके में भाकपा-माले का आंदोलन फैलता चला गया।

वर्तमान
अगर राजद 1974 और कर्पूरी ठाकुर की धारा को ले कर चल रही है, तो भाकपा-माले राजा कुंवर सिंह, बूटन मुसहर और विनोद मिश्र की विरासत की पार्टी है। इन दोनों धाराओं का साथ आना बिहार में क्रांतिकारी लहर पैदा कर रहा है। इनके साथ व्यापक मोर्चे में कांग्रेस और भाकपा-माकपा भी हैं।

यही महागठबंधन है जिसने मोदी, जेपी नड्डा और अमित शाह की रातों की नींद उड़ा दी है!

(अमरेश मिश्र इतिहासकार और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। 1857 पर आप का गहरा अध्ययन है।इन्होंने तीन संस्करणों में तक़रीबन 2000 पृष्ठों की 1857 पर किताब लिखी है। इस समय दो संगठनों मंगल पांडे सेना और राष्ट्रवादी किसान क्रांति दल का नेतृत्व कर रहे हैं।)

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This post was last modified on October 21, 2020 3:39 pm

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