Sunday, October 17, 2021

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महामारी का मायका कहां है?

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दुनिया भर के राजनेता और वैज्ञानिक नोबल कोरोना वायरस का मायका ढूंढने में लगे हैं। यह जानते हुए कि वायरस कोई स्त्री नहीं है जिसे जब चाहो तलाक देकर बिना गुजारा और मेहर दिए खदेड़ दो। वह ऐसी व्याहता भी नहीं है जिससे दहेज मांग कर ससुराल से धक्के मार कर मायके भेज दिया जाए या ससुराल में जला दिया जाए। हम अपनी भाषा की सीमाओं के कारण वायरस को स्त्री कहें या पुरुष लेकिन हकीकत यह है कि वह जीव और निर्जीव के बीच की ऐसी कड़ी है जिसकी स्थिति बताना कठिन है। इसलिए प्रकृति के ऐसे अजूबे जीव के मायके पर बहस विचित्र सी लगती है।

अमेरिका कह रहा है कि कोरोना का मायका चीन है और वह भी वुहान के लैब में पैदा हुआ है। चीन कह रहा है कि हमें पता नहीं कि वह यहां किसी लैब में पैदा हुआ है। शायद इसे यहां खेल खेलने आए अमेरिकी सैनिक लाए थे। चीन का कहना है कि वह भी उसके जन्म के बारे में शोध करने में लगे हैं और जब पता चल जाएगा तो बता देगा।

वायरस के जन्म को लेकर छिड़े इसी विवाद के कारण इन्सानी कौमों ने वायरस के निपटने से ज्यादा एक दूसरे को निपटाने की राजनीति शुरू कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वास्थ्य संबंधी दुनिया की सबसे बड़ी और विश्वसनीय संस्था डब्ल्यूएचओ की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा करते हुए उसका अनुदान रोक दिया है। अमेरिका में मचे हाहाकार से परेशान ट्रंप ने डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रास अधानम को चीनी एजेंट कहा है। उन्होंने चीन की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा है कि चीन सही संख्या नहीं बता रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने वुहान की प्रयोगशाला से वायरस के बेकाबू होकर निकलने की थ्योरी को फिर दोहराया है। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पांपियो ने चीन को सही स्थिति बताने की सलाह दी है। 

चीन के अखबार `ग्लोबल टाइम्स’ ने अमेरिका के इस प्रचार की आलोचना की है और कहा है कि उसे इस समय चीन विरोधी प्रचार करने की बजाय महामारी से लड़ना चाहिए। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि यह वायरस चीन के वुहान प्रांत के लैब में पैदा हुआ। हालांकि चीन के जैव विज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं कि अगर इस वायरस के जन्म के बारे में पता चल जाए तो उसे रोकने और उसका इलाज ढूंढने में सुविधा होगी। क्योंकि इससे पता चल सकेगा कि वह कैसे फैला और उसका वाहक कौन सा जानवर है। पर वे पता नहीं कर पा रहे हैं।

डब्ल्यूएचओ के इस विवाद में कभी बोफोर्स घोटाला जैसी खोजी खबर करने वाली और आजकल जिनेवा में बस चुकी पत्रकार चित्रा सुब्रह्मण्मय ने भी हस्तक्षेप किया है। उन्होंने इथियोपिया मूल के महानिदेशक टेड्रास को अयोग्य बताया है। उनका कहना है कि यह व्यक्ति अपनी प्रतिभा के बूते पर नहीं बल्कि राजनीति के कारण इस पद पर पहुंचा है और इस काम में चीन ने भारत को मोहरा बनाया था। उन्होंने भी इस थ्योरी का समर्थन किया है कि यह वायरस चीन की लैब में पैदा हुआ है। 

अमेरिकी वायरालोजिस्ट कैनेडी सार्ट्रिज मानते हैं कि सारे फ्लू चीन के गुआंगसांग प्रातं में पैदा होते हैं। वहां घनी आबादी में इनसान, सूअर, बत्तख और मुर्गे एक दूसरे से सट कर रहते हैं और यहीं से फ्लू जन्म लेता है। सार्स की उत्पत्ति भी 2003 में चीन में ही हुई थी। हालांकि भारत सरकार ने डब्ल्यूएचओ और वायरस की उत्पत्ति से जुड़े सारे विवाद पर इस समय कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है। भारत ने बहुत जिम्मेदारी के साथ यही कहा है कि वक्त महामारी से निपटने का है और इन मसलों पर उसके बाद बात की जा सकती है। भारत का यह पक्ष वैश्विक सहयोग की भावना को आश्वस्त करता है।

वायरस या महामारी का मायका ढूंढने वाले यह भूल जाते हैं कि दुनिया इतनी गोल और छोटी है कि इस ग्लोबल विलेज में मायका और ससुराल का अंतर मिट चुका है। कम से कम प्रौद्योगिकी ने तो वैसा कर ही दिया है।  दुनिया के किसी भी हिस्से में शुरू हुई कोई अच्छी और बुरी चीज तेजी से दूसरे हिस्से में पहुंच जाती है। पहले वह धीरे धीरे पहुंचती थी लेकिन आज ज्यादा तेजी से पहुंचती है।

आज के सौ साल पहले शुरू हुए जिस फ्लू ने पूरी दुनिया में पांच से छह करोड़ लोगों की जान ली थी उसे स्पैनिश फ्लू कहा जाता है। लेकिन मशहूर पत्रकार जान बैरी ने गहरे शोध पर आधारित `द ग्रेट इन्फुलेंजा’ में माना है कि इस बीमारी की उत्पत्ति अमेरिका में हुई थी। स्पेन का नाम तो ऐसे ही बदनाम हो गया। इस बीमारी से भारत में एक से डेढ़-दो करोड़ लोग मारे गए थे। भारत में यह बीमारी उन सैनिकों से फैली थी जो प्रथम विश्व युद्ध से लौट रहे थे और जिनका जहाज बंबई के बंदरगाह पर लगा था।

इसी तरह जिस एड्स नामक बीमारी की उत्पत्ति चिंपैंजी और अफ्रीका में बताई जाती है उसके सबसे पहले लक्षण अमेरिका में कुछ लोगों में न्यूमोनिया के रूप में पाए गए थे। जिस इन्फुलेंजा, डिप्थीरिया और चेचक से रेड इंडियन्स की 70 साल में दस करोड़ आबादी खत्म हो गई उसे 1492 में इटली का निवासी क्रिस्टोफर कोलंबस यूरोप से अमेरिका लेकर पहुंचा था।

इसी प्रकार इटली का जहाज जब 1347 में कुसतुनतुनिया पहुंचा तो उसने वहां भूमध्यसागरीय इलाके में प्लेग फैलाया। वहां से प्लेग ने अफ्रीका, मध्यपूर्व और बाद में यूरोप को तबाह किया। ब्लैक डेथ के बारे कहा जाता है कि वह 1331 में चीन में शुरू हुआ और 1345 में क्रीमिया पहुंचा। इस बीमारी से यूरोप की पांच करोड़ की आबादी खत्म हो गई। 

चेचक के बारे में दावा किया जाता है कि ईसा पूर्व यह बीमारी भारत में थी और भारत के लोगों ने इस बारे में एक तरह के टीकाकरण का भी आविष्कार किया था। बाद में इस बीमारी और टीकारण को भारत के बौद्ध भिक्षु तिब्बत, सियाचीन और चीन लेकर गए। भारत में अंग्रेजों से आने से पहले चेचक का टीका होने का उल्लेख धर्मपाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक साइंस एंड टेक्नालाजी इन एट्टीन्थ सेंचुरी इंडिया में किया है। 

दरअसल महामारियों का मायका होता भी है और नहीं भी होता। जिस तरह से घूमती हुई पृथ्वी के सूर्य की ओर पड़ने और न पड़ने को हमने पूरब और पश्चिम मान लिया है उसी प्रकार राष्ट्रों ने अपनी सुविधा और नस्लों व कौमों ने अपनी राजनीतिक जरूरतों के लिहाज से इन बीमारियों का मायका और ससुराल ढूंढने का सिलसिला शुरू कर दिया है। पर दिक्कत यह है कि वायरस के साथ हम पुरुषवादी सत्ताओं की तरह से व्यवहार कर नहीं सकते। वह मायके में भी तबाही मचाता है और ससुराल में भी।

हम उसे ससुराल से मायके भेज नहीं सकते और न ही किसी एक पर यह आरोप लगा सकते हैं कि उसने जबरदस्ती उसे ब्याह कर कहीं भेज दिया। वास्तव में दुनिया में घूमते फिरते रहने की जो प्रवृत्ति मनुष्य में है वही प्रकृति के हर छोटे बड़े जीवों के भीतर है। मनुष्य ने पहले बड़े जीवों को गुलाम बनाया और फिर राष्ट्रों की सीमाएं खड़ी करके और वीसा पासपोर्ट जारी करके अपनी प्रजाति के लोगों को रोकने का इंतजाम कर दिया। लेकिन मनुष्य सूक्ष्म जीवों के मामले में वह व्यवस्था नहीं कर पाया है। काश मनुष्य कोरोना वायरस का वीसा पासपोर्ट बना सकता और उसे दुनिया के किसी एक हिस्से में कैद करके तालाबंदी कर सकता।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल माखन लाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अध्यापन का काम कर रहे हैं।)

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