जीवन का अंत हो चुका होगा, तब शुरू होगा बचे रहने का युद्ध!

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प्रतीकात्मक फोटो।

आज के समय में इससे जरूरी शायद दूसरा दस्तावेज नहीं हो सकता। इसे अपनी डायरियों में उतार लें, पोस्टर बना कर अपने आसपास की दीवारों को पाट दें, संभव हो तो इसे अपने खून या सोने की स्याही से लिख कर फ्रेम करवा लें और अपने घर में उस जगह टांगें जहां से यह आपको और आपकी संततियों को हर समय दीखता रहे। बल्कि हो सके तो इसे कंठस्थ कर रखें। अगर आप बचे रह गए तो।

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अमेरिका के बसने की कहानियां पढ़ेंगे तो पाएंगे असीम लालच की ईंटों से बनी इस बदसूरत ज्यामितीय संरचना की सम्पन्नता की बुनियाद में लगे गारे को वहां के मूल निवासियों का खून मिलाकर बनाया गया था। प्रकृति से सच्ची मोहब्बत करने वाले और अद्भुत सामुदायिक चेतना से भरपूर इन बहादुर मूल निवासियों को असभ्य आदिवासी कह कर संबोधित किया गया। उन्हें सभ्य बनाने और उनकी संपत्ति हड़पने के लिए यूरोप से आये गोरे लुटेरों-अपराधियों ने जिस पैमाने पर खौफनाक नरसंहार, मारकाट और हिंसा की उसकी थोड़ी बहुत भी कल्पना करनी हो तो कुछ किताबों को जरूर पढ़ा जाना चाहिए। इनमें फारेस्ट कार्टर की ‘एजूकेशन ऑफ़ द लिटल ट्री’, विलियम ऑस्बोर्न की ‘द वाइल्ड फ्रंटियर’ और एलेन एक्सेलरॉड के ‘क्रोनिकल्स’ के नाम फिलहाल याद आ रहे हैं।

आज से कोई एक सौ सत्तर साल पहले जब ये अत्याचार अपने चरम पर थे, सूकामिश नाम के ऐसे ही कबीले में सिएटल नाम का एक वीर सरदार हुआ। एक निडर युवा योद्धा के तौर पर उसने अपने आसपास के छः स्थानीय कबीलों का नेतृत्व किया।

दिसंबर 1854 में उसने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन पीयर्स को संबोधित करते हुए एक खत लिखा था

“वाशिंगटन के सरदार ने संदेशा भेजा है कि वह हमारी ज़मीन खरीदना चाहता है। आप आसमान को बेच या खरीद कैसे सकते हैं – आप धरती के ताप को कैसे खरीद सकते हैं? हमारे लिए तो यह विचार ही अजीब है। यह अलग बात है कि हवा की ताजगी या पानी की चमक पर हमारा कोई अधिकार नहीं। इन्हें आप हमसे कैसे खरीद सकते हैं? इस धरती का हर हिस्सा मेरे कबीले के लोगों के लिए पवित्र है। चीड़ वृक्षों का एक-एक सुईपत्ता, एक-एक रेतीला तट, जंगल की एक-एक अंधेरी रात, एक-एक खुला मैदान और एक-एक गुनगुनाता झींगुर-पतंगा मेरे लोगों की स्मृति और अनुभव में पवित्रता से दर्ज हैं।

हम पेड़ के भीतर बहने वाले जीवन जल को उस रक्त की तरह जानते हैं जो हमारी नसों में बहता है। हम इस धरती के हिस्से हैं और धरती हमारा हिस्सा है। खुशबूदार फूल हमारी बहनें हैं। भालू, हिरन, बाज – ये सारे सहोदर हैं हमारे! चट्टानी ऊंचाइयां, चारागाह की घास, खच्चर के शरीर की गर्मी और मनुष्य – ये सब एक ही परिवार के सदस्य हैं।

नदियों और धाराओं में बहने वाला पानी केवल पानी नहीं है, वह हमारे पुरखों का रक्त है। पानी की छलछल मेरे पिता के पिता की आवाज है। महानद हमारे भाई हैं। वे हमारी प्यास बुझाते हैं। वे हमारी डोंगियों को लेकर जाते हैं और हमारे बच्चों को भोजन देते हैं। तुम्हें नदियों को वैसी मोहब्बत करनी होगी जैसी तुम अपने भाई से करते।

क्या तुम अपने बच्चों को वह सिखाओगे जो हमने अपने बच्चों को सिखाया है? कि धरती हमारी माँ है। कि जो धरती पर गुजरता है वह धरती के बच्चों पर भी गुजरता है।

हमें इतना मालूम है – धरती मनुष्य की जागीर नहीं है, आदमी धरती की जागीर है। सारी चीजें उस रक्त की तरह एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं जो हम सबको एक बनाता है। जीवन का तानाबाना आदमी ने नहीं बुना। वह फकत एक रेशा है उसका। उस तानेबाने के साथ आदमी जैसा सुलूक करता है वही उसके साथ भी होता है। हम इस धरती को उस तरह प्यार करते हैं जैसे एक नवजात अपने माँ के दिल की धड़कन से करता है।

हम जानते हैं हमारा जीवन गोरे आदमी की समझ में नहीं आता। उस के लिए धरती का हर टुकड़ा बगल वाले टुकड़े जैसा ही होता है, क्योंकि वह रातों को आने वाला ऐसा अजनबी है जो धरती से अपने काम की चीज़ें जब चाहे चुरा ले जाता है। वह अपने पुरखों की कब्रें छोड़ जाता है और उस के बच्चों का जन्माधिकार बिसरा दिया जाता है।

गोरे आदमी के शहरों में कोई भी शांत जगह नहीं। कोई जगह नहीं जहां वसंत की पत्तियों या कीड़ों के परों की फड़फड़ सुनी जा सके। लेकिन चूँकि मैं जंगली हूँ इसलिए समझा नहीं सकता – आपका शोर मेरे कानों के लिए एक अपमान ही है बस। वैसे जीवन में बचता ही क्या है अगर आप चिड़िया की कूक न सुन सकें या रात को तालाब के गिर्द मेढकों के तर्कों को न समझ पाएं।

गोरे लोग भी एक दिन इस संसार से चले जायेंगे – शायद बाकी कबीलों से पहले ही। तुम अपने बिस्तर को गंदा किए जाओ और एक रात तुम्हारे अपने कचरे से तुम्हारा दम घुट जाएगा। जब सारी भैंसें काटी जा चुकी होंगी, सारे जंगली घोड़े पालतू बना लिए गए होंगे, कहाँ होंगे आदमियों की गंध से अटे जंगलों के गुप्त कोने और कहाँ वे पहाड़ी दृश्य? – वे जा चुके होंगे। बाज़ कहाँ होगा? – जा चुका होगा। जीवन का अंत हो चुका होगा – तब शुरू होगा बचे रहने का युद्ध।”

(अशोक पांडे का डेरा कहने को उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर में है लेकिन उनके पाँवों में चक्की है और मन में पंख लगे हैं। उनकी रुचियों का दायरा अति विशाल है। संगीत, कला, साहित्य, सिनेमा, फोटोग्राफी, खेल, शराब, खाना, गाना, नाच वगैरह के तमाम शास्त्रीय और आभिजात्यिक रूपों से लेकर तलछट के जीवन के समस्त सौंदर्य, संघर्ष, खुशियां, उदासी और कलाएं उनके साथ रहती हैं। साधारण जीवन पर लपूझन्ना और कुत्तों पर एक ख़ास सीरीज उनकी इस मोहब्ब्त और जीवंतता के अद्भुत उदाहरण हैं। उनके पास एक अपना ही अद्भुत गद्य है। वे कवि हैं, फोटोग्राफर हैं, शानदार अनुवादक हैं और अपने मशहूर ब्लॉग ‘कबाड़खाना’ के चलते घोषित कबाड़ी हैं।)

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