Sunday, December 5, 2021

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जब लोहिया की आवाज ने ले लिया था गोवा क्रांति का रूप

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यह आज के राजनेताओं, पूंजपीतियों और ब्यूरोक्रेट्स का एक रणनीति के तहत अपनी सुरक्षा के लिए बनाया गया माहौल ही है कि देश का युवा अपना हक मांगने के बजाय मौज-मस्ती का रास्ता अपनाना ज्यादा पसंद कर रहा है। एक रणनीति के तहत आजादी की लड़ाई की कीमत और संघर्षपूर्ण इतिहास को दरकिनार कर युवाओं को कॉरपोरेट संस्कृति में ढाला जा रहा है। यही वजह है कि जिस गोवा का इतिहास संघर्षों से भरा है उस गोवा को आज का युवा मौज-मस्ती के रूप में जानता है। युवाओं के लिए गोवा का मतलब समंदर की लहरों के बीच मौज-मस्ती, छुट्टी बिताने का खूबसूरत शहर मात्र है। गोवा के संघर्षपूण इतिहास और इसकी आजादी में दिये गये बलिदान से आज का युवा अनभिज्ञ है। गोवा पर पुर्तगालियों द्वारा थोपी गई गुलामी, उनके जुल्म और लूट के खिलाफ गोमंतकों के संघर्ष से वह अनजान है। गोवा की आजादी में लोहिया के योगदान को आम लोग ही क्या आज के समाजवादी भी न जानने को तैयार हैं और न ही समझने को

देश के नायकों में डॉ. राम मनोहर लोहिया वह नाम है जो जिंदगी भर अन्याय के खिलाफ लड़ते रहे। जहां एक ओर लोहिया देश को अंग्रेजों से मुक्त करने के लिए आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभा रहे थे वहीं गोवा को पुर्तगालियों के शासन से मुक्त कराने के लिए भी उन्होंने मोर्चा संभाल लिया था। 18 जून 1946 को डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ गोवा के लोगों को आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया था। लोहिया के आह्वान के बाद गोवा की मुक्ति के लिये एक लम्बा आन्दोलन चला। एक बड़े संघर्ष के बाद 19 दिसम्बर 1961 को भारतीय सेना ने इस क्षेत्र को पुर्तगाली आधिपत्य से मुक्त कराया और गोवा को भारत में शामिल कर लिया गया।

देश में जब 1946 में यह माना जाने लगा कि अंग्रेजों को भारत को छोड़कर जाना ही पड़ेगा तब गोवा के बारे में देश के नेताओं का मानना था कि अंग्रेजों के साथ ही पुर्तगाली भी गोवा छोड़कर चले जाएंगे। गोवा के मामले में राममनोहर लोहिया इन नेताओं से इत्तफाक नहीं रखते थे, उनको लगता था कि बिना संघर्ष के पुर्तगाली जाने वाले नहीं हैं। यही वजह थी कि डॉ. लोहिया ने 18 जून, 1946 को गोवा में डॉ. जुलियो मेनजेस के साथ एक सभा की,  जिसमें गोवा के हजारों लोगों ने भाग लिया। इन दोनों नेताओं ने उस दिन गोवावासियों में आजादी की लड़ाई का जज्बा भरा। एक ओजश्वी भाषण से लोहिया ने न केवल लोगों में आजादी के प्रति जोश भरा बल्कि पुर्तगालियों के विरुद्ध एकजुट होने के लिए नेतृत्व भी किया। हालांकि इसका खामियाजा उन्हें जेल जाकर भुगतना पड़ा।

डॉ. लोहिया के नेतृत्व में गोवा के लोगों में आजादी का जज्बा जाग गया था। बड़े आंदोलन के बाद  भारतीय सेना के तीनों अंगों ने पुर्तगाली सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 19 दिसम्बर, 1961 को तत्कालीन पुर्तगाली गवर्नर मैन्यू वासलो डे सिल्वा ने भारत के सामने समर्पण कर दिया। क्योंकि दमन दीव भी उस समय गोवा का हिस्सा था, तो इस तरह दमन दीव भी आजाद हुआ। यह देश का लोहिया को याद करना ही है कि गोवा को आजादी 19 दिसम्बर को मिली पर 18 जून यानी कि क्रांति दिवस को ज्यादा याद करते हैं।

यह भी जमीनी हकीकत है कि 1961 में गोवा को आजादी तो मिल गई थी पर पूर्ण राज्य बनने में काफी समय लगा। आजादी के एक साल बाद चुनाव हुए और दयानंद भंडारकर गोवा के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। जब महाराष्ट्र में विलय की बात आई तो गोवा में जनमत संग्रह हुआ और लोगों ने केंद्र शासित प्रदेश के रूप में रहना पसंद किया। वर्ष 1987 की 30 मई को गोवा भारत का 25वां पूर्ण राज्य बना। 

(चरण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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