यह युद्ध कब खत्म होगा?

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मेरी तरह आपको भी बार-बार और दिन में कई बार इस सवाल का सामना करना पड़ता होगा कि यह जो युद्ध यूक्रेन और रूस के बीच चल रहा है, यह युद्ध कब खत्म होगा? आप भी मेरी तरह सोच में पड़ जाते होंगे कि इस सवाल का क्या जवाब दूँ?

एक विदूषक की मूर्खता से अगर आप वाकिफ हैं तब भी और एक तानाशाह के हथकंडों के आप जानकार हैं तब भी युद्ध की वकालत करना एक सरल लेकिन मुश्किल काम है। बेशक यह किसी भी दृष्टिकोण से मानवता के पक्ष में नहीं है। यह पर्यावरण, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, पारिवारिक आदि उन सभी प्रणालियों के विनाश का ऐलान भी है, जो जीवन का पोषण और रक्षा करती हैं।

कहने को आप कह सकते हैं, 1991 सोवियत संघ के विघटन के बाद एक सार्वभौमिक समझ बनी थी कि सोवियत संघ से अलग हुए देशों में नाटो का विस्तार उसके लिए एक अनावश्यक उकसावे जैसा होगा। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मन सरकारों द्वारा ऐसा ना करने का वायदा किया गया था। वैसे भी नाटो का सोवियत संघ के टूटने के बाद कोई औचित्य नहीं रह गया था। मगर मरे और मुकरे का क्या इलाज है? उन्होंने वह वायदा तोड़ दिया। नाटो का विस्तार यूक्रेन के द्वार तक किया। यह शांति लाभांश का गंभीर मसला था। हथियार निर्माताओं ने कम्युनिस्ट ब्लॉक देशों को नाटो के साथ सैन्य रूप से संगत बनाने के लिए कई अरब डॉलर का मुनाफा देखा, अतिरिक्त मुनाफा, जिसे बोनस कहते हैं।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पोलैंड की क्या स्थिति थी, इसे करीब से देखना हो तो रोमन पोलैंस्की की फ़िल्म ‘द पियानिस्ट’ देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन उसके बाद पोलैंड बड़ी मुश्किल से सोवियत संघ के साथ जुड़कर अपने पैरों पर खड़ा हुआ था। वहां जब नवउदारवाद ने अंगड़ाई ली तो बोटी की जगह रोटी और रोटी की जगह टोंटी ने ले ली। अगर आप पोलैंड की राजधानी वारसा की सड़कों पर निकलें तो आपको हर चौक चौराहे पर रेथियन (Raytheon) के उससे ज्यादा होर्डिंग लगे हुए मिल जाएंगे, जितने भारत में मोदी की फोटू वाले होर्डिंग हैं।

रेथियॉन, साबुन तेल नहीं बल्कि खतरनाक देशभक्त मिसाइल और अन्य हथियार बनाती और बेचती है। पोलैंड उनसे यह हथियार खरीदता है जिसकी कीमत उसके गले में अंगूठा देकर वसूल की जाती है। रेथियॉन भारत की टाटा एडवांस सिस्टम लिमिटेड के साथ मिलकर मिसाइलें बना रहा है। रेथियॉन और लॉकहीड मार्टिन भी बिना ‘मेक इन इंडिया’ किये भारत को आत्मनिर्भर बनाने की सोच रहे हैं।

किसी जंग के दौरान शहर जितनी तेजी से नेस्तनाबूद होते हैं और लाशों की संख्या जितनी तेजी से बढ़ती है उतनी ही तेजी से स्टॉक मार्केट में इन हथियार निर्माताओं की कीमतें बढ़ती हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरू होते ही लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin), रेथियन (Raytheon), जनरल डायनॉमिक्स (General Dynamics) बोइंग (Boeing), नोर्थोर्प ग्रामन (Northrop Grumman) जैसी तमाम हथियार निर्माण से जुडी अमेरिकी कंपनियों के स्टॉक की कीमतों में मिसाइल की तेजी से उछाल आया है और कई कंपनियों की कीमतें चार गुना से भी ज्यादा बढ़ गयी हैं। जितनी लाशें गिरती हैं, मुनाफा उतना बढ़ता है। क्या यह कम्पनियाँ कभी चाहेंगी कि यह जंग रुक जाये?

इतिहास बताता है कि रूस और अमेरिका के बीच तनाव 1917 में हुई रूसी क्रांति के बाद ही शुरू हो गया था। मई 1918 में अमेरिकी क्रूज़र ‘ओलंपिया’ जिस पर जल सैनिक सवार थे, मर्मांसक बंदरगाह में दाखिल हुआ। कई दिनों के बाद, इस जहाज ने तट पर फौजी दस्ते उतारे जो, दूसरे हमलावर सेनाओं के साथ मिलकर तुरंत ही इस इलाके में सोवियत सेना के विरुद्ध लड़ाई में शामिल हो गए। जल्दी ही पीछे से कई अमेरिकी फौजी ट्रांसपोर्ट जहाज मर्मांसक पहुंच गए। अमेरिकी सैनिकों के जबरदस्त दस्ते आर्केंजेलस्क के तट पर भी उतरे। इसके बाद अमेरिका ने सोवियत रूस पर पूर्व की ओर से धावा बोल दिया। नवंबर 1917 से अमेरिका और दूसरे देश रूसी प्रति-क्रांतिकारियों को खुले दिल से मदद देते रहे।

अमेरिकी गोदामों, सप्लाई और संपत्ति की रक्षा के नाम पर अमेरिकी फौजी दस्ते मर्मांसक के तट पर उतरे तो जनता को यकीन दिलाया गया कि वह तो बस इस अहम बंदरगाह की और फौज के बड़े गोदामों की रक्षा करने के लिए ही आए हैं। पर जुलाई 1918 में इन फौजियों ने ब्रिटिश दस्तों के साथ मिलकर धावा बोल दिया। बहुत सारे नगरों और गांवों में कानूनी हुकूमत के प्रतिनिधियों को हराकर उन्होंने सोवियत कर्मचारियों और सोवियत सत्ता के वफादार लोगों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। इस धोखाधड़ी की असलियत निकल कर बाहर लाने के लिए लेनिन ने लिखा, “झूठ और धोखे फ़रेब के साथ, यह कहते हुए कि उनका रूस के विरुद्ध लड़ने का कोई इरादा नहीं है इन लोगों ने मर्मांसक पर कब्जा कर लिया फिर केम को हथियाकर हमारे साथियों को, सोवियत सदस्यों को गोलियों से उड़ाने लगे।”

अमेरिकी फौजों का सोवियत संघ में दखल और नरसंहार का दौर 1920 तक चलता रहा। उत्तरी इलाके में ‘बोल्शेविकों को मदद देने और उनके साथ हमदर्दी करने’ का दोष लगाकर 4000 लोगों को कोर्ट मार्शल द्वारा मौत की सजा सुनाई गई। बहुत सारे लोग जेलों में या क़ैदी-कैंपों में मर गए।

तब से लेकर अब तक अमेरिका ने इस धरती पर अनेकों कलंक कथाएं लिखी हैं। हिरोशिमा-नागासाकी को कौन भूल सकता है? अमेरिकी अर्थव्यवस्था हथियारों के विश्वव्यापी व्यापार से होने वाली आमदनी पर निर्भर है। इसलिए वहाँ की मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्पलेक्स उत्तरोतर भारी भरकम होता जा रहा है। अब पिछले दो साल कोरोना काल में कोई युद्ध नहीं हुआ, हथियार नहीं बिके। हथियार बनाने वाली कंपनियों के मालिक इस शांति के माहौल को देखकर अशांत हो जाते हैं, विचलित हो जाते हैं, विक्षिप्त हो जाते हैं और फ़िर अपने किसी राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री की मदद से जंग छेड़ देते हैं। जंग छिड़ जाने के बाद वह शांत हो जाते हैं, आम आदमी परेशान हो जाता है। 

आम आदमी शांति की बातें करता है। अरुंधति रॉय के शब्दों में कहें तो शांति का कारोबार भी कभी-कभी उतना ही डरावना है, जितना जंग का कारोबार। यह जनता के गुस्से की हवा निकालने का एक तरीका है। हम सभी पर इसे आजमाया जा रहा है और हमें इसका पता तक नहीं है।

अभी तो हम पुतिन को कोस रहे हैं, बाईडेन को गरिया रहे हैं और जेलेंस्की के दुस्साहसी भाषणों पर तालियाँ बजा रहे हैं। हमें कोई नहीं बताता कि पूंजीवाद के आंतरिक अंतर्विरोधों और संकटों को टालने और छिपाने का, साम्राज्यवादियों का पसंदीदा तरीका युद्ध है। मजबूरी है, क्या करें? बेचारा साम्राज्यवाद युद्धों के बिना काम नहीं कर सकता, और पूंजीवाद के लिए युद्ध ही जीवन है। युद्ध ही शांति है। एक बार युद्ध शुरू हो जाने के बाद कोई भी यहां तक कि युद्ध करने वाले लोग भी अनुमान नहीं लगा सकते कि क्या होगा, युद्ध कैसे विकसित होगा और यह कैसे सेनाओं और राष्ट्रों को आत्मघाती मूर्खता की ओर ले जाएगा।

जब तक हथियार बनते रहेंगे, युद्ध चलते रहेंगे। खून बहता रहेगा। लाशें बिछती रहेंगी। शासक कभी कोई युद्ध नहीं हारते। शासित कभी कोई युद्ध नहीं जीतते। बस एक दूसरे से पूछते रहते हैं, “यह युद्ध कब ख़त्म होगा?”  

(देवेन्द्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल लुधियाना में रहते हैं।)

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