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कलंक कथाओं से भरा पड़ा है बीजेपी और संघ का इतिहास

पिछले दिनों जब केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी ने अपने पाठ्यक्रम में अरुंधति रॉय के व्याख्यान ‘Come September’ को शामिल किया तो भाजपा प्रदेश इकाई के अध्यक्ष के. सुरेन्द्रन और उनके समर्थकों ने इसके विरोध में झण्डा-डंडा उठा लिया क्योंकि अरुंधति ने अपने व्याख्यान में एक जगह ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ का ज़िक्र किया है। इसके साथ ही सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ जैसी किसी चीज का हमारे भारतीय समाज में कहीं कोई अस्तित्व है भी कि यह अरुंधति आए दिन खामख्वाह कोई-न-कोई फड्डा किए रखती हैं?

हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या? ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ का यह सवाल उस वक़्त खड़ा किया जा रहा है जब अयोध्या में भूमिपूजन हो रहा है। सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं की जिस इमारत के निर्माण के लिए भूमिपूजन हो रहा है उसे आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और बीजेपी का मंदिर कहा जा सकता है। इस परियोजना को एक राष्ट्रीय परियोजना के रूप में पेश किया जा रहा है। न्यायालय यह तो मानता है कि मस्जिद को गिराया जाना एक आपराधिक कृत्य है। जो लोग मस्जिद गिराने के लिए दोषी पाये गए उन्हीं लोगों को ज़मीन सौंप दी गयी। सरकार ने उस फैसले के बाद ट्रस्ट बनाया तो उस ट्रस्ट में भी महंत नृत्यगोपाल दास और चंपत राय जैसे वही लोग थे जो इस षड्यंत्र और अपराध में शामिल थे।

संघ के कई नेता जिन्हें सीबीआई ने आरोपी बना रखा है और जिनका मुकदमा आज भी चल रहा है वही लोग शाश्वत-दंडवत भूमि पर लोट रहे प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक के साथ बैठे भूमिपूजन कर रहे थे। ऐसे में संविधान और कानून का पालन कौन कर रहा है? यानि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक की ओर से सीधा संदेश जा रहा है कि वह भारत के संविधान और कानून से ऊपर हैं। यही ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ है। अगर भारत में कानून का राज होता तो यह लोग जेल में होते। हॉवर्ड जिन याद आ गए। एक बार उन्होंने किसी और सन्दर्भ में कहा था- जिन्हें जेल में होना चाहिए वह बाहर घूम रहे हैं जिन्हें बाहर होना चाहिए उन्हें जेल में बंद कर रखा है। 

यह मंदिर जिसे राम मंदिर कहा जा रहा है और यह परियोजना (जिसमें एक पेंटिंग के माध्यम से मोदी का कद राम के कद से बहुत बड़ा करने की कोशिश की जा रही है) ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ का हिस्सा कैसे है इसे जरा स्पष्टता से जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। यह भी एक कलंक-कथा है। क़लंक़-कथाएँ भी दिलचस्प होती हैं। यह दिलचस्प कलंक-कथा अभय कुमार दुबे की पिछले दिनों आई एक महत्वपूर्ण किताब ‘हिन्दू-एकता बनाम ज्ञान की राजनीति’ में दर्ज है। अभय लिखते हैं: “सांप्रदायिक प्रश्न को जिलाये रखने का सबसे बड़ा उदाहरण रामजन्मभूमि का मसला है जिसे हल करने की कोशिशों को संघ परिवार द्वारा सायास विफल करने के परिणाम सामने आ चुके हैं।

बाबरी मस्जिद के ध्वंस से पाँच साल पहले 1987 में अयोध्या विकास ट्रस्ट की पहलक़दमियों से एक ऐसी नौबत आई थी जब मस्जिद की मौजूदगी के साथ-साथ मंदिर बनाने पर सभी संबंधित पक्षों में समझौता होने वाला था। 27 दिसम्बर, 1987 के पांचजन्य और ऑर्गनाइज़र (दोनों संघ परिवार के मुखपत्र) में इस आशय की ख़बर भी छपी कि मंदिर बनाने के लिए ट्रस्ट बन गया है और काँग्रेस सरकार मंदिर बनाने के लिए मजबूर हो गयी है। इन अख़बारों ने ख़बरों के साथ-साथ विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल की तस्वीर भी छापी थी। अयोध्या विकास ट्रस्ट की अध्यक्षता महंत नृत्यगोपाल दास के हाथ में थी, और रामजन्मभूमि न्यास के अगुआ परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के एक और नेता न्यायमूर्ति देवकीनंदन अग्रवाल भी इसमें शामिल थे। गोरख पीठ के तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ ने इस पहलक़दमी का तत्परता के साथ समर्थन किया।

लेकिन जैसे ही संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस को इस घटनाक्रम की जानकारी मिली, उन्होंने झंडेवालान, दिल्ली स्थित संघ के कार्यालय केशव पुरम में फ़ौरन एक बैठक बुलवाई और अशोक सिंघल को आड़े हाथों लिया। उन्होंने सिंघल से पूछा, ‘तुम इतने पुराने स्वयंसेवक हो। तुमने इस योजना का समर्थन कैसे कर दिया? सिंघल का जवाब था, ‘हमारा आंदोलन तो राम मंदिर के लिए ही था। यदि वह स्वीकार होता है तो उसका स्वागत करना चाहिए।’ इस पर नाराज़ होकर देवरस ने कहा कि क्या तुम्हारी अक़्ल घास चरने चली गयी है।

इस देश में 800 राम मंदिर हैं। एक और बन जाएगा तो 801वां होगा। लेकिन, यह आंदोलन जनता के बीच लोकप्रिय हो रहा है। उसका समर्थन बढ़ रहा है जिसके बल पर हम दिल्ली में सरकार बनाने की स्थिति में पहुँच सकते हैं। यह प्रस्ताव स्वीकार करना आंदोलन की पीठ में छुरा भोंकने जैसा है।’ ….सरसंघचालक का आदेश मिलते ही सिंघल के नेतृत्व में विहिप ने कहना शुरू कर दिया कि मंदिर-निर्माण की इस योजना में मंदिर के गर्भ-गृह की जगह तय नहीं है। इस बहाने से अयोध्या विकास ट्रस्ट का यह प्रयास नाकाम कर दिया गया।”

इस कलंक-कथा से सिद्धार्थ वरदराजन की यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि 801वें मंदिर की यह परियोजना राष्ट्रीय परियोजना नहीं है बल्कि संघ की निजी सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवादी परियोजना है जिससे किसी भी हिन्दू का उद्धार होने वाला नहीं है। राही मासूम रज़ा याद आ गए। उन्होने कभी लिखा था आधुनिक भारत में यह तय करना मुश्किल है कि धर्म ज्यादा बड़ा व्यापार है या राजनीति। मुझे तो लगता है सियासतदानों के लिए राम भी एक प्रॉडक्ट है और राम मंदिर भी।

‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ को पुख्ता करती ऐसी कलंक-कथाओं से आरएसएस-भाजपा का इतिहास भरा पड़ा है। विहिप की आधिकारिक वेबसाइट बजरंग दल को हिन्दू समाज का सुरक्षा घेरा बताती है। यह बजरंग दल भी आरएसएस का तैयार किया फ्रेंकेस्टीन है। बजरंग दल की भी एक कलंक-कथा और सुन लें। बात तब की है जब मोदी को ‘राजधर्म’ का पाठ पढ़ाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधान मंत्री थे। ओड़ीसा के क्योंझार जिले के मनोहरपुर गाँव में आस्ट्रेलियाई समाजसेवी और कुष्ट उन्मूलन के क्षेत्र में काम कर रहे ग्राहम स्टीवर्ट स्टेंस और उनके दो बेटों की 22 जनवरी, 1999 की रात गाड़ी में सोते समय ज़िंदा जलाकर हत्या कर दी गयी। जीप में आग लगाकर ग्राहम स्टीवर्ट स्टेंस ओर उनके दो बेटों की हत्या का यह अभियान दो घंटे चला था और मौका-ए-वारदात से फरार होने से पहले आरोपियों ने सीटियाँ बजायी थीं तथा “ज़य बजरंग बली’ का उद्घोष किया था।

इस हत्याकांड के मुख्य आरोपी दारा सिंह के एक सहयोगी दीपू ने पुलिस को बाद में बताया कि जिस बैठक में हत्या की योजना बनायी गयी थी, उसमें 40 लोग शामिल हुए थे। मनोहरपुर में हत्या के लिए 46 लोग इकट्ठे हुए थे। इस हत्याकांड की वजह यह थी कि लोगों को लगता था कि स्टेंस इलाके के लोगों को ईसाई बनाने के काम में लगे हुए थे। आरोप है कि दारा सिंह उर्फ़ रवीन्द्र कुमार पाल ने अपने साथियों से कहा था कि स्टेंस लोगों को ईसाई बनाने के लिए वहाँ रह रहे थे और इस तरह वे हमारे धर्म व संस्कृति को बरबाद कर रहे थे।’

ओड़ीसा के पुलिस महानिदेशक ने यह कहते हुए इस निष्कर्ष  पर अपनी मोहर लगा दी कि ‘इस हमले के पीछे बजरंग दल का हाथ है। निचली अदालत ने दारा सिंह को मौत की सज़ा सुनाई जिसे ओड़ीसा उच्च न्यायालय ने 2005 में उम्र कैद में तब्दील कर दिया था। हत्यारे दारा सिंह के नाम पर आज ‘धर्म रक्षक श्री दारा सिंह समिति, ‘दारा सिंह परिजन सुरक्षा समिति’ आदि संगठन बना कर आरएसएस ने उसे अमर कर दिया है।

2002 में, जब आरएसएस के आजीवन सदस्य नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री के पद पर बिराजमान थे, जो नरसंहार हुआ उसमें बजरंग दल की बड़ी अहम भूमिका थी। बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी को कौन भूला है? बाबू बजरंगी ने एक गर्भवती मुस्लिम महिला के पेट को चीरकर उसमें से बच्चा निकाल कर अपने त्रिशूल पर खोंस कर नरोदा पाटिया की सड़कों पर घुमाया था। एक साक्षात्कार में उसने बताया था कि उसे ‘नरेंद्र भाई’ ने बचा लिया। यह जो गुजरात में नरसंहार हुआ था यह ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ का ही एक उदाहरण है।

उन दिनों बजरंग दल और संघ परिवार के दूसरे संगठनों ने माहौल इतना अधिक दूषित कर दिया था कि राज्य के अधिकांश शहरों से मुसलमानों का पलायन शुरू हो गया और वे बड़ी संख्या में सुरक्षित स्थान की तलाश करने लगे, इस वजह से अल्पसंख्यकों की अलग जगह बन गई। हकीकत तो यह है कि गुजरात के अनेक शहरों में कुछ स्थानों पर अब मुसलमानों की घनी आबादी हो गई जिसे स्थानीय लोग ‘मिनी पाकिस्तान’ कहकर संबोधित करते हैं। यह ऐसा शब्द है जो वहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के ‘शत्रु’ होने का संकेत देता है। इलाकों को अक्सर दीवारों के माध्यम से अलग किया जाता है और प्रत्येक दंगे के साथ दीवार की ऊंचाई बढ़ती जाती है। यहां तक कि संभ्रांत इलाकों में भी मुसलमानों को संपत्ति नहीं ख़रीदने दी जाती है।

अंग्रेजी पत्रिका फ्रंट लाइन में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, जब मुस्लिमों ने अहमदाबाद के संपन्न हो रहे इलाके पालदों में फ्लैट खरीदे तो बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इस इमारत में तोड़फोड़ की और एक बम फेंका जिसने लिफ्ट को तहस नहस का दिया। बाद में उन्होंने फ्लैट के मुस्लिम मालिकों को कौडियों के दाम बेचने के लिए मजबूर कर दिया। अहमदाबाद के पुराने शहर में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उन कारोबारियों पर हमले बोले जिन्होंने मुसलमानों को संपत्ति बेची थी। 2002 के नरसंहार का शिकार हुए मुसलमानों के अन्यत्र पलायन का सिलसिला गुजरात के ग्रामीण इलाकों में भी चला। मुस्लिम विस्थापित अपने घर वापस लौटने में असमर्थ थे। उन्होंने पास के उस नगर या गांव में रहना अधिक बेहतर समझा जहां मुसलमानों की अपेक्षाकृत अधिक आबादी थी।

उन्हें लगता था कि अलग-थलग होने के कारण उन्हें निशाना बनाना ज्यादा आसान है। गावों से मुस्लिम निवासियों को बाहर निकालने के बाद बजरंग दल की स्थानीय इकाई ने गर्व के साथ बैनर लगाकर दावा किया कि यह ‘मुस्लिम मुक्त’ क्षेत्र है। देश के किसी भी हिस्से में यह ‘मुस्लिम मुक्त’ क्षेत्र का बोर्ड लगा होना ‘हिन्दू सांप्रदायिक फ़ासीवाद’ ही तो है।

हत्यारों को सम्मानित करने की भी संघ-भाजपा में अनूठी परंपरा रही है। इसी तरह का सम्मान 25 सितंबर 2015 को गोरक्षा के नाम पर 52 वर्षीय अख़लाक़ के हत्यारों को जेल से छूटने पर मंत्री महोदय द्वारा गले में फूल माला पहना कर किया गया था। उनमें से एक रविन सिसोदिया जब डेंगू से मर गया तो मोदी के ही एक साथी केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा उसके घर अफ़सोस करने गए। उसकी बाकायदा तिरंगे में लपेट कर शव यात्रा निकाली गयी पूरे राष्ट्रीय सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया। अब मुझे यह याद नहीं है कि संस्कार से पहले उसे कितनी तोपों की सलामी दी गयी थी। यह ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ की एक और बेहद शर्मनाक मिसाल है।

गोरक्षा के नाम पर कहीं पहलू खान मारा गया कहीं रकबर खान, कहीं सिराज खान और शकील तो कहीं अलीमुद्दीन अंसारी। एक के बाद दूसरा हमला हो रहा था। कोई सुनने वाला नहीं था, कोई देखने वाला नहीं। 2017 में हफ़िंग्टन पोस्ट में एक रिपोर्ट छपी तो पता चला कि धर्मांधता के मामले में भारत सीरिया, नाइजीरिया और इराक के बाद चौथे नंबर पर आ गया है। प्रधानमंत्री ने इस विषय पर बोलना कभी जरूरी नहीं समझा। एक बार गुजरात में हुई हिंसा के बारे में किसी विदेशी पत्रकार ने पूछा तो बोले कुत्ते का पिल्ला…. । मुर्दा बोले, कफन फाड़े।

गुजरात में डिस्को डांडिया, कानपुर में ‘वैलेंटाइन डे’ का विरोध, ‘फायर’ और ‘पद्मावती’ फिल्म को प्रदर्शित होने देने से रोकना, ‘वाटर’ की शूटिंग को रुकवाना, अभिनेता दिलीप कुमार के घर पर नग्न प्रदर्शन, ‘और अंत में प्रार्थना’ के मंचन पर जबलपुर में किए गए हमले और तोड़फोड़,  मक़बूल फिदा हुसैन तथा जतिन दास के चित्रों को नुकसान पहुंचाने, गुजरात, उड़ीसा, उतर प्रदेश, हरियाणा में ईसाई मिशनरियों पर हमले, चर्च पर हमले, पोप की यात्रा का विरोध, मुम्बई में क्रिकेट मैच न होने देने, ईसाई साध्वियों (ननों) से किए गए बलात्कार आदि से किस प्रकार के हिन्दुत्व का पता चलता है और हिन्दू राष्ट्र बनाने की राह में यह ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ की करवाइयाँ ही तो हैं।

ऐसी कितनी ही कलंक-कथाओं से भाजपा-संघ का इतिहास भरा पड़ा है। पर ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ से जुड़े बहुत से सवाल अब जब उठ खड़े हुए हैं तो इन सवालों के जवाब देने के लिए हम बाध्य इसीलिए हुए हैं क्योंकि जो तमाम संघर्ष हमने नहीं किए अपना हिसाब मांगने चले आए हैं और साथ में रघुवीर सहाय जी अपनी कविता ‘अधिनायक’ लिए आन खड़े हुए हैं। फिर एक बार पूछ रहे हैं:

‘‘राष्ट्रगीत में भला कौन वह

भारत-भाग्य-विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका

गुन हरचरना गाता है

मखमल टमटम बल्लम तुरही

पगड़ी छत्र चंवर के साथ

तोप छुड़ा कर ढोल बजा कर

जय-जय कौन कराता है

पूरब-पश्चिम से आते हैं

नंगे-बूचे नरकंकाल

सिंहासन पर बैठा

उनके तमगे कौन लगाता है

कौन कौन है वह जन-गण-मन

अधिनायक वह महाबली

डरा हुआ मन बेमन जिसका

बाजा रोज बजाता है’’

ऐसे दौर में जब इतिहास का इतना मिथकीकरण किया गया हो कि मिथहास ही इतिहास होकर मंदिर में सिमट गया हो तो इस सवाल का जवाब बार-बार दोहराना पढ़े-लिखे सयानों के लिए ना सही, फटा सुथन्ना पहने अनपढ़ हरचरने के लिए जरूरी हो जाता है ताकि उसे पता चले कि धरती का यह टुकड़ा जिसे वह अपना विश्व-गुरु महान देश मानता है और जिसकी ‘एकता, अखंडता और संप्रभुता’ के लिए वह अपना फटा सुथन्ना तो क्या चीज है, जान की बाज़ी लगा देने के लिए तैयार है, उस देश का जन-गण-मन अगर अधिनायक नहीं है तो फिर कौन है?

हरचरने ने तो जब ‘एंग्री यंग मैन’ के लिए तालियाँ बजाई थीं तब भी उसे खबर नहीं थी कि वह सत्ता के पक्ष में खड़े एक महानायक के लिए तालियाँ बजा रहा है और जब उसी ‘एंग्री यंग मैन’ के कंधे पर हाथ रखकर एक जुमलेबाज़ मदारी सत्ता पर काबिज़ हुआ तो उसके हरेक एक्शन पर वह तालियाँ-थालियाँ बजाने लगा क्योंकि उसके मन में अब यह बात घर कर गई है कि तालियाँ-थालियाँ बजाने वाला ‘वह’ ही असली देशभक्त है।

‘अधिनायक’ के बिना तो फ़ासीवाद संभव नहीं है। किसी सर्वसत्तावादी राज्य में जरूरी नहीं है कि फ़ासीवाद हो। तानाशाही फ़ासीवाद का रूप तभी धारण करती है जब उसे जनता (हरचरना सहित) के एक उल्लेखनीय हिस्से का समर्थन प्राप्त होता है और इसमें उनकी भागीदारी भी रहती है, वह एक आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर लेता है। यह फ़ासीवादी शक्ल जो जनता के मुँह पर लगी हम देख रहे हैं क्या हमारी अपनी शक्ल नहीं है जो हमने अपने हाथों, अपनी गलतियों से बिगाड़ी है? के. सुरेन्द्रन और उनके समर्थकों का विरोध दरअसल आईने में दिख रही, महान भारत के चेहरे के उग आई ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ की अमरबेल का ही विरोध नहीं है? वह नहीं चाहता कि वह अमरबेल किसी को दिखाई दे जो उसने इतने जतनों से उगाई है किसी और को दिखाई दे इसलिए वह हरेक वो आईना तोड़ देना चाहते हैं जिसमें वह अमरबेल दिखाई देती है।

भारत में फ़ासीवाद का जोरदार ढंग से उस समय आगमन हुआ जब पूरी दुनिया में लोकतन्त्र के झंडाबरदार यह मान रहे थे कि फ़ासीवाद बीसवीं सदी में पैदा होकर शिखर पर पहुँचा और शताब्दी के अवसान से बहुत पहले ही प्रभावहीन हो गया। भारतीय फ़ासीवाद इस सदी की शुरुआत में ही विमर्श के केंद्र में आ गया था। हमारे यहाँ रौशन-ख़्याल लोगों की कोई कमी नहीं रही जो संघ के इस फ़ासीवादी ‘अदृश्य रथ-यात्रा’ को लेकर चिंतित थे, लिख-बोल रहे थे। इन्हीं में से एक थे-धीरुभाई सेठ। जैसे साहित्यकारों में मंटो अपना तांगा किसी के साथ शेयर नहीं करते थे वैसे ही लोकतन्त्र के झंडाबरदार धीरुभाई सेठ भी रजनी कोठारी की रैली में अलग वैचारिक तांगे में बैठे नज़र आते हैं।

धीरुभाई सेठ अपनी आशंका व्यक्त करते हुए कहा करते थे- हिंदूवाद एक धर्म है और हिंदुत्व एक राजनीतिक विचार जो महज डेढ़ सौ साल पुराना है। दोनों के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। पर आजकल हिदू धर्म में तब्दीलियां दिखाई दे रही हैं। गुजरात पर निगाह डालने से लगता है कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच का फर्क कम होता जा रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू धर्म और हिंदुत्व के फर्क को बिना समझे हिंदुत्व को जीवन-शैली करार दे दिया था पर हिदुओं के राजनीतिकरण की प्रक्रिया हिंदू धर्म को संरचनागत रूप से हिंदुत्व के नजदीक ला रही है। डर यह है कि कहीं हिंदुत्व ही हिंदुओं को धार्मिक और थियोलॉजी के आधार पर परिभाषित न करने लगे। आज उनकी आशंकाएं सच होती दिखाई दे रही हैं।

उस दौर में सभी लेखक-पत्रकार हिन्दुत्व और फ़ासीवाद के खिलाफ एक जुट और बेखौफ़ होकर लिख रहे थे। किसी दूसरे की चुप्पी किसी से बर्दाश्त नहीं हो रही थी। राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ में ‘कांटे की बात’ लिखी: ‘पहले हम सिर्फ शोर मचाते थे फ़ासीवाद आया, फ़ासीवाद आया। अब जब समाज में फ़ासीवाद सचमुच आ गया है तो सब चुप हैं : ‘आज न आप धर्म के बारे में कुछ बोल सकते हैं, न इतिहास के, न फ़िल्म-नाटक बना सकते हैं, न चित्र-कार्टून, अगले दिन राष्ट्रीयता और धर्म-संस्कृति के एकमात्र तालिबान आपका जीना हराम कर देंगे, वे सिर्फ अख़बारों और मंचों से ही नहीं धमकाएँगे, सड़कों पर प्रदर्शन करेंगे, पुतले जलाएंगे, तोड़-फोड़ करेंगे। कोर्ट-कचहरी में घसीटेंगे, शारीरिक हमले करेंगे और स्थिति यह पैदा कर दी जाएगी कि आपकी जान के लाले पड़ जाएं।….नरेंद्र मोदी नाम का दुःशासन द्रौपदी का एक-एक कपड़ा उतारता रहा, सारे कौरव बारी-बारी से अपने-अपने ढंग से उसके साथ बलात्कार करते रहे और अंधा धृतराष्ट्र निष्क्रिय बैठा कराहने के डायलॉग बोलता रहा कि यह ठीक नहीं हो रहा है…।’

अरुंधति रॉय, रजनी कोठारी, नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, रविभूषण, खगेन्द्र ठाकुर, मंगलेश डबराल, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती आदि सबने फ़ासीवाद के खतरे को अपने-अपने ढंग से चिन्हित किया। कमलेश्वर ने ‘हिंदुत्ववादी नाज़ीवाद’ को अपने अंदाज़ में लानत-मलामत भेजी। संघ के कुलगुरु सावरकर और इष्ट देव हिटलर और मुसोलिनी से रिश्तों के ऐतिहासिक किस्से पाठकों के सामने खुलकर रखे। बार-बार याद दिलाते रहे कि भारत का हर हिन्दू भाजपाई हिन्दू नहीं है। मोदी के बारे में तो यहाँ तक कह गए कि ‘नरेंद्र मोदी और आतंकवादी दोनों की बिरादरी एक है’।

अब जो यह सब देखने-सुनने को मिल रहा है इसमें हैरानी की क्या बात है? पूत के पाँव पालने में पहचाने जाते हैं। जब मोदी प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए तो जहाँ तक हिंदुत्व के एजेंडे का सवाल है तो नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो पहले कभी नहीं हुआ था। मोदी राज में ही यह कमाल देखने में आया कि सरकारी मीडिया का इस्तेमाल गैर-सरकारी ‘धर्म माफिया’ के लोगों ने किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने सरकारी मीडिया पर ‘राष्ट्र के नाम सन्देश’ प्रसारित किया। सरकारी मीडिया पर इस तरह बोलने का मौका केवल राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को ही मिलता है।

सवाल उठे कि क्या किसी निजी संगठन के कार्यक्रम को प्रसारित करने के दूरदर्शन के पास कोई मानक है? यह भी कहा जाने लगा कि जैसे कांग्रेस की सियासत 10 जनपथ से चलती थी, अब बीजेपी की सियासत आरएसएस के नागपुर मुख्यालय से चलती है। आरएसएस के सरसंघचालक की कोई संवैधानिक हैसियत नहीं है लेकिन फिर भी उन्हें दूरदर्शन पर बोलने का मौका दिया गया, क्यों? “घर वापसी’ जैसी मुहिम के मुखिया रहे आरएसएस के एक और प्रचारक राजेश्वर सिंह भी अल्पसंख्यकों को टीवी पर खुलेआम धमकी देते दिखे कि अगर उन्होंने 2025 तक धर्मान्तरण नहीं किया तो उन्हें भारत से खदेड़ दिया जायेगा।

इसके कुछ दिन बाद दिल्ली में हिन्दू विश्व सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत की उपस्थिति में बोलते हुए विश्व हिन्दू परिषद् के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “भारत में आठ सौ साल बाद हिन्दुओं का राज स्थापित हुआ है। हिन्दुओं के पास पहले भी सत्ता थी, लेकिन पृथ्वीराज चौहान के बाद स्वाभिमानी हिन्दुओं का राज पहली बार स्थापित हुआ है”। इसी दरम्यान योगी आदित्यनाथ की तर्ज़ पर भाजपा की सहयोगी पार्टी शिव सेना (जो इन दिनों काँग्रेस की मदद से सत्ता में है) ने भी यह मांग शुरू कर दी थी कि मुसलमानों से वोट देने का अधिकार छीन लिया जाना चाहिए। बयानबाज़ी के साथ-साथ गिरजाघरों पर हमले की ख़बरें आती रहीं पर मोदी सरकार ने कोई सख्त करवाई तो दूर चेतावनी देने की भी जरूरत नहीं समझी।

अब जब अयोध्या की धरती पर प्रधानमंत्री मोदी के कर-कमलों द्वारा भूमिपूजन के साथ ही ‘सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद’ का झण्डा गाड़ दिया गया है और वामपंथियों सहित तमाम राजनीतिक दल घुटनों के बल खड़े दिखाई दे रहे हैं, एक बात याद रखने वाली है कि हर तानाशाही का अंत बहुत बुरा होता है। दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात नाज़ी अफ़सरों पर मुक़दमा कायम हुआ था जिसे ‘न्यूरेमबर्ग ट्रायल’ के नाम से जाना जाता है। सभी अपराधियों का यह बचाव था कि उन्हें उनके आका ने हुक्म दिया था और वे मात्र अपना काम कर रहे थे। अतः उन्हें दंडित न किया जाए। हर तानाशाह नफ़रत की एक लहर प्रवाहित करता है, जिस पर पवित्र लेबल लगाए जाते हैं। तानाशाह स्वयं एक भयभीत व्यक्ति होता है और उसके सारे आक्रोश के तेवर महज अपने भय के ऊपर चादर डालने के लिए होते हैं। जनता जिस दिन एकजुट हो जाएगी कच्चे सूत की चादर उतार फेंकेगी। तानाशाह का क्या होगा, खुदा जाने।

चलते-चलते: बक़ौल ध्यान देने लायक बात तो यह है कि जो संघवादी संयुक्त राजनीतिक परिवार है, उसी में सांप्रदायिकतावादी भी मौजूद हैं और इन संगठनों ने अपने संप्रदायवाद को सामाजिक और सांस्कृतिक छद्म में छिपा रखा है। नहीं तो क्या कारण है कि इन संगठनों से एक भी ऐसा ख्यातनाम संस्कृतिकर्मी नहीं जुड़ा हुआ है। जिसे ‘हिन्दुत्ववाद’ का प्रवक्ता या प्रतिनिधि कहा जा सके। आधुनिक भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में क्यों इनके पास कोई कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, सुब्बालक्ष्मी या रविशंकर नहीं है?

क्यों कोई सत्यजित रे, ऋत्विक घटक, गुरुदत्त, श्याम बेनेगल या राजकपूर नहीं है? क्यों इनके पास कोई भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद, ताराशंकर बंदोपाध्याय, शंकर कुरूप, फणीश्वरनाथ रेणु या महाश्वेता देवी नहीं है? क्यों इनके पास कोई मेधा पाटकर या सुंदरलाल बहुगुणा नहीं है? क्यों इनके पास कोई स्वामीनाथन या राजा रमन्ना नहीं है? मैंने जानबूझकर उन भारतीयों के नाम गिनाए हैं जो हिंदू हैं। प्रधानमंत्री मोदी से पूछा जाना चाहिए कि आरएसएस यदि एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है तो अपने जीवनकाल में संघ ने हमें कितने संस्कृति पुरुष दिए हैं? वे सब कहाँ हैं? यदि नहीं तो क्यों नहीं?

भूमिपूजन के बाद तो आरएसएस और भाजपा की अब सारी पोलपट्टी खुल नहीं गई है? क्या अब भी कहने–सुनने को कुछ बाकी बचा है? क्या अब भी कोई पूछेगा कि सांप्रदायिक हिन्दू फ़ासीवाद कहाँ है?

सवाल-दर-सवाल है, हमें जवाब चाहिए।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल लुधियाना में रहते हैं।)

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This post was last modified on August 12, 2020 9:54 am

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