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मॉब लिंचिंग पत्र केस में हस्तियों पर देशद्रोह के मुकदमे का निर्देश देने वाले सीजेएम को क्या सुप्रीमकोर्ट के रुलिंग्स का ज्ञान है?

मुज़फ़्फ़रपुर में सीजेएम सूर्यकांत तिवारी की अदालत ने एक वकील सुधीर कुमार ओझा के प्रार्थना पत्र पर धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत मॉब लिंचिंग को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखने वाले इतिहासकार रामचंद्र गुहा, फ़िल्मकार मणिरत्नम, अनुराग कश्यप, श्याम बेनेगल, अभिनेत्री अपर्णा सेन, गायिका शुभा मुद्गल जैसे 49 लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर के तहत मुकदमा लिख कर विवेचना करने का आदेश पुलिस को दिया था।

इस शिकायत में कानून के अनुसार देशद्रोह का मामला न बनते देख पुलिस अधिकारियों ने इस एफ़आईआर को रद्द करके वकील सुधीर कुमार ओझा के खिलाफ झूठा मुकदमा लिखने के आरोप में मामला दर्ज़ कर कार्रवाई करने का आदेश दिया है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या सीजेएम सूर्यकांत तिवारी को धारा 156(3) सीआरपीसी के प्रावधानों का ज्ञान है कि नहीं?

अगर किसी संज्ञेय मामले में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करती तो शिकायती सीआरपीसी की धारा-156 (3) के तहत अदालत में अर्जी दाखिल करता है और अदालत पेश किए गए सबूतों के आधार पर फैसला लेती है। ऐसे मामले में पुलिस के सामने दी गई शिकायत की कॉपी याचिका के साथ लगाई जाती है और अदालत के सामने तमाम सबूत पेश किए जाते हैं। इस मामले में पेश किए गए सबूतों और बयान से जब अदालत संतुष्ट हो जाए तो वह पुलिस को निर्देश देती है कि इस मामले में केस दर्ज कर छानबीन करे।

जब मामला असंज्ञेय अपराध का होता है तो अदालत में सीआरपीसी की धारा-200 के तहत कंप्लेंट केस दाखिल किया जाता है। कानूनी प्रावधानों के तहत शिकायती को अदालत के सामने तमाम सबूत पेश करने होते हैं। उन दस्तावेजों को देखने के साथ-साथ अदालत में प्री समनिंग साक्ष्य होता है। यानी प्रतिवादी को समन जारी करने से पहले का साक्ष्य रेकॉर्ड किया जाता है।

दरअसल किसी अदालत में अगर कोई किसी के ख़िलाफ़ 156(3) में ऍफ़आईआर दर्ज़ करने के लिए प्रार्थनापत्र दाखिल करता है तो कोर्ट उस पर सुनवाई करती है और सम्बन्धित थाने से रिपोर्ट भी मांगती है। अगर शिकायत में दम लगता है तभी कोर्ट ऍफ़आईआर दर्ज़ करके जांच का आदेश देता है। लेकिन यदि शिकायतकर्ता के पास पक्ष में सबूत नहीं होते तो उसका प्रार्थना पत्र ख़ारिज कर दिया जाता है। 156(3) में प्रार्थनापत्र में यह लिखना पड़ता है कि सम्बन्धित पुलिस थाने में शिकायत दी गया लेकिन पुलिस ने ऍफ़आईआर दर्ज़ नहीं की।

अदालत में इस पूरी प्रक्रिया में तीन महीने से छह महीने तक लगते हैं। लेकिन 49 प्रख्यात लोगों के ख़िलाफ़ जिस तरह एफआईआर लिखने का आदेश जल्दीबाजी में दिया गया उससे यह शोध का विषय है की क्या 156(3) में प्रार्थनापत्र देने के क़ानूनी प्रावधान का पालन किया गया? यदि प्रार्थनापत्र के साथ साक्ष्य देने की बात है तो पत्रावली पर क्या साक्ष्य देखकर सीजेएम सूर्यकांत तिवारी ने पुलिस को एफआईआर लिखकर जाँच करने का आदेश दिया।

क्या सीजेएम सूर्यकांत तिवारी को देशद्रोह कानून के प्रावधानों का सम्यक ज्ञान है? क्या सीजेएम सूर्यकांत तिवारी केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य, 1962 सुप्रीम कोर्ट 2 एससीआर 769 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गयी उस व्यवस्था का ज्ञान है कि केवल सरकार या उसकी नीतियों की आलोचना करने के लिए देशद्रोह के आरोप नहीं लगाए जा सकते? क्या सीजेएम सूर्यकांत तिवारी को इस बात का ज्ञान है कि उच्चतम न्यायालय के जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने 5 सितम्बर  2016 को साफ-साफ कहा था  कि सरकार की आलोचना करने पर किसी के खिलाफ राजद्रोह या मानहानि के मामले नहीं थोपे जा सकते?

इसी के साथ पीठ ने पुलिस और ट्रायल जजों सहित सभी अथॉरिटीज को निर्देश दिया कि वे इस मामले में उसकी संविधान पीठ के उस फैसले का पालन करें जिसमें कहा गया था कि सिर्फ हिंसा भड़काने और समाज में गड़बड़ी पैदा करने के मामले में ही राजद्रोह का मामला लगाया जा सकता है। पीठ ने कहा था कि यदि कोई सरकार की आलोचना करने के लिए बयान दे रहा है तो वह राजद्रोह या मानहानि के कानून के तहत अपराध नहीं करता। धारा 124 (ए) आईपीसी यानि देशद्रोह की धारा को लागू करने के लिए उच्चतम न्यायालय  के पहले के एक फैसले के अनुसार कुछ दिशानिर्देशों का पालन करना होगा।

इसके बावजूद जुलाई महीने में भारत के 49 सेलिब्रिटीज द्वारा  देश में बढ़ रही भीड़ हिंसा यानी लिंचिंग के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गये पत्र को लेकर इनके खिलाफ सीजेएम सूर्यकांत तिवारी के आदेश पर बिहार के मुजफ्फरपुर में देशद्रोह के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी। यक्ष प्रश्न यह भी है की जिस सीजेएम को धारा 156(3) सीआरपीसी के प्रावधानों और देशद्रोह पर क़ानूनी प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय की रुलिंग्स का सम्यक ज्ञान न हो उसे एक मिनट भी इतने महत्वपूर्ण पद पर रहने का अधिकार है?

राजस्थान हाइकोर्ट ने इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। हाइकोर्ट ने कहा है कि संबंधित मजिस्ट्रेट आपराधिक परिवाद को पुलिस थाने में मुकदमा दर्ज करने का आदेश देने से पहले प्रथमद्रष्ट्या मामले की जांच करे। यदि जरुरत हो तो वह मामले के सत्यापन के लिए परिवादी से शपथ पत्र भी ले। हाइकोर्ट ने कहा है कि संज्ञेय अपराध होने पर ही मामले को 156 3 के तहत ही थाने में भेजा जाए।

प्रमोशन परीक्षा में फेल हो गए सभी 119 जज

कितने काबिल न्यायिक अधिकारी हैं इसकी बानगी पिछले दिनों गुजरात में 40 जिला न्‍यायाधीशों के लिए आयोजित परीक्षा के परिणाम से देखी जा सकती है। परीक्षा में हिस्‍सा लेने वाले 119 कार्यरत जजों और 1,372 वकीलों में से कोई भी यह परीक्षा पास नहीं कर सका। गुजरात हाईकोर्ट ने 7 अक्तूबर 2019 को जजों की भर्ती के लिए हुई लिखित परीक्षा के परिणाम का ऐलान किया और परिणाम ‘शून्‍य’ बताया। गुजरात हाईकोर्ट के पोर्टल पर लगी इस लिस्‍ट के अनुसार फेल होने वाले इन 119 जजों में से 51 जज गुजरात में किसी न किसी कोर्ट में जज हैं। जून 2019 की स्थिति के अनुसार ये इन अदालतों में या तो प्रिंसिपल जज या चीफ ज्यूडिशियल मजिस्‍ट्रेट के पद पर तैनात थे।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ ही कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

This post was last modified on October 11, 2019 5:50 pm

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