Sunday, October 17, 2021

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ट्रम्प को लाशें ज़्यादा डरा रही हैं या चुनाव!

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कोरोना के कहर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प को चकरघिन्नी बना दिया है। ख़ुद को सर्वशक्तिमान समझने वाला अमेरिका अब तक अपनी 50,000 से ज़्यादा लाशें गिन चुका है। वैसे ट्रम्प ख़ुद आशंका जता चुके हैं कि कोरोना 2.5 लाख अमेरिकियों की बलि लिये बग़ैर नहीं मानने वाला। यानी, अभी चार गुना तबाही देखना बाक़ी है। लेकिन ट्रम्प की बदहवासी की वजह इन लाशों से ज़्यादा दिसम्बर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर है। इसीलिए वो कोरोना को महज वैश्विक महामारी नहीं मानना चाहते, बल्कि दुनिया की आँखों में धूल झोंकने के लिए वो इसे ‘अमेरिका पर हमला’ बता रहे हैं।

अमेरिकी क़ानून और परम्पराओं के अनुसार, ‘अमेरिका पर हमला’ से बड़ी आफ़त और कुछ नहीं होती। दुनिया में कहीं भी यदि अमेरिकी नागरिक किसी हमले के शिकार होते हैं तो अमेरिका उसे ख़ुद पर हमला करार देता रहा है। इसीलिए 22 अप्रैल को व्हाइट हाउस में संवाददाताओं को दिये गये इस बयान के मायने बहुत गहरे हैं कि “हम पर हमला हुआ। यह हमला था। यह कोई फ्लू नहीं था। कभी किसी ने ऐसा कुछ नहीं देखा।” अब सवाल ये है कि यदि हमला हुआ तो हमलावर कौन है? किसने शेर की माँद में हाथ डाला?

ट्रम्प ने इस बार चीन को हमलावर नहीं बताया, लेकिन उनका इशारा चीन पर ही है। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव को सामने देख कोरोना का ठीकरा चीन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और डेमोक्रेटिक पार्टी के अपने प्रतिद्वन्दी जोए बिडेन पर फोड़ने की रणनीति बनायी है। उन्होंने WHO को अमेरिकी अंशदान रोककर सज़ा भी दे दी। इसके बाद ट्रंप ने एक तीर से दो शिकार किया और कहा कि “चीन, पूर्व उपराष्ट्रपति जोए बिडेन का समर्थन कर रहा है। और, यदि बिडेन जीत गये तो अमेरिका पर चीन का कब्ज़ा हो जाएगा।” बिडेन, इसी साल हो रहे राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार हैं।

चीन को खलनायक बनाने का दाँव 

ट्रम्प के तेवर की तुलना 2015 के इस बयान से कीजिए कि ‘बिहार में बीजेपी नहीं जीती तो पाकिस्तान में दिवाली मनायी जाएगी’। ‘अमेरिका पर हमला’ और ‘अमेरिका पर चीन के कब्ज़े’ का मतलब साफ़ है कि ट्रम्प और उनका गोदी मीडिया डरा हुआ है कि अमेरिका ने जैसे कोरोना का मुक़ाबला किया है, वैसा ही नतीज़ा कहीं जनता भी चुनाव में न सुना दे। इसीलिए अमेरिका और बाक़ी दुनिया का अमेरिका परस्त कॉपी-पेस्ट मीडिया ट्रम्प की सियासी भूख को मिटाने में जुट गया है।

ख़ुद को अजेय नायक और चीन को खलनायक की तरह पेश करने में ट्रम्प को कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली जैसे मित्र देशों (एलाइड फ़ोर्सेस) से भी पूरा सहयोग मिला है। सभी एक स्वर से गाते हैं कि चीन ने प्रयोगशाला में कोरोना को जैविक हथियार की तरह बनाया है। कोई कहता है कि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से कोरोना लीक हो गया, किसी ने कहा कि चीन ने जान बूझकर कोरोना का सारा ब्यौरा दुनिया को नहीं दिया, कोई कह रहा है कि चीन में अमेरिका से ज़्यादा मौतें हुईं लेकिन उसने छिपा लिया। वैसे कोरोना ने अब चीन के पाँच से ज़्यादा प्रान्तों में फिर से अपना सिर उठा लिया है।

दरअसल, जैसे Weapon of mass destruction के नाम पर सद्दाम का सफ़ाया हुआ था, वैसे ही अभी नाटो देशों के निशाने पर चीन है। सिर्फ़ फ़्राँस ने ही कहा कि कोरोना कृत्रिम नहीं है। इसे प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता। वुहान में इसका अवतरित होना महज एक इत्तेफ़ाक है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित शोध कह रहे हैं कि कोरोना पूरी तरह से प्राकृतिक ही है। ज़ाहिर है, जब वायरस के कृत्रिम होने का झूठ फैलेगा तभी तो सारा विज्ञान धरा का धरा रह पाएगा। यही हो रहा है। कोई बता रहा है कि चीनी कम्पनियों ने अपने सुरक्षा उपकरण (PPE), वैक्सीन, वेंटिलेटर, टेस्टिंग किट, मॉस्क वग़ैरह के धन्धे को चमकाने के लिए दुनिया को कोरोना की आग में झोंक दिया है। लेकिन यही वर्ग ये नहीं देख रहा कि कोरोना ने चीन की अर्थव्यवस्था का भी सत्यानाश कर दिया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति जी जिनपिंग

दूसरी ओर, ये तथ्य किसी से छिपे नहीं हैं कि तमाम सुविधाओं से सम्पन्न अमेरिका और उसके मित्र देशों ने यदि वक़्त रहते दक्षिण कोरिया, ताइवान और हाँगकाँग की तरह दूरदर्शिता दिखायी होती तो वहाँ हालात इतने भयावह नहीं होते, जैसे कि हुए। इसीलिए अपनी ख़ामियों को छिपाने के लिए अमेरिका और उसके मित्र देशों ने चीन को बलि का बकरा बनाने का रास्ता थामा और अमेरिका परस्त देशों के मीडिया घरानों ने चीन का चरित्र-हनन करने वाली ख़ूब ‘प्लांटेड ख़बरें’ फैलायीं।

मुक़दमा और हर्ज़ाने की नौटंकी

बहरहाल, बहती गंगा में हाथ धोने की रणनीति के अनुसार, पहले अमेरिका और जर्मनी की निजी कम्पनियों ने चीन से भारी-भरकम हर्ज़ाना भी माँग डाला। फिर अमेरिकी राज्य मिसूरी ने भी चीन के ख़िलाफ़ मुक़दमा ठोकने की नौटंकी की। हर्ज़ाने के प्रति मित्र देशों की सरकारें तटस्थ हैं। क्योंकि यदि वो इसका समर्थन करती हैं तो नया संकट खड़ा हो जाता कि उनके देशों की अदालतों का क्षेत्राधिकार चीन तक कैसे हो सकता है? हर्ज़ाने की वसूली कैसे होगी? क्या मामला अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में जाएगा? क्या चीन को तमाम आर्थिक प्रतिबन्धों से हर्ज़ाना भरने के लिए मज़बूर किया जाएगा या फिर उसके ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया जाएगा?

इन सवालों का जवाब अभी हवा में ही है। ट्रम्प तो अमेरिकी जाँच दल को वुहान भेजने का शिगूफ़ा भी छोड़ चुके हैं। ऐसी माँग को ठुकराते हुए चीन ने कहा कि ‘हम दोषी नहीं, पीड़ित हैं। हमने ज़िम्‍मेदारी से काम किया है।’ हालाँकि, ये भी किसी से छिपा नहीं है कि चीन और उत्तर कोरिया की सरकारें और वहाँ का मीडिया कभी पारदर्शी नहीं रहा। वहाँ वही छपता या दिखता है जिसमें सरकारों की रज़ामन्दी हो। बहुलतावादी पत्रकारीय समीक्षा तो कभी उनकी संस्कृति में रही ही नहीं। तो फिर ऐन कोरोना के कहर के वक़्त ही चीनी ढर्रा कैसे बदल जाता?

पत्रकारिता के लिहाज़ से चीन जैसा रवैया कमोबेश दुनिया के सभी देशों में रहा है। आमतौर पर सभी देशों का मीडिया अपनी सरकारों की ओर से तय राष्ट्रीय हितों के मुताबिक क़दम-ताल करके ही चलता है। अब चूँकि चीन को खलनायक बनाने के लिए उसका चरित्र हनन ज़रूरी है, इसीलिए अमेरिकी मीडिया लगातार ट्रम्प के सियासी हथकंडों के मुताबिक़, रोज़ाना किसी नये ‘एंगल’ से ऐसी ख़बरें प्लांट कर रहा है कि चीन ने ये गड़बड़ी की या वो गड़बड़ी की। हालाँकि, कोई पुख़्ता सबूत किसी के पास नहीं है। शायद, कभी मिलेंगे भी नहीं। वैसे भी चरित्र हनन के लिए सबूत की ज़रूरत कब पड़ी है!

इतना झूठ फैलाओ कि वही सच लगे

अब सवाल ये है कि विकसित देशों में कोरोना से जो तबाही होनी थी, सो तो हुई ही। अभी हो ही रही है। लिहाज़ा, अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए तबाही का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने के लिए चीन और WHO को खलनायक बनाया गया। चीन को सज़ा देने से पहले उसकी भयावह और महादुष्ट खलनायक वाली छवि बनाना ज़रूरी था। क्योंकि नाट्य शास्त्र का सहज नियम है कि खलनायक जितना ‘क्रूर, भयावह और निर्दयी’ दिखेगा, उतना ही उसे ललकारने वाला नायक, ‘महान, तेजस्वी और प्रतापी’ नज़र आएगा। दूसरी ओर, अमेरिका को चीन से मदद भी चाहिए। उसकी अपनी अब भी तैयारियाँ वैसी नहीं हैं जैसी कि कोरोना से मुक़ाबले के लिए ज़रूरी हैं।

चीन को जमकर कोसे बग़ैर ट्रम्प के बलशाली होने की छवि नहीं उभर सकती। छवियों को बनाने-बिगाड़ने के लिए झूठ का प्रचंड फैलाव ज़रूरी है। क्योंकि ये स्थापित नियम है कि झूठ को इतना फैला दो कि लोग उसे ही सच समझने लगें। ये नुस्ख़ा दर्ज़नों बार अपना कमाल दिखा चुका है। चीन की कम्युनिस्ट शासन-प्रणाली का ढर्रा इसके लिए खाद-पानी का काम कर रहा है। अमेरिका में भी बराक ओबामा की हुक़ूमत पर वैसे ही ठीकरा फोड़ा जा रहा है, जैसे भारत में बात-बात पर नेहरू को कोसा जाता है। ऐसा नहीं है कि झूठ के खिलाड़ियों को पता नहीं होता कि पोल खुली तो उन्हें बहुत भारी पड़ेगा। लेकिन वो जोख़िम उठाते हैं क्योंकि यही उनका आख़िरी हथकंडा होता है। इसीलिए अँग्रेज़ी मीडिया को मुट्ठी में करके चीन का चरित्रहनन किया जा रहा है। चुनाव तक ऐसे ही चलेगा।

ट्रक और डब्ल्यूएचओ के निदेशक।

राजनीति में कोई दूध का धुला नहीं होता। चीन भी नहीं हो सकता। तो फिर भारतीय मीडिया भी, चीन को खलनायक बनाने पर क्यों आमादा है? ट्रम्प ने भारत से भी अमेरिका के सुर में सुर मिलाकर चीन को कोसने के लिए कहा था। लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की कठपुतली बनने से इनकार कर दिया। फिर सत्तासीन लोगों को लगा कि ट्रम्प प्रशासन की तरह यदि कल को मोदी सरकार के सामने भी थू-थू की नौबत आ गयी तो? इसीलिए तय हुआ कि सरकार औपचारिक तौर पर चीन की आलोचना नहीं करेगी, लेकिन भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया और WhatsApp University पश्चिमी मीडिया के झूठ को भारतीय जनमानस में कूट-कूटकर भरता रहेगा। फिलहाल, भारत में यही हो रहा है।

कॉपी-पेस्ट पत्रकारिता

भारत में ये काम बहुत आसान है। हमारे इंग्लिश मीडिया की आदत है कि वो पश्चिम के इंग्लिश प्रेस की स्टोरीज़ और यहाँ तक कि ‘प्लांटेड स्टोरीज़’ को भी आँख बन्द करके छापता रहा है। भारत में ये सामान्य धारणा है कि पश्चिमी प्रेस बहुत सदाचारी, नैतिक और मूल्यों पर चलने वाला है। इसीलिए, उनकी सामग्री को हम चुटकियों में कॉपी-पेस्ट करके अँग्रेज़ी पढ़ने-सुनने वाले सम्भ्रान्त लोगों के आगे परोस देते हैं। फिर देश की भाषायी पत्रकारिता अपने अँग्रेज़ी वाले भाईयों-बहनों की ‘प्लांटेड स्टोरी’ का अनुवाद करके उसे अपने दर्शकों और पाठकों तक पहुँचा देती है।

दरअसल, भारतीय प्रेस के पास विदेश से सूचनाएँ लाने और अपना विश्लेषण करने की संस्कृति ही नहीं है। हमारे मीडिया घरानों के बमुश्किल दर्ज़न भर संवाददाता ही विदेश में हैं। विदेश पर नज़र रखने वाली हमारी ख़ुफ़िया एजेंसी ‘रॉ’ भी पश्चिमी मीडिया के कॉपी-पेस्ट कंटेट के भरोसे ही रहती है। इसीलिए, हमारा सारा तंत्र भी चीन को खलनायक की तरह पेश कर रहा है। भले ही चीन ने तमाम सयानापन दिखाया हो, बहुत कुछ छिपा ही लिया हो, लेकिन कोरोना की क्रोनोलॉज़ी से साफ़ है कि जितना कुछ भी सारी दुनिया या WHO को पता चला वो यदि दक्षिण कोरिया, हाँगकाँग और ताइवान के लिए पर्याप्त था तो फिर बाक़ी दुनिया के लिए क्यों नहीं? इत्तेफ़ाकन, ये तीनों देश भी कोई मामूली अमेरिका परस्त नहीं हैं।

ये किससे छिपा है कि अमेरिका में पहला संक्रमित 20 जनवरी को मिला। भारत से 10 दिन पहले। अगले 40 दिन तक ट्रम्प प्रशासन के पास बयानबाज़ी के सिवाय कोरोना से लड़ने की कोई ख़ास तैयारी नहीं थी। वहाँ भी सोशल डिस्टेन्सिंग और लॉकडाउन या ‘स्टे एट होम’ का फ़ैसला बहुत देर से लिया गया। व्यापक टेस्टिंग की तैयारी नहीं थी। पर्याप्त वेंटिलेटर्स नहीं थे। PPE की भारी किल्लत थी। टेस्टिंग किट्स का अकाल था। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन जैसी दवा भी नहीं थी। वहाँ भी कोरोना से हो रही मौतों का आँकड़ा ये कहकर छिपाया जा रहा है कि मृत्यु के बाद टेस्टिंग पर धन-श्रम खर्च करने ये बेहतर है कि इस शक्ति को ज़िन्दा लोगों पर ही लगाया जाए। वहाँ भी बेरोज़गारी रोज़ाना नये कीर्तिमान बना रही है। अर्थतंत्र चरमरा गया है। ऐतिहासिक मन्दी दरवाज़े पर खड़ी है।

साफ़ है कि यदि चीन को खलनायक बनाने का दाँव चल गया तो ठीक, वर्ना ट्रम्प क्यों नहीं जानते होंगे कि कोरोना की चौतरफा मार के आगे उनकी सियासी नैया का पार उतरना बेहद मुश्किल है। कोरोना ने चीनी अर्थव्यवस्था का भी कचूमर निकाल दिया है। चीन को भी इसके फिर से लौटने की चिन्ता बहुत सता रही है। उधर, दक्षिण कोरिया में जिस सरकार ने कोरोना से जंग में देश का नाम ऊँचा किया वो भारी बहुमत से सत्ता में लौट चुकी है। लिहाज़ा, वक़्त आने पर यूरोप, अमेरिका, भारत-पाकिस्तान की मौजूदा सरकारों को भी अपनी करनी का फल क्यों नहीं मिलेगा!

(मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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