Saturday, December 4, 2021

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क्या स्टेन स्वामी के बाद सत्ता अब गौतम नवलखा को चाहती है मौत के घाट उतारना?

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मीडिया के अनुसार अब 70 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गौतम नवलखा को नवी मुंबई के तलोजा जेल के सामान्य कैदियों वाली बैरक से गंभीर,बड़े अपराध करने वाले और शातिर कैदियों को रखे जाने वाले अंडा सेल की एकदम तनहाइयों और एकाकी जीवन के लिए बाध्य करने वाली सेल में,जिसमें कैदी खुली हवा में सांस तक नहीं ले सकता,ऑक्सीजन और हरियाली के बिना रहने को बाध्य करने वाली सेल में स्थानांतरित कर दिया गया है। अब वे अपने 24 घंटे की दिनचर्या में केवल 8 घंटे ही 7.50 फीट × 72 फीट के एक बारामदे में, जो ऊँची-ऊँची सीमेंट की चाहरदिवारी से घिरा है,के सीमेंटेड फर्श पर ही टहल-घूम सकते हैं,उन्हें उनकी अपनी जीवन संगिनी व अपने वकीलों से फोन पर बात करने की सुविधा से भी वंचित कर दिया गया है। इन्हीं परिस्थितियों में 5 जुलाई 2021 को गरीबों, वंचितों, दलितों के मसीहा फादर स्टेन स्वामी को मौत के घाट उतार दिया गया था।

आखिर 84 वर्षीय, वृद्ध, शक्तिहीन, बेबस,लाचार,कई बीमारियों यथा पर्किंसन बीमारी से ग्रस्त,लगभग पूर्णतः बहरे,कांपते हाथों वाले,ठीक से खाना-पानी तक अपने मुँह तक ले जाने में असमर्थ,आजीवन वंचितों आदिवासियों के हक-हूकूक के लिए संघर्ष करने वाले अथक योद्धा अपने पैरों को बेड़ियों में जकड़े हुए इस देश की क्रूरतम्,फॉसिस्ट,असंवेदनशील मोदी और शाह की वजह से अपने प्राण त्याग दिए। जबकि फादर स्टेन स्वामी, 82 वर्षीय कवि वरवर राव, आईआईएम अहमदाबाद के 71वर्षीय प्रोफेसर आनन्द तेलतुंबडे, सुधा भारद्वाज आदि मानवता के देवदूतों को कमेटी फॉर रिलीफ ऑफ पोलिटिकल प्रिजनर्स के मीडिया सेक्रेटरी रोना विल्सन के कम्प्यूटर को मैलवेयर साफ्टवेयर यानि चोर साफ्टवेयर के जरिए फंसाया गया। फिर उसी छद्म और फर्जीवाड़े केस के तहत उक्त सभी लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें तिल-तिलकर मारा जा रहा है। क्या वर्तमान समय के सत्ता के असहिष्णु, अमानवीय, क्रूर सत्ता के कर्णधारों द्वारा फादर स्टेन स्वामी की तरह सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार 70 वर्षीय गौतम नवलखा को भी अब मौत के मुंह में धकेलने की तैयारी की जा रही है ?

उक्त प्रश्न का उत्तर जी हाँ में है, क्योंकि अमेरिका के सुप्रसिद्ध समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट में 10फरवरी 2021 को प्रकाशित खबर के अनुसार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भूतपूर्व रिसर्च स्कॉलर और कमेटी फॉर रिलीफ ऑफ पोलिटिकल प्रिजनर्स के मीडिया सेक्रेटरी रोना विल्सन के कम्प्यूटर को किसी गुमनाम हैकर ने पहले हैक करके उसमें मैलवेयर साफ्टवेयर यानि चोर साफ्टवेयर के जरिए उनके कम्प्यूटर में फर्जी तरीके से 10 दस्तावेज बनाए, जिसमें रोना विल्सन की तरफ से किसी माओवादी संगठन से मोदी की कथित हत्या के लिए बंदूकें और हथियार माँगे गये थे और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने जैसे आरोप लगाए गये थे। रोना विल्सन की गिरफ्तारी के बाद इस देश के अलग-अलग जगहों से 15 अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों, वकीलों आदि की गिरफ्तारियां हुईं, इन सभी पर आरोप है कि इन सभी लोगों का सम्बंध उक्त रोना विल्सन से है। इन गिरफ्तार लोगों में इंसानियत पर कविता लिखने वाले 82 वर्षीय कवि वरवर राव,आईआईएम अहमदाबाद के 71वर्षीय प्रोफेसर आनन्द तेलतुंबडे, प्रोफेसर शोमा सेन, आजीवन आदिवासियों और बेसहारा लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले 84 वर्षीय स्टेन स्वामी, विकलांगों की मदद करने वाले वर्नन गोंजाल्विस और गरीबों के केस लड़ने वाले अरूण फरेरा, सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज,गौतम नवलखा, महेश राउत, नताशा नरवाल, हैनी बाबू, सुधीर ढावले, गौतम गिलानी, देवांगना कालिता, सुरेंद्र गाडगिल आदि को जेलों में गैरकानून रूप से सड़ाया जा रहा है।

अफसोस, हतप्रभ और विस्मित करने वाली बात यह भी है कि उक्त लोगों में कुछ ऐसे लोग भी हैं,जो शारीरिक और मानसिक रूप से इतने अशक्त हैं कि वे अपने हाथों से ठीक से पानी तक नहीं पी सकते,न खाना खा सकते हैं। ये सभी लोग अपनी शारीरिक व मानसिक अस्वस्थता की वजह से गुहार लगाकर अपनी रिहाई और वृद्धावस्था में अपने परिवार और परिजनों के साथ रहने की अंतिम इच्छा और लालसा हेतु भारत के विभिन्न हाईकोर्ट्स और सुप्रीमकोर्ट तक में बार-बार अपनी जमानत याचिका दाखिल कर रहे हैं। लेकिन उन्हें वहां से कोई राहत नहीं मिल रही है। वाशिंगटन पोस्ट की यह खबर पिछले दिनों द ट्रिब्यून, इंडिया टुडे, लाईव मिन्ट, एनडीटीवी, वाशिंगटन पोस्ट स्क्रोल और हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे लब्धप्रतिष्ठित और सम्मानित भारतीय समाचार पत्रों के साथ तमाम विदेशी मीडिया के समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुआ है।

आर्सेनल कंसल्टिंग जो एक अमेरिकी फोरेंसिक फर्म है,की फोरेंसिक रिपोर्ट ने इसका खुलासा किया है कि किसी अज्ञात हैकर ने रोना विल्सन की गिरफ्तारी से पूर्व उनके लैपटॉप में एक चोर साफ्टवेयर जिसे मैलवेयर साफ्टवेयर कहते हैं,के जरिए कुछ आपत्तिजनक पत्र डाले। आईएनए ने उन्हीं छद्म और फ्रॉड पत्रों को रोना विल्सन के खिलाफ अपने शुरुआती साक्ष्य के रूप में कोर्ट में इस्तेमाल किया। रोना विल्सन के लैपटॉप से प्राप्त पत्रों में से एक पत्र, जिसमें कथित एक माओवादी आतंकवादी को सम्बोधित किया गया था,जिसमें उसने प्रधानमंत्री मोदी की हत्या करने का अनुरोध किया गया था,इसी पत्र में रोना विल्सन ने कथित तौर पर गोला-बारूद और बंदूकों की आपूर्ति की चर्चा भी की थी,लेकिन अर्सेनल कंसल्टिंग की रिपोर्ट में साफतौर पर कहा गया है कि ये बात रोना विल्सन ने कभी लिखा ही नहीं,न किसी को भेजा।

बल्कि यह पत्र रोना विल्सन के कम्प्यूटर में चोर दरवाजे से सेंधमारी कर चुपके से ठूंसा गया था और हैकर ने एक मैलवेयर मतलब चोरी से काम करने वाले साफ्टवेयर के जरिए,जो अमेरिका और यूरोप के बाजारों में सिर्फ 7 डालर यानि लगभग 500 रूपये में कहीं भी आसानी से मिल जाता है, की मदद से रोना विल्सन की डिवाइस में डालकर उस पर भी नियंत्रण और जासूसी किया था। आगे बताया गया है कि रोना विल्सन को जून 2016 में एक गुमनाम व्यक्ति से कुछ ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें उनका परिचय एक साथी कार्यकर्ता के रूप में हुआ था, उस गुमनाम व्यक्ति मतलब चोर हैकर ने कथित तौर पर उन्हें नागरिक स्वतंत्रता समूह के एक बयान को डाउनलोड करने के लिए एक क्लिक करने का आग्रह किया था,लेकिन रोना विल्सन द्वारा क्लिक करने के तुरंत बाद लिंक ने नेटवायर को तैयार किया। रिपोर्ट के अनुसार चोर हैकर ने मैलवेयर का इस्तेमाल एक छिपे हुए फोल्डर को बनाने के लिए किया,जहाँ 10 गुप्त पत्र जमा किए हुए थे,आर्सेनल एजेंसी के अनुसार अक्षरों को माइक्रोसॉफ्ट शब्दों के एक काफी आधुनिकतम् वर्जन का उपयोग करके उसे तैयार किया गया था, जो कि रोना विल्सन के कम्प्यूटर में मौजूद ही नहीं था।

आर्सेनल की रिपोर्ट में कहा गया कि रोना विल्सन उस चोर हैकर्स के अकेले शिकार नहीं हुए थे,अपितु एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी अपने 2020 की रिपोर्ट में खुलासा किया है कि भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी कार्यकर्ताओं की मदद करने वाले अन्य 9 लोगों के भी कम्प्यूटरों में ईमेल के जरिए उन्हें निशाना बनाया गया था। सबसे बड़ी बात यह है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल और आर्सेनल दोनों ही एजेंसियों की रिपोर्टों में एक ही डोमेन नाम और आईपी पते सामने आए हैं, इन फर्जी पत्रों के आधार पर ही सभी कथित 16 अपराधियों को गिरफ्तार करके पिछले दो सालों से जेल में डाला गया है। ठीक इसी तरह की घटना सन् 2011 में टर्की में भी हुई थी,जब वहाँ की सत्तारूढ़ सरकार के शासक कुछ पत्रकारों पर यह गलत आरोप लगाकर कि वे वहां के शासक का तख्ता पलटना चाहते हैं,उन्हें जेल में ठूँस दिया,परन्तु जब आर्सेनल के एक्सपर्ट ने पता लगाया कि यह सब फर्जी तौर पर किया गया है,तब इसका भेद खुलने के बाद तुर्की सरकार को उन बेकसूर पत्रकारों को जेल से रिहा करना पड़ा था

रोना विल्सन और 15 अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ यह घटना उस समय घटित हुई,जब ये सभी लोग भीमा कोरागांव की लड़ाई की 200 वीं वर्षगाँठ मनाने के लिए भीमा कोरागांव क्षेत्र में इकट्ठे हुए थे,दलित समाज इसे सदियों से हर वर्ष 1जनवरी को दमनकारी उच्च जातियों के शासकों पर जीत की खुशी में एक विजयदिवस के रूप में मनाते रहे हैं। इसका इतिहास यह है कि भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी, 1818 को अंग्रेजों की महार रेजिमेंट जिसके सेनापति कैप्टन एक अंग्रेज फ्रांसिस एफ.स्टौंटन थे उनकी इस सेना में 500 पैदल सैनिक,300 घुड़सवार सैनिक और 24 तोपों के साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में, जिनकी सेना में 8000पैदल सैनिक और 20000 घुड़सवार सैनिकों के साथ भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें सिर्फ 12 घंटे युद्ध के बाद ही अंग्रेज कैप्टन जनरल जोसेफ स्मिथ की अगुवाई में अंग्रेजों की बड़ी सेना आने की संभावना सुनकर ही मराठा सेना युद्ध मैदान से पलायन कर गई और अंततः महार रेजिमेंट की विजय हो गई। इसी युद्ध की जीत के बाद महाराष्ट्र का यह दलित महार समाज हर साल 1 जनवरी को विजय दिवस के रूप में अपना यह जश्न पूरे धूमधाम से मनाता रहा है।

1जनवरी, 2018 को इसी युद्ध के 200 वीं वर्षगाँठ के अवसर पर इसको आयोजित करने वाले एल्गार परिषद के कई सदस्यों, दलित अधिकार कार्यकर्ताओं व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस सभा को सम्बोधित किया, लेकिन सत्तारूढ़ सरकार के इशारे पर कुछ धर्म और जाति के संकीर्ण विचारधारा के पोषक तत्वों ने यहां दंगे करवाकर, प्रोपेगेंडा करवाकर इस जलसे में आए विद्वान जनों को बदनाम करने का भरपूर प्रयास किया। उसके बाद उक्त वर्णित रोना विल्सन प्रकरण करके कथित प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश करने और देश की अखंडता और एकता को तोड़ने की कथित साजिश के तहत उन पर गंभीर आरोप जड़कर उन्हें पिछले दो साल पूर्व उन पर यूएपीए मतलब अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर दो साल से जेलों में सड़ाया जा रहा है। हमारे प्रधानमंत्री महोदय द्वारा लोकसभा में महज गलत आरोपों के आधार पर जेल में बंद इन दयालु, निश्छल व नेकदिल लोगों को आतंकवादी और दगाबाज कह देना उनकी सतही बुद्धि का परिचायक ही कहा जा सकता है।

भारत में वर्तमान समय में किसी भी व्यक्ति पर सत्ता के कर्णधारों के इशारे पर फर्जी धाराएं लगाकर महीनों जेल में बंद कर देना भारतीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक सामान्य सी बात हो चुकी है। आजकल पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को गलत धाराओं में गिरफ्तार करने के बाद गोदी मीडिया में उस व्यक्ति के खिलाफ बाकायदा प्रोपेगैंडा चलाया जाता है। पिछले सालों में 6300 लोगों पर कथित राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया है, उन लोगों पर यूएपीए मतलब अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट लगाकर उन्हें जेलों में ठूँस दिया गया,जबकि उनमें से मात्र 2 प्रतिशत लोगों पर ही सजा निर्धारित हो पाई है। आज मृणाल पांडेय, सिद्धार्थ वर्धराजन, राजदीप सरदेसाई, परेशनाथ आदि जैसे पत्रकारों और कांग्रेस नेता शशि थरूर जैसे नेताओं पर राजद्रोह का केस चल रहा है। यक्षप्रश्न है कि 98 प्रतिशत बेकसूर और बेगुनाह लोगों पर अनावश्यक आरोप लगाकर जेलों में ठूँसने वाले और स्टेन स्वामी जैसे अशक्त, कमजोर, तमाम रोगों से ग्रस्त बुजुर्ग को मौत के घाट उतारने वाले वर्तमान समय के सत्ता के कर्णधारों, चमचे न्यायधीशों और पुलिस के अफसरों को कौन दंड देगा ? और कब तक इनको दंड मिलेगा ? यह प्रश्न अनुत्तरित क्यों है ?
(निर्मल कुमार शर्मा लेखक और पर्यावरणविद हैं।)

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