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Categories: बीच बहस

आरोग्य सेतु ऐप से कहीं व्यक्तिगत निगहबानी तो नहीं

देश में बढ़ते कोरोना संक्रमण के मामलों के बीच केंद्र सरकार ने आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप लॉन्च किया है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड-19 ख़िलाफ़ लड़ाई में महत्वपूर्ण कदम बताया है वहीं दूसरी ओर आरोप लग रहे हैं कि यह निजता का हनन कर रहा है। साइबर क़ानून विशेषज्ञों की मानें तो एक तरफ़ ये ऐप आपके कोविड-19 स्टेटस को अपडेट करता रहता है, वहीं चौबीस घंटे आपकी लोकेशन पर भी नज़र बनाए रहता है। सवाल यह भी है कि क्या यह इलेक्ट्रानिक सर्विलांस नहीं है? यदि नहीं है तो इलेक्ट्रानिक सर्विलांस से किस तरह अलग है?
इस बीच झारखंड हाईकोर्ट ने एक अजीबोगरीब आदेश में एक पूर्व सांसद और पांच अन्य को इस शर्त पर जमानत दी है कि वे पीएम केयर्स फंड में 35,000 रुपए जमा करेंगे। साथ ही पैसे जमा करने का प्रमाण भी कोर्ट में पेश करेंगे,साथ ही रिहा होने के तुरंत बाद वे ‘आरोग्य सेतु ऐप’ डाउनलोड करें।
साइबर क़ानून विशेषज्ञों के अनुसार आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप के माध्यम से ये जो सारा डेटा एकत्रित हो रहा है आख़िर ये जा किस एजेंसी के पास रहा है, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। यही नहीं इस ऐप के ज़रिए आपका निजी मेडिकल डेटा एकत्रित होकर कहीं जा तो रहा है पर आपको अभी ये नहीं पता कि आख़िर ये सब किस साइबर क़ानून के अंतर्गत आता है। ऐसा नहीं है कि भारत में ही निजता के हनन का मामला उठ रहा है बल्कि चीन और साउथ कोरिया वाले ऐप पर भी उठे थे। वहां भी कहा गया था कि लोगों की निजता यानी प्राइवेसी भंग हो रही है। भारत वाले पर भी वैसे ही सवाल हैं।
सरकार का दावा है कि लोगों की लोकेशन और उनके मूवमेंट की जानकारी रखने वाला ये ऐप “प्राइवेसी-फ़र्स्ट” के सिद्धांत पर बनाया गया है। सरकार का दावा है कि ऐप के यूज़र का जो भी डेटा ये ऐप लेता है, वो एनक्रिप्टेड है। सरकार का ये भी कहना है कि यूज़र के डेटा का ग़लत इस्तेमाल नहीं होगा। लेकिन यही पर पेंच है। लोगों का जो डेटा लिया जा रहा है, वो आगे किस इस्तेमाल में लिया जा सकता है, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अगर डेटा को भारत सरकार के साथ साझा कर लिया जाता है, तो सरकार लोगों को बताए कि इन आकड़ों का वो आगे आने वाले समय में क्या करने वाली है? ये भी नहीं पता है कि कोरोना का संक्रमण ख़त्म होने के कितने समय बाद तक सरकार के पास ये डेटा रहेगा। लॉंच होने के तीन दिनों के भीतर इस ऐप के 50 लाख से ज़्यादा डाउनलोड हो चुके हैं।
भारत सरकार का कहना है कि इस ऐप के ज़रिए कोरोना संक्रमित लोगों और होम क्वारंटीन पर रखे गए लोगों पर नज़र रखी जा रही है और ये ऐप यूजर्स की निजता को ध्यान में रखकर बनाया गया है।विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस जैसी महामारी की आपात स्थिति से निपटने के लिए भले ही सरकार का यह क़दम एक हद तक सही लग रहा हो लेकिन अगर लोगों की निजता की बात की जाए और जो जानकारी सरकार इकट्ठा कर रही है, उसका इस्तेमाल कब तक होगा और कैसे होगा इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है जो चिंता का विषय है।
विशेषज्ञ यह भी सवाल कर रहे हैं कि एप के वर्तमान संस्करण का कोई स्पष्ट लीगल फ्रेमवर्क नहीं है, यह साफ नहीं है कि इससे मिलने वाली जानकारी को किस मंत्रालय या अधिकारी की जिम्मेदारी में सुरक्षित रखा जाएगा। अभी तक यही पता है कि सरकार द्वारा बनाई गई विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति इस एप से आ रही जानकारी की मॉनिटरिंग कर रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय इस डेटा को रखे यहां तक तो ठीक है लेकिन अगर कानून लागू कराने वाली एजेंसियां इसे एक्सेस करने लग गईं तो यह लोगों के निजता के अधिकारों का गंभीर हनन होगा। ऐसा नहीं होगा, इसकी फिलहाल कोई गारंटी नहीं है। इसे स्पष्ट करना जरूरी है।
भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. के विजय राघवन का कहना है कि इसके लिए डाटा सर्विलांस जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं जो कि बेबुनियाद हैं। उनका कहना है कि सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में और एपल-गूगल जैसी कंपिनयों ने इस तरह के सिस्टमों को लोगों के व्यापक सुरक्षा हितों के मद्देनजर लागू किया है। इसके बावजूद यह सवाल तो अपनी जगह कायम है ही कि स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कितना कम खरा उतरता है।
झारखंड हाईकोर्ट के ज‌स्टिस अनुभा रावत चौधरी ने अपने जमानत आदेश में याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि रिहा होने के तुरंत बाद वे ‘आरोग्य सेतु ऐप’ डाउनलोड करें और कोविड- 19 की रोक‌थाम के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार की ओर से जारी निर्देशों का पालन करें। छह याचिकाकर्ताओं- भाजपा के पूर्व सांसद सोम मरांडी, विवेकानंद तिवारी, अमित अग्रवाल, हिसाबी राय, संचय बर्धन, और अनुग्रह नारायण पर 15 मार्च 2012 को पाकुड़ में ‘रेल रोको’ आंदोलन करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। रेलवे न्यायिक मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ताओं को रेलवे अधिनियम की धारा 174 (ए) के तहत एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। याचिकाकर्ताओं ने सत्र अदालत के समक्ष अपील की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। बाद में उन्होंने सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में आपराधिक संशोधन याचिका दायर की थी। वे पिछले फरवरी से हिरासत में थे।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर शर्तें लगाई हैं कि याचिकाकर्ता रिहा होने से पहले पीएम केयर्स फंड में 35,000 रुपए जमा करने का प्रमाण पेश करेंगे। याचिकाकर्ता रिहा होने के तुरंत बाद ‘आरोग्य सेतु ऐप’ डाउनलोड करेंगे। कोविड-19 की रोकथाम के लिए जारी किए गए केंद्र सरकार व राज्य सरकार के निर्देशों का पालन करेंगे। याचिकाकर्ता अपने आधार कार्ड की स्व-प्रमाणित प्रति जमा करेंगे और अपना मोबाइल नंबर भी देंगे, जिसे वे अदालत की अनुमति के बिना नहीं बदलेंगे।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on April 18, 2020 8:42 pm

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