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Friday, September 24, 2021

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क्या न्यायिक नियुक्तियों में केंद्र के सामने झुक जाता है सुप्रीमकोर्ट?

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उच्चतम न्यायालय  में नौ जजों की नई नियुक्तियों की मौजूदा सूची में जस्टिस अकील कुरैशी, जस्टिस रविशंकर झा को न शामिल किया जाना विधिक और न्यायिक क्षेत्रों में चर्चा का विषय बन गई है। इसके साथ ही कलकत्ता हाईकोर्ट में नियुक्ति के लिए सुप्रीमकोर्ट कालेजियम द्वारा दो साल पहले भेजे गये 5 नामों की सिफारिश पर अभी तक केंद्र ने निर्णय नहीं लिया है, जिसमें एक नाम गोधरा कांड की जाँच करने वाले जस्टिस बनर्जी के पुत्र जस्टिस अमितेश बनर्जी का है। तो क्या यह माना जाए कि यदि किसी ने रुल ऑफ़ लॉ का पालन किया है और उसका फैसला मोदी-शाह के खिलाफ गया है तो उसका राजनीतिक रंजिश का शिकार बनना निश्चित है। जैसा जस्टिस अकील कुरैशी और अमितेश बनर्जी के साथ किया जा रहा है। और इस तरह के ज्वलंत मामलों में उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस की चुप्पी आखिर क्या संदेश देती है कि जज निष्पक्ष न्याय न करें वरना पदोन्नति में प्रताड़ित होंगे और उच्चतम न्यायालय बेचारा बनकर मूकदर्शक बना रहेगा।

भारत तो अपने लोकतान्त्रिक देश होने का दम्भ भरता है और पड़ोसी देश पाकिस्तान में लोकतंत्र पर सेना के हावी होने का दावा करता है पर क्या आपने कभी पिछले 10-15 सालों के दौरान पाकिस्तान की न्यायपालिका की स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायप्रणाली के निर्णयों पर कभी ध्यान दिया है, शायद नहीं! तो चलिए पाकिस्तान न्यायपालिका के कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों को हम बता देते हैं।      

पनामा पेपर लीक केस में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को दोषी करार दिया था। जिसके बाद नवाज ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट के जज एजाज अफजल खान ने फैसले में कहा था कि नवाज शरीफ अब पार्लियामेंट के ईमानदार सदस्य बने रहने के काबिल नहीं हैं।’ कोर्ट ने कहा कि शरीफ ने जब 2013 के जनरल इलेक्शन में नॉमिनेशन भरा था, तब उन्होंने अपने बेटे की दुबई बेस्ड कंपनी से होने वाली आय का खुलासा करने में ईमानदारी नहीं बरती थी।

वर्ष 2018 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री इमरान खान की बहन अलीमा खानम को एक सप्ताह के भीतर 2,940 करोड़ रुपये कर और जुर्माने के रूप में जमा कराने का आदेश दिया था अदालत ने विदेश में संपत्ति रखने के एक मामले में यह कार्रवाई की थी।

उच्चतम न्यायालय ने पदधारी सेना स्टाफ प्रमुख (सीओएएस) जनरल कमर जावेद बाजवा के कार्यकाल में किए गए तीन वर्ष के विस्तार का मामला था जिसे एक कड़ी कानूनी लड़ाई के बाद कम करके छह माह कर दिया था। उसी समय पाकिस्तान के पूर्व सेना स्टाफ प्रमुख और पूर्व विशेष न्यायालय की तीन-सदस्यीय न्यायपीठ ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के घोर राजद्रोह की सुनवाई में अनेक कारणों से परवेज़ मुशर्रफ को दोषी पाया जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ, संविधान को निरसित करना, आपातकाल की स्थिति घोषित करना और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को निरुद्ध करके रखना शामिल था। न्यायालय अपने 1 के मुकाबले 2 के बहुमत वाले निर्णय में इस बात के प्रति आश्वासित था कि पूर्व सीओएएस और पूर्व राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 6 के अंतर्गत परिभाषित ‘घोर राजद्रोह’ के आरोपों के दोषी हैं तथा उसने 17 दिसम्बर, 2019 को मृत्यु-दंड की सजा सुनाई। क्या भारत में यह सम्भव है?

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हिंदू मंदिर को तोड़े जाने के बाद पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2021 में सख्ती दिखाई है। सुप्रीम कोर्ट ने इमरान खान की सरकार को फटकार लगाते हुए तुरंत अपराधियों को गिरफ्तार किए जाने का आदेश दिया है। वहीं मंदिर की मरम्मत तुरंत कराने का आदेश जारी किया है।

जब केंद्र ने पिछले सप्ताह कलकत्ता उच्च न्यायालय के लिए पांच अतिरिक्त न्यायाधीशों को मंजूरी दी, तो यह सवाल उठा कि दो साल पहले की गयी 5 सिफारिशों का क्या हुआ। दरअसल केंद्र सरकार ने इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित पांच नामों को मंजूरी दे दी, लेकिन कॉलेजियम द्वारा दो साल से अधिक समय पहले भेजे गये पांच अन्य नामों की सिफारिश दबा रखी है।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नति के लिए नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अभी तक अनुमोदित न होने वाले पांच नामों में से एक वरिष्ठ अधिवक्ता अमितेश बनर्जी का नाम है। वरिष्ठ अधिवक्ता अमितेश बनर्जी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यू.सी. बनर्जी के पुत्र हैं, जिन्होंने उस जाँच आयोग का नेतृत्व किया था जिसने वर्ष 2006 में दी गयी अपनी रिपोर्ट में गोधरा में 2002 में हुए साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड में किसी भी साजिश के कोण को खारिज कर दिया था। इस अग्निकांड में 58 कारसेवक मारे गए थे और गुजरात दंगों के लिए एक बहाने के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद द्वारा नियुक्त जस्टिस बनर्जी आयोग के निष्कर्षों का जस्टिस जीटी नानावटी और एएच मेहता योग ने खंडन किया था,  जिन्होंने 2008 में दी गयी अपनी रिपोर्ट में गोधरा में ट्रेन की जलाये जाने को एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा माना था। इसके बाद, नानावती-मेहता आयोग ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी को क्लीन चिट दे दी थी ।

अमितेश बनर्जी सहित पांच नामों को केंद्र द्वारा कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नत करने के लिए मंजूरी दी जानी बाकी है, जिसकी सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 24 जुलाई, 2019 को की थी। हालांकि कॉलेजियम द्वारा 4 फरवरी, 2021 की गयी अन्य पांच नामों की सिफारिश को पिछले सप्ताह केंद्र द्वारा मंजूरी दी गई। 24 जुलाई, 2019 को, भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने जिसमें जस्टिस एनवी रमना (वर्तमान चीफ जस्टिस) भी शामिल थे ने जयतोष मजूमदार, अमितेश बनर्जी, राजा बसु चौधरी, श्रीमती लपिता बनर्जी और शाक्य सेन को कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी।

केंद्र सरकार ने नामों को वापस लेने के लिए अभी तक कोई वैध कारण नहीं बताया है। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर की शर्तों के तहत केंद्र को अपनी आपत्तियां देनी होंगी। लेकिन अगर कॉलेजियम सिफारिश को दोहराता है, तो केंद्र के पास लाइन में आने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

इसी तरह जस्टिस कुरैशी से जुड़ा विवाद पहली बार 2018 में सामने आया था। तब वे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुभाष रेड्डी की पदोन्नति के बाद इसके वरिष्ठतम न्यायाधीश के रूप में गुजरात हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनने वाले थे। हालांकि उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उन्हें पांचवें नंबर का निम्न वरिष्ठता का पद लेना था। गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने स्थानांतरण का जोरदार विरोध किया, जिससे जस्टिस कुरैशी की ईमानदारी और क्षमता की दृढ़ता से पुष्टि हुई, और उनका स्थानांतरण पूर्णतया अनुचित करार दिया गया।

मई 2019 में, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस कुरैशी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की सिफारिश की। हालांकि, केंद्र सरकार ने चुनकर जस्टिस कुरैशी की पदोन्नति की मंजूरी रोक दी, जबकि जिन अन्य नामों की सिफारिश उस सूची में की गई थी, (जस्टिस डीएन पटेल, जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम और जस्टिस आरएस चौहान को क्रमशः दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के रूप में अनुशंसित किया गया था) उन्हें केंद्र सरकार ने अनुमोदित किया था।

इसके चलते गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर केंद्र को जस्टिस कुरैशी की पदोन्नति की सिफारिश पर कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की। जस्टिस कुरैशी की पदोन्नति के मामले की पैरवी के लिए जीएचसीएए के ओर से फली एस नरीमन, अरविंद दातार, दुष्यंत दवे, यतिन ओझा, मिहिर ठाकोर, पर्सी कविता आदि जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं का एक पैनल पेश हुआ। हालांकि, केंद्र बिना कोई कारण बताए अपने पैर खींचता रहा।

सिफारिश के चार महीने बाद सितंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मिन‌िस्ट्री ऑफ जस्टिस से कुछ बातचीत के बाद अलग प्रस्ताव रखा, जिसके तहत जस्टिस कुरैशी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट,जहां तीन क्षेत्री‌य बेंच और 53 जज ‌थे, के बजाय त्रिपुरा हाईकोर्ट, जहाँ 4 जज की हाईकोर्ट थी में पदोन्नत करने की बात कही गई।

दरअसल जस्टिस कुरैशी अपने कुछ निर्णयों के कारण केंद्र सरकार के लिए एक अवांछित व्यक्ति हैं। 2010 में जस्टिस कुरैशी ने भाजपा नेता अमित शाह, जो गुजरात के तत्कालीन कनिष्ठ गृह मंत्री थे, को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ हत्या मामले में दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था। जस्टिस कुरैशी ने 2012 में एक फैसले के तहत (सेवानिवृत्त) जस्टिस आरए मेहता की लोकायुक्त के रूप में नियुक्ति को बरकरार रखा ‌था, जो राज्य सरकार के लिए एक झटका था।

2016 में नरोदा पाटिया हत्याकांड मामले में गुजरात सरकार में मंत्री माया कोडनानी और कुछ अन्य लोगों की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील पर सुनवाई से उन्हें हटाने का प्रयास किया गया था। इसमें जस्टिस कुरैशी को मामले से अलग करने की मांग की थी। मई 2018 में उनकी अध्यक्षता वाली एक पीठ ने ओड में गोधरा के बाद हुए दंगों में शामिल 19 आरोपियों की सजा को बरकरार रखा था, जहां मार्च 2002 में महिलाओं और बच्चों सहित 23 लोगों को भीड़ ने जिंदा जला दिया था।

न्यायाधीशों को कार्यपालिका के कोप का शिकार होने से बचाने में कॉलेजियम के विफल होने का यह पहला उदाहरण नहीं है। 2017 में, जस्टिस जयंत पटेल को पदोन्नति देने से इनकार करने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। चर्चा थी कि जस्टिस पटेल विवादास्पद इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की सीबीआई जांच का निर्देश देने की कीमत चुका रहे हैं। उनकी निगरानी के दौरान ही सीबीआई ने आईबी और गुजरात पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को नामजद करते हुए मामले में चार्जशीट दाखिल की थी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

  

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