Monday, August 8, 2022

क्या उदयपुर से होगा नई समझ का उदय?

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राजस्थान के उदयपुर में जो हुआ, उसके बारे में कोई लिखे भी तो क्या! इस देश की दुर्दशा कहाँ तक होगी, इसका अंदाजा लगाना ही मुश्किल है। धर्म या किसी विचारधारा के नाम पर होने वाली हिंसा मानव इतिहास में होने वाली किसी भी हिंसा की तुलना में बहुत ज्यादा भयंकर है। यह कोई सहज, सरल हिंसा नहीं जो भोजन, ज़मीन के लिए होती हो। गौरतलब है कि किसी विचारधारा के नाम पर होने वाली हिंसा को सही ठहराने वाले अगिनत मिल जाते हैं; उसे गलत ठहराने वाले भी असंख्य मिल जाते हैं। हिंसा का विभाजन हो जाता है। मेरी हिंसा, तेरी हिंसा, उसकी हिंसा में। मेरी हिंसा हमेशा सही होती है; किसी और की हमेशा गलत। विचारधारा के नाम पर, धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा इसीलिए बहुत खतरनाक है। इतिहास इस तरह की हिंसा के उदाहरणों से पटा हुआ है।   

उदयपुर में जो हुआ उससे मुस्लिम समुदाय और अधिक असुरक्षित हुआ है। मजबूत नहीं हुआ। उसके दो तथाकथित नुमाइंदों ने अपनी ‘वीरता’ दिखाकर अपने समुदाय को अधिक ताकत नहीं दी, बल्कि और कमज़ोर, असुरक्षित बना दिया है। हिंसा में भरोसा न करने वाले, भाईचारे में भरोसा करने वाले मुस्लिमों को अधिक निराश और कुंठित कर दिया है।   

जिस तरह से इस हिंसा को अंजाम दिया उससे कई बातें स्पष्ट होती हैं। एक तो यह, कि यह हत्या पहले से सोच समझ कर की गई थी, उसका प्रचार-प्रसार करना था और इस्लाम के नाम पर उसे अंजाम देकर देश के साम्प्रदायिक माहौल को और अधिक जहरीला बनाना था। इसका मकसद यही था कि देश के राजनीतिक दलों और मीडिया ने जिस विषाक्त माहौल को अपने प्रचार के जरिए लगातार बढ़ावा दिया है, उसको अपने शिखर तक पहुंचा देना। 

राजस्थान की पुलिस ने अपराधियों को गिरफ्तार करने में तेजी दिखाई है। इनसे संबंधित अदालती कार्यवाही और इनकी सजा में भी विलंब नहीं होना चाहिए। सजा इस तरह के दूसरे क्रूर लोगों के लिए एक उदाहरण बननी चाहिए और उसमें ज्यादा समय नहीं लगना चाहिए, देश ऐसी उम्मीद करता है। पर सवाल यह भी उठता है कि देश में जब चारों तरफ इस तरह का माहौल बन ही रहा है, तो प्रशासन पहले से सतर्क क्यों नहीं रहता। सारी सतर्कता और सक्रियता घटना के बाद क्यों दिखाई देती है? प्रशासन का तो दायित्व है कि वह इस तरह की घटनाओं का पूर्वानुमान लगा सके, और इनके घटित होने से पहले ही सतर्क रहे। सतर्कता हमेशा इलाज से बेहतर होती है।    

अशोक गहलोत ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी से अपील की है कि वह शांति के लिए अपील करें। इधर भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान में कांग्रेस पर यह आरोप लगाया है कि वह मुस्लिमों के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपना रही है और इसकी वजह से ही हालात इतने खराब होते जा रहे हैं। उदयपुर की घटना देश की सांप्रदायिक स्थिति में एक नए मोड़ की तरफ इशारा कर रही है और यह भविष्य में और अधिक हिंसा का कारण बन सकती है। आरोप-प्रत्यारोप से इस स्थिति में कोई सुधार नहीं होने वाला, इस बात को देश के सत्तारूढ़ और विपक्षी दल जितनी जल्दी समझ सकें, उतना ही बेहतर होगा। 

हिंसा की तरफदारी किसी हालत में भी नहीं की जानी चाहिए। यह दुःख की बात है कि भारत में कुछ राज्यों की सरकारें हिंसा फैलाने वालों के साथ खड़ी दिखती हैं। भाजपा के समर्थक सामूहिक रूप से मुस्लिमों को सज़ा देने का समर्थन करते प्रतीत होते हैं, ख़ास कर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम में तो उदयपुर की घटना के बाद इन राज्यों के भाजपा समर्थक और अधिक मुखर हो रहे हैं, मुस्लिम विरोधी विचारों को व्यक्त करने में। कानून का असमान उपयोग मुस्लिमों को और अधिक उलझन में डाल रहा है। उनके एक वर्ग को हिंसा का सहारा लेने पर भी बाध्य कर रहा है। हिंदुत्व के समर्थन में की गई हिंसा उतनी ही निंदनीय है जितनी कि इस्लाम के समर्थन में की गई हिंसा।

मुस्लिमों को यह शिकायत रही है कि पुलिस उनके खिलाफ अधिक सख्ती करती है और जब वे कानूनी मदद के लिए जाते हैं तो भी उनकी बातों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। यदि आबादी का एक बड़ा हिस्सा कानून में अपना भरोसा खो बैठता है तो चारों तरफ अराजकता और हिंसा का माहौल बन सकता है और यह देश के लिए अच्छा संकेत नहीं। इसका सीधा असर देश के उन वर्गों पर पड़ेगा जो अपनी जीविका कमाने के लिए रोज़ संघर्ष करता है और जिसे इन सियासती, मजहबी मामलों में न ही कोई रूचि है, और न ही उसे इनसे कोई फायदा है। उसे तो उदयपुर के दर्जी कन्हैया की तरह रोज सीना है। जब तक जीना है, तब तक सीना है। इससे नुकसान सिर्फ इस देश का होगा, उसके आम आदमी का होगा, और नुकसान होगा उसकी अन्तर्राष्ट्रीय छवि का।

उदयपुर में हत्या करने वाले दो लोग, उसका विडियो प्रसारित करने वाले समर्थक कहीं से भी इस देश के बारे में चिंतित नहीं हैं। उनके मन-मस्तिष्क को विष से धो डाला गया है। एक काल्पनिक जन्नत और वहां मिलने वाली हूरों की कल्पना ने उनको अंधा कर दिया है। उन्हें अपनी और अपने परिवार की फ़िक्र नहीं, वे इस देश और दुनिया की क्या फ़िक्र करेंगे! जिस मजहब के अनुसार मानव मस्तिष्क का विकास आज से चौदह सौ साल पहले ही शिखर पर पहुँच चुका है, और अब उसमें और अधिक विकास की, सवाल करने की कोई संभावना नहीं, उसके अंधभक्तों से क्या उम्मीद की जा सकती है। नयूरोप्लास्टिसीटी की वैज्ञानिक खोजों से उनका कोई संबंध ही नहीं। यह बात सिर्फ किसी ख़ास मजहब के लोगों के लिए नहीं, बल्कि तथाकथित उदार और समावेशी हिन्दू धर्म पर भी लागू होती है जिसके कई समर्थकों ने सवाल करना, संवाद करना छोड़ दिया है।

देश के दुश्मन ऐसी ही घटनाओं के इन्तजार में बैठे रहते हैं। इन घटनाओं को लेकर देश-विदेश से निंदाओं की बौछार होने लगती है। भारत सांप्रदायिक उपद्रव की कढ़ाई है, यह बात इस तरह की घटनाओं से ही फैलती है। इसके दूरगामी परिणाम समूचे देश को ही झेलने पड़ते हैं। कारोबारी हमेशा एक शांत और स्थाई वातावरण चाहते हैं, जिसमें उनका निवेश सुरक्षित रहे। वे अशांत माहौल नहीं चाहते। इस तरह की घटनाएँ उन्हें देश में निवेश करने से रोकती हैं। क्या उदयपुर की घटना से इस देश में, सत्तारूढ़ दल में, तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों में किसी नई समझ का उदय होगा। ये सभी इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

इस देश के वामपंथी भी अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते क्योंकि उन्होंने भी मौका मिलते ही धर्म का उपयोग/दुरुपयोग किया है। समूचे देश के उत्थान में किसी भी दल की रूचि नहीं। सभी अपने अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए राजनीति कर रहे हैं। इस देश के हर समझदार नागरिक को यहाँ के राजनीतिक दलों के रवैये पर शर्म आती है, यहाँ के धार्मिक गुरुओं, मुल्लों, पादरियों पर शर्म आती है। वे शायद भय या अपनी सुरक्षा की चिंता करते हुए इनके खिलाफ बोल नहीं पाते, या बोलना नहीं जानते। यदि सरकार के साथ देश के सभी वर्गों ने इस संबंध में गंभीरता से विचार नहीं किया और सौहार्द्र का वातावरण तैयार करने में अपना योगदान नहीं दिया, तो भारत साम्प्रदायिक घृणा की उबलती हुई कढ़ाई के रूप में पूरी दुनिया में विख्यात हो जाएगा। इस दिशा में हम पहले ही कई कदम बढ़ा चुके हैं।

(चैतन्य नागर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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