कौन चाहता है टीचर बनना!

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सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्य इस कदर बदलते जा रहे हैं कि कभी देवता और गुरु जी कह कर पूजे जाने वाले शिक्षक खिसकते-खिसकते अब सामाजिक जीवन के हाशिये पर चले गए हैं। आदरणीय गुरु जी तेजी से मास्साब में तब्दील होते जा रहे हैं। शिक्षक बनने के इच्छुक और वर्तमान में शिक्षण के काम में लगे लोगों की मनोदशा, पेशेवर स्तर और शिक्षण के प्रति उनके समर्पण के बारे में लगातार बातचीत,संवाद और विवाद होता रहा है। शिक्षक दिवस के बहाने इस बातचीत को नए सिरे से शुरू करने की जरूरत है।   

फ़िनलैंड ने शिक्षा जगत में अद्भुत प्रयोग किये जिसकी चर्चा हर देश में होती रहती है। वहां एक शिक्षक को किसी डॉक्टर या वकील के बराबर तनख्वाह दी जाती है पर हमारे देश में शिक्षकों को लेकर बड़ी नकारात्मकता या उदासीन सोच बनी हुई है। मैंने कॉलेज में अपनी कक्षाओं में ही जब भी बच्चों से पूछा कि उनमें से कितने लोग शिक्षक बनना चाहते हैं, तो कभी शायद ही किसी ने ‘हाँ’ कहा हो।

जिन थोड़े बच्चों ने शिक्षक बनने की इच्छा जाहिर की वे संपन्न परिवार के थे और एक अलग किस्म के सृजनशील शिक्षक बनना चाहते थे। शिक्षक को लेकर उनके अपने रोमांटिक विचार थे। कुछ आर्थिक रूप से बहुत ही कमज़ोर थे, और शिक्षक की नौकरी ही उनका अंतिम स्वप्न थी। पर आम तौर कोई शिक्षक बनने की ख्वाहिश नहीं रखता। बड़े शहरों में पढ़ने वालों से पूछा जाए कि कौन सा छात्र शिक्षक बनना चाहता है, तो शायद ही कोई छात्र ‘हाँ’में जवाब देगा। 

शिक्षक के पेशे के इतने कम लोकप्रिय होने के कई कारण हैं। बदलता सामाजिक माहौल और नीतियों में परिवर्तन इन कारणों में शामिल है। उपभोक्तावादी समाज में एक आदर्श शिक्षक ढूंढना कोई आसान काम नहीं।वह भी युवा वर्ग से। समाज में परिवर्तन लाने की जरूरत महसूस करने और इस दिशा में काम करने के लिए एक किस्म का आदर्शवाद जरूरी है। कुछ युवा बड़े उत्साह के साथ इस पेशे में आते भी हैं, पर संस्थान के माहौल और अनावश्यक प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कामों के दबाव के कारण बड़ी जल्दी मुरझा जाते हैं। कई रिहायशी स्कूलों में शिक्षकों को पढ़ाने के अलावा वार्डन का काम भी दे दिया जाता है। या तो शिक्षक मशीन में तब्दील हो जाते हैं या फिर किसी और काम की तलाश में शिक्षण का काम ही छोड़ देते हैं। 

हालांकि पूरी तरह नकारात्मक होना सही नहीं क्योंकि यह बात भी सही है कि तमाम उलझनों के बाद भी देश में अलग-अलग स्तरों पर लाखों शिक्षक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने काम के प्रति समर्पित हैं। कुछ की अभिभावक भी तारीफ करते हैं, पर आम तौर पर वे अपने बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों से नाराज ही रहते हैं। इसका उपभोक्तावादी, पूंजीवादी सोच से गहरा संबंध है। माता-पिता पढ़ाई पर होने वाले खर्च को ‘निवेश’ की तरह देखते हैं, और उसमें अच्छे ‘रिटर्न’ की उम्मीद करते हैं। इसके लिए वे शिक्षकों और प्रिंसिपल पर लगातार निगाहें गड़ाए रखते हैं।

अभिभावकों को ज़रा भी अंदाज नहीं कि आम तौर पर निजी स्कूलों में तो शिक्षक को कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है। कई ऐसे काम जो शिक्षक के लिए हैं ही नहीं, वे भी निपटाने पड़ते हैं। रिहायशी स्कूलों में एक ही शिक्षक पढ़ाता भी है, और हॉस्टल में रहकर वार्डन का भी काम करता है। इस तरह वे वह चौबीसों घंटे व्यस्त रहता है। और सरकारी स्कूलों में न पर्याप्त शिक्षक होते हैं, और न ही अभिभावक उनकी नाक में दम करने का अवसर पाते हैं। मनीष सिसोदिया और केजरीवाल के स्कूलों के यूटोपिया में तो शिक्षा मंत्री रोज़ स्कूलों में गए बगैर भोजन भी नहीं करता! पर यह कितना सच है, और कितना झूठ यह बताना इतना आसान नहीं। क्योंकि दिल्ली के स्कूलों के बारे में कई अजीबो गरीब और हास्यास्पद ख़बरें भी आती रहती हैं।     

जितने शिक्षकों को इन दिनों नियुक्त किया जाता है उनमें से अधिकाँश का प्रशिक्षण आधुनिक सुविधाओं से लैस प्रशिक्षण संस्थानों में नहीं हो पाता। उम्दा पेशेवर ट्रेनिंग के अभाव में उनकी शिक्षण की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। यह कोई नई समस्या नहीं है। पर राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (एनसीटीई) के लाइसेंस राज के दौरान इसकी स्थिति बदतर हुई है। इसकी स्थापना के पहले शिक्षकों की ट्रेनिंग के लिए कोई ऐसा संगठन नहीं था जो प्रशिक्षण देने वाले संस्थानों को लाइसेंस जारी करे। लाइसेंस देने की जब शुरुआत हुई तो भ्रष्टाचार भी बढ़ा और इसका असर पेशेवर प्रशिक्षण पर पड़ा।   

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में प्रशिक्षित शिक्षकों की मांग इस बीच काफी बढ़ गई। इसकी तैयारी के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए कई संस्थान भी खुल गए हैं। पत्राचार के जरिये प्रशिक्षण का रिवाज भी तेजी से बढ़ा है। शुरुआत में तो ऐसा प्रतीत हुआ कि एनसीटीई शिक्षकों के प्रशिक्षण पर निगाह बनाये रखेगा, पर बाद में जब निजी संस्थानों ने अपने वाणिज्यिक हितों के साथ प्रशिक्षण के इलाके में प्रवेश किया, तो परिषद् की भूमिका कमज़ोर पड़ गई। इसका भी शिक्षकों के प्रशिक्षण पर बुरा असर पड़ा है। शिक्षकों के प्रशिक्षण को लेकर धोखाधड़ी भी खूब होने लगी। फर्जी डिग्रियां बिकने लगीं और इन सभी का प्रभाव पड़ा बच्चों की शिक्षा पर।     

नई शिक्षा नीति के तहत चार साल का एक समेकित कोर्स प्रारंभ किया गया है जिसमें स्नातक और शिक्षक-प्रशिक्षण की पढ़ाई एक साथ करवाई जाएगी। इसकी सफलता भी निर्भर करेगी इस बात पर कि बुनियादी सुविधाओं वगैरह पर कितना व्यय किया जाता है। इस क्षेत्र में भी लाभ कमाने में लिप्त निजी क्षेत्र की अच्छी-खासी घुसपैठ है और इसलिए शिक्षकों के सही प्रशिक्षण की चुनौती यथावत बनी रहेगी।

शिक्षकों की ट्रेनिंग की गुणवत्ता से स्कूली शिक्षा पर बहुत गहरा असर पड़ता है। उम्मीद की जाती है कि केंद्र और राज्य की सरकारें इस मामले में संवेदनशील बनेंगी। इसके लिए शिक्षक योग्यता परीक्षा (टीईटी) शुरू की गई है, पर इसमें दिक्कत यह है कि इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले प्रशिक्षित शिक्षकों की संख्या बहुत कम होती है, जबकि शिक्षकों की आवश्यकता बहुत अधिक है। इस वजह से ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति लगातार की जाती है जो प्रशिक्षित नहीं और इसका भी असर आखिरकार बच्चों की शिक्षा पर ही पड़ता है। विभिन्न राज्यों में ऐसे शिक्षकों को अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है।

 उन्हें रिसोर्स पर्सन के रूप में भी नियुक्त किया जाता है। शिक्षा व्यवस्था के बाहर भी वे बड़ी संख्या में मौजूद हैं। वे घरों में ट्यूशन पढ़ाते हैं, और कोचिंग सेंटर्स चलाते हैं, या फिर उनमें शिक्षण का काम करते हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था का यह एक ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है जहाँ सरकार के नियम कानून काम नहीं करते। कोचिंग केन्द्रों में शिक्षण सिर्फ कमाई का एक साधन होता है। एक नेक काम के रूप में शिक्षण का मखौल ही उड़ाया जाता है।       

शिक्षकों की गुणवत्ता में गिरावट कब से शुरू हुई यह बताना तो मुश्किल है, पर यह लगातार जारी है। पिछले दो दशकों में कई आर्थिक और सामाजिक बदलाव हुए हैं जिसकी वजह से शिक्षक हाशिये पर चला गया है। कभी भारतीय शिक्षक राष्ट्र निर्माता हुआ करता था। आजादी की लड़ाई में उसका महान योगदान था। अब वह सार्वजनिक जीवन के हाशिये पर खड़ा है। धन के पीछे लगी आज की पीढ़ी धन और शोहरत की तुलना में बुद्धि और गहरी समझ को कम महत्त्व देती है, और इसी अनुपात में शिक्षक का महत्त्व भी घटा है।

हर स्तर पर शिक्षकों के अपमान की घटना अब आम बात हो गई है। बचपन में माता पिता के बाद बच्चों के जीवन में शिक्षक की ही सबसे अहम् भूमिका होती है। डिजिटल युग में शिक्षक को नई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। उसके सामने प्रतिद्वंद्वी के रूप में सोशल मीडिया और इन्टरनेट अनेकों रूप में खड़े हैं। उसे अपने पेशे के भीतर, शिक्षा व्यवस्था के बाहर-भीतर से और साथ ही डिजिटल युग के साथ जूझना पड़ रहा है। कभी पूजा जाने वाला शिक्षक नये भारत में अक्सर बहुत ही दुर्बल और असहाय नज़र आ रहा है।

(लेखक, पत्रकार और अनुवादक चैतन्य नागर की रिपोर्ट।)

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